दुष्यंत कुमार, dushyant kumar
विजय कुमार स्वर्णकार की कलम से....

एक दरख़्त के साये में 50 वर्ष (अंतिम भाग)

              पिछले दो भागों में हमने दुष्यंत कुमार के निम्न शेर पर चर्चा की:

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए

अब इसी शेर को केंद्र में रखकर ग़ज़ल की कुछ सूक्ष्मताओं के आधार पर दुष्यंत की कलात्मकता को चिह्नित करते हैं। शेर पढ़ते समय पाठक को स्पष्ट होना चाहिए कि वह किस अवसर पर या किस क्षण विशेष में कहा गया होगा। अगर शेर के टेक्स्ट से यह स्पष्टता नहीं आ रही है तो उसे थोड़ा प्रयास करके चिह्नित करना चाहिए, तभी शेर से पूरा लाभ प्राप्त होता है। लाभ क्या हो सकता है? केवल आनंद की अनुभूति! इससे भी आगे एक बात हो सकती है वह है कल्पना शक्ति का विस्तार। आइंस्टीन ने कहा है, “कल्पना ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण होती है”। सच कहा है, इसमें केवल इतना और जोड़ लिया जाये – अगर वह सकारात्मक और हितकारी हो।

हम अतीत के उस क्षण विशेष को चिह्नित करने की बात कर रहे हैं, जिसमें स्थित होकर ग़ज़लकार वह शेर कह रहा है। इस शेर में वह क्षण कौन-सा है? इस तथ्य की स्पष्टता के लिए यूं समझिए कि एक दृश्य को क़ैद करने के लिए अलग अलग फ़ोटोग्राफ़र अपने कैमरे को अलग-अलग जगह पर और अलग कोण से रखते हैं। श्रेष्ठ फ़ोटोग्राफ़र वह है जो उस दृश्य की सबसे दिलकश फोटो निकालता है। हो सकता है उसके लिए वह अनेक कोण से प्रयत्न करता हो, लेकिन अंत में उसे पता होता है कि किस कोण से श्रेष्ठ फ़ोटो आयी है, या आएगी।

यहां दरख़्त के साये में एक व्यक्ति अपने प्रियजनों के साथ अपने सुख और संसार को पूरे आनंद और श्रद्धा के साथ जी रहा था। समय के साथ दरख़्त से धूप छनने लगी – यह एक असुविधाजनक स्थिति का आरंभ था। कुछ समय पश्चात धूप इतनी बढ़ गयी कि वह अपने आश्रितों को लेकर आसपास के दूसरे दरख़्तों से मदद मांगता है। वहां भी वही स्थिति सामने आती है। कालांतर में उसने अपनी बर्दाश्त करने की शक्ति को बढ़ाया होगा। जब पीड़ा चरम पर पहुंच गयी, तब सोच-विचारकर उसने निर्णय लिया कि अब यहां नहीं रहना है और किसी मौसम विशेष के लिए या कालखंड के लिए नहीं, वरन हमेशा के लिए यहां से दूर चले जाना ही उचित होगा। यह इस निर्णय के ऐलान के क्षण का शेर है। संबोधन अपने साथियों और आश्रितों के प्रति है। अब ज़रा विचार करें कि जब यह पीड़ा आरंभ हुई होगी तब के क्षण में शेर का स्वरूप कैसा होता। यह विवेचना और नीचे लिखे डमी शेर इस तथ्य को उजागर करने के लिए हैं कि विवेकी और शिल्प कौशल से परिपूर्ण ग़ज़लकार किस प्रकार अपने शेर में प्राण और ऊर्जा भरता है और उसे ऊंचाई प्रदान करने के लिए पंख लगाता है। यह विवेचन उन आलोचकों के लिए भी है, जो केवल कथ्य पर ध्यान देते हैं और शिल्प की सूक्ष्मताओं को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कैसे उसी कथ्य की धुरी पर शिल्प का जीनियस श्रेष्ठतम शेर कह देता है और कैसे उसी कथ्य पर लचर शिल्प से एक शेर औसत शेर की श्रेणी में चला जाता है यह देखिए।

जब साये में धूप लगनी आरंभ हुई होगी उस क्षण में शेर कुछ इस तरह कहा जाता या हुआ होता:

अब इन दरख़्तों के साये में धूप लगती है
दुआ करो, न रहे रुत ये उम्र भर के लिए

या

ये क्यों दरख़्तों के साये में धूप लगती है?
ये बस अभी के लिए है कि उम्र भर के लिए!

कुछ समय बाद जब यह स्थिति और गंभीर हुई होगी तब के क्षण के लिए शायद यूं कहा जाता:

यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलें अभी के लिए या फिर उम्र भर के लिए

या

यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है
ये दिल में है कि निकल जाएं उम्र भर के लिए

इसी तरह वहां से निकल आने के बाद अगर शेर कहा जाता तो शायद यूं होता:

वहां दरख्तों के साये में धूप लगती थी
वहां से निकले तो निकले हैं उम्र भर के लिए

या

वहां दरख्तों के साये में धूप लगती थी
वो ताप किसलिए हम सहते उम्र भर के लिए

इन सब उदाहरणों का अभिप्राय है कि ग़ज़लकार शेर कहने से पहले तय करे कि वह अपने कथ्य को किस कोण से देखना चाहता है। उसे उस क्षण की पहचान करनी चाहिए जहां से शेर में सबसे अधिक प्रभाव उत्पन्न हो। दुष्यंत ने अपने शेर के लिए जो निर्णय की घोषणा का क्षण चुना है, वही सबसे मार्मिक और प्रभावी है। इससे उनके शिल्प का नया पहलू उजागर होता है।

एक और ध्यान देने योग्य तथ्य है कि दुष्यंत ने शेर सीधे दरख़्तों को संबोधित नहीं किया है। जिसके साये में आपने जीवन की एक लंबी अवधि बितायी हो, जिसने आश्रय दिया हो उसे अपमानित करने से क्या लाभ। दरख़्त जैसे भी हैं, उनका कुछ ऋण तो है ही। यह भारतीय संस्कार है। यही वह सजगता है जो एक श्रेष्ठ और औसत ग़ज़लकार में अंतर निर्धारित करती है।

एक और बात इस शेर के बारे में यह है कि इसकी दोनों पंक्तियों की बुनावट बहुत ही शास्त्रीय है। बोलचाल में प्रायः जैसा बोला जाता है, वैसा बयान है। पहला वाक्य बिल्कुल गद्यात्मक शैली में कहा गया है और दूसरे में बहुत डायनेमिज़्म है। पहली पंक्ति एक तनाव उत्पन्न करती है और दूसरी उसे तार्किक परिणति की ओर ले जाती है। दूसरी पंक्ति में “चलो यहां से चलें” पर बात समाप्त हो जाती है लेकिन आगे का टुकड़ा “और उम्र भर के लिए” सारे पुल तोड़कर आगे बढ़ जाने के दृढ़ निश्चय का घोष है। यह अद्भुत कलात्मकता दुष्यंत की ग़ज़लाें का अभिन्न हिस्सा है। शब्द चयन के पहलू से इस शेर को देखें तो भी ग़ज़लकार का हुनर देखते ही बनता है। औसत ग़ज़लकार इसी कथ्य को इस तरह बांधकर भी ख़ुश होता:

यहां तो पेड़ों की छाया में धूप लगती है
तलाशिए नये जंगल गुज़र बसर के लिए

शेर के प्रभाव में अंतर स्पष्ट है। दुष्यंत का शब्द चयन और संयोजन उच्च स्तरीय है। यह कला आते-आते ही आती है। दुष्यंत के बाद की पीढ़ियों में कम ही ग़ज़लकार हैं जिनमें शब्दों को बरतने की ऐसी सलाहीयत है।

इसी शेर के संदर्भ को लेकर “धूप” प्रतीक पर बात करते हैं। धूप जीवनदायिनी होती है। यह एक सकारात्मक ऊर्जा है। यह प्राकृतिक है। इसके नुक़सान अगर हैं तो वैसे ही हैं जैसे आग, पानी और हवा के हो सकते हैं। इस शेर में धूप के नकारात्मक प्रभाव की ओर संकेत है। धूप-छांव का जब भी उल्लेख होता है, वहां धूप विपरीत परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करती है। “दरख़्त” भी एक सकारात्मक प्रतीक है किंतु इस शेर में उसे भी नकारात्मक ख़ेमे में खड़ा पा रहे हैं। गज़लकार की ख़ूबी है कि वह आपको विश्वास में ले पा रहा है। देश, काल और परिस्थितयों के साथ जैसे सत्य के आयाम बदल जाते हैं, वैसे ही प्रतीक भी रंग बदल लेते हैं। यह ग़ज़लकार पर है कि वह इन्हें कैसे बरतता है और वह स्वयं इस कला में कितना सिद्धहस्त है।

कथ्य, कलात्मकता और शेरियत के शीर्ष पर खड़ा यह अकेला शेर ही स्पष्ट कर देता है कि क्यों दुष्यंत कुमार हिन्दी ग़ज़ल के शिखर पुरुष हैं और क्यों उनकी लोकप्रियता समय के साथ बढ़ती ही जा रही है।

विजय कुमार स्वर्णकार, vijay kumar swarnkar

विजय कुमार स्वर्णकार

विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में ​सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

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