rajendra mathur, राजेंद्र माथुर
गूंज बाक़ी... अंग्रेज़ी के दैनिक टाइम्स आफ़ इंडिया के लिए हिंदी की दैनिक पत्रकारिता के विषय पर राजेंद्र माथुर ने दो लेखों में अपने दृष्टिकोण लिखे थे, जो आज भी विचारणीय मालूम होते हैं। यह अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने किया है, जो उन्हीं के द्वारा संकलित पुस्तक 'सदी का संपादक राजेंद्र माथुर' से साभार यहां दिया जा रहा है...
राजेंद्र माथुर की कलम से....

हिंदी की दैनिक पत्रकारिता का उत्कर्ष

              हिंदी का विकास देश के श्रेष्ठतम दिमाग़ वाले लोगों द्वारा विकसित मानक हिंदी और सदियों से रोज़मर्रा की बोलियों के आपसी संपर्क से हुआ। जहाँ पढ़े-लिखे लोग पुस्तकों या मासिक पत्रिकाओं में लिखी जाने वाली भाषा बोलने लगे तो दूसरी ओर लेखकों ने मोहल्लों और बाज़ारों में बोले जाने वाले देशी मुहावरों को भी अपनाने का प्रयास किया। इस प्रकार विगत सौ साल में हमारी आँखों के सामने एक ऐसी भाषा का निर्माण हुआ, जिसका विकास बहुत रोमांचकारी है। इसे सिर्फ़ अंधे लोग नहीं देख सकते। हिंदी के विकास की इस प्रक्रिया में सहभागी बनने के आनंद को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। पत्रकार कमोबेश इसी प्रक्रिया के सह-उत्पाद हैं। यह सच है कि श्रेष्ठतम लेखक पत्रकारिता में आये और उन्होंने अपने अख़बारों के ज़रिये भाषा को तराशने और उसे मानक रूप देने के लिए प्रयास किया, लेकिन ऐसे लोग कम ही थे। पत्रकारिता में उनकी कोई वास्तविक दिलचस्पी नहीं थी। उनमें से अधिकतर लेखकों का शीर्षकों, खोजी पत्रकारिता, भंडाफोड़, स्कूप, त्वरित टिप्पणियों और सधे हुए विवरण आदि की तरफ रुझान नहीं था, जिनके कारण कोई अख़बार चलता है। कुल मिलाकर अख़बारों में राष्ट्रवादी तेवर लिये शब्दाडंबर होता था।

यह भी देखा गया कि साहित्य के क्षेत्र में असफल लेखक ही साप्ताहिक या दैनिक पत्रों के ज़रिये पत्रकारिता में आये। उन लेखकों को उस दौर के साहित्य से एक बड़ी शिकायत रही। वे कहते थे कि साहित्य में उन्हें सही स्थान नहीं मिला है। पत्रकारिता उनके जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति के लिए दोयम दरजे का काम था। लिहाज़ा वह लेखक, पत्रकारिता व्यवसाय के साथ कभी न्याय नहीं कर पाया। वह मानता था कि पत्रकारिता का कौशल सीखना उसकी प्रतिभा से नीचे की बात है। इसके अलावा एक और बड़ी खाई थी। हिंदी-भाषी क्षेत्र का राजनेता संस्कृति का अगुआ नहीं होता था और लेखकों, कलाकारों तथा विचारकों से उसके रिश्ते बड़े नाज़ुक होते थे। नेहरू और प्रेमचंद समकालीन थे, लेकिन उनका आपस में जुड़ाव नहीं था। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक बंगाली नेता को टैगोर के बारे में पता नहीं हो और वह उनके प्रति सम्मान व्यक्त नहीं करता हो? महाराष्ट्र में तिलक एक पत्रकार, विचारक, शिक्षा सुधारक और सांस्कृतिक नेता थे, लेकिन तत्कालीन राजनेताओं से उनके कितने संपर्क थे। असल में हिंदी की दो धाराएँ आपस में आकर मिल गयी थीं। नेताओं को रचनात्मक लेखकों के बारे में पता नहीं था और लेखक भी समाज की मुख्यधारा से दूर ही रहते थे। अलबत्ता निचले स्तर पर दोयम दरजे के नेताओं और दोयम दरजे के हिंदी पत्रकारों के बीच संपर्क बढ़ रहे थे। नेता को ख़ासकर आज़ादी के बाद अपनी छवि चमकाने और राजनीति के मैदान में शक्ति बढ़ाने के लिए ऐसे पत्रकार की ज़रूरत होती थी, जो सदा उपलब्ध रहे। पत्रकार उनके रसूख़ से फ़ायदा लेकर नाम कमाते थे। वे सत्ता के छोटे-मोटे लाभ भी ले लिया करते थे। सतही राजनीति में उनकी जो पूछ-परख होती थी, उससे उन्हें लगता था कि वे बहुत महत्वपूर्ण हो गये हैं। उन्हें जो स्थान साहित्य में नहीं मिला था, वह पत्रकारिता में मिलने लगा था। मगर दोयम दरजे के नेताओं के दोयम पिछलग्गुओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे आला दरजे की पत्रकारिता भी करेंगे।

पत्रकारिता दरअसल एक संरचनागत मुखरता है। लाखों की संख्या में शब्द रोज़मर्रा में, संगठित और संस्थागत रूप से चलन में आते हैं। इसमें बहस होती है, गंभीर मसलों पर विवेचना होती है, डेस्क वर्क होता है और अलग-अलग स्तर पर निर्णय लिये जाते हैं। यहाँ फ़ाइल्स होती हैं, कॉलम होते हैं, चक्रव्यूह होते हैं और नौकरी से निकालने की घटनाएँ होती हैं। भारत में इस तरह की अभिव्यक्ति गीत लिखने से भिन्न होती है। लिहाज़ा इनमें से कोई भी अपने लेखन में अंग्रेज़ी लेखन की बराबरी नहीं कर सका, लेकिन यहाँ कहना ज़रूरी है कि दूसरी भाषाएँ बहुत अच्छी स्थिति में थीं। उनका गद्य हिंदी गद्य की तरह नया नहीं था। अधिकतर की अपनी अलग सांस्कृतिक राजधानी थी। उनमें लिखी और बोली जाने वाली भाषा के बीच इतनी चौड़ी खाई नहीं थी। उनका प्रभाव क्षेत्र बिखरा हुआ नहीं था। उसमें बहुत सघनता थी और उन्हें तत्काल प्रतिसाद मिल जाता था। उनके जो नेता उभरे, वे सांस्कृतिक रूप से माटी से जुड़े थे। एक मानक भाषा के निर्माण में बोलियों में भिन्नता बाधा नहीं थी। ग़ैर-हिंदी भाषी लोग अपने लेखकों से शब्दावली के मामले में किसी चमत्कार की आशा नहीं करते थे।

आज़ादी के बाद उम्मीद स्वाभाविक ही थी कि हिंदी में राष्ट्रीय स्तर के अच्छे अख़बार निकलेंगे। पर, ऐसा नहीं हुआ। इसके तीन कारण हैं-पहला, कि दिल्ली नौकरशाहों के डेरे वाला शहर है और जो स्वाभाविक रूप से उनका नहीं है। यह एक त्रिशंकु शहर है, जो अधर में लटका है। यह भारत की राजधानी है, लेकिन किसी की सांस्कृतिक राजधानी नहीं। अगर किसी को ऐसा कहने पर मजबूर कर ही दिया जाये, तो वह संभवतः इसे एक पंजाबी शहर कहेगा, लेकिन लंदन में भी कई स्थान ऐसे हैं। यह कल्पना मुश्किल है कि दिल्ली कभी पंजाबी पुनर्जागरण का शहर बनेगी। दिल्ली जैसे शहर में, जहाँ अंग्रेज़ी ही अभिजात्य शासक वर्ग की संपर्क भाषा है, कोई हिंदी दैनिक अख़बार दोयम दरजे का ही रहने को अभिशप्त है। इस तध्य के बावजूद कि दिल्ली से निकलने वाले हिंदी अख़बारों का प्रसार व्यापक है, उनका प्रभाव जनमत निर्माताओं और शहर के जीवन पर उस अनुपात में नहीं है। अख़बार दिल्ली से निकलते हैं, लेकिन वे इसके अंग नहीं हैं, क्योंकि दिल्ली अधिकारियों और धनवान उद्योगपतियों का शहर है, जो मानते हैं कि किसी विचार या तथ्य को स्पष्टता और प्रभाव के साथ सिर्फ़ अंग्रेज़ी में व्यक्त किया जा सकता है। दिल्ली में रहने वाले ग़ै़र हिंदी-भाषी हिंदी को पिछड़ी भाषा मानते हैं। उन्हें यह पता ही नहीं कि पिछले तीस सालों में हिंदी पत्रकारिता ने कितनी तेज कुलाँचें भरी हैं। यहाँ तक कि यदि कोई नोबेल पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति भी दिल्ली से प्रकाशित किसी हिंदी दैनिक अख़बार को संपादित करे और भले ही यह अख़बार बौद्धिक नज़रिये से दिल्ली से निकलने वाले किसी अंग्रेज़ी दैनिक से बेहतर हो, तो भी कल्पना मुश्किल है कि थोड़े-बहुत पढ़े-लिखे दिल्लीवासी हिंदी दैनिक की श्रेष्ठता स्वीकार करेंगे। इसकी श्रेष्ठता को मथुरा या मेरठ में तो माना जाएगा, लेकिन संभवतः दिल्ली में वह महत्व नहीं मिल पाएगा।

ऐसी जानकारी नहीं आयी है और यह दूसरा कारण है। हिंदी दैनिक लगातार दोयम बने रहे हैं। वे दिल्ली के परिदृश्य की रिपोर्टिंग करने में भी पिछड़ रहे हैं। उनके संपादकीय पेज इतने कमज़ोर होते हैं कि उनमें ग़लतियों की भरमार रहती है। अंग्रेज़ी भाषा के पत्रकारों को जो सम्मान और हैसियत मिलती है, उसके सामने वे बौने सिद्ध होते हैं। इस प्रकार दोषपूर्ण फ़ीडबैक से वे उन लोगों की राय को ही मज़बूत करते रहते हैं, जो हिंदी पत्रकारिता को महत्व ही नहीं देते। उनकी प्रसार संख्या भले ही कितनी हो। ऐसी स्थिति मुंबई, कलकत्ता या मद्रास में नहीं है, क्योंकि ये अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक राजधानियाँ हैं। उनकी जड़ें उनकी संस्कृति में हैं। उनके अख़बार सांस्कृतिक रूप से स्वायत्त होते हैं, भले ही उनकी गुणवत्ता कैसी भी हो। उनके अपने पक्के पाठक होते हैं। वे अपने रंगमंच, लोक-साहित्य, लोक-नायकों से इस तरह जुड़े होते हैं कि अंग्रेज़ी अख़बार उन्हें कभी पीछे छोड़ ही नहीं सकते।

rajendra mathur, राजेंद्र माथुर

राजेंद्र माथुर

मप्र के धार ज़िले में 1935 में जन्मे माथुर हिंदी पत्रकारिता के हस्ताक्षर रहे हैं। राहुल बारपुते के संपादन में नईदुनिया में उन्होंने 1955 से लिखना शुरू किया। अंग्रेज़ी के प्राध्यापक की नौकरी से 1970 में मुक्त होकर नईदुनिया के संपादक हुए और जल्द ही यह अख़बार व माथुर एक-दूसरे के पर्याय हो गये। अनुलेख व पिछला सप्ताह, उनके दो कॉलम चर्चित रहे। 1982 से वे नवभारत टाइम्स के संपादक रहे। 9 अप्रैल 1991 को वह इस संसार से विदा हुए।

राजेश बादल, rajesh badal

राजेश बादल

राज्यसभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक के रूप में ख्यातिप्राप्त। चार दशक से अधिक समय से रेडियो, टीवी, प्रिंट व डिजिटल पत्रकारिता में चर्चित हस्ताक्षर। सौ से अधिक वृत्तचित्रों के निर्माण, टीवी पत्रकारिता में व्यवस्थित बायोपिक एवं पत्रकारिता की अनेक पुस्तकों के लिए प्रशंसित। पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित।

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