आब-ओ-हवा के अंक लगातार देख रहा हूँ। पत्रिका नियमित रूप से निकल रही है। नियमित होना भी बड़ी उपलब्धि है। इसके अलावा पत्रिका की संपादकीय दृष्टि से मैं बहुत प्रभावित हूँ। इसके स्तंभों में लगातार नवाचार और साहित्येतर विषयों की भी रोचक प्रस्तुति, बहुत ही सराहनीय है। सामाजिक सरोकारों से भरे साहित्य सामग्री के पाठ का अवसर उपलब्ध करवाने वाली इस पत्रिका को हार्दिक शुभकामनाएँ।
-प्रदीप मिश्र
(वैज्ञानिक/लेखक/कवि)
प्रिय भाई भवेश जी, व्यस्त तो कम, अपने में त्रस्त ज़रूर रहती हूँ, इस कारण से चिट्ठी लिखने में देरी हुई। पत्रिका के दो वर्ष पूरे होने पर भर-भर कर बधाई। मैं जानती हूं, कितना कठिन काम है नेट पर पत्रिका चलाना। आप लगन से हर महीने दो बार पत्रिका निकालते हैं। यही नहीं आप विविध विषयों पर लिखवाते हैं।मैं देख रही हूं आराम से बैठकर पढ़ने लायक़ काफी कुछ है, जैसा कि हमारे बचपन में हिन्दुस्तान पाक्षिक पत्रिका रही। इस पत्रिका के बारे में इतना तो कहा जा सकता है कि काफ़ी कुछ पढ़ने को मिलता जाता है।विषय की विविधता इस पत्रिका को ख़ास बनाती है, और आप इस बात का ध्यान रखते हैं कि लेखन का मनभावन भी हो, जिससे हर आम आदमी जुड़ सके। हालांकि मैं अभी तक शीर्षकों और विषयों से तारतम्य नहीं बैठा पा रही हूँ, संभवतया मेरे मोबाइल चलाने की कमज़ोरी होगी।आप लगातार पत्रिका चलाते रहें, मेरी शुभकामना है।
-रति सक्सेना
(वरिष्ठ लेखक/कवि/अनुवादक)
दो साल का आब-ओ-हवा का शानदार सफ़र। कुछ समय बाद मैं भी जुड़ गयी। दिनो-दिन इसको बढ़ते, फैलते और पल्लवित होते देखा। कितना बड़ा सहयोगी समूह आपके साथ है और सब रत्न सरीख़े हैं। यह आपकी मेहनत है और साकार होता सपना है। मुझ जैसी आलसी को आपने सक्रिय कर दिया। आब-ओ-हवा के लिए बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएँ।
-नमिता सिंह
(वरिष्ठ लेखक)
आब-ओ-हवा नाम और काम, दोनों ऐतबार से एक साहसिक प्रयास है। इसके अलग-अलग स्तंभ अपने काल का इतिहास दर्ज करने में जिस तन्मयता और एकाग्रता के साथ लगे हुए हैं उसके लिए भवेश दिलशाद बधाई के पात्र हैं। फ़िलहाल वैविध्य और स्तर के लिहाज़ से ऐसी कोई भी वेब-पत्रिका मेरी नज़र में तो नहीं। मेरी ओर से भी वर्षगांठ पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
-नोमान शौक़
(वरिष्ठ कवि/शायर)
दुर्लभ ज्ञानवर्धक कुबेर का ख़ज़ाना... गागर में सागर भरती साहित्यिक विधाओं को मान और पहचान दिलाकर साहित्यानुरागियों तक पहुँचाने वाली पत्रिका आब-ओ-हवा, जिसमें संकलित अनूठी सामग्री कुछ न कुछ संदेश, प्रेरणा, सीख देती है, जो अपने आपको आंकने, तराशने, शोधन करने का उत्साहवर्धन करती है।जीवन से जुड़े पहलुओं को अपने में समेटे, अनमोल पत्रिका अपने ज्ञानवर्धक रूपी कुबेर के ख़ज़ाने से प्रसारित-प्रकाशित सामग्री सूत्रधारक बनकर बौद्धिकता को मज़बूत करने के साथ भावनात्मक रूप से भी जोड़ती है। सभी सदस्यों के सराहनीय रचनात्मक प्रयासों के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और स्थापना दिवस की बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
-बबीता गुप्ता
(युवा लेखक/कवि)
पहली बार जब मैंने ‘आब-ओ-हवा’ का नाम सुना था, तबसे ही मुझे आपके सामयिक का नाम पसंद आ गया था। आप की बात करने की तमीज़ विनम्र और सहज है। मुझे आपका व्यक्तित्व बहुत शालीन लगता रहा है। जैसे आप हैं, वैसा आपका सामयिक है। आपके सब लेखक-लेखिकाएं भी अपने विचार निर्भीकतापूर्वक, तटस्थता और विनम्रता से पेश करते हैं।दो साल में आब-ओ-हवा ने अच्छी ख़ासी लोकप्रियता प्राप्त की है और तरक़्क़ी की है। आपने मुझे भी हिन्दी में लिखने के लिए प्रेरित किया था और आज भी मैं सोचती हूँ कि मैं आपके सामयिक के स्तर पर लिख सकूँ। आब-ओ-हवा की प्रगति के लिए आपको बहुत बधाई, शुभकामनाएँ और आशीर्वाद।
-बकुला घासवाला
(गुजराती की लेखक, कवि, अनुवादक)
प्रिय पत्रिका “आब-ओ-हवा” के दो वर्ष पूर्ण होने के इस सुखद अवसर पर हृदय से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ स्वीकार करें। 15 अप्रैल 2024 को प्रारंभ हुई यह साहित्यिक यात्रा आज जिस मुकाम पर पहुँची है, वह केवल समय की गणना नहीं, बल्कि निरंतर सृजन, संवेदना और सरोकारों की एक सशक्त अभिव्यक्ति का प्रमाण है।इन दो वर्षों में “आब-ओ-हवा” ने जिस तरह विविध साहित्यिक विधाओं— हास्य-व्यंग्य, कविता, ललित निबंध, संस्मरण, समीक्षा आदि को समाहित करते हुए एक सजीव मंच प्रदान किया है, वह अत्यंत सराहनीय है। विशेष रूप से यह उल्लेखनीय है कि आपने न केवल स्थापित रचनाकारों को स्थान दिया, बल्कि नवोदित लेखकों को भी समान सम्मान और अवसर प्रदान कर एक स्वस्थ साहित्यिक वातावरण का निर्माण किया।मेरे लिए यह विशेष संतोष और आत्मीयता का विषय है कि मेरी अनेक रचनाएँ भी इस मंच पर प्रकाशित हुईं और एक व्यापक, सजग तथा संवेदनशील पाठक वर्ग से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ। “आब-ओ-हवा” ने न केवल रचनाओं को प्रकाशित किया, बल्कि उन्हें पाठकों के मन तक पहुँचाने का कार्य भी बखूबी निभाया— यही किसी भी साहित्यिक मंच की वास्तविक सफलता होती है।आपकी पत्रिका का संपादकीय दृष्टिकोण संतुलित, समकालीन और विचारोत्तेजक रहा है। सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय मुद्दों को जिस गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है, वह इसे मात्र एक पत्रिका न बनाकर एक साहित्यिक आंदोलन का रूप देता है।भविष्य के प्रति अपेक्षाएँ भी इसी अनुपात में बढ़ती हैं। आशा है कि “आब-ओ-हवा” आने वाले समय में और अधिक व्यापकता, गहराई और नवीनता के साथ साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान को और सुदृढ़ करेगी, नये प्रयोगों को प्रोत्साहित करेगी तथा लेखकों-पाठकों के बीच एक जीवंत संवाद का सेतु बनी रहेगी।इस दो वर्षीय सफल, सार्थक और प्रेरणादायी यात्रा के लिए आप सभी को पुनः हार्दिक बधाई। ईश्वर से प्रार्थना है कि यह साहित्यिक कारवाँ यूँ ही निरंतर आगे बढ़ता रहे और सृजन की यह सुगंध दूर-दूर तक फैलती रहे।
-डॉ. मुकेश असीमित
(चिकित्सक, व्यंग्यकार, लेखक)
‘आब-ओ-हवा’ एक ऐसी पत्रिका है जो साहित्य, राजनीति, सिनेमा, स्वास्थ्य जैसे विविध विषयों के माध्यम से अपने समय की बहसों और सरोकारों को स्वर देती है। आज के दौर में किसी पत्रिका की निरंतरता बनाये रखना स्वयं में एक बड़ी चुनौती है। ऐसे समय में दो वर्षों से इसका लगातार प्रकाशित होना न केवल सराहनीय है, बल्कि संपादकीय प्रतिबद्धता और रचनात्मक साहस का प्रमाण भी है। ‘आब-ओ-हवा’ की पूरी टीम को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
-अनामिका शिव
(साहित्यसेवी, संपादक)
अपनी ब्लॉगज़ीन आब-ओ-हवा के दो वर्ष पूरे होने पर हार्दिक बधाई। यह सफ़र साहित्य, कला और भाषाओं के लिए ताज़ा हवा का झोंका साबित हुआ है।15 अप्रैल 2024 को जारी पहले अंक ने हिंदी साहित्यिक ब्लॉगज़ीन के रूप में यात्रा की शुरूआत की, जिसमें साहित्य, कला और परिवेश पर विविध रचनाएँ जैसे शायरी, कहानियाँ, समीक्षाएँ और कार्टून शामिल थे। आपके संपादन में शशि खरे, ब्रज श्रीवास्तव, ग़ज़ाला तबस्सुम, सलीम सरमद, अनामिका अना, आकांक्षा त्यागी तथा आशा सक्सेना, यतीन्द्रनाथ राही जैसे स्तंभ लेखकों ने इसे निरंतर अंक-दर-अंक और समृद्ध किया है। दो वर्षों में लगातार नियत समय पर अंक प्रकाशित हुए हैं। यह आपकी समर्पित साहित्यिक निष्ठा का प्रमाण है।मेरी सहभागिता वैश्विक तथा विविध, नवाचारी रही है। मीना कुमारी की शायरी पर, लद्दाख के पर्यावरण, युद्ध, विदेश प्रवास के अनुभव आदि पर मेरी रचनाएं ब्लॉग में हैं। हिंदी दिवस विशेष (अंक 35), शांति की आवाज़ (अंक 48) जैसे थीम्स से वेब पोर्टल ने सामाजिक मुद्दों को स्पर्श कर अपना वैचारिक योगदान दिया।फ़ेसबुक पर सक्रियता से पाठकों तक आब-ओ-हवा की पहुँच बढ़ी है। भविष्य में यह लोक साहित्य, व्यंग्य और क्षेत्रीय भाषाओं को जोड़ते हुए सतत् प्रगतिशील रहे, पाठकों की भागीदारी बढ़े यही कामना है। ब्लॉगज़ीन और समृद्ध बने। अशेष शुभकामनाएं। मंगल भाव के साथ इस सुकार्य में हमेशा आपके साथ हूं। आपका अपना..
-विवेक रंजन श्रीवास्तव
(लेखक, व्यंग्यकार, सेवानिवृत्त इंजीनियर)
आब-ओ-हवा की यात्रा के साथ चलना सुखद रहा। अलग-अलग विषयों पर लेख, शोध आलेख, कहानी, ग़ज़ल, गीत सब पर एक साथ तवज्जो दी जाती रही। किताबों के बारे में और यात्राओं के वर्णन ने नयी चेतना और ऊर्जा भरी। ग़ज़ल और ग़ज़ल पर चर्चा सुकून भरी रही।दो साल की अल्पायु में ही आब-ओ-हवा सबकी चाहत बन गया। चुनी हुई सामग्री और स्थायी स्तम्भ विकलता से अपना इंतज़ार करवाते हैं। बहुत दुआएं। और उन्नति करें। साहित्यिक पत्रिका सामाजिक चेतना की भी मशाल बने। मिशन और अभियान का सूत्रधार है यह पत्र। अजर हो, अमर हो। हमारा प्यारा -आब-ओ-हवा।
-मधु सक्सेना
(कवि, लेखक)
15 अप्रैल 2024 को तुमने अपनी पत्रकारिता की प्रतिभा और सृजनात्मक दृष्टि के साथ ‘आब-ओ-हवा’ नामक ई-पत्रिका का आरंभ किया। इसके प्रारंभिक अंक देखने का अवसर मिला, और कहना होगा कि प्रस्तुति की दृष्टि से यह अत्यंत आकर्षक और सुसज्जित रही है। किन्तु केवल बाह्य सौंदर्य ही नहीं, इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामग्री का चयन और उसकी उच्च स्तरीयता है।दरअसल, तुम स्वभाव से ही समझौतावादी नहीं हो, और यही कारण है कि हर अंक में तुम्हारी मौलिकता और ‘भवेश-रंग’ स्पष्ट रूप से झलकता है। एक सांस्कृतिक-साहित्यिक जर्नल के लिए जो आवश्यकताएँ होती हैं, वे सभी इसमें सजीव रूप से उपस्थित हैं। जिस समय में अधिकांश लोग केवल आर्थिक उपलब्धियों की ओर उन्मुख हैं, उस समय तुम्हारा एक बौद्धिक आंदोलन के सिपाही की तरह सक्रिय होना निश्चय ही सुखद और प्रेरणादायक है।मुझे विश्वास है कि ‘आब-ओ-हवा’ आज के दूषित होते वातावरण में एक सकारात्मक, परिष्कृत और सृजनशील हस्तक्षेप सिद्ध होगी।दो वर्ष पूरे हो चुके हैं और यह यात्रा यहीं नहीं रुकेगी। हमें विश्वास है कि यह बीस वर्षों और उससे भी आगे तक अपनी सार्थक उपस्थिति बनाये रखेगी। हम सब तुम्हारे साथ हैं। स्नेह और आशीर्वाद सहित, तुम्हारा अग्रज
-ब्रज श्रीवास्तव
(कवि, शिक्षक, संपादक)
साहित्य, कला, समाचार, दुनिया की चिंताएँ और सरोकार। आब-ओ-हवा ने मानो दुनिया को समेटकर हथेली पर ला दिया है। दो बरस की निर्बाध यात्रा के लिए अभिनंदन और आगामी यात्रा के लिए शुभकामनाएं।
-प्रीति जोशी
(अनुवादक, हिंदीसेवी)
'आब-ओ-हवा' अपनी आब-ओ-ताब के साथ पूरी मुस्तैदी से लगातार जारी है। हर अंक अपनी सज-धज में स्तरीयता बनाये हुए रखता है। इस ब्लाॅगज़ीन के द्वारा साहित्य, कला, संस्कृति और समाज के साथ-साथ सत्ता तथा वैश्विक घटनाओं पर पैनी नज़र रखते हुए विविध विषयों से लैस विचारों को पाठकों तक पंहुचाने की सराहना करती हूं।
-ख़ुदेजा ख़ान
(कवि, लेखक, संपादक)
आप जिस प्रकार साहित्य की सेवा पिछले कई वर्षों से कर रहे हैं वह सराहनीय है। आब-ओ-हवा के माध्यम से पिछले दो वर्षों में आप का यह योगदान आप के साहित्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है। आशा है कि आप के कर्मठ मार्गदर्शन में साहित्य की आब-ओ-हवा इसी प्रकार महकती रहेगी और यह यात्रा सुगमता से आगे भी जारी रहेगी। शुभकामनाओं सहित, साहित्य का एक कर्मठ विद्यार्थी
-तहसीन मुनव्वर
(शायर, पत्रकार, ज्योतिष एवं कलाकार)
विचारों को पोषित, परिष्कृत और परिवर्द्धित करने का काम आब-ओ-हवा ने बख़ूबी किया है। इसे हमने प्रारंभ से पल्लवित, पुष्पित होते देखा है। कहानी, कविता, ग़ज़ल, नज़्म से इतर वैचारिक समृधि भी यहाँ भरपूर मिली है। इस समय जहाँ आवाज़ों की ख़ामोशी अधिक पसंद की जा रही है; आब-ओ-हवा के ज़रिये सम्पादक ने ज़रूरी आवाज़ दर्ज़ कराने की जुर्रत की है। यह सफ़र अनवरत चलता रहे ऐसी दिली तमन्ना हम रखते हैं। भवेश दिलशाद जी को बहुत सारी शुभकामनाएं। साथ ही बहुत मुबारकबाद भी।
-अनिता मण्डा
(कवि, गहिणी)
अति श्रेष्ठ पत्रिका रही। प्रतीत यह होता रहा कि विद्या का शाब्दिक स्वरूप इस प्रकल्प में समक्ष आया। मनीषियों की कथा और काव्य से भारती और भारत की चेतना सदैव झरती रही।पत्रिका भाषा की प्रांजलता और मानक में और अधिक कांतिमान हो उठेगी, यह इच्छा है। आगामी अंकों में यह सृजन यज्ञ इस महानीय योजना में निरंतर प्रज्वलित रहेगा, यह कामना रहेगी।
-राजीव सक्सेना
(कवि एवं शासकीय अधिकारी)
आब-ओ-हवा के दो वर्ष पूरे होने पर हार्दिक बधाई। इन दो वर्षों में “आब-ओ-हवा” ने एक ऐसे रचनात्मक मंच के रूप में अपनी पहचान बनायी है, जहाँ साहित्य, विचार और संवेदना एक साथ सांस लेते हैं। यह सिर्फ़ रचनाओं का संकलन नहीं, बल्कि अपने समय के साथ एक सतत संवाद है, जो पाठक को सोचने, ठहरने और भीतर झाँकने का अवसर देता है।इस मंच की सबसे बड़ी ताक़त इसकी विविधता और खुलापन है। अलग-अलग भाषाओं (अनुवाद के माध्यम से), अनुभवों और दृष्टियों को यहाँ जिस सहजता से जगह मिलती है, वह इसे विशिष्ट बनाता है।एक लेखक के रूप में मुझे भी इस यात्रा का छोटा-सा हिस्सा बनने का अवसर मिला- जहाँ मैंने गुजराती कविताओं के हिंदी अनुवाद के माध्यम से भाषाओं के बीच एक सेतु बनाने की कोशिश की।आब-ओ-हवा ने इन दो वर्षों में जिस संवेदनशीलता और निरंतरता के साथ अपनी राह बनायी है, वह सराहनीय है। उम्मीद है कि यह मंच आगे भी नये रचनात्मक प्रयोगों, ख़ासकर अनुवाद जैसे क्षेत्रों को विस्तार देता हुआ, और अधिक व्यापक संवाद रचेगा। प्रिय भवेश एवं पूरी टीम को शुभकामनाएँ।
-मालिनी गौतम
(अनुवादक, कवि, शिक्षक)
आप आब-ओ-हवा के माध्यम से जो उत्कृष्ट और सराहनीय कार्य कर रहे हैं, वह वास्तव में प्रशंसा के योग्य है। आज के समय में जब साहित्य और कला के प्रति लोगों का झुकाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, ऐसे में आपका यह प्रयास एक नयी ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करता है।भवेश दिलशाद जी द्वारा लेख, कविता, कहानी और क़िस्सों पर किया गया गहन शोध तथा उनकी संवेदनशील और प्रभावशाली प्रस्तुति इस ब्लॉगज़ीन को विशिष्ट बनाती है। प्रत्येक रचना में न केवल साहित्यिक सौंदर्य झलकता है, बल्कि उसमें विचारों की गहराई और समाज के प्रति जागरूकता भी स्पष्ट रूप से दिखायी देती है।आपका यह मंच न केवल स्थापित लेखकों के लिए बल्कि नवोदित रचनाकारों के लिए भी एक सशक्त अवसर प्रदान कर रहा है, जहाँ वे अपनी प्रतिभा को अभिव्यक्त कर सकते हैं और एक व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँच सकते हैं। यह पहल साहित्य के संवर्धन और प्रसार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।विशेष रूप से, प्रत्येक शीर्षक के साथ दिया गया लिंक और "PDF डायरेक्ट टू पोर्टल" जैसी सुविधा पाठकों के लिए इसे और भी सहज और आकर्षक बनाती है। इससे पाठकों को सामग्री तक पहुँचने में सरलता होती है और पढ़ने का अनुभव भी समृद्ध होता है।मैं दिल से आपकी इस रचनात्मक यात्रा के लिए शुभकामनाएँ एवं बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि आब-ओ-हवा आने वाले समय में और भी ऊँचाइयों को छुएगा। आप इसी प्रकार साहित्य और कला की सेवा में निरंतर अग्रसर रहें और हम सभी को अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों से समृद्ध करते रहें। आपके उज्ज्वल भविष्य और निरंतर सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। सादर..
-डॉ. आकिब जावेद
(कवि, लेखक, शिक्षक)
हर्ष का कारण है "आब-ओ-हवा" ने अपने प्रकाशन के दो वर्ष पूरे कर लिये हैं। प्रकाशन निरंतर जारी रहे- हार्दिक शुभकामना। साथ ही आब-ओ-हवा के संपादक प्रिय भवेश को उनके साहस, श्रम और कुशल संपादन के लिए बधाई। उज्ज्वल भविष्य हेतु शुभकामना एवं आशीर्वाद।
-धृतिवर्धन गुप्त
(कलाविद, साहित्यकार, संस्थापक-सदाशय मंच)
आब-ओ-हवा साहित्य, ज्ञान और अभिव्यक्ति का सुंदर मंच बनकर उभरी है। दो वर्ष पूरे होने पर हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है कि यह आगे भी नयी ऊँचाइयों को छूती रहे और पाठकों को प्रेरित करती रहे।
-स्मिता सक्सेना
(हिंदी शिक्षक)
आदरणीय भाईसाहब, इसमें कोई शक नहीं कि 'आब-ओ-हवा' ने हज़ारों ब्लॉग की भीड़ में अपनी अलग और व्यापक पहचान बनायी है। छोटे-से प्रारूप में ये 'मैग्ज़ीन' पर्याप्त वैचारिक सामग्री समेटे रहती है। ख़ासकर आपकी संपादकीय। संपादकीय ही किसी भी पत्र/पत्रिका का असली चेहरा होता है।चूँकि मैं ग़ज़ल का विद्यार्थी हूँ तो इससे सम्बन्धित लेखों पर ज़्यादा ध्यान देता हूँ। इस क्रम में डॉ आज़म साहब, आशीष दशोत्तर जी और ज्ञानप्रकाश पांडेय जी बहुत अच्छा लिख रहे हैं। इस बार के अंक में सुल्तान अहमद जी पर पांडेय जी की आलोचना से याद आया कि बिल्कुल ऐसी ही आलोचना सुल्तान अहमद जी ने लगभग पच्चीस साल पहले 'पहल' के लिए लिखी थी। इस तरह की आलोचना से ग़ज़ल को सीखने-समझने में मदद मिलती है। हालांकि एक-दो जगह पांडेय जी से चूक हो गयी है, लेकिन वो ग़ैर-इरादतन है। मुझे लगता है कि ऐसी आलोचना नियमित होनी चाहिए।आप जिस अभियान पर निकले हैं, उसमें आपको कामयाबी मिले, ऐसी शुभकामनाओं सहित। आपका अपना
-धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद'
(ग़ज़लकार)
दो साल का सफ़र। कई ऋतुओं को झेलना, रंगों को बदलते, बिखरते देखना। एआई और व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी की चुनौतियों के बीच कुकरमुत्ते की तरह उग रहे डिजिटल प्लेटफ़ार्म के बीच छायादार वृक्ष की तरह पनपना बड़ी मेहनत और उपलब्धि है। बधाई।
-विवेक मेहता
(शिक्षक/लेखक)
“आब-ओ-हवा” के प्रकाशन को दो वर्ष पूर्ण हो गये, समय जैसे पंख लगाकर उड़ गया। सबसे पहले इस सुंदर पहल और आपके सतत् प्रयासों के लिए हार्दिक बधाई। साहित्य जगत के सभी रचनाकारों और पाठकों को भी साधुवाद, क्योंकि यह मंच केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि सृजन की जीवंत धारा बन चुका है।यह मंच उन मौलिक रचनाओं के लिए एक सशक्त आसरा है, जहाँ गद्य और पद्य दोनों को समान सम्मान और बेबाक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलती है। इसकी भूमिका ठीक वैसी ही प्रतीत होती है, जैसे तपती गर्मियों में वन विभाग द्वारा निर्मित कोई जलस्रोत, जो न केवल तृप्ति देता है, बल्कि जीवन को संबल भी प्रदान करता है।डिजिटल माध्यम से इसका प्रकाशन न केवल पर्यावरण के प्रति आपकी संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि रचनाओं को सीमाओं से परे, दूर-दूर तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम भी बनता है।पत्रिका में सामग्री के चयन और उसके सुरुचिपूर्ण प्रस्तुतिकरण में एक परिपक्वता और गरिमा झलकती है, जो अनायास ही “धर्मयुग” जैसी श्रेष्ठ परंपराओं की स्मृति को ताज़ा कर देती है। ईश्वर से यही कामना है कि यह साहित्यिक यात्रा यूँ ही निरंतर, ऊर्जावान और प्रेरणादायी बनी रहे। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ...आपका
-प्रदीप पाराशर
(अधिवक्ता, साहित्य-प्रेमी)
सृजनात्मक पत्रकारिता जब आज संकट की ज़द में है, तब आब-ओ-हवा का एक साल का सफ़र उपलब्धि से कम नहीं। संसाधनों के अभाव में पत्रिका की आब और ताब क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। आपने इसका एक मेयार बनाया है और दोआब की परम्परा को मज़बूत किया है। साधुवाद और शुभकामना। 
 -लीलाधर मंडलोई
(वरिष्ठ साहित्यविद/चित्रकार)
आब-ओ-हवा के कुछ अंक देखे, जी ख़ुश हुआ। सोशल मीडिया के आज के हदबंदी भरे समय में आपकी पत्रिका एक बड़ी राहत की तरह है। इसके आलेख, स्तंभ और इंटरव्यूज़ एक सुरुचिपूर्ण चयन और संयोजन का परिणाम नज़र आते हैं। आब-ओ-हवा को पहली वर्षगांठ की बधाई और भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।
-राजेश रेड्डी
(मशहूर शायर/संगीतविद)
आब-ओ-हवा ने साहित्य के क्षेत्र में क़दम रखते ही अपनी बेहतरीन पहचान बनायी है। संपादक के रुप में भवेश दिलशाद की अपनी कल्पनाशीलता भी दिखायी देती है। विभिन्न साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से भवेश व्यापक साहित्य समाज से वास्ता रखते हैं। बधाई और शुभकामनाएं कि यह पत्रिका निरंतर रचनात्मक यात्रा में अपना योगदान देती रहे।
-उर्मिला शिरीष
(वरिष्ठ लेखक/हिन्दीसेवी)

'आब-ओ-हवा' का एक वर्ष सफल होने पर पूरी टीम को बधाइयां, पत्रिका निकालना वर्तमान में आसान भी है, कठिन भी। ख़ासकर साहित्यिक पत्रिका तो बहुत ही घाटे का सौदा है। उससे भी अधिक जिगर का काम है पत्रिका को सौहार्द्रपूर्ण या हिन्दी-उर्दू की संयुक्त पत्रिका के तौर पर निकालना। भोपाल से यह काम कर रहे भवेश दिलशाद जी को शुभकामनाएं, पिताजी के इस शेर के साथ-

बला से शजर हों न हों रस्ते में

नहीं बाज़ आते सफ़र करने वाले

-फ़िरोज़ मुज़फ़्फ़र
(लेखक/समाजसेवी)
सार्थक यात्रा के लिए बधाई। आपका संपादकीय ज्वलंत सवालों को सामने लाता है। मैं आब-ओ-हवा के ब्लॉग नियमित पढ़ता हूँ। आपकी रचनात्मक यात्रा जारी रहे...
- स्वप्निल श्रीवास्तव
(कवि-समालोचक)
आब-ओ-हवा साहित्यिक पत्रकारिता में एक रोशनदान है।
-ब्रज श्रीवास्तव
(कवि, संपादक)

'आब-ओ-हवा' अपनी आब और ताब के साथ बेहतर से बेहतरीन की राह पर अग्रसर है। संपादक भवेश दिलशाद की मेहनत, लगन और समर्पण की झलक हर अंक में दिखलायी देती है। एक ऐसी लघु साहित्यिक पत्रिका जो अपने नाम के अनुरूप साहित्य, कला, परिवेश की संतुष्टिदायक सामग्री पाठकों तक पहुंचाती है।

संपादकीय 'हम बोलेंगे' हक़ और इंसाफ़ की बात करते हुए नागरिक चेतना जागृत करने हेतु प्रतिबद्ध दिखता है। मुआयना, सरोकार, ग़ज़ल रंग, गुनगुनाहट, फ़न की बात, किताब-कौतुक, सदरंग में संगीत, चित्रकला से जुड़े विषयों पर लेख, विमर्श, चर्चा ध्यान खींचते हैं। सबसे बड़ी बात इसकी तरतीब, इसका व्यवस्थित आकल्पन है। यह निशानदेही भी कि साहित्य के सरोकार व्यापक हैं जिसमें संसार के हर सुख-दुख, उतार-चढ़ाव और धूप-छांव के विविध रंग समाहित हैं।
-ख़ुदेजा ख़ान
(कवि/समीक्षक)
बहुत सादगी और बिना शोर-शराबे के बड़े काम किये जा सकते हैं, ‘आब-ओ-हवा’ इसका पर्याय है। छोटे-से कलेवर में कला-संस्कृति के नये-पुराने सारे ट्रेंड समेटना, समाज व राजनीति पर भी बारीक़ नज़र रखना, यह कमाल कर दिखाया है इसने, वह भी छोटे-से वक़्फ़े में। आब-ओ-हवा को पहले जन्मदिन की हार्दिक बधाई। इतनी उम्मीदें जगा दी हैं, तो आप नई चुनौतियों से भी रूबरू होंगे, उनसे निपटने के लिए अनंत शुभकामनाएं
-आलोक त्यागी
(कवि/साहित्यविद)
आब-ओ-हवा का पहले साल का सफ़र शानदार और यादगार रहा, उम्मीद है यह ऊर्जा और आगे बढ़ेगी। नये साथियों के जुड़ने से और समृद्ध होंगे। जोड़ने की अद्भुत क्षमता वाले, नये विचार पालने-पोसने और हर संभव सामने लाने के लिए भाई भवेश को बहुत शुभकामनाएं।
-चित्रा चौधरी
(महिलाओं के न्यायिक कार्य से संबद्ध)
साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अवदान पर केंद्रित प्रतिष्ठित पत्रिका 'आब-ओ-हवा' का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय प्रयास है, जो न केवल हमारी महान साहित्यिक परम्पराओं के प्रति विनम्र कृतज्ञता-ज्ञापन है बल्कि देश की श्रेष्ठ वैचारिकी को आम पाठकों तक पहुॅंचाने का प्रशंसनीय प्रयत्न है ताकि उनके बौद्धिक विकास को साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से पुष्पित और पल्लवित किया जा सके। पत्रिका अपने असरकारी विचारों की निरन्तरता को क़ायम रखते हुए सदा सक्षमता और सार्थकता के साथ सफल हो, आगे अपनी महती भूमिका को सन्नद्धता के साथ निबाहने के लिए तत्पर रहे, इस हेतु उसके उज्जवल और उन्नत भविष्य के लिए हार्दिक स्वस्ति-कामनाएँ। उम्मीद करता हूॅं पत्रिका युवा प्रतिभा और मेधा को विकसित करने के अभियान में निरन्तर उद्यमशील रहकर प्रगति पथ पर अग्रसर रहेगी।
-मुकेश वर्मा
(वरिष्ठ लेखक/संपादक: वनमाली कथा)
   

   आब-ओ-हवा के लगभग सभी अंक निरंतर और समयबद्ध प्रकाशित हुए और समय पर पाठकों तक पहुंचे भी...इसके लिए नि:सन्देह आप प्रशंसा के पात्र हैं भवेश भाई। प्रिंट मीडिया से प्रकाशित समाचार पत्र हो या सामयिक पत्रिका या मनोरंजन की कोई मैगज़ीन ही हो, मालिक और प्रकाशक तथा उसमें नियमित स्तम्भ देने वाले रचनाकारों/लेखकों का अर्थ हित तो रहता ही है। मुझे नहीं लगता आपकी टीम में कोई ऐसा मेम्बर है, जो आपसे इस अपेक्षा से जुड़ा है। सभी के विचार, लेखन और चिन्तन हाशिये पर खड़े या अंतिम पंक्ति के भी अंतिम व्यक्ति के दर्द और उसकी आवश्यकता से जुड़े हुए हैं।

       

आपने आधुनिकता और प्रगतिशीलता के साथ सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर अपनी बात आरम्भ की है। मुझे लगता है अब तक तो आब-ओ-हवा ने अपनी निष्पक्षता से एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक और प्रगतिशील पाठक वर्ग तैयार कर लिया होगा। सभी अंकों में सभी स्तम्भ सार्थक, पठनीय, अनूठे और संग्रह योग्य हैं। आपके सभी साथी कड़ी मेहनत से नि:स्वार्थ लेखन कर रहें हैं। आपकी संपादकीय टिप्पणियां तो अत्यन्त विचारणीय और उद्वेलित करने वाली होती हैं.. वाह-वाह! शुभकामनाएं। 

-नून जीम
(साहित्यप्रेमी)
      मैं आब-ओ-हवा के एक वर्ष होने के उपलक्ष्य में लिख रहा हूं कि आपके लेखन सहित प्रकाशन से जुड़े सभी लोगों को बधाई दे सकूं। बिना सकारात्मक कार्य के भी अनावश्यक व्यस्त लोगों की भीड़ एक मेरा नाम भी है। वैसे तो पढ़ने में मेरी प्रवृत्ति ही बहुत कम है, अतः लेखन के मर्म में जाने का पूरा समय नहीं मिल पाता, किन्तु जितना भी पढ़ा है उसमें लेखकों के अलावा आपका साहित्य के लिए जो समर्पण भाव व्यक्त होता है, मैंने वर्तमान में अन्यत्र नहीं देखा। मेरे विचार में अब भी साहित्य में उत्कृष्ट लिखा जा रहा है, किन्तु उन्हें सही स्थान नहीं मिल पा रहा है। क्योंकि हमेशा की तरह ही लेखन दरबारों की छत्र-छाया में पल रहा है। जो काग़ज़ दरबार की स्तुति में न हो, उसमें उनका ध्यान अनावश्यक है, ऐसा ही माना जाता है। किंतु त्याग की नियति होती है हर स्थिति में प्रस्फुटित होने की, तो यह भी तय है कि वो होकर रहेगी।
-डॉ आलोक त्रिपाठी
(प्राचार्य-डिग्री कॉलेज, फ़तेहपुर)
  

     आब-ओ-हवा के सभी अंक हमेशा अत्यंत समृद्ध, पठनीय और संग्रहणीय सामग्री से भरे-पूरे दिखे। नहीं पढ़ने, कम पढ़ने और कम पढ़कर भी लम्बी हाँकने के इस दौर में आब-ओ-हवा ताज़ा हवा का अहसास है। इस समय जब प्रतिरोध के स्वर गूँगे हो चले हैं, सच को सच कहने के ख़तरे बढ़े हुए हैं तब तीखे सम्पादकीय और संतुलित आलेखों के साथ  आब-ओ-हवा सन्नाटों के बीच उभरती, नन्ही ही सही, प्रतिरोध की बहुत महत्वपूर्ण आवाज़ है। हस्तक्षेप सराहनीय है। विभिन्न ललित कलाओं से जुड़ी उत्कृष्ट साहित्यिक सामग्री सम्पादकीय टीम के परिश्रम, कौशल और समाज के प्रति पक्षधरता को सहज ही प्रकट करते हैं। इस के विभिन्न स्तम्भों का तो कोई जवाब ही नहीं।  

     सारी सामग्री बहुत ही मनोयोग से चयनित और प्रकाशित होती है और यह बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि आब-ओ-हवा का सम्पादन स्वयं एक मंझे हुए और स्थापित साहित्यकार/शायर आदरणीय भवेश दिलशाद जी के हाथ में है। छोटे से कलेवर में इतनी साहित्यिक समृद्धि आनंदित भी करती है और चमत्कृत भी। प्रसन्नता का विषय है कि आब-ओ-हवा को एक वर्ष पूर्ण हो रहा है। इतनी अल्पावधि में इतनी बड़ी साहित्यिक पहचान सम्पादकीय टीम की योग्यता और निष्ठा, प्रकाशन की निरंतरता और निरंतर श्रेष्ठ पठनीय सामग्री के प्रकाशन से ही संभव है।

-अशोक शर्मा
(शायर)
  

    अदब की ज़मीन को शादाब करना, अपनी रवायत को एक आश्वासन देना आने वाली नस्लों के हाथों में उम्मीद की एक किरण देने के समान है। आब-ओ-हवा ने अपने अंकों के ज़रिये अदब के पिछले वक्तों, मौजूदा समय और आने वाले वक़्त के बीच एक पुल बनाने का काम किया है। ताज़ातरीन मसअलों को अदब के ज़ाविये से उठाकर उस पर बहस-मुबाहिसा किया, तरक़्क़क़ीपसंद तहरीक़ की ज़मीन को पुख़्ता किया। बीते हुए कल के उन अदीबों को याद किया जिन्होंने अपनी क़लम से ख़ूबसूरत इतिहास लिखा। आने वाले कल की उम्मीदें लिये महत्वपूर्ण रचनाकारों को स्थान देकर अपने भविष्य को सुदृढ़ करने की कोशिश भी की है।  

     दरअसल यह कल्चरल मैगज़ीन है, जिसने अपने कल्चर को बचाने के लिए तो काविशें की ही, अपने बीच उठ रहे उन तमाम सवालों से दो-चार होने की कोशिश भी की है जिनसे भिड़ना आज की ज़रूरत है। युवा शाइर भाई भवेश दिलशाद ने बहुत मन से इस एक वर्ष के सफ़र में आब-ओ-हवा को आगे ले जाने की कोशिश की है। उनका यह सफ़र ऐसे ही जारी रहे और अगले बरसों के अंकों में और नयापन हम सभी महसूस करें, यही तमन्ना है। भाई भवेश दिलशाद को दिली मुबारकबाद।

-आशीष दशोत्तर
(शायर/लेखक)
बधाई इसलिए भी कि जिस तरह साहित्यिक पत्रकारिता का स्तर आब-ओ-हवा ने रचा है, वह आज कुछ दुर्लभ-सा है। 
-राजा अवस्थी
(कवि-समालोचक)
साल भर में आब-ओ-हवा का प्रत्येक अंक नवीन जानकारी और कलात्मकता से सम्पन्न रहा। जिज्ञासु पाठक की साहित्यिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने मे अग्रणी।
-अर्चना श्रीवास्तव
(साहित्य व कलाप्रेमी)
विगत कुछ माहों से मेरा स्तंभ "उड़ जाएगा हंस अकेला" आब-ओ-हवा के ज़रिये मक़बूलियत पा रहा है, यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। भवेश ऐसे संपादक हैं, जो पत्थर से भी पानी निचोड़ लेते हैं।
-विवेक सावरीकर मृदुल
(रंग-कलाकार/कवि)
आब-ओ-हवा की हर एक रचना प्रभावित करती है, बिना लाग लपेट के हर अंक का संपादन सोच-समझकर किया जाता है। चहुंओर फ़िज़ा में आब-ओ-हवा है। स्तरीय और महत्वपूर्ण संपादन हेतु हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। पुनश्च: वेब पत्रिकाओं में आब-ओ-हवा सबसे बेहतर है।
- डॉ. मांघीलाल यादव
(शिक्षक-साहित्यविद)
error: Content is protected !!