
- August 30, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
संदर्भ : 31 अगस्त 2025, कमलकांत सक्सेना की 14वीं पुण्यतिथि
गीत तब : कमलकांत
1
दीपक जैसा जलना प्यारे
जीवन जैसा गलना प्यारे
पूरे जग में अंधियारा है
दौलत की ही पौबारा है
अस्मत की नीलामी करता
सत्ता वाला गलियारा है
पानी जैसा चलना प्यारे
सुख की आंखें दुख का काजल
मन के ऊपर छाया बादल
धड़कन गाये फिर भी, कजली
दोहा, रोला, छप्पय आरल
माटी जैसा ढलना प्यारे
————*————
2
यह हमारे गांव की पहचान है
हर अधर पर मोहिनी मुस्कान है
जो पथिक आया यहां पर
रह गया होकर यहीं का
ढूंढ़ता था प्यार कण भर
पा गया सागर सरीखा
देवता सा गांव में मेहमान है
यह हमारे गांव की पहचान है…
नीतियां जीवित यहां पर
सत्य का सूरज उगा है
हर अंधेरा डूबता है
यह यहां की मान्यता है
त्याग का ही गांव को वरदान है
यह हमारे गांव की पहचान है…
गांव ने संपन्नता दी
मन दिया वैभव दिया है
संस्कृति दी सभ्यता दी
धर्म औ’ दर्शन दिया है
गांव जैसा गांव का परिधान है
यह हमारे गांव की पहचान है…
गांव गोरी गांव गुंजन
गांव माटी प्रीति चंदन
गांव पूजा गांव श्रद्धा
गांव माता भक्ति वंदन
गांव को ही पूजता भगवान है
यह हमारे गांव की पहचान है
————*————
3
दीप हूं बस रात का मेहमान ही तो
बुझ रहा यदि प्रात को तो दोष क्या है
इस धरा को ज्योति मिलती इसलिए है
तम बिखरकर टूट जाएं दीप्त हो मन
चेतना को प्रीत मिलती इसलिए है
गा सके हर बीज में इक पुष्प यौवन
पुष्प हूं बस दो घड़ी की गंध ही तो
झर रहा यदि सांझ को तो दोष क्या है…
मैं थका हारा मुसाफ़िर क्या करूं अब
लक्ष्य सम्मुख, शेष पर अनुराग कितना
फिर उठूंगा भस्म अपने प्राण करने
अग्नि गायक हूं जलूंगा आग जितना
मैं समय के चक्र की गति मात्र ही तो
तज रहा यदि मोह को तो दोष क्या है..!

कमलकांत सक्सेना
करैरा, ज़िला शिवपुरी (मप्र) में 5 अक्टूबर 1948 को जन्म। बी.ए. व एल.एल.बी. की शिक्षा और पत्रकारिता और साहित्य से आजीवन संबद्ध रहे। शिवपुरी, ग्वालियर और भोपाल कर्मभूमियां रहीं। 1977 में साप्ताहिक ग्वालियर बाज़ार पत्रिका की स्थापना व संपादन। 'गीतायन', 'विद्रोहिणी' जैसे गीत संकलनों का संपादन। 2000 से 'साहित्य सरोवर' का संपादन शुरू किया, जो 2002 से अंतिम सांस तक 'साहित्य सागर' नाम से जारी रहा। 'नटवर गीत सम्मान', 'राष्ट्रीय गीत उत्सव' के प्रवर्तक। गीत के उत्थान के लिए पूरा जीवन समर्पित किया। 2001 में इकलौता काव्य संग्रह 'ऋजुता' प्रकाशित हुआ। 2012 में 'गीत अष्टक' के दो खंडों का संपादन व प्रकाशन कर चर्चित हुए और 31 अगस्त 2012 को कीर्तिशेष।
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सदाबहार कविताओं के साथ पुण्य स्मरण
***सूरज जैसा जलना प्यारे
माटी जैसा ढलना प्यारे।***
सदाबहार गीतों के साथ पुण्य स्मरण
***सूरज जैसा जलना प्यारे
माटी जैसा गलना प्यारे।***
गीत कविता की दुनिया में कमलकांत सक्सेना एक ऐसा नाम
है, जिनके गीतों में गीत की मिठास, एक जीवन-दर्शन और उनका अपना समय और उस समय की गंध महसूस की जा सकती है। उन्होंने गीत लिखे भर नहीं है, बल्कि गीत को जीते भी रहे हैं। साहित्य सरोवर या साहित्य सागर के साथ गीत अष्टक के दो खण्डों का संपादन प्रकाशन इस बात का प्रमाण है। यहाँ प्रस्तुत गीत उनकी जीवन के प्रति आस्था को भी दिखा रहे हैं। जीवन, मनुष्य और मनुष्यता से भरा उनका जीवन इस राह पर चलने वाले किसी भी राही के लिए प्रकाश स्तंभ की तरह काम कर सकता है।