
- January 3, 2026
- आब-ओ-हवा
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हास्य-व्यंग्य मुकेश असीमित की कलम से....
मीटर टेप के साये में-दो पहाड़ों का संवाद
दो पहाड़ – एक बड़का भैया, एक छुटका भैया बरसों से बगल-बगल खड़े थे। एक ही माँ, पृथ्वी की संतान; क़द-काठी में फ़र्क, पर दायित्व में बराबरी। दोनों ने ही धरती को थामे रखा, हरियाली की चादर ओढ़ाये रखी। मगर इंसान की आदतें कहाँ बदलती हैं। उसने छुटके के कान भरने शुरू किये – तेरी जगह अब यहाँ नहीं; तुझे जान-बूझकर छोटा रखा गया; असली बेटा तो बड़का है। चल, तुझे शहर ले चलते हैं, वहाँ नाम बदलेगा, पहचान बनेगी।
छुटका बातों में आ गया। उसे भरोसा दिलाया गया कि “पहाड़” नाम का कलंक हटेगा। कहा गया – तू नव-निर्माण की नींव है; तेरे ऊपर इमारतें उठेंगी; तू काम आएगा। पहली बार उसे लगा कि खड़ा रहना नहीं, उपयोगी होना ज़रूरी है।
“बड़के भैया… सुना है हम दोनों का बिछोह होने वाला है!” छुटका चुप्पी तोड़ता है। आवाज़ में उत्सुकता है, दुख कम। बड़का भैया गहरी साँस लेता है। “हाँ छुटके, पर तू ख़ुश क्यों है? हज़ारों साल से हम संग-संग खड़े हैं- धूल, आँधी, बर्फ़ सब झेली। यही सोचते रहे कि धरती माँ को नंगा होने से बचाए हैं हम। और अब… तुम्हें ले जाया जा रहा है।”
छुटका मुस्कुराता है। “भैया, पहली बार किसी ने मेरी सुध ली है। तुम्हारे पास खड़े-खड़े भी मेरी पूछ नहीं हुई। मैं ऊब गया था! भेड़-बकरियाँ मुँह पर चढ़तीं, पशु-पक्षी जब चाहें मुंह उठाये आते और घर बना लेते। बदले में मिला? धूल, बौछारें, लीद और बीट। अब इंसानों की दुनिया देखनी है। सुना है शहर चमकते हैं, फ्लैट ऊँचे होते हैं। क्या पता, मैं किसी बुलंद इमारत का हिस्सा बन जाऊँ! किसी मंच का पत्थर, किसी माला का हीरा। शायद ‘बुलंद भारत’ की तस्वीर का फ़्रेम भी मेरी देह से बने।”
बड़का भैया सख़्त हो उठता है। “तुम्हें इसमें खुदाई दिख रही है वाह! इंसान अपनी ‘खुदाई’ भूल चुका है। ये जंगल काटकर ख़ुद जंगली हो रहे हैं। सच ही तो है अब जब दरिंदे पशु शहरों में बस गये हैं, तो इन्हें पहाड़ों की ज़रूरत क्या?”

छुटका व्यंग्य से कहता है। “भैया, आदमी जितना छोटा होता जाता है, उतनी बड़ी हरकतें करता है। मुझे भी वही सीखनी है। हम पहाड़ उसकी महत्त्वाकांक्षाओं के रास्ते में जड़ता बनकर खड़े रहे इसीलिए खटकते हैं।”
“पर तुम्हें ज़रा भी दुख नहीं?” बड़का पूछता है।
“किस बात का?” छुटका पलटता है। “मुझे तो फ़ायदा दिखता है। ‘पहाड़’ नाम में जड़ता है। आज नाम बदलने का दौर है। कल हमें भूखंड, उभार, संसाधन, संपदा, खनिज-खान कहा जाएगा—ताकि हटाये जाते वक़्त नाम का नशा हो और शहादत भी उत्सव लगे। सब शहर की ओर भाग रहे हैं, तो मैं क्यों न भागूँ? धरती रेगिस्तान हो जाये, तो क्या? आदमी अपनी बरबादी का ठीकरा ख़ुद उठाने को तैयार है।”
बड़का भैया बेचैन होकर याद दिलाता है- कैसे उसने सदियों तक ढाल बनकर शहरों को धूल से बचाया; कैसे दुर्दिनों में महाराणा प्रताप को शरण दी; कैसे आदिवासी समाज की युद्धस्थली और शरणस्थली बना। बिना पुरस्कार, बिना प्रमाणपत्र… बस खड़ा रहा।
छुटका ठहाका लगाता है। “शहर तो वैसे भी गैस चैम्बर हैं। चिमनियाँ, पराली, वाहनों का धुआँ, सबने हवा रौंद दी। तुम्हारे होने-न होने से अब क्या फ़र्क?”
बड़का फिर समझाता है। “देख छुटके, अब खुदाई इंसानों में नहीं, पहाड़ों में दिखती है। पेड़ नहीं कटते, माँ के हिलते हाथ कटते हैं। जहाँ हमारा अस्तित्व मिटा, वहाँ ग्लेशियर पिघले, गंगोत्री की तपस्या भंग हुई।”
छुटका ठंडे व्यंग्य से कहता है। “अलंकारों से दुनिया नहीं चलती। दूध की नदियाँ कहाँ? नदियाँ बाँधों में क़ैद हैं। कहते हैं, हाथ ख़ून से रंगे हैं; सच होता तो रंगे हाथ पकड़े जाते। इंसानों के क़ानून तो इंसानों पर ही चलते हैं। कण-कण में शंकर मानने वालों को पहाड़ों के कण-कण का खनन क्यों अखरता है? कण-कण में खनिज भी है। पेड़ पूजनीय हैं, उन्हें एसी रूम के फ़र्नीचर में बदल दो, पूजा आसान हो जाती है।”
बड़का भैया बुदबुदाता है- “संभल… हथौड़ा चल रहा है।”
दूर कहीं हथौड़ों की गूँज है। दृश्य एक कटु सच्चाई पर टिकता है- माँ के नाम पर ख़ुशी कितनी देर? इंसानी दरिंदे इस धरती माता को किसी की माता नहीं रहने देंगे।
(कार्टून/ग्राफ़िक : मितेश द्वारा रचित)

डॉ. मुकेश असीमित
हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।
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