
- January 12, 2026
- आब-ओ-हवा
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विश्व पुस्तक मेले के संदर्भ में विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
किताबों का मूल्य अमूल्य
पुराना समय स्कूलों में हस्तलिखित व सायक्लोस्टाइल पत्रिकाओं का ज़माना था। हमने वह ज़माना भी जिया है जब रचना करते थे, सुंदर हस्तलेख में लिखते थे। एक पता लिखा, टिकिट लगा लिफ़ाफ़ा साथ रखते थे कि यदि संपादक जी को रचना पसंद न आयी तो “संपादक के अभिवादन व खेद सहित” रचना वापस मिल जाएगी, कहीं और छपने के लिए भेजने को। फिर डाक निकलने के समय से पहले चिट्ठी लाल डिब्बे में डालने जाते थे। रचना छपने से पहले उसकी स्वीकृति आ जाती थी। बुक स्टॉल पर जाकर पत्रिका के नये अंक उलटते-पलटते थे, इस जिज्ञासा में कि रचना छपी? फिर पारिश्रमिक का चैक या मनीआर्डर, जिसे अपेक्षा से बहुत कम होने के चलते कई पत्रिकाएं “पत्रं पुष्पं” लिखती थीं, आता था। कितना मज़ा था, यह सारी प्रक्रिया अनवरत जीवनचर्या बन गयी थी। इसे हम मित्रमण्डली में लेखनसुख कहते थे। जब कोई ख़ूब छप चुकता था, तब उसकी किताब छपने की बारी आती थी। रॉयल्टी के एग्रीमेंट के साथ प्रकाशक के आग्रह पर किताबें छपती थीं।
ईमेल ने और आरटीजीएस पेमेंट सिस्टम ने आज के लेखकों को इस सुख से वंचित कर दिया है। सिद्धांत है कि ढेर-सा पढ़ो, ख़ूब-सा गुनो, तब थोड़ा-सा लिखो। जब ऐसा लेखन होता है तो वह शाश्वत बनता है, पर आज लिखने की जल्दी ज़्यादा है, छपने की उससे भी ज़्यादा। हर डायरी अब पुस्तक बन रही है।
आज सम्पादक की कसौटी से अपनी रचना गुज़ारना पसंद न हो तो ब्लॉग, फ़ेसबुक पोस्ट जैसे संसाधन हैं। सीधे कम्प्यूटर पर लिखो और एक क्लिक करते ही दुनिया भर में छप जाओ। रचना की केवल प्रशंसा ही सुननी हो और आपकी भक्तमण्डली बढ़िया हो तो व्हाट्सअप ग्रुप बना लो, आत्ममुग्ध रहो।
इस सारे आधुनिकीकरण ने डेटाबेस में भले ही हिन्दी किताबों की संख्या और पत्रिकाओं का सर्क्युलेशन बढ़ा दिया हो पर वास्तविक पाठक कहीं खो गया है। लोग ठकुरसुहाती करते लगते हैं। एक दिन मेरी एक कविता अख़बार के साप्ताहिक परिशिष्ट में छपी, मेरे एक मित्र मिले और उन्होंने उसका उल्लेख करते हुए मुझे बधाई दी। मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि आज भी अच्छी रचनाओं के पाठक मौजूद हैं, पर जैसे ही मैंने उनसे रचना के कथ्य पर चर्चा की, मुझे समझ आ गया कि उन्होंने मेरे नाम के सिवाय रचना में कुछ नही पढ़ा था और वे मुझे बधाई भी इस बहाने केवल इसलिए दे रहे थे क्योंकि मेरे सरकारी ओहदे के कारण उनकी कोई फ़ाइल मेरे पास आयी हुई थी। पाठकों की इसी गुमशुदगी के चलते नये-नये प्रयोग चल रहे हैं। कविता पोस्टर बनाकर प्रदर्शनी लगायी जा रही है। काव्य-पटल बनाकर चौराहों पर लोकार्पित किये जा रहे हैं। किसी भी तरह पाठक को साहित्य तक खींचकर लाने की पुरज़ोर कोशिशें हो रही हैं। इन्हीं प्रयासो में से एक है “पुस्तक मेला”, जहाँ लेखकों, पाठकों और प्रकाशकों का जमघट लगता है। सरकारी अनुदान से स्कूल-कॉलेज के पुस्तकालयों के लिए किताबें ख़रीदी जाती हैं, जिनसे आंकड़े कुछ प्रदर्शन योग्य हो जाते हैं। कुछ स्कूल अपने छात्रों को ग्रुप में और चन्द माता-पिता अपने बच्चों में पठन-पाठन के संस्कार डालने के लिए उन्हें इन मेलो में लेकर आते हैं। ये और बात है कि ये बच्चे किताबों के इन मेलों से किताबें कम स्टेशनरी आदि अधिक ले जाते हैं।
साहित्यिक प्रकाशकों के पण्डालों पर नये लेखकों का, प्रकाशकों और धुरंधर समीक्षकों तथा सुस्थापित लेखकों से साहित्यिक संपर्क हो जाता है, जिसे वे आगे चलकर अपनी क्षमता के अनुरूप इनकैश कर पाते हैं। अन्यत्र पूर्व विमोचित किताबों का पुनर्विमोचन होते भी हमने इन मेलों में देखा है, किसी भी तरह किताब को चर्चा में लाने की कोशिश होती है। लोकार्पण, प्रस्तुतिकरण, समीक्षा गोष्ठी, किताब पर चर्चा, एक कवि एक शाम, लेखक-पाठक संवाद, लेखक से सीधी बात, वग़ैरह वग़ैरह वे जुमले हैं, जो शब्दों के ये खिलाड़ी उपयोग करते हैं और आयोजन को सफल बनाने में जुटे रहते हैं। महिला कवि विशेष अटेंशन पाती हैं, यदि उनका कंठ भी अच्छा हो तो तरन्नुम में काव्यपाठ स्टॉल की भीड़ बढ़ा सकता है। कोई लोकल अख़बार यदि प्रकाशकों से विज्ञापन जुटा पाया तो मेला विशेषांक छापकर मुफ़्त बांट देता है। मेले के दिनों में लोकल टीवी चैनल वालों को भी एक सकारात्मक काम मिल जाता है।
दुनिया में यदि कोई वस्तु ऐसी है, जिसके मूल्य निर्धारण में बाज़ार का ज़ोर नहीं है तो वह किताब ही है। क्योंकि किताब में इंटेलेक्चुएल प्रॉपर्टी संग्रहीत होती है जो अनमोल होती है। यदि लेखक कोई बड़ा नाम वाला आदमी हो या किताब में कोई विवादास्पद विषय हो तो किताब का मूल्य लागत से क़तई मेल नही खाता या फिर यदि लेखक अपने दम पर किताबों की सरकारी ख़रीद करवाने में सक्षम हो तो भी किताब का मूल्य, कंटेंट या किताब के गेटअप की परवा किये बिना कुछ भी रखा जा सकता है।
अब किताबें छपना बड़ा आसान हो गया है। ई-बुक तो घर बैठे छाप लो। यदि प्रकाशक को नगद नारायण दे सकें तो किताब की दो-तीन सौ प्रतियां छपकर सीधे आपके घर आ सकती हैं, जिन्हें अपनी सुविधा से किसी बड़े किताब मेले में या पाँच सितारा होटल में डिनर के साथ विमोचित करवा कर और शॉल, श्रीफल, मानपत्र से किसी स्थानीय संस्था के बैनर में स्वधन से सम्मानित होकर कोई भी सहज लेखक बनने का सुख पा सकता है।
पिछले ज़माने की फ़िल्मों के मेलों में भले ही लोग बिछड़ते रहे हों पर आज के साहित्यिक परिवेश में मुझे पुस्तक मेलों में मेरे गुमशुदा पाठक की तलाश है। उस पाठक की जो धारावाहिक उपन्यास छापने वाली पत्रिकाओं के नये अंकों की प्रतीक्षा करता हो, उस पाठक की जो खरीदकर किताब पढ़ता हो, जिसे मेरी तरह बिना पढ़े नींद न आती हो, उस पाठक की, जो भले ही लेखक न हो पर पाठक तो हो, ऐसा पाठक जो साहित्य के लिए केवल अख़बार के साहित्यिक परिशिष्ट तक ही सीमित न हो, उस पाठक की जो अपने ड्रॉइंग रूम की अल्मारी में किताबें सजाकर भर न रखे वह उनका पायक भी बने, ऐसा पाठक आपको मिले तो ज़रूर बताइएगा। आज साहित्य जगत के पास लेखक हैं, किताबें हैं, प्रकाशक हैं… चाहिए कुछ तो बस पाठक।
आज ऐसे लेखक कितने हैं जिन्हें प्रकाशक ख़ुद छाप रहे हैं या रॉयल्टी आदि दे रहे हैं? 100 में से 99 बार यह है कि लेखक को ही वह वित्तीय भार उठाना पड़ रहा है जो कभी प्रकाशक और पाठक उठाया करते थे।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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प्रिय पाठक
वर्ना कौन कवि होता है इतना भाग्यशाली
जो अपने घर से चले
और सीधे पहुँच जाए
उस दुर्लभ -अदृश्य द्वार पर
जो एक पाठक का होता है।
—केदारनाथ सिंह