सलीम सरमद blog
पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....

हवा, सफ़र और वज़ीर आग़ा साहब

             क्या मेरा इस तरह होना तय था? पहले मैं कौन था और अब क्या हूँ? किसी मिट्टी के धेले-सा मुझे क्या पस्ती में फेंक दिया जाना चाहिए था? या मैं किसी बुलंदी का हामिल था? मैंने कभी राजनेताओं के पीछे जयकारे तो नहीं लगाये यानी ढलान पर जाने का सवाल ही नहीं था और इसके सिवा मेरी अक़्ल मुझे किन ठिकानों पे ले आयी, ये देखकर हैरतज़दा होता हूँ।

अंधी मुसाफ़तों का दिया इज़्न किसलिए
अब पूछना है मेरा पता तो हवा से पूछ

दूर जाते क़ाफ़िले ने मुड़ के देखा भी नहीं
मैं सदा देता रहा वो बेसदा होता गया

क़ाफ़िले आयें उड़े गर्द चले जायें कहीं
और हम ख़ाक ब-सर नक़्श ब-दीवार रहें

किसकी झोली में क़ुदरत गिराती हैं नियामतें? कौन सुर्ख़रू होता है ज़माने में? किसको मिलती हैं ख़ुदादाद सलाहियतें और क्यों? यहाँ कोई मज़दूर है और कोई साहब है… कोई बड़े ओहदे पर अपने फ़राइज़ अंजाम दे रहा है तो कोई सड़कें साफ़ करता है। काम कैसा भी हो, कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता मगर जिसके ज़ेह्न में तसव्वुर हिलोरें मारता है, जिसका ज़ेह्न सोचता है और जिसके कारण शाहपारे रचे जाते हैं। आख़िर वो फ़नकार तो बड़ा होता है मगर फ़नकारों में इतना इख़्तिलाफ़, इतना भेद कैसे है? और फिर मैं इनमें कहाँ हूँ?

कहाँ गया मैं बिछड़कर किसे ख़बर होगी
जो एक बार हुआ यहाँ इसे रवाना, गया

रेत पर छोड़ गया नक़्श हज़ारों अपने
किसी पागल की तरह नक़्श मिटाने वाला

हूँ अकेला भरे ज़माने में
कोई मुझसा भी बेमिसाल न हो

लौटे अगर सफ़र से कभी हम तो डर नहीं
सूरत बदल के आएंगे बेनाम आएंगे

हुनर की परत किरदार पे किस तरह चढ़ती है, रौनक़ बख़्शती है? मुक़द्दर कैसे तय होता है? दिमाग़ के वो कौन से न्यूरॉन होते हैं, जो शख़्सियत में निखार पैदा करते हैं? डीएनए के किस हिस्से के कारण एक मामूली आर्टिस्ट आख़िरकार ख़ुद को एक बेहतरीन आर्टिस्ट बना लेता है? इन सवालों के दरमियाँ मुझे इतनी ख़बर थी कि मुझमें कुछ सलाहियत तो है।

कैसे कहूँ के मैंने कहाँ का सफ़र किया
आकाश बेचिराग़ ज़मीं बेलिबास थी

पूछ ले तेज़ परिंदों से सफ़र का अंजाम
ख़ाक पर टूटे हुए पर का उतरना देखो

सफ़र तवील सही हासिले-सफ़र ये है
वहाँ को भूल गए और यहॉं को पहचाना

बहुत रोका उसे पर न रुका वो
कभी झौंका हवा का भी रुका है

अब मेरी उम्र इतनी थी कि मैं शहर में भटक सकता था… नये चेहरे देख सकता था, नए तजरुबों से दो चार हो सकता था लेकिन मुझे किताबों ने घेर लिया। बोसीदा पीली हो चुकी किताबें, फटी, आधी, टुकड़ो में बटी हुई किताबें, नयी, महकती और चमकदार किताबें… मैं उनके कवर ताकता, उन्हें छूने, उनके पन्नों को पलटने को बेताब होता। तब सेंट्रल लाइब्रेरी में मुझे एक किताब मिली ‘उर्दू शायरी का मिज़ाज’ (हिंदी लिप्यान्तरण) मुझे धुंधला-धुंधला आज भी याद आता है- इस किताब में ईरान से बंगाल तक फैले देवता और देवियों का संगम-सा कुछ है। आर्य जाति से ग़ज़ल तक का सफ़र है, बौद्ध मत से नज़्मों तक सिलसिला है। इस किताब के ख़ालिक़ वज़ीर आग़ा साहब ने मेरे ज़ाविये को तब पूरी तरह से उलट दिया था। पहली मर्तबा मैंने किसी पाकिस्तानी राइटर के हवाले से आर्य, द्रविड़, बुद्ध और शायरी के बारे में पढ़ा था।

अजब नहीं कि मुसाफ़िर पलट के आ जाये
लरज़ती पलकों पे इक दीप-सा जला रखना

इस लबादे को तार-तार करें
इक नया चेहरा इख़्तियार करें

उस यख़ हवा से बर सरे पैकार हम भी थे
अपने ही घर में बे दरो-दीवार हम भी थे

शायद इसी तरह के कुनबे से जुड़कर ही कोई ऐसा बनता है। फ़नकार से फ़नकार मिलता है। मैं ख़ुश था कि मैं उस परंपरा से जुड़ रहा था जो फ़नकारों की थी… लिखने, पढ़ने और सोचने वालों की थी। यहाँ नस्ल से नहीं अक़्ल से एक हो रहे थे, एक ख़ानदान तय हो रहा था। आख़िर संगत आदमी को बनाती है।

दिल कि है रास्ते का इक पत्थर
आओ इस कोहे-ग़म को पार करें

जिधर देखता है हवा रूबरू है
ये दिल ज़र्द पत्ते की तरह खड़ा है

ऐसे बढ़े कि मंज़िलें रस्ते में बिछ गईं
ऐसे गये कि फिर न कभी लौटना हुआ

होता है ज़िक्र गलियों में अब आसमान का
अंधों के बंद शहर में कैसी हवा चली

लुटाकर हमने पत्तों के ख़ज़ाने
हवाओं से सुने क़िस्से पुराने

वज़ीर आग़ा साहब की ग़ज़लों और नज़्मों की किताब ‘उजड़े मकां का आईना’ मिली तो ख़रीद ली, मगर पढ़कर निराश हुआ क्योंकि मुझे उनके शेर समझ ही नहीं आ रहे थे। उनमें वो रस नहीं था जो दीगर शायरों में था। कुछ अपनी समझ पे रोना आया और कुछ वज़ीर आग़ा पर… सोचा अच्छी नस्र लिखने वाले अच्छी शायरी करें ज़रूरी तो नहीं। उनकी नस्र की किताबें हिंदी लिप्यंतरण में न होने से उनके यू ट्यूब पर मयस्सर वीडियो देखता रहा शेरो-सुख़न को समझता रहा। एक वीडियो में वो कहते हैं- एक साहब उन्हें शेर सुनाते जिनके हर दूसरे शेर में दीद-ओ-दिल की तरक़ीब आती थी और वो उन्हें इस पर टोकते हैं कि आपकी सारी शायरी दीद-ओ-दिल से इबारत हो गयी है। इस पर उस शायर का जवाब था कि यही उसकी ख़ास पहचान है। मुझे भी समझ आया कि शायरी की पहचान किसी एक लफ़्ज़ या एक तरक़ीब से नहीं हो सकती। वज़ीर साहब का कहना था कि शायर को अपने आपको रिक्रीएट करते रहना चाहिए ताकि वो किसी फ़ैशन में न फंस जाये।

ख़िज़ाँ इक ग़मज़दा बीमार औरत
हवा ने छीन ली जिसकी रिदा है

हवा इसको उड़ा ले जा कहीं तू
ये बादल अपने पर फैला रहा है

मैला हुआ फ़लक तो चहकने लगी हवा
सागर के रुख़ पे कितने शिकन और पड़ गए

बेसदा दम ब ख़ुद फ़ज़ा से डर
ख़ुश्क पत्ता है तू हवा से डर

आसमां पर अब्र पारे का सफ़र मेरे लिए
ख़ाक पर महका हुआ छोटा सा घर मेरे लिए

वज़ीर आग़ा साहब मुझे बाद में समझ आये। पहले मेरा बालक मन उनकी जुदा पहचान से उलझता था। आज वो अलग दिखायी देते हैं। उनकी शायरी में भी सफ़र और हवा दो लफ़्ज़ अक्सर आते हैं, हर दूसरा शेर एक ही मंज़र को दुहराता-सा है और एक फ़िक्र बारहा लौटती-सी है लेकिन मैं समझता हूँ कि बेसाख़्ता कोई लफ़्ज़ ख़ुद को दुहराता है, कोई सोच अपनी ज़िद से बारहा ज़ाहिर होती है और एक मंज़र अपनी मर्ज़ी से बार-बार सुख़न में लौटता है तो वो क़ाबिले-क़बूल है। जैसे धीमे-धीमे बहता हुआ पानी सुकून बख़्श है, उसकी रवानी सहज है- उसकी धारा का दुहराव कोफ़्त पैदा नहीं करता। वो कहते हैं कि तजुर्बात सफ़र से फूटते हैं और जिससे ज़ेह्न में तलातुम पैदा होता है जो अदब की तख़लीक़ के लिए ज़रूरी है अगर सफ़र की सूरत न हो तो किताबें पढ़ना भी सफ़र की सूरत है। मुझे भी एक किताब में वज़ीर आग़ा साहब मिले थे।

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

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