
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....
धर्मेंद्र पर फिल्माये वो लीक से हटकर गाने
धर्मेंद्र की बेमिसाल शख़्सियत की बात करें तो एक अलग किताब लिखना पड़ सकती है। उनकी जाबांज़ी, उनके रोमांटिक स्वभाव, उनकी दिलेरी और रूह तक डूबकर अभिनय करने की क्षमता धर्मेंद्र को अलग मुकाम अता करती है। अगर धर्मेंद्र के 6 दशकों से अधिक के फ़िल्मी करियर में उन पर फिल्माये गीतों के ज़रिये उन्हें याद करने की कोशिश करें तो चंद उन गीतों का ज़िक्र लाज़मी हो जाता है, जो धर्मेंद्र की ख़ूबसूरत आंखों और लिपसिंक करने के दिलचस्प अंदाज़ के कारण लीक से हटकर साबित हुए। हालांकि इनमें से कुछ गीत इसलिए कम सुने रह गये क्योंकि वे फ़िल्में नहीं चल पायीं।
ऐसे गानों में सबसे ऊपर फ़िल्म शोला और शबनम का गीत रखना होगा। कैफ़ी आज़मी के बोल और ख़ैयाम का संगीत। “जाने क्या ढूंढ़ती रहती हैं ये आंखें मुझमें, राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है..” श्वेत-श्याम दौर की इस फ़िल्म में गाने का फ़िल्मांकन करते समय धर्मेंद्र को ज़्यादातर प्रोफ़ाइल में लिया गया है। अपने बचपन का प्यार रही संध्या (तरला) को ठीक अपने सामने पाकर रवि (धर्मेंद्र) यह बताना चाहता है कि वो उसके प्यार को स्वीकार नहीं कर सकता। गाने में धर्मेंद्र का प्रोफ़ाइल इन पंक्तियों में चमकता है:
जिसकी तस्वीर निगाहों में लिये बैठी हो
मैं वो दिलदार नहीं
उसकी हूं ख़ामोश चिता
ख़ैयाम का संगीत, रफ़ी की आवाज़ और धर्मेंद्र की अदायगी, सब मिलकर एक मीठी आरी की तरह देखने वाले के सीने चाक कर देते हैं। कहते हैं इस गाने की रिकॉर्डिंग के समय रफ़ी साहब को एक सौ दो बुख़ार था। इसके बावजूद गाने को सौ फ़ीसदी न्याय सिर्फ़ उनके जैसे अमर गायक ही दे सकते थे।

ऐसा ही एक गाना, जो धर्मेंद्र की शख़्सियत का अनूठापन पूरे दमखम से दर्शकों के दिलों पर चस्पां करता है वो है- “या दिल की सुनो दुनिया वालो, या मुझको अभी चुप रहने दो”। फ़िल्म है अनुपमा, निर्देशक हैं ऋषिकेश मुखर्जी और इस गाने को गाया है हेमंत कुमार ने। उन्हीं का संगीत भी है। एक बड़े से हॉल में संभ्रांत और धनी-मानी लोगों के बीच सादगी भरी वेशभूषा में धर्मेंद्र पूरी महफ़िल को अपने गायन में छिपे फ़लसफ़े से अवाक रख छोड़ते हैं। इसीलिए ऋषिदा का कैमरा लगभग एक जगह स्थिर रहकर फिल्मांकन करता है और जब कैमरा घूमता भी है, तब भी लोग एकदम बहुत बने हैं, जिसे थिएटर की भाषा में फ़ीज़ हो जाना कहते हैं।
ऋषिदा ने अपनी अगली फ़िल्म सत्यकाम में धर्मेंद्र पर एक मस्ती भरा गीत फ़िल्माया है, जो याद रह जाता है। मुकेश, किशोर कुमार और महेंद्र कपूर के गाये इस गीत में असरानी, संजीव कुमार भी उनके साथ दिखते हैं। “लट्टू नहीं है, लड़की नहीं है ज़िंदगी है सच्चाई” कहते धर्मेंद्र जैसे फ़िल्म सत्यकाम के पूरे कथासार का भाव अपने चेहरे से साकार कर देते हैं। कभी-कभी लगता है रफ़ी साहब के गानों में तो धर्मेंद्र ने हर बार बेहतरीन ही दिया लेकिन मुकेश के गले के दर्द को पर्दे पर धर्मेंद्र ने जिस शिद्दत से उतारा, उसका भी जवाब नहीं। याद करें पूर्णिमा फ़िल्म का गीत “तुम्हें ज़िंदगी के उजाले मुबारक, अंधेरे हमें आज रास आ गये हैं”। कल्याणजी आनंदजी के राग दरबारी कानड़ा पर आधारित इस गाने की एक ख़ासियत यह भी है कि गीतकार गुलज़ार ने इसे अपनी चिर-परिचित शैली की जगह तत्कालीन दौर के गीतकारों की शैली में ग़ज़ल के अंदाज़ में लिखा है।
यूं धर्मेंद्र के लिए रज़िया सुल्तान में कब्बन मिर्ज़ा के गाये गीत- “आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे” को संगीतप्रेमी कभी भुला नहीं सकते। मगर जाने क्यों गाने की लिपसिंक पर कमाल अमरोही जी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। चलते-चलते उन दो गानों का ज़िक्र भी कर दूं जो उम्दा थे पर ख़ास मक़बूल नहीं हुए। इनमें एक है फ़िल्म ‘चन्दन का पलना’ का धर्मेंद्र और मीना कुमारी पर फिल्माया गीत- “तुम्हें देखा है मैंने गुलसितां में, कि जन्नत ढ़ूंढ ली है इस जहां में”। आश्चर्य कि संगीतकार हैं पंचम यानी राहुल देव बर्मन लेकिन तर्ज़ और रिद्म पैटर्न पर उनके पिता के संगीत संयोजन का प्रभाव साफ़ दिखायी देता है।
दूसरा गाना कुमकुम और धर्मेंद्र पर फ़िल्माया है- “ये वादा करें, जहां भी रहें, तुम हमारे रहो हम तुम्हारे रहें”। मुकेश और लता के गाये इस दोगाने में धर्मेंद्र का जलवा देखते ही बनता है जबकि ये उनकी पहली फ़िल्म थी। वैसे मीना कुमारी और धर्मेंद्र पर फ़िल्माया “हमसफ़र मेरे हमसफ़र, पंख तुम परवाज़ हम” सर्वकालिक लोकप्रिय और मधुर गीतों में एक है।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
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“जाने क्या ढूंढ़ती रहती हैं ये आंखें मुझमें, राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है..” बहुत यादगार गीत का ज़िक्र किया आपने। सुनना पड़ेगा अब। शुक्रिया।
बहुत शुक्रिया आपका।जरूर सुनाएगा।…”कैसे बाजार का दस्तूर तुम्हें समझाएं,बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता ” ये पंक्तियां आज के नयी पीढ़ी के भी सुनने वाले के रोंगटे खड़े कर जाती हैं।