
- October 10, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
त्वरित टिप्पणी भवेश दिलशाद की कलम से....
लास्ज़लो क्राज़्नाहोरकाई और लास्ज़लो टॉथ से गुज़रते हुए
लास्ज़लो नाम ऐसा नहीं है, जो हमेशा याद या ज़बान पर रहे। बुकर पुरस्कार के सिलसिले में यह नाम तक़रीबन दस साल पहले सुर्ख़ियों में आया था, तब हंगरी के इस लेखक लास्ज़लो क्राज़्नाहोरकाई के बारे में कुछ पढ़ा, सुना (बतौर ख़बरनवीस) था। एक दशक का वक़्त काफ़ी है, इस नाम को भूल जाने के लिए। इत्तेफ़ाक बहुत दिलचस्प होते हैं। यह नाम मेरे पास लौटकर आया दिलचस्प ढंग से…
आज 10 अक्टूबर 2025 है, जब मैंने यह ख़बर अख़बार और सोशल मीडिया पर देखी कि लास्ज़लो क्राज़्नाहोरकाई को इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार घोषित किया गया है। इत्तेफ़ाक से यह नाम ‘लास्ज़लो’ पिछले एक हफ़्ते से मेरे ज़ेह्न में बना हुआ है। वजह है एक अमरीकी और यूरोपीय फ़िल्म ‘द ब्रूटैलिस्ट’। इसके मुख्य किरदार का नाम है लास्ज़लो। जब laszlo, यह स्पेलिंग फ़िल्म के सबटाइटल्स में दिख रही थी, तो इसका उच्चारण करने की कोशिश कर रहा था। लास्ज़लो, लिख भी रहा हूं तब भी यही कोशिश कर रहा हूं। किरदार की कई ख़ूबियां तो हैं ही, पिछले एक हफ़्ते से इस कोशिश की वजह से भी यह नाम मेरे भीतर अटका रहा। हालांकि मुझे एक धुंधला-सा ख़याल था कि यह नाम पहले कहीं टकरा तो चुका है। मैं किसी और फ़िल्म के किसी और किरदार को ही याद करने में था, पर आज ख़ुलासा हुआ यह तार जुड़ा है एक लेखक से।
बहरहाल, यह लेखक कौन है, क्या है? इस खोज में पुराने कुछ तार खुले भी और एक छोटे-से अध्ययन की यादें ताज़ा हो गयीं। मीडिया और सोशल मीडिया ने इस बात को प्रमुखता से केंद्र में रखा कि नोबेल विजेता लास्ज़लो बहुत लंबे वाक्य लिखने की शैली के लिए मशहूर हैं, या वह मानते हैं कि पूर्णविराम तय करने वाले हम कौन होते हैं या यह कि उन्होंने एक पूरा उपन्यास ही एक वाक्य में लिखा… ये बातें चौंकाती तो हैं लेकिन इसे जान लेने और एक बार चौंकने के बाद ये बातें क्या कोई प्रभाव छोड़ पाती हैं!

लास्ज़लो के शब्दों, विचारों को लेकर अपनी थोड़ी-सी पढ़ाई और समझ के मुताबिक़ मैं चाहता हूं किसी और सिरे से बात की जाये। और वो सिरा है समय के साथ उनका रिश्ता…
“कड़वाहट। दुनिया के मौजूदा हालात के बारे में सोचना मुझे बहुत दुखी करता है। यही मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है। साहित्य की दुनिया में आने वाली अगली कई पीढ़ियों के लिए भी मुमकिन है, यही प्रेरणा बने। आने वाली नस्लों को कुछ देने की प्रेरणा, बहुत, बहुत अंधेरे दौर में किसी तरह जी पाने की कोई प्रेरणा और इस दौर को झेलने के लिए हमें पहले से कहीं ज़्यादा हौसले की ज़रूरत है…”
ये लास्ज़लो के शब्द हैं, जो उन्होंने इस सवाल के जवाब में कहे कि उन्हें लिखने की प्रेरणा कैसे, कहां से मिलती है। इन शब्दों से दो यादें मेरे पास फ़ौरन आयीं, पापा के इकलौते काव्य संग्रह का जब प्रकाशन हुआ था, तब उन्होंने समर्पण वाले पन्ने पर लिखा था, ‘उन उलाहनों के नाम…’। और दूसरी जो मैंने कहीं पढ़ा था, कालजयी या सर्वकालिक लेखन के लिए पहली शर्त समसामयिक होना है। कड़वाहटें ही हैं, जो एक इंसान को कुछ लिखने, कुछ अभिव्यक्त करने के लिए उकसाती हैं। और ये कड़वाहटें ही हैं, जो हर समय का कड़वा सच रही हैं।
लास्ज़लो जब यह कह रहे हैं कि आने वाली नस्लों के लिए भी यही प्रेरणा होगी, तो यह कितना बड़ा दुख है। हज़ारों, लाखों महान लेखकों, समाजसुधारकों के फ़ना हो जाने के बावजूद यह दुनिया वैसी नहीं है, जैसी हो तो अच्छा हो। हर दौर पिछले से ज़ियादा गहरा सियाह होता जा रहा है… मैं अपने ही शब्द दोहराऊं तो “ग़मे-दौरां हमारी ज़िंदगी है तो यह उदासी आती कहां से है? आवाज़ का असर न होने से शायद…”
आवाज़ के असर का दौर जाने कब आये। लास्ज़लो की आवाज़ में मानवीयता के घुटने की पीड़ा है। अमरीकी आलोचक सूज़न सोंटैग ने लास्ज़लो के लिए “master of the apocalypse” वाक्यांश गढ़ा। सूज़न का एक पूरा विश्लेषण इस बात पर आधारित रहा कि लास्ज़लो आहिस्ता-आहिस्ता मर रही मानवीयता को, ऐसे में सौंदर्य की क्षणभंगुरता और अस्तित्व की छायाओं को बारीक़ी से दर्ज कर पा रहे हैं। ख़ुद लास्ज़लो ने कहा है, “विनाश या क़यामत एक प्रक्रिया है जो लंबे अरसे से चल रही है और बहुत अरसे तक चलती रहेगी। क़यामत अभी है, एक लगातार जारी न्याय की तरह।”
हालांकि वह अपना प्रतिरोध भी दर्ज करते हैं और युद्ध को अनिवार्यता स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। उन्हें कहीं न कहीं अपने शब्दों पर भरोसा है कि आने वाले समय के लिए वो एक सहारा बन सकेंगे। और इसी सिरे से मुझे ‘द ब्रूटैलिस्ट’ का लास्ज़लो टॉथ भी याद आ जाता है, जो कहता है “जंग चल रही थी, फिर भी मेरे जितने भी प्रोजेक्ट्स थे, उनमें से बहुत-से वैसे ही खड़े रहे। यूरोप में जो कुछ हुआ, जब उसकी शर्मिंदगी से लोग उबरेंगे तो मुझे पूरी उम्मीद है कि ये साइट्स सियासत को सोचने पर मजबूर करेंगी…”
लास्ज़लो की चिंताएं, वैचारिकताएं और उनके प्रभाव पर चर्चा का समय तो है ही…हम जल्द ही आब-ओ-हवा के आगामी किसी अंक में उन पर केंद्रित विशेष सामग्री अपने पाठकों तक लाने के लिए प्रयासरत हैं।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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लेखक, वैचारिकी, फिल्म का किरदार, असल जीवन की कड़वाहट और भविष्य- सबको एक साथ कैसे पिरो लिया! वाह!
इंतज़ार रहेगा
आकांक्षा
नोबल से सम्मानित लेखक के बारे में जानकर बहुत लगा चिंता सिर्फ उनकी नही नही साझा है हम सबकी ।
उनके बारे में और जानने की इच्छा है ।इंतज़ार रहेगा ।
धन्यवाद ।