
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
विजय कुमार स्वर्णकार की कलम से....
हिन्दी ग़ज़ल में दृश्य चित्रण की बानगी-1
कविता में दृश्य चित्रण की परंपरा आदिकाल से रही है। ग़ज़ल विधा भी इससे अछूती नहीं है ।यद्यपि ग़ज़ल की दो पंक्तियों में तग़ज़्ज़ुल के साथ दृश्य चित्रण करना चुनौती भरा काम है, फिर भी स्थान-स्थान पर समर्थ ग़ज़लकारों ने अपनी ग़ज़लों में ऐसे अशआर कहे हैं जिनमें दृश्य चित्रण ही प्रमुख आयाम है। अरबी, फारसी और उर्दू ग़ज़लों की यात्रा हिंदी ग़ज़लों से लंबी है इसलिए वहाँ दृश्य चित्रण के उदाहरण भी अधिक हैं। चूँकि हिंदी ग़ज़ल में आरम्भ से ही व्यवस्था विरोध और सामाजिक सरोकार का स्वर प्रमुख रहा है अतः यहाँ दृश्य चित्रण की स्थिति पर पड़ताल करना एक विशिष्ट अनुभव है।
दृश्य चित्रण में चुनौती यह होती है कि इसमें जो प्रत्यक्ष है उसे शब्दों में पिरोकर उसके साकार रूप का पाठक के मानस पर ऐसा चित्र उकेरना, जिसे देख-समझकर उसे उसी स्थान पर होने और उसके प्रभाव की अनुभूति हो जिस स्थान का चित्र कवि ने खींचा है।चूँकि शे’र में शब्दों की सीमा होती है अतः ग़ज़लकार सायास उतना ही कहता है जितना कहने से पाठक को एक तरह की परिपूर्णता का अहसास हो जाये। यहाँ यह भी कहना आवश्यक है कि शेर में कितना कहा सकता है यह सीमा तो है लेकिन कैसे कहा जाए इसकी कोई सीमा नहीं है। बल्कि यूँ समझना चाहिए कि शब्दों की संख्या की सीमा के कारण उत्पन्न कमी की भरपाई ,कहन की अनन्त संभावनाओं और कलात्मक दक्षता से पूरा करने की कोशिश की जाती है। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे एक चित्रकार या कैमरामैन अपने चित्र में वही दृश्यांश, वही रंग, वही रेखाएँ किसी विशेष कोण से प्रस्तुत करता है जिससे उसका मंतव्य या यूँ कहें कि चित्र खींचने के कारण का मंतव्य उजागर होता है। चित्र को देखकर दर्शक अपनी-अपनी समझ, दृष्टिकोण और व्यक्तिगत अनुभवों के आलोक में वह सब भी देख पाता है जो उसमें प्रत्यक्ष नहीं दिखता।
दृश्य चित्रण में जो भी शब्द किसी साकार के लिए उपयोग में लाये जाते हैं वे उस शे’र विशेष में प्रतीक हों ही यह आवश्यक नहीं है। ये ‘साकार’ व्यवहार में मानवीय क्रिया प्रतिक्रिया करते हुए भी दिखायी देते हैं। दृश्य विवरण के कारण शे’र सपाट बयानी की भेंट चढ़ सकता है। ग़ज़लकार की असली परीक्षा यहीं होती है।
दृश्य चित्रण के उदाहरण की बात करें तो यह देखा गया है कि शे’र के एक मिसरे में सिर्फ दृश्य चित्रण है मगर दूसरी पंक्ति किसी अन्य तथ्य की ओर संकेत करते हुए शेर को पूर्णता प्रदान करती है। दृश्य चित्रण दृश्य का विवरण मात्र नहीं हो सकता। ऐसा होने पर वह शे’र नहीं हो सकता। तब वे क्या तत्त्व हैं जो आवश्यक हैं और उन्हें कैसे शे’र में समाहित किया जाता है। इसकी पड़ताल हम कुछ उदाहरणों के द्वारा कर सकते हैं:
राजपथ से दूर गंदी बस्तियों के बीच में
एक जनपथ है जहाँ पर कोई अवरोधक नहीं
-माधव कौशिक (अंगारों पर नंगे पांव)
इस शे’र में दृश्य यह है कि बस्तियों की सड़क पर कोई अवरोधक नहीं है। “राजपथ से दूर” यह वाक्यांश दृष्टि को गति देते हुए गंदी बस्तियों तक ले जाता है। यहाँ ऐसा बोध होता है कि जैसे कैमेरा रोल करते हुए एक दृश्य से दूसरे तक पहुँच गया हो। यह गतिशीलता शे’र में आये कंट्रास्ट के प्रभाव को बढ़ाने में सफल रही है। यहाँ गंदी बस्तियाँ, अवरोधक, राजपथ और जनपथ भी प्रतीक हैं लेकिन शे’र विशेष में इन जातिवाचक संज्ञाओं के भौतिक स्वरूप ही अर्थपूर्ण हैं। अवरोधक शब्द की व्यंजना से इस शे’र में तग़ज़्ज़ुल है। राजपथ पर चलने में अवरोध की स्थिति बनती है लेकिन बस्तियों में ऐसा जनपथ है, जहाँ कोई अवरोध करने वाला नहीं है। जनता ने ऐसे अवरोधक या तो बनने ही नहीं दिये या तोड़ दिये हैं।अवरोधक वहीं होते हैं जहाँ तेज़ गति से वाहन चलते हैं। बोध यह भी होता है कि जनपथ पर चलने वालों में गति का तत्व ही नहीं है और अगर है भी तो किसी को परवाह नहीं, जो चपेट में आता हो तो आये। आप इस शे’र की गद्यात्मकता को भी देखिए, दोनों मिसरों को सामान्य स्टेटमेंट की तरह पढ़ा जा सकता है। यही शे’र का उचित वाक्य विन्यास है।
बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं
और नदियों के किनारे घर बने हैं
-दुष्यंत कुमार (साये में धूप)
इस शे’र में दृश्य तो है लेकिन क्या यह दृश्य कवि की आंखों के ठीक सामने है। शायद नहीं। बाढ़ की संभावनाएं तक तो ठीक है लेकिन ‘नदियों के किनारे…’ पर बात स्पष्ट होती है। किसी को एक स्थान पर खड़े होकर कितनी नदियां एक साथ दिख सकती हैं? इसका अर्थ यह हुआ कि यह दृश्य कवि के ज़ेह्न में संचित सूचना से उत्पन्न हुआ है। अगर कवि प्रत्यक्ष होकर देख रहा होता तो शायद शे’र में यह बात आती कि “बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं और नदी के किनारे घर बने हैं”।
यहाँ प्रत्यक्ष संभावनाएं ये हैं कि आसमान में काले-घने बादल छाये हुए हैं और ज़बरदस्त बारिश हो रही है; नदी में मटमैला पानी चढ़ते हुए आगे बढ़ रहा है; दूर से घनगर्जन और मनुष्यों का हाहाकार सुनायी पड़ रहा है। लेकिन जब विचार में यह दृश्य आता है तो बाढ़ की संभावनाओं के अन्य कारण भी हो सकते हैं। कवि ने शायद यह सुन रखा हो कि आने वाले दिनों में भी वर्षा होने का अनुमान है ,यह भी कि ये नदियां बाढ़ के लिए कुख्यात हैं आदि। इस शे’र में ‘नदियों’ शब्द के आने से यह तथ्य उजागर होता है कि यह दृश्य कवि के ज़ेह्न में है। ख़ैर यह तो हुई दृश्य चित्रण की बात, अब इसके तग़ज़्ज़ुल पर आते हैं। बाढ़ किसी भी त्रासदी की आशंका का संकेत है और नदी किनारे बने घर उस त्रासदी के सबसे आसान शिकार हैं। घर कहीं भागकर जा भी नहीं सकते। बाढ़ की गतिशीलता और आक्रामकता एक तरफ़ है और दूसरी तरफ़ है घरों की जगह न बदल सकने की विवशता और निरीहता। इन दोनों पाटों के बीच मनुष्य के जीवन-संघर्ष का बोध होते ही शे’र अपने शिखर को छू लेता है।
ऐसी काई है अब मकानों पर
धूप के पैर भी फिसलते हैं
-सूर्यभानु गुप्त
दृश्य चित्रण का यह अनोखा उदाहरण है। मकानों पर काई का चित्र मस्तिष्क में आसानी से टिक जाता है लेकिन धूप के फिसलते पैर का गतिशील चित्र बार-बार चढ़ता और फिसलता रहता है। दृश्य में यही तत्त्व जान भर रहा है। काई कितनी है, कबकी है और क्यों है, इसका कोई विवरण नहीं है। क्योंकि आवश्यक नहीं है। हमारे सामने ‘ऐसी काई…’ से अनुभव के अनुसार कोई भी चित्र बन सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अलग-अलग पाठक के मस्तिष्क में इस के अलग-अलग चित्र बन सकते हैं। ‘मकानों’ के साथ भी यही बात है। धूप के पैर फिसलते हुए देखने के लिए विशिष्ट दृष्टि चाहिए। तग़ज़्ज़ुल के लिहाज़ से देखिए तो वे मकान जिन पर काई जम गयी है ये कौन से पुराने मकान हैं? अगर पुराने नहीं हैं तो उनकी देखभाल नियमित और उचित नहीं है। क्या यह संकेत उदासीन और यथास्थितिवादी समुदाय की ओर है? इस शे’र में ‘अब’ से तात्पर्य यह है कि पहले ऐसा नहीं होता था। इससे यह बोध होता है कि इन मकानों पर पहले काई नहीं जमती थी और अगर जमती भी थी तो ‘ऐसी काई’ नहीं जमती थी। तो यह परिवर्तन क्यों आया, यहीं तग़ज़्ज़ुल की जड़ें हैं। ‘ऐसी काई’ की व्याख्या ज़रूरी थी। आख़िर कैसी काई है। ऐसी काई जिस पर धूप के पैर भी फिसलते हैं। फिसलने शब्द से काई के ताज़ा होने का प्रमाण मिलता है। काई गीली है। काई की नमी के कारण धूप की लपझप या झिलमिल, फिसलते हुए पैर की तरह दिख रही है। धूप जीवंतता, नवीन चेतना और ऊर्जा का प्रतीक है। समाज मे व्याप्त रूढ़िवादी धारणाओं पर चोट करना आसान नहीं रह गया है। शे’र की दूसरी पंक्ति में ‘भी’ की स्थिति पर भी ग़ौर कीजिए। ‘धूप के पैर भी फिसलते हैं’ कवि ने काव्यात्मक छूट लेते हुए कहा है कि धूप के भी पैर फिसलते हैं, शेष की तो बात ही क्या करना। यह शे’र ग़ज़ल की धरोहर है।
मेहंदी रची हथेलियाँ लहरों ने चूम लीं
छोड़े जब उसने ताल में जलते हुए दिये
-मंगल नसीम
दृश्य चित्रण का यह मोहक उदाहरण है। हमारे देश मे जलते हुए दीयों को ताल में प्रवाहित करने की परंपरा है। ताल का पानी, दीये की लौ और मेहंदी रची हथेलियों से रूमानियत के साथ-साथ दिव्यता का बोध भी होता है। इन शब्दों को सुनने के बाद हमें जल में दीयों की लौ के प्रतिबिम्ब, लहरों के उतार-चढ़ाव, कलकल की ध्वनि, जल की सुगंध आदि की भी अनुभूति होने लगती है। हमारा अवचेतन अपनी रंग-रेखाएं भी प्रस्तुत चित्र में देखने लगता है। वैसे भी इस शे’र में रंग की विविधता देखिए- मेहंदी का रंग, हथेलियों का रंग, ताल के जल का रंग, जलते हुए दीये की लौ का रंग, स्वयं दीये का रंग भी और जल में बनते लहराते प्रतिबम्बों का रंग। हथेलियाँ चूम लेने में मनुष्य और प्रकृति के बीच का प्रगाढ़ अंतर्संबंध अभिव्यक्त हुआ है। लहरों ने हथेलियाँ चूम लीं, यह लहरों का आशीर्वाद है या दीवानगी, यह कहने की आवश्यकता ही नहीं। यह शे’र कहने की विशिष्ट शैली है। इस शे’र में ताल, लहरें, हथेलियाँ और दीये से कोई अन्य संकेत नही मिलता। मेहंदी लगी हथेलियाँ सुहागिन स्त्री का प्रतीक अवश्य हैं। इस शे’र में पहला दृश्य ताल में दीये छोड़े जाने के क्षण का है। इसके तत्काल बाद के क्षण का दूसरा दृश्य है, जिसमें लहरें मेहंदी लगी हथेलियाँ चूम लेती हैं। यह दो फ्रेम की छोटी वीडियो क्लिप है। ‘प्रवाहित किये’ की जगह ‘छोड़े’ का प्रयोग काव्य भाषा पर शाइर के विश्वास और साहस की बानगी है। एक बार वज़न को भुलाकर शेर में दूसरी पंक्ति को यूँ पढ़कर देखिए, “छोड़े जो उसने ताल में दीये”। “जलते हुए दीये” से जो सौंदर्य आया है वह अद्भुत है। शे’र में शब्दों की संगति और प्रवाह भी प्रशंसनीय है।
क्रमशः

विजय कुमार स्वर्णकार
विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
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बहुत सुन्दर विश्लेषण। एक बार इस पर भी लिखिए कि ये हिन्दी ग़ज़ल के शे’र कैसे हैं? या हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल से किस आधार पर अलग से पहचाना जाए? वैसे आपने लिखा ही होगा इस पर। वह आबोहवा में पढ़वाइए।
नसीम अंकल की तरह भइया भी शायद बुढ़ा गये हैं।