
- October 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 0
स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....
त्योहार का समय और प्रमाणीकरण का व्यवसायीकरण
लगभग एक दशक पहले मैंने फ़ेसबुक पर युवाओं को सलाह दी थी कि आने वाले समय में उत्पाद के विज्ञापन से एक क़दम आगे बढ़कर उत्पाद के प्रमाणीकरण पर ध्यान देना चाहिए, यह एक अच्छा व्यवसाय बनेगा और इस दिशा में प्रयास किया जा सकता है। आज जब देखता हूं तो मुझे यह विचार इन्फ़्लुएनसर्स की शक्ल में नज़र आता है। लेकिन यह सलाह देने में भी मेरी सोच सकारात्मक थी। बिना सिर पैर के विज्ञापनों की भीड़ में वास्तविक उत्पाद का चयन, उपभोक्ता के लिए एक बहुत बड़े शोध का विषय बन गया है। अब तो बहुत लोग समझ गये होंगे कि सिने जगत सारी तारिकाएं लक्स साबुन लगाते हुए क्यों दिखती है। अब ऐसे में, समाज के साथ चलने की होड़ में बहुत से लोग इनका अनुकरण करने लगते हैं, और ज़ाहिर है परिणाम अपेक्षानुरूप नहीं आता, और आ भी नहीं सकता क्योंकि सच बोलने की गारंटी नहीं है।
ख़ैर प्रामाणिकता के व्यवसाय संबंधी सुझाव के संबंध में मेरा निहित स्वार्थ यह था कि समाज को सही उत्पाद चुनने में सुविधा होगी और उसका लाभ समाज को होगा। वैसे मैं ऐसा कुछ दावा नहीं करता कि मेरे ही सुझाव से सभी इन्फ़्लुएनसर बन गये हैं और मीडिया जगत की कई हस्तियों ने भी इसमें अपना बड़ा मुकाम बना लिया, जिससे इसकी सफलता स्पष्ट होती है।
वैसे तो सोशल मीडिया पर पार्टियों के समर्थकों की अच्छी ख़ासी भीड़ है और उनके अनुसार उनका बहुत अच्छा प्रभुत्व भी है। भीड़ वैसे हर क्षेत्र के प्रभावशाली चेहरों की है, जो विभिन्न क्षेत्रों में अपना दख़ल रखते है। वैसे तो आम दिनों में इनका कार्य पार्टी के समर्थन में अपना योगदान देना होता है तथा दूसरी पार्टी को कोसना होता है। लेकिन ये प्रभुत्वशाली लोग मौसम के हिसाब से कुछ काम करते हैं, जिसकी शुरूआत मीडिया से होती है और फिर शुरू होता है विमर्श का एक सिलसिला। इसमें किसी एक क्षेत्र विशेष, जैसे दवा, भोजन, सौन्दर्य प्रसाधन आदि के क्षत्रप अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, जिसका समर्थन हर पार्टी के समर्थकों द्वारा किया जाता है। यहाँ पार्टी भेद भी मिट जाता है। और फिर प्रस्फुटित होती है ज्ञान की नयी गंगा, जिसके लिए मार्ग प्रशस्त करती है पीआर एजेंसी।

मसलन हर त्यौहार के पहले, लगभग निष्प्राण पड़ी सरकारी जांच एजेंसी- चाहे वो केंद्र की हो या राज्य की- में एकाएक प्राण का त्वरित संचार होता है, छापे पड़ने लगते हैं और बहुत सारे मिठाई बनाने के समान, जैसे नक़ली खोया, छेना, पनीर आदि ज़ब्त होने लगते हैं। कभी तो किसी फ़िल्म की शूटिंग की तरह दिखने वाली घटना को खोजी पत्रकारिता उजागर करती है। वैसे इस तरह की ज़ब्ती में पुलिस नहीं दिखती, और न ही खोजी पत्रकार यह बताते हैं कि उनकी उक्त खोज का परिणाम क्या हुआ, क्या जो दोषी थे उनको सज़ा हुई? पुलिस ने किन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया? वैसे हर त्योहार के पहले इस तरह के कम से कम 10 केस तो आपको पता चलते हैं और यह 20 सालों से हो रहा है तो कितनों को सज़ा हुई? अगर सिर्फ़ 5 त्योहारों को मानें, 1000 के लगभग मामले होते हैं। क्या सभी में आरोपी छूट गये? एक को भी कोई सज़ा नहीं हुई? लेकिन अख़बार से लेकर टीवी तक, सोशल मीडिया पर बहस छिड़ जाती है कि इस देश का भविष्य क्या होगा? आपको बस लगने लगेगा कि इस देश में आप जीवित बच गये, पूर्वजों के पुण्यों का प्रभाव है। वरना हर कोई ज़हर खाकर भी जीवित कैसे है!
वैसे ज़रा सरकारी आंकड़े देखें तो ये कुछ और तस्वीर बयान करते हैं, जिससे आपको लगेगा कि अपने शायद विषपान नहीं किया है। साल 2023 में भारत ने लगभग 239.3 मिलियन टन दूध का उत्पादन किया, जिसमें से क़रीब 237 मिलियन टन (लगभग 99%) घरेलू उपयोग में खपत हुआ और केवल लगभग 63,738 टन डेयरी उत्पाद निर्यात किये गये। प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता उस वर्ष लगभग 471 ग्राम प्रतिदिन रही। अर्थात इतनी भी आफ़त नहीं है कि हम दूध की जगह ज़हर पीते हैं।
अब आती है बाज़ार में एक प्रचारित धारणा- “ये जो छोटे छोटे व्यापारी हैं ना, इनका कोई भरोसा नहीं है। यही सब मिलावट करके मिठाई बनाकर बेचते हैं। इनके यहां से तो कुछ भी लेने लायक़ ही नहीं हैं।”
और फिर तभी, और सच में ठीक तभी… टीवी पर यह विज्ञापन, “इस बार पड़ोसियों को फ़लानी चॉकलेट का डिब्बा भेंट कर प्रेम बढ़ाएं।” फिर टीवी देखते देखते “इस बार नो स्वीट, जस्ट चॉकलेट ही खरीदा जाये।” साथ ही इंस्टा/फ़ेसबुक पर ऑनलाइन, नयी पीढ़ी कह उठती है, हां, इन छोटे वेंडरों पर तो भरोसा कर ही नहीं सकते। और ये तय पाया जाता है कि है इस बार हम सिर्फ़ चॉकलेट्स या ब्रांडेड मिठाई ही खरीदेंगे और बांटेंगे।
प्रचारित धारणा के अनुसार छोटे मोटे दुकानदार, सब मिलावटी सामान बेचते हैं! सच में? वैसे ये ज्ञान कब और कैसे हुआ?
सोचकर देखिए अगर ऐसा होता तो हमारी कई पीढ़ियाँ एमएनसी से सामान ख़रीदे बिना इन्हीं दुकानदारों से समान खरीदकर जीती रहीं, वो कबकी समाप्त हो गयी होतीं। और वैसे भी वो दुकान, उन छोटे दुकानदारों के जीवन जीने का इकलौता ज़रिया। कुछ ग़लत होने पर ग्राहक का भरोसा टूटने की नौबत आने पर उस दुकानदार और उसके परिवार के भरण पोषण का सवाल खड़ा हो जाएगा। उसका नुक़सान कुछ शेयर गिरने तक सीमित नहीं होगा। उसके पास उस कंपनी को बंद करके फिर से नयी कंपनी खोलने का विकल्प नहीं है। तो फिर ऐसी धारणा क्यों? मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ कि ऐसा होता ही नहीं है। आपको बस सतर्क रहना है, किसी धारणा का शिकार नहीं।
आपको एक घटना याद होगी। कहीं किसी पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर हत्या कर दी और उसे नीले रंग के ड्रम में शव को ठिकाने लगा दिया। फिर क्या था, इतनी मसालेदार ख़बर को मीडिया ने हाथो-हाथ लिया। और हर जगह चर्चा शुरू। सोशल मीडिया पर रील और मीम बनने लगे। कुल मिलाकर आपको लगने लगेगा जैसे हर पत्नी अपने पति कि हत्या करने के लिए षड़यंत्र रच रही है। अपवाद का सामान्यीकरण कर दिया गया है, जो कि समाज के लिए अत्यंत घातक है। लगभग 150 करोड़ के देश में अगर एक घटना ऐसी होती है, तो यह PPT (पार्ट पर ट्रिलियन) में है जो कि अपवाद की सीमा से भी बहुत दूर है।
वैसे मिलावट की घटना केवल भारत में ही होती है, ऐसा कुछ नहीं है। यह एक वैश्विक तौर पर फैली बीमारी है, लेकिन उस बाबत सबकी जानकारी व्यापक हो, संभावना कम है। अधिकांश को यही विश्वास होगा कि ये सब भारत में ही होता है। मैं यह तर्क नहीं दे रहा हूँ कि विदेशों में हो रहा है, तो भारत में भी हो सकता है। लेकिन आपने यह क्यों नहीं सोचा कि हम हर नकारात्मक ख़बर, जो भारत के संबंध में है, को सही मानने के लिए तैयार रहते हैं, विचार करिएगा। इस पर भी कभी विस्तार से लिखूँगा।
दुनिया में खाद्य मिलावट की कई बड़ी घटनाएँ हुई हैं, जिनसे लाखों लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हुआ। 1981 में स्पेन में जैतून के तेल में एनिलीन ऑइल मिलाने से 600 से अधिक मौतें और 25,000 बीमारियाँ हुईं। 1998 में बांग्लादेश में सरसों के तेल में अर्गेमोन तेल मिलाने से “ड्रॉप्सी” नामक गंभीर बीमारी फैली। 2011 में जर्मनी में डायऑक्सिन युक्त पशु चारे के कारण हज़ारों फार्म बंद करने पड़े। 2013 में यूरोप में बीफ़ उत्पादों में घोड़े का मांस मिलाने का खुलासा हुआ, जिससे उपभोक्ताओं का भरोसा हिल गया। ये घटनाएँ दिखाती हैं खाद्य मिलावट एक देश की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक ख़तरा है।
अंततः यह सब कुछ बताने का उद्देश्य इतना भर है कि आप जो कुछ भी सुनते हैं, देखते हैं और समझते हैं, सिर्फ़ फेस वैल्यू के आधार पर उसका आंकलन न करें, चाहे आपकी नज़र में प्रस्तोता कितना बड़ा ही महात्मा क्यों न हो। कुछ एपिसोड की टीआरपी के लिए ऐसा तमाशा किया जाता है। परदे के पीछे पटकथा लेखन इतना अव्वल दर्जे का होता है कि आपको उस पर विश्वास होने ही लगता है। ऐसे में उसके द्वारा दिये गये तथ्यों पर एक समालोचनात्मक विश्लेषण करें, ख़ासकर जब कोई लीक से दूर हटकर चलने की बात कर रहा हो, तब।
आपको यह सुविधाजनक लग सकता है कि आप अगर घर बैठे सामान मंगवा सकते हैं और उस बचे हुए समय में फ़ेसबुक या सोशल मीडिया पर और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, तो फिर तैयार रहें और भ्रामक तथ्यों के जोखिम के लिए और साथ ही अपने एकाकीपन के दुष्प्रभाव को झेलने के लिए, जिम या फिर डॉक्टर की फ़ीस भरने के लिए। आप अपने लिए जो उत्पाद चुन रहे हैं, उसे अपनी तार्किक समझ के आधार पर चुनने के लिए जागरूक बनें। त्योहार आपके अपनों के साथ, अपनों के लिए है। एमएनसी के लिए व्यापार का स्वर्णिम अवसर भर है। वैसे एमएनसीयों की पारदर्शिता और प्रामाणिकता पर कभी और चर्चा करेंगे।

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
