
- February 28, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
दूब: हर चौथे मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी
हरियश राय हिंदी के उन उल्लेखनीय कथाकारों में हैं, जो निरंतर लेखन कर रहे हैं और अपनी कहानियों व उपन्यासों के ज़रिये सामाजिक विसंगतियों को पाठकों के सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। यह लेखकीय ऊर्जा और निरंतर सक्रियता उनके सामाजिक, मानवीय सरोकारों के प्रति उनकी चिंता और संवेदनशीलता को प्रदर्शित करती है। हिंदी कथाकारों की अग्रिम पंक्ति में शामिल हरियश राय के चार उपन्यास, आठ कहानी संग्रह के अलावा लगभग आठ संपादित और आलोचनात्मक पुस्तकें भी हैं। अभी हाल में उनकी एक और महत्वपूर्ण पुस्तक विभाजन की विभीषिका और भारतीय कथा साहित्य भी आ चुकी है।
मेरे सामने उनका ताज़ा उपन्यास ‘दूब’ है, जो सेतु प्रकाशन से छपा है। इस उपन्यास में हरियश राय पहाड़ों में विकास के नाम पर हो रहे निर्माण और उसके दुष्परिणामों की ओर संकेत करते हैं। दरअसल आज के समय में, विकास शब्द मानो विनाश का पर्यायवाची हो गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से लगातार धरती बंजर हो रही है, पहाड़ नंगे हो रहे हैं और मानो शर्मिंदगी के एहसास से ज़मींदोज़ हो जाना चाहते हैं। लगातार भू-स्खलन के कारण होने वाली विनाशलीला मानो रोज़मर्रा के क़िस्से हो गये हैं। भूमंडलीकरण आज एकल प्रक्रिया नहीं है, इसके साथ वैश्विक व्यापार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का साम्राज्यवादी रूप अब छिपा नहीं है, जो कहीं पर फ़ौज तथा हथियारों से दुनिया के वांछित हिस्सों पर कब्ज़ा कर रहा है तो कहीं वैश्विक राजनीति के दांव-पेंचों के बल पर उपनिवेश स्थापित कर रहा है। आज ईस्ट इंडिया कंपनी से कई गुना बड़े रूप हैं। कार्पोरेट जगत की कंपनियां वैश्विक व्यापार और राजनीति की संचालक हैं। सत्ता और मुनाफ़े के लिए विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन कर आने वाली पीढ़ियों के लिए भयावह स्थितियां निर्मित हो रही हैं। इसका असर पिछले चालीस-पचास सालों में अब स्पष्ट दिखायी देने लगा है। खेती की ज़मीनें छीनी जा रही हैं, सामूहिक-सामाजिक जीवन नष्ट हो रहा है। नौजवानों का सपना पढ़-लिखकर किसी मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करना और अपने इष्ट देवता अमरीका जैसे पश्चिमी देशों में बसना है। पारिवारिक जीवन नष्ट हो रहे हैं और मां-बाप बुढ़ापे में अकेले जीने-मरने के लिए अभिशप्त हैं। यह हम सबके आस-पास की, पड़ोस की कहानियां हैं। अब एकल परिवार हैं और संकट आने पर किसी को कोई मदद नहीं मिलती क्योंकि रिश्तों-नातों का समय समाप्त हो गया है इसलिए पूरे-पूरे परिवारों की सामूहिक आत्महत्याओं के समाचार भी विचलित नहीं करते हैं।
विकास के नाम पर देश में जो राजनीति हो रही है तथा पर्यावरण का क्षरण हो रहा है, उसके बीच भ्रष्टाचार नयी ऊंचाइयां छू रहा है तथा एक संवेदनहीन समाज बन रहा है। उसकी एक झलक यह उपन्यास दिखाता है। उपन्यास के केंद्र में एक नौजवान लड़की दूर्वा (दूब) है, जो हिमाचल प्रदेश के सोलन ज़िले के पास एक गांव धर्मपुर में है। महत्वाकांक्षी दूर्वा का सपना किसी प्रतिष्ठित संस्थान से एमबीए करने का है। आज हर युवा इंजीनियर बनना चाहता है, मैनैजमेंट का कोर्स कर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी चाहता है। अंतिम लक्ष्य है अमरीका जाना। दूर्वा को भी गुड़गांव स्थित एक बड़े संस्थान में प्रवेश मिल गया है। यहां भी उसे अच्छे नंबर मिलते हैं और कैंपस सिलेक्शन के ज़रिये मल्टीनैशनल में नौकरी भी मिल जाती है। उसका सहपाठी तरुण, जिससे वह प्रेम करती है, को हिंदुस्तान की एक आनलाइन शिक्षा प्रदान करने वाली कंपनी में नौकरी मिलती है। वह थोड़ा निराश है। बाद में दोनों परिवारों की सहमति से उनका विवाह हो जाता है।

जैसा अक्सर होता है, तरुण उसकी आशा के अनुरूप नहीं निकलता। उसके परिवार वाले रूढ़िवादी हैं लेकिन दूर्वा की मोटी तनख़्वाह से उत्साहित भी। उसे अब हर महीने तरुण के पिता की देनदारी के लिए एक चेक देना होता है। घर का ख़र्च भी उसकी तनख़्वाह से ही चलता है। तरुण का रस्मो-रिवाज वाला परिवार पत्नी को पति का ग़ुलाम समझता है। दूर्वा को अपने सम्मान और अपने वजूद के लिए लड़ाई लड़नी पड़ती है, जो अंतत: कोर्ट तक पहुंचती है। उसे अपने तीन साल के बेटे की कस्टडी के लिए भी क़ानून का सहारा लेना पड़ता है। एक स्वयंसेवी महिला संस्था और उससे जुड़ी महिला वकील के प्रयासों से वह तलाक़ के साथ तीन साल के अपने बेटे को भी प्राप्त करती है।
यह कहानी आज हर तीसरे, चौथे मध्यमवर्गीय परिवार की है, जहां पुरुष समाज पुरानी सामंती मानसिकता में जीता है और पढ़ी-लिखी चेतना संपन्न लड़कियां अपनी परंपरागत बेड़ियां तोड़कर आगे बढ़ रही हैं।
यहां लेखक ने पर्यावरण के क्षरण को भी मुद्दा बनाया है। खेती की ज़मीनें किसानों से विकास के नाम पर छीनकर अधिग्रहण करना और नये चौड़े रास्ते, हाईवे बनाना ही आज सरकारी प्रगति का मॉडल है। दूर्वा के पिता गांव धर्मपुर में अपनी खेती की ज़मीन बचाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं लेकिन अंत में एक चौथाई ज़मीन ही बचती है। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हज़ारों पेड़ भी काटे गये हैं। उसकी मुलाक़ात सेना से रिटायर हुए कर्नल बग्गा से होती है। उन्होंने एक स्वयंसेवी संस्था बनायी है और नये बने हाईवे के रास्तों के किनारे पेड़ लगाने का अभियान चलाया है। दूर्वा ने तय किया है कि वह नौकरी के साथ-साथ हर छुट्टी के दिन सोलन आकर पेड़ लगाने के काम में मदद करेगी।
युवा पीढ़ी के बीच पर्यावरण के सवालों और पेड़ लगाने की बात उठाना आज बहुत ज़रूरी है। इस पर गहराई से और पूरे व्यवस्था तंत्र के संदर्भ में बात होनी चाहिए। पिछले दिनों विकास के नाम पर पहाड़ों की भीषण तोड़-फोड़ तथा सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता के साथ-साथ भ्रष्टाचार तंत्र की परतें खोलता एक उपन्याय देवभूमि डेवलपर्स डॉट कॉम आया था। इसके लेखक नवीन जोशी हैं, जो उत्तराखंड के पहाड़ों के नष्ट-भ्रष्ट होने की तस्वीर पेश करते हैं। इस पर पिछले किसी अंक में लिख चुकी हूं। आज पर्यावरण के सवाल भी समाज और इंसानियत को बचाये रखने के लिए ज़रूरी हैं। यह उत्साहजनक है कि आज लेखक सामाजिक पर्यावरण के साथ-साथ प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण के मुद्दों को भी रचनात्मक लेखन का विषय बना रहे हैं।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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