
- February 28, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
पर्यावरण और औद्योगिक कचरा
घर आंगन में आग लग रही
सुलग रहे वन उपवन
दर दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर छाजन
तन जलता है, मन जलता है
जलता जन धन जीवन
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बंधन
दूर बैठकर ताप रहा है
आग लगाने वाला
देश हमारा जल रहा है, कौन बुझाने वाला
डॉ शिवमंगल सिंह सुमन
आज आधुनिक विकास के केंद्र में मशीनीकरण और औद्योगिक उत्पादकता है। इंटरनेट, मोबाइल और अनगिनत मशीनों ने जीवन को सुविधा संपन्न बनाया है, पर इसी के साथ हिंसा, शोषण, विषमता, बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट और पर्यावरण विनाश भी तेज गति से बढ़े हैं। तेज रफ्तार जीवन में समय का अभाव, रिश्तों में कृत्रिमता, अकेलेपन की भावना और शारीरिक श्रम की कमी ने न केवल समाज को भीतर से कमजोर किया है, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे संबंधों को भी असंतुलित कर दिया है। गांधीजी की चेतावनी कि हम कहीं शरीर रूपी अपनी मूल मशीन का उपयोग करना ही न भूल जाएं, आज स्वास्थ्य से अधिक पर्यावरण के संदर्भ में भी प्रासंगिक लगती है।
औद्योगिक विकास ने जिस तरह उत्पादन की क्षमता बढ़ायी है, उसी अनुपात में औद्योगिक कचरे का पहाड़ भी खड़ा कर दिया है। विकास की प्रमुख धारणा अब भी यह मानकर चलती है कि अधिक उत्पादन ही प्रगति का मापदंड है, जबकि इसके पीछे छिपा पर्यावरणीय और सामाजिक मूल्य शायद ही कभी ईमानदारी से जोड़ा जाता है। संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य वैश्विक अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि भारी औद्योगिक अपशिष्ट, भूमि का अत्यधिक दोहन और रासायनिक कृषि, मरुस्थलीकरण और जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह बन रहे हैं, जिससे विश्व की एक तिहाई तक आबादी किसी न किसी रूप में प्रभावित हो सकती है। मरूस्थलों का विस्तार, मिट्टी की उर्वरता में कमी, जल स्रोतों का सूखना और मौसम के अत्यधिक असंतुलन के पीछे कहीं न कहीं यही औद्योगिक असावधानी और लालच कार्य कर रहा है।
भोपाल गैस त्रासदी इसका जीता जागता उदाहरण है कि औद्योगिक इकाइयाँ यदि केवल लाभ को देखें और सरकारें यदि लापरवाह हों, तो एक रात की दुर्घटना आने वाली कई पीढ़ियों के लिए स्थायी अभिशाप में बदल सकती है। त्रासदी के बाद भी वर्षों तक वहाँ जमा खतरनाक अपशिष्ट मानसून के साथ ज़मीन और भूजल में रिसता रहा, जिससे एक बड़े भूभाग की मिट्टी और पानी पर विष का स्थायी साया पड़ा रहा। यह घटना हमें याद दिलाती है कि ख़तरनाक औद्योगिक कचरे का विज्ञानसम्मत और दीर्घकालिक निपटान किसी भी सभ्य समाज के लिए अनिवार्य दायित्व है, जिसे टाला नहीं जा सकता।
ई वेस्ट और रीसाइकिलिंग
इसी कड़ी में ई वेस्ट यानी इलेक्ट्रॉनिक कचरा आधुनिक युग के सबसे गंभीर ख़तरों में से एक बनकर उभरा है। भारत आज दुनिया के प्रमुख ई वेस्ट उत्पादक देशों में गिना जाता है और देश में हर वर्ष लाखों टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकल रहा है, जो आने वाले वर्षों में और बढ़ने वाला है। मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, एयर कंडीशनर, प्रिंटर, मॉनीटर, राउटर, सीसीटीवी कैमरे, खिलौने, मेडिकल उपकरण, यहां तक कि सोलर फोटो वोल्टिक पैनल भी अपनी उपयोगी उम्र के बाद ई वेस्ट की श्रेणी में शामिल हो जाते हैं। इस कचरे में लेड, कैडमियम, मरक्यूरी, क्रोमियम, लिथियम जैसे भारी धातु और अनेक जटिल रसायन होते हैं, जो यकृत, फेफड़े, गुर्दे, हृदय, तंत्रिका तंत्र और त्वचा पर गंभीर दुष्प्रभाव डाल सकते हैं। दुखद यह है कि हमारे यहां ई वेस्ट का बड़ा हिस्सा अब भी अनौपचारिक क्षेत्र के हाथों से, बिना किसी सुरक्षा के, अम्ल स्नान, खुले में जलाने और अन्य अवैज्ञानिक तरीकों से निपटाया जाता है, जिससे कचरा बीनने वाले ग़रीब, महिलाएं और बच्चे सबसे ज़्यादा बीमार पड़ते हैं।
इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने ई वेस्ट प्रबंधन नियम 2022 अधिसूचित किये, जो 1 अप्रैल 2023 से लागू हैं। इन नियमों ने विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व यानी ईपीआर को अधिक सख़्ती से लागू किया है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक और विद्युत उपकरण बनाने और बेचने वाली कंपनियों को अपने उत्पादों के पूरे जीवन चक्र के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। अब उन्हें अपने उत्पादों से निकलने वाले ई वेस्ट के संग्रह और पर्यावरण अनुकूल रीसाइकिलिंग या निपटान के लक्ष्य पूरे करने होते हैं, जिनकी जानकारी एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज होती है, और रीसाइकलर द्वारा जारी ईपीआर प्रमाणपत्रों के माध्यम से उनका सत्यापन भी होता है। नियमों में ख़तरनाक पदार्थों की मात्रा घटाने की दिशा में भी प्रावधान किये गये हैं, और उल्लंघन की स्थिति में केवल दंड ही नहीं, बल्कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति तक का प्रावधान जोड़ा गया है, ताकि नियम तोड़ना उद्योग के लिए आर्थिक रूप से भी नुक़सानदेह सौदा बने।
बीमार नदियों की चिंता
नदियाँ भी औद्योगिक कचरे और शहरी अपशिष्ट की सबसे बड़ी पीड़ित हैं। यमुना नदी इसका अत्यंत मार्मिक उदाहरण है। दिल्ली के हिस्से में यमुना मात्र कुछ किलोमीटर बहती है, लेकिन प्रदूषण का अधिकतर भार इसी छोटे से हिस्से पर पड़ता है। 1993 से यमुना एक्शन प्लान के नाम पर अनेक योजनाएँ बनीं, पर तेज़ी से बढ़ती आबादी, अनधिकृत बस्तियाँ, पर्याप्त सीवेज संयंत्रों की कमी और नालों का सीधे नदी में गिरना… यह सब मिलकर यमुना को और अधिक बीमार बनाते रहे। हाल के वर्षों में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार दोनों ने इस संकट की गंभीरता को देखते हुए अधिक समन्वित और समयबद्ध योजनाओं की घोषणा की है।

दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड ने यमुना की सफ़ाई के लिए विस्तृत कार्ययोजना बनायी है, जिसमें प्रमुख नालों को इंटरसेप्टर ड्रेनों के ज़रिये सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जा रहा है, ताकि बिना शोधन का सीवेज सीधे नदी में न गिरे। वर्तमान में दिल्ली में लगभग अड़तीस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालित हैं, जिनकी क्षमता सात सौ से अधिक मिलियन गैलन प्रतिदिन तक पहुंच चुकी है और निकट भविष्य में इसे आठ सौ चौदह मिलियन गैलन प्रतिदिन से अधिक करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि लगभग पूरा शहरी सीवेज उपचारित होकर ही नदी तक पहुंचे। इसी के साथ यमुना के तटों पर हरित क्षेत्र और नदी तट विकास की योजनाएँ चल रही हैं, और ठोस कचरा प्रबंधन को भी सुदृढ़ किया जा रहा है।
हाल में केंद्र सरकार ने दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को साथ लेकर यमुना की सफ़ाई के लिए एक समन्वित अभियान शुरू किया है, जिसमें हरियाणा में औद्योगिक अपशिष्ट और एसटीपी की कार्यक्षमता सुधारने, और उत्तर प्रदेश के आगरा, मथुरा, वृंदावन जैसे नगरों में नालों के टैपिंग और सीवेज उपचार के लक्ष्य तय किये गये हैं। यह स्वीकार किया गया है कि यमुना को साफ़ रखना केवल दिल्ली की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे बेसिन की साझा ज़िम्मेदारी है, और तभी नदी को सचमुच जीवनदायिनी रूप दिया जा सकेगा।
बात अन्य उद्योगों की
औद्योगिक कचरा घटाने की वैश्विक दिशा अब सर्कुलर इकोनॉमी की ओर है, जिसमें संसाधन लेने, वस्तु बनाने और फेंक देने की रैखिक व्यवस्था के स्थान पर पुनः उपयोग, मरम्मत, पुनर्निर्माण और रीसाइक्लिंग पर आधारित चक्राकार व्यवस्था के निर्माण की कोशिश की जा रही है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यदि भारत उद्योगों में इस प्रकार की चक्रियता अपनाये, तो सैकड़ों मिलियन टन औद्योगिक अपशिष्ट को पुनः संसाधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को काफ़ी हद तक घटाया जा सकता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लायी जा सकती है। इसके लिए औद्योगिक अपशिष्ट की सटीक सूची बनाना, क्षेत्र विशेष के लिए अलग रोडमैप तैयार करना, कचरे को संसाधन की तरह उपयोग करने वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देना और उत्पाद डिज़ाइन के स्तर पर ही पुनः उपयोग और रीसाइकिलिंग को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
प्लास्टिक और पॉलीथिन कचरा भी हमारे समय की एक बड़ी चुनौती है। ये नदियों के लिए तो घातक हैं ही, जानवरों, सीवर लाइनों, उपजाऊ ज़मीनों, वायु और जल गुणवत्ता के लिहाज़ से भी ख़तरनाक हैं। नगर निकायों द्वारा सूखा और गीला कचरा अलग अलग इकट्ठा करने, प्लास्टिक के लिए अलग कूड़ेदान और उत्पादक उत्तरदायित्व जैसी व्यवस्थाएँ तभी सफल होंगी जब घर घर स्तर पर कचरा प्रबंधन के प्रति संवेदनशीलता और अनुशासन विकसित हो।
ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भी औद्योगिक कचरा और प्रदूषण के प्रश्न गहरे हैं। कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र फ्लाई ऐश और कार्बन डाइऑक्साइड के बड़े स्रोत हैं, जिनका प्रभाव वायु, जल और मृदा तीनों पर पड़ता है। नवीकरणीय ऊर्जा में सौर और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु आदि में बड़े सोलर और विंड पार्क विकसित हुए हैं और निजी कंपनियाँ भी इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ा रही हैं, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि सोलर पैनल और बैटरियां स्वयं भविष्य का ई वेस्ट बन सकती हैं, जिनके लिए अलग रीसाइकिलिंग ढांचे की ज़रूरत होगी। परमाणु ऊर्जा से निकलने वाला रेडियोएक्टिव कचरा सैकड़ों वर्षों तक सक्रिय रह सकता है, इसलिए उसके सुरक्षित भंडारण और निगरानी के लिए अत्यंत सख्त मानक और सामाजिक सतर्कता आवश्यक है।
अंततः कहा जा सकता है कि औद्योगिक कचरा आधुनिक प्रगति का दूसरा पहलू है, जिससे पूरी तरह बचना शायद संभव नहीं, लेकिन इसे नियति मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठना भी उचित नहीं।
अमेरिका जैसे विकसित देशों से जहाज़ों में भरकर औद्योगिक कचरा विकासशील देशों को रिसाइकल प्रोसेसिंग के लिए बेचा जाता है। भारत में हम अपेक्षाकृत ऐसे रोज़मर्रा के संसाधन प्रयोग करते है, जिनसे कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय नियंत्रण होता है, एक छोटा सा उदाहरण पेपर नैपकिन का ही लीजिए, पाश्चात्य जगत में पेपर नैपकिन की जगह हम पानी और कपड़े के टावेल प्रयोग करते हैं, जिन्हें धोकर पुनः उपयोग किया जाता है। यह आदत टनों पेपर बचाती है। किंतु पाश्चात्य अंधानुकरण में ऐसी अच्छी आदतें भी हम बदलते दिखते हैं, जो चिंताजनक है।
ई वेस्ट प्रबंधन नियम, यमुना जैसी नदियों के लिए समन्वित योजनाएँ, सर्कुलर इकोनॉमी की नीतियाँ और प्लास्टिक पर नियंत्रण के प्रयास यह संकेत देते हैं कि समाधान के रास्ते हमारे सामने हैं, केवल उन्हें ईमानदारी से अपनाने की आवश्यकता है। विज्ञान और तकनीक यदि जीवन संतुलन को केंद्र में रखकर आगे बढ़ें, तो यही विज्ञान मानवता के लिए वरदान बन सकता है, अन्यथा अनियंत्रित उपभोग और लापरवाह कचरा प्रबंधन की स्थिति में यही विज्ञान और उद्योग पर्यावरण और मानव जीवन दोनों के लिए अभिशाप सिद्ध होंगे।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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