
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
ताकि दर्ज रहे 2025
जाते-जाते कुछ दे जाना
जाते-जाते कुछ ले जाना
रुत हो रिश्ता या साल कोई
सबकी आदत इक जैसी है
‘हम बोलेंगे’ 2025 के कुछ लमहों को दर्ज करता रहा। आब-ओ-हवा के मंच पर और भी ब्लॉग्स, लेख, काव्य, तस्वीरें आदि भी यह बीड़ा उठाती रहीं। पिछले अंक में विस्तार से हमने दर्ज किया कि साहित्य की दुनिया का यह साल कैसा रहा। इस अंक में हम इस साल के सिनेमा पर ख़ास नज़र कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होने पर, दुष्यंत कुमार के जाने और साये में धूप के शाया होने के 50 साल होने पर, 31 दिसंबर को उम्र की सदी में दाख़िल हो रहे कवि यतींद्रनाथ राही पर और अन्य पहलुओं को भी समेट रहे हैं। फिर भी जाने कितना कुछ है, जो छूट गया। ज़ाती तौर पर मैं बहुत-से विषयों, मुद्दों और भावनाओं को दर्ज करना चाहता रहा पर…
चाहा था ज़ुबिन गर्ग, कार्टूनिस्ट काक, छन्नूलाल मिश्र, बी. सरोजा देवी, ताबिश महदी, रामदरश मिश्र जैसे उन कुछ और कलाकारों पर कुछ लिख सकूं, जो इस बरस हमें छोड़ गये। साल गुज़रने के आख़िरी दिनों यानी 25 से 28 दिसंबर तक ‘जलम’ (जबलपुर आर्ट-लिटरेचर-म्यूज़िक फ़ेस्टिवल) का मुआयना करता रहा। मन है उस पर भी विस्तार से कुछ लिखूं। साथ ही, चाहा था इस साल कुछ ज़ाती और दुनियावी हासिलों पर अपने अहसास दर्ज कर सकूं… खेलों की दुनिया में हिंदोस्तान के लिए 2025 एक मील का पत्थर रहा। अंतरिक्ष की दुनिया में शुभांशु शुक्ला की उपलब्धि तारीख़ बन गयी। साक्षरता में पहले ही झंडे गाड़ चुका केरल देश का पहला राज्य बना जिसे अति ग़रीबी मुक्त घोषित किया गया। ऐसी ख़ुशख़बरियों के बीच न जाने कितनी ही ख़बरें माथे पर चिंता की लकीरों की तरह उभरती रहीं।
गुज़रते हुए 2025 के नवंबर माह में इंडिया गेट पर प्रदूषण के ख़िलाफ़ भारी प्रदर्शन ने यह साबित किया कि अवाम जन सरोकार के मुद्दों पर एकजुट हो सकते हैं। अरावली पहाड़ियों पर आया संकट किसी तरह फ़िलहाल टल सका तो उम्मीद जगी कि विरोध प्रदर्शनों ने रंग लाना अभी छोड़ा नहीं। इधर मायूसी का रंग तब दिखा, जब हज़ारों-लाखों पेड़ों की बलि देने वाले सरकार-कॉर्पोरट गठजोड़ के विरोध का मोर्चा रंग नहीं ला सका।
ऐसे तमाम मुद्दों से लगातार बेचैन रहा मैं 2025 में सोनम वांगचुक के आंदोलन को दर्ज करना चाहता था। उन्होंने अपनी लड़ाई बहुत शिद्दत से लड़ी है और व्यवस्था के ख़िलाफ़ जोखम लेने से पीछे नहीं हटे। उन्हें जेल में डाल दिया जाना इस सत्ता की घबराहट की ही एक और केस स्टडी के तौर पर दर्ज किया जाएगा। सोनम ने युवाओं को जिस तरह प्रेरित किया है, उम्मीद है कि अच्छी ख़बर जल्द आये।

युवा आबादी ने इस बरस दर्जन भर से ज़ियादा देशों/इलाक़ों में तख़्तापलट तक कर देने का कारनामा किया। जिस पर इल्ज़ाम थे कि बस स्मार्ट फ़ोन में सिर घुसाये रहती है, बस फ़ास्ट फ़ूड की ही भेंट चढ़ी जा रही है, बस रील में ही मुब्तला है रीयल में नहीं… उस जेन-ज़ी ने सड़कों पर आकर बेलगाम सत्ताओं के क़िले ढहा दिये। यह ज़रूर कि इन आंदोलनों, विद्रोहों का अंजाम क्या हुआ? यहां से सोचना यह है कि ग़ुस्से को आकार किस तरह दिया जाये ताकि एक सही निज़ाम की दिशा की तरफ़ कारवां बढ़े। यानी जेन-ज़ी ने जितने देशों में उग्रता और व्यग्रता का इज़हार किया, वहां कमज़ोर विपक्ष और नेतृत्वविहीन समाज का चेहरा उभरकर आया। इसे पलटकर कहा जा सकता है कि जहां विपक्ष और समाज के पास कोई दिग्दर्शन नहीं, वहां जेन-ज़ी की बेचैनी और बौखलाहट का विस्फोट हुआ।
हिंदोस्तान में सत्ता के प्रतिपक्ष को ख़त्म किये जाने, प्रतिपक्ष की आवाज़ों के दमन को लेकर कई ख़बरें फ़िक्र बढ़ाती रहीं। जांच एजेंसियां हों या बोर्ड, अकादमी जैसी सरकारी इकाइयां, पहले ही सत्ता की ग़ुलाम हो चुकी हैं। पत्रकारिता और न्यायपालिका जैसे स्तंभों के ध्वस्त होने के बाद 2025 में हमने और एक विद्रूप देखा। इस वर्ष चुनाव आयोग बुरी तरह से मटियामेट होता नज़र आया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव अप्रासंगिक होते दिखे। कुल मिलाकर लोकतंत्र की क़ब्र पर 2025 एक बड़े पत्थर की तरह बिछता हुआ दिखा।
सत्ताएं कुछ सियासी पार्टियों और लोकतंत्र के ख़ात्मे में जितनी ऊर्जा खपाने में लगी हैं, अगर वह ताक़त सही जगह लगायी जाती तो बेहतर होता। 2025 में दो बड़े आतंकी हमले न होते, चार दिन की ही सही पर भारत को बेवजह किसी जंग में नहीं कूदना पड़ता; धार्मिक आयोजनों/अवसरों पर मची भगदड़ों में सवा सौ से ज़ियादा जानें न गयी होतीं; क्लाइमेट चेंज के संकट में हीटवेव और भयानक न हुई होती; बाढ़, बादल फटने जैसे हादसों से और सड़कें, पुल, भवन आदि टूटने से लोग तबाह न हुए होते; विकास के डरावने नतीजे न सामने आ रहे होते; तक़रीबन डेढ़ सौ नक्सलियों को मारकर नक्सलवाद के सफ़ाये के पीछे ये शक न उभरते कि अब इन आदिवासियों के जल-जंगल-ज़मीन पर कब्ज़ा करने की नीयत किसकी है…
दरअसल ये सब 2025 की वो आवाज़ें हैं, जो चीख, गूंज या सन्नाटा बनकर आने वाले सालों में भी सुनायी देती रहेंगी।
जनवरी से चले दिसम्बर तक
एक पतझर से एक पतझर तक
इसी तरह तड़प के एक साल और निकल गया
बेसिर-पैर के नियम-क़ायदों की साज़िश से जब समाज जाहिल होता चला जाता है, तब क़ानून और इंसाफ़ के वजूद का संकट खड़ा हो जाता है। 2025 को ऐसी कुछ त्रासदियों के लिए याद करके भी हम तड़पकर रह जाएंगे।
कोलकाता रेप केस में संजय राय को और सीरियल बलात्कार केस में प्रज्ज्वल रेवन्ना को उम्र क़ैद की सज़ा हुई लेकिन बरसों से चल रहे निठारी कांड का प्रमुख आरोपी सुरेंद्र कोली सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। 2006 के इस कांड में पहले और भी मुल्ज़िम बरी हो चुके हैं। यानी अबूझ पहेली रह गयी कि उन दर्जनों मासूम बच्चों का क़ातिल कौन था, है? नोएडा के आरुषि तलवार हत्याकांड की तरह यहां भी देश का पूरा अपराध अन्वेषण सिस्टम कितना लाचार और लचर साबित होकर रह गया। आप दो दशक तक दिल दहला देने वाले हत्याकांड की जांच करते रहते हैं, जाने कितने अफ़सरों को, कितने ही उप विभागों को पालते रहते हैं और होता क्या है? खोदा पहाड़ निकली चुहिया… एक सबूत नहीं मिल पाता। और मारे गये बच्चों के लिए सच एक सवाल बनकर रह जाता है ‘हू किल्ड अवर किड्स’! इन जांच विभागों, इनके आक़ाओं की जवाबदारियां तय करने वाला सिस्टम क्या कभी बन सकेगा?
ऐसी ख़बर शायद कभी नहीं आयी कि निठारी कांड के पीछे कोई रसूख़दार शरीके-जुर्म रहा हो, तब भी हमारी जांच एजेंसियां बेबस साबित हुईं। ऐसे में यह उम्मीद तो की ही नहीं जा सकती थी कि रेसलर के शोषण के आरोपों में एक रसूख़दार सियासतदां ब्रजभूषण सिंह के ख़िलाफ़ कोई फ़ैसला आएगा। बरसों पहले के मालेगांव बमकांड में जिन्हें बरी किया गया, उनमें पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर का नाम होना चौंकाने वाली बात नहीं था।
बड़ी त्रासदी तो यही है कि एक समाज के तौर पर हम ऐसी किसी भी घटना से चौंकना भूल चुके हैं। आदी हो चुके हैं एक बदनिज़ामी के, अपना चुके हैं ज़ुल्म की सत्ता को और क्रूर अट्टहासों के सामने सिर झुका चुके हैं। इस मुर्दापरस्त समाज में अब भी हैं कुछ शायराना ज़ुबानें जिनकी ज़िद है हम बोलेंगे।
एक तरफ़ शायर और विद्वान हैं जो समाज को जातिवाद की ज़लालत से छुटकारा दिलाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ़ सियासत जो जाति आधारित जनगणना को बढ़ावा देकर इस रोग को पालते रहना चाहती है। सियासत यानी शायरी और बौद्धिकता का प्रतिपक्ष। और यह समाज को जहालत के पाले से खेलने पर मजबूर करती है। आगे-आगे देखिए होता है क्या…
दिल में कोहरा और नज़र में धुंध जमती जा रही है
जा रहा है फिर दिसंबर जनवरी फिर आ रही है
कैलेंडर बदलते रहते हैं, बदलते रहेंगे। और शायद कोई दिन न आये बोलने वाली इन आवाज़ों को सुनने वाला, फिर भी इनका अपना किरदार, अपना आत्मसम्मान तो छीना नहीं जा सकता।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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ऐसा लगा जैसे कुछ नए तरीके से लिखा गया है यह लेख. दिलशाद का कोई अलग स्टाइल लगा! काफी लोगों की चिंताओं और दुख को आपने जगह दी. शुक्रिया.