हिंदी नाटक में व्यंग्य-चेतना का विकास : इतिहास और वर्तमान
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....

हिंदी नाटक में व्यंग्य-चेतना का विकास : इतिहास और वर्तमान

       हिंदी साहित्य के प्रारंभिक वर्षों में व्यंग्य-नाटक व्यापक रूप से लिखे और मंचित किये जाते थे तथा जनमानस में उनका सशक्त और स्थायी स्थान था। हिंदी साहित्य को सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यापक स्वीकृति दिलाने में कविता के साथ-साथ नाटकों का भी अभूतपूर्व योगदान रहा है। कुछ समालोचक तो यह भी मानते हैं कि हिंदी में गद्य लेखन की परंपरा नाटकों से ही विकसित हुई है। उस दौर में जहाँ पौराणिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर आधारित नाटक लिखे गये, वहीं हास्य-व्यंग्य नाटकों ने समाज को आईना दिखाने और जनचेतना को जागृत करने में निर्णायक भूमिका निभायी।

नाटक, साहित्य की वह विधा है जिसमें कथ्य को केवल पढ़कर या सुनकर ही नहीं, बल्कि मंचन के माध्यम से प्रत्यक्ष देखा, सुना और अनुभव किया जाता है। यही कारण है नाटक को साहित्य की सर्वाधिक जीवंत, समग्र और प्रभावशाली विधा माना जाता है। संवाद, अभिनय, हाव-भाव, संगीत, प्रकाश-व्यवस्था, मंच-सज्जा और दृश्यात्मक प्रस्तुति, इन सभी तत्वों के समन्वय से कथ्य अधिक सजीव और अनुभूतिपरक बन जाता है। नाटक की परिभाषा देते हुए नाट्यशास्त्र में आचार्य भरतमुनि उल्लेख करते हैं नाटक विविध भावों, अवस्थाओं, संगीत, दृश्यात्मक अभिव्यक्ति और लोकव्यवहार के अनुकरण का समन्वित रूप है। उनके अनुसार नाट्य का उद्देश्य, मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकजीवन का यथार्थ स्वरूप प्रस्तुत करते हुए, रस की निष्पत्ति करना है। नाटक की एक महत्त्वपूर्ण उपविधा ‘प्रहसन’ है, जो आकार में लघु तथा हास्यप्रधान होती है और व्यंग्य के अत्यंत निकट मानी जाती है।

देश में हिंदी नाटकों के विधिवत लेखन से पूर्व रामलीला, नौटंकी, रूपक और स्वांग जैसी लोक-नाट्य परंपराओं में नाटकीयता किसी न किसी रूप में विद्यमान थी। सन् 1853 में पहली पारसी नाटक मंडली की स्थापना के प्रमाण मिलते हैं। इसके बाद पारसी नाट्य मंडलियों ने व्यवस्थित रंगमंच की नींव डाली। उनके प्रमुख नाटककारों में विनायक प्रसाद तालिब, नारायण प्रसाद बेताब तथा मेंहदी हसन अहसन के नाम उल्लेखनीय हैं। इन नाटककारों ने ‘फरेबे मोहब्बत’, ‘महाभारत’, ‘कृष्ण-सुदामा’ और ‘पति-पत्नी’ जैसे अनेक नाटक लिखे, जिनका सफल मंचन हुआ और जिन्होंने हिंदी रंगमंच की आधारशिला को सुदृढ़ किया।

उन्नीसवीं सदी, हिंदी साहित्य और रंगमंच के इतिहास में परिवर्तन और नवजागरण की सदी मानी जाती है। यह वह समय था जब भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था और समाज राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर गहरे अंतर्विरोधों से गुजर रहा था। ऐसे परिवेश में हास्य–व्यंग्य नाटक केवल मनोरंजन के लिए नहीं रचे गए, बल्कि सामाजिक सुधार, वैचारिक हस्तक्षेप और जनचेतना के प्रसार के उद्देश्य से लिखे गए। व्यंग्य इस दौर में सत्ता, सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक मानसिकता की आलोचना का एक प्रभावशाली माध्यम बनकर उभरा।

उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्ती काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र के पिता गोपालचंद्र गिरधरदास द्वारा रचित “नहुष” को प्रायः हिंदी का पहला आधुनिक नाटक माना जाता है। यह नाटक एक पौराणिक कथा पर आधारित था और हिंदी नाट्य-लेखन की आरंभिक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। इसका शिल्प संस्कृत नाट्य-परंपरा से प्रभावित था, किंतु भाषा और अभिव्यक्ति की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण आरंभिक प्रयास माना जाता है। कुछ आलोचक, जैसे रामचंद्र शुक्ल और बाबू गुलाबराय, रीवा के महाराज विश्वनाथ सिंह द्वारा रचित “आनंद रघुनंदन” को हिंदी का पहला मौलिक नाटक स्वीकार करते हैं, जबकि विजयेंद्र स्नातक “नहुष” को ही पहला हिंदी नाटक मानते हैं। मतभेदों के बावजूद यह तथ्य निर्विवाद है कि इन आरंभिक प्रयासों ने आगे चलकर भारतेंदु युग में विकसित होने वाले समृद्ध हिंदी रंगमंच के लिए आधारभूमि तैयार की।

भारतेंदु युग में नाटक

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतेंदु हरिश्चंद्र के नेतृत्व में हिंदी नाट्य-लेखन को एक नयी और स्पष्ट दिशा मिली। इसी संदर्भ में रामचंद्र शुक्ल का यह कथन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है – “विलक्षण बात यह है कि आधुनिक गद्य साहित्य की परंपरा का प्रवर्तन नाटकों से हुआ।” यह उक्ति उस कालखंड में नाटकों की सशक्त और केंद्रीय उपस्थिति को रेखांकित करती है। भारतेंदु युग के नाटक अपने समय की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं से सीधा संवाद करते हैं तथा समकालीन विसंगतियों को निर्भीकता से उजागर करते हैं। इन नाटकों में हास्य और व्यंग्य का प्रयोग सत्ता की निरंकुशता, अंधविश्वास, सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक मानसिकता पर प्रहार करने के लिए एक सशक्त औज़ार के रूप में किया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने स्वयं अठारह नाटकों की रचना की। उनका प्रसिद्ध नाटक “अंधेर नगरी” (1881) हिंदी हास्य–व्यंग्य नाटक परंपरा का शिखर माना जाता है। इस नाटक में निरंकुश, अन्यायपूर्ण और विवेकहीन सत्ता पर तीखा राजनीतिक व्यंग्य किया गया है, न्याय-व्यवस्था की विडंबना और जनता की विवशता को इसमें अत्यंत मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। लोककथा और लोकरूपों के सधे हुए प्रयोग से रचा गया यह व्यंग्य इतना कलात्मक और प्रखर है कि “अंधेर नगरी” आज भी अपनी वैचारिक और सामाजिक प्रासंगिकता बनाये हुए है।

भारतेंदु के अन्य नाटकों में “भारत दुर्दशा” तथा “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” (1873) का विशेष महत्त्व है। “भारत दुर्दशा” में देश की तत्कालीन स्थिति को लेकर गहरी चिंता अभिव्यक्त हुई है। इसमें अंग्रेज शासन के दुष्परिणामों, भारतीय समाज की आत्मगौरवहीनता, आपसी फूट और निष्क्रियता पर तीखा व्यंग्य किया गया है। वहीं “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” में धर्मग्रंथों की मनमानी व्याख्या की आड़ में हिंसा और स्वार्थ को उचित ठहराने की प्रवृत्ति पर करारा प्रहार करते हुए धार्मिक पाखंड को बेनकाब किया गया है। उनके एक अन्य नाटक “प्रेमयोगिनी” में काशी के धर्माडंबर का स्थानीय बोली और परिवेश में व्यंग्यात्मक चित्रण मिलता है, तथा “विषस्य विषमौषधम्” में अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों और भारतीयों में व्याप्त तथाकथित ‘हीन मानसिकता’ पर चुटीला और मारक व्यंग्य किया गया है।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध, अर्थात् भारतेंदु युग के अंतिम चरण में, जिन नाटककारों ने समाज को गहरे स्तर पर प्रभावित किया और जनचेतना के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनमें बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, लाला श्रीनिवास दास, राधाचरण गोस्वामी, विजयानंद त्रिपाठी तथा श्रीधर पाठक का योगदान उल्लेखनीय है। बालकृष्ण भट्ट का “नूतन ब्रह्मचारी” सामाजिक विसंगतियों पर केंद्रित एक सुधारपरक नाटक है, जबकि “रेलवे की लीला” में उन्होंने आधुनिकता और भारतीय समाज पर पड़ रहे औपनिवेशिक प्रभावों पर तीखा व्यंग्य किया है। इसी प्रकार प्रतापनारायण मिश्र ने “कलियुग” तथा “गो-संकट” जैसे नाटकों के माध्यम से सामाजिक अवसरवाद, नैतिक पतन और धार्मिक भावनाओं के दुरुपयोग पर करारा प्रहार किया। इन नाटकों में हास्य और व्यंग्य, दोनों जनजागरण के सशक्त उपकरण के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। राधाचरण गोस्वामी के दो प्रहसन – “तन-मन गोसाईं जी को अर्पण” तथा “बूढ़े मुँह मुँहासे” विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पहले प्रहसन में धर्मगुरुओं की छद्म लीलाओं और पाखंड को उजागर किया गया है, जबकि “बूढ़े मुँह मुँहासे” में परनारीगमन के दुष्परिणामों को व्यंग्यात्मक और प्रभावी ढंग से रेखांकित किया गया है। इस दौर के अन्य उल्लेखनीय नाटकों में बालकृष्ण भट्ट के “जैसा काम वैसा परिणाम” (1877) व “आचार विडंबन” (1899), प्रतापनारायण मिश्र के “कलि कौतुक” (1886) तथा विजयानंद त्रिपाठी के “महाअंधेर नगरी” (1893) को माना जाता है।

भारतेंदु युग के हास्य–व्यंग्य नाटकों का प्रमुख लक्ष्य सामाजिक विसंगतियाँ थीं- जैसे अंधविश्वास, जाति-व्यवस्था, स्त्री-अवमानना, दिखावटी नैतिकता और पश्चिमीकरण की अंधी नक़ल। इन नाटकों के पात्र सामान्य जनजीवन से लिए गए होते थे, जिससे दर्शक मंच पर घटित घटनाओं से सहज रूप से अपना तादात्म्य स्थापित कर पाता था। नाटकों की भाषा सरल, लोकधर्मी और संवादप्रधान थी। हास्य के माध्यम से कही गई बात सीधे मन को स्पर्श करती थी, जबकि व्यंग्य दर्शक को सोचने और आत्ममंथन के लिए विवश करता था। यही कारण है कि ये नाटक मंच पर अत्यंत लोकप्रिय हुए और जनता के बीच विचारोत्तेजक विमर्श का कारण बने। उन्होंने दर्शकों को हँसाया भी और साथ ही सत्ता तथा समाज की अंतर्निहित विसंगतियों पर प्रश्न उठाने की प्रेरणा भी दी। इस प्रकार हास्य–व्यंग्य नाटक उस समय के सामाजिक आंदोलनों के मौन, किंतु अत्यंत प्रभावशाली माध्यम सिद्ध हुए।

व्यंग्य गया हाशिये पर

भारतेंदु युग के पश्चात् द्विवेदी युग में नाट्य-लेखन अपेक्षित रूप से विकसित नहीं हो सका। इस कालखंड में नाटकों की संख्या सीमित रही और वे साहित्यिक परिदृश्य में केंद्रीय स्थान नहीं बना पाए। इसके बाद 1920 से 1937 तक की अवधि को नाटक के संदर्भ में आलोचकों ने ‘प्रसाद युग’ की संज्ञा दी। नाट्य-विकास की दृष्टि से यह काल अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। हिंदी साहित्य में यह छायावाद का स्वर्णिम युग था, जिसका प्रभाव नाटक विधा पर भी स्पष्ट रूप से पड़ा। इस दौर के नाटकों में ऐतिहासिक, पौराणिक और दार्शनिक विषयों की प्रधानता रही, यद्यपि वे तत्कालीन सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से पूरी तरह विच्छिन्न भी नहीं थे। हालाँकि इस अवधि में हास्य–व्यंग्य नाटकों पर विशेष बल नहीं दिया गया, किंतु यह कहना भी उचित नहीं होगा कि इस क्षेत्र में कोई कार्य नहीं हुआ। सीमित ही सही, पर हास्य और व्यंग्य की परंपरा इस काल में भी किसी न किसी रूप में जीवित रही और आगे के विकास के लिए आधार प्रदान करती रही।

हिंदी नाटक में व्यंग्य-चेतना का विकास : इतिहास और वर्तमान

इस युग के सर्वाधिक प्रभावशाली नाटककार जयशंकर प्रसाद थे। उन्हीं के व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण इस काल को “प्रसाद युग” कहा जाता है। प्रसाद के नाटकों में काव्यात्मक भाषा, गहन मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि, ऐतिहासिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का दुर्लभ समन्वय दिखाई देता है। उनके अधिकांश नाटक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं – जैसे अजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी तथा जनमेजय का नागयज्ञ।

प्रसाद के समकालीन अनेक नाटककारों ने भी ऐतिहासिक और पौराणिक विषयों को केंद्र में रखकर नाट्य-रचना की। इनमें लक्ष्मीनारायण मिश्र (राक्षस का मंदिर, गरुड़ध्वज, दशाश्वमेध, चक्रव्यूह, नारद की वीणा), जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिंद’ (प्रताप प्रतिज्ञा), उदयशंकर भट्ट (विक्रमादित्य, विश्वामित्र, दाहर अथवा सिंध पतन, शकविजय, पार्वती, विद्रोहिणी अंबा, अश्वत्थामा), भंवरलाल सोनी (वीरकुमार छत्रसाल), गणेशदत्त इंद्र (महाराणा संग्रामसिंह 1921), विशंभरनाथ ‘कौशिक’ (भीष्म), माखनलाल चतुर्वेदी (कृष्णार्जुन युद्ध), सेठ गोविंददास (हर्ष तथा कर्ण), दुर्गाप्रसाद गुप्त (अभिमन्यु वध, विश्वामित्र), रामनरेश त्रिपाठी (सुभद्रा 1924), वियोगी हरि (छद्म वियोगिनी 1928), लक्ष्मीनारायण गर्ग (श्रीकृष्णावतार 1934), चतुरसेन शास्त्री (उत्सर्ग 1929) तथा चंद्रगुप्त विद्यालंकार (अशोक, रेवा) प्रमुख हैं। इसी काल में सामाजिक पृष्ठभूमि वाले अनेक नाटक भी लिखे गए, जिनमें व्यंग्य की अनुगूंज सुनाई देती है। ऐसी उल्लेखनीय कृतियों में विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ का “अत्याचार का परिणाम” (1921), ईश्वरी प्रसाद शर्मा का “कृषक दुर्दशा” (1922), सुदर्शन का “आनरेरी मजिस्ट्रेट” (1926), गोविंदवल्लभ पंत के “कंजूस की खोपड़ी” (1923) और “अंगूर की बेटी” (1937), रघुनाथ चौधरी का “अछूत की लड़की” (1934), बेचैन शर्मा ‘उग्र’ का “डिक्टेटर” (1937) तथा चंद्रिका प्रसाद सिंह का “कन्या विक्रय” (1937) शामिल हैं।

डॉ. रामकुमार वर्मा को हिंदी एकांकी का जनक माना जाता है। 1930 में उन्होंने “बादल की मृत्यु” नामक पहला एकांकी लिखा, जो फैंटेसी शैली का होने के कारण विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। उनके अधिकांश एकांकी सामाजिक और ऐतिहासिक हैं, किंतु “रेशमी टाई” संग्रह के कुछ एकांकियों में व्यंजनात्मकता और संवादों में व्यंग्य की स्पष्ट गूँज मिलती है। उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के नाटकों में पारिवारिक समस्याओं पर तीखा व्यंग्य मिलता है। “देवताओं की छाया में”, “तूफान से पहले” और “चरवाहे” इसके उदाहरण हैं। इसी क्रम में उदयशंकर भट्ट का “नेता”, सेठ गोविंददास के “विटामिन” और “अधिकार-लिप्सा”, भुवनेश्वर का “स्ट्राइक” तथा हरिशंकर शर्मा का “चिड़ियाघर” उल्लेखनीय हास्य–व्यंग्य एकांकी हैं।

इस युग में हास्य–व्यंग्य नाटकों की मशाल को थामे रखने वालों में एक प्रमुख नाम बद्रीप्रसाद भट्ट का है। उन्होंने नये विषयों का चुनाव करते हुए “विवाह विज्ञापन”, “चुंगी की उम्मीदवारी” और “मिस अमेरिका” जैसे नाटक लिखे। पहले नाटक में पश्चिमी मेकअप अपनाने को लेकर व्यंग्य किया गया है जबकि दूसरे में रीतिकालीन अश्लील काव्य-रुचि को निशाने पर लिया गया है। इसके अतिरिक्त जी.पी. श्रीवास्तव का योगदान भी उल्लेखनीय है। उनके नाटक- “दुमदार आदमी”, “गड़बड़झाला”, “भूल-चूक”, “चोर के घर छिछोर”, “चाल बेढब”, “नाक में दम उर्फ़ जवानी बनाम बुढ़ापा उर्फ़ मियाँ की जूती मियाँ के सिर” तथा “स्वामी चौखटानंद”, अपने समय में पर्याप्त चर्चित रहे और हास्य–व्यंग्य नाटक की परंपरा को जीवित बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

व्यंग्य नाटकों की वापसी

प्रसादोत्तर काल (1938-1947) में पौराणिक और ऐतिहासिक नाटकों की परंपरा यथावत् बनी रही, किंतु इसी समय राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर आधारित नाटकों का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। परिणामस्वरूप हास्य–व्यंग्य नाटक अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लिखे जाने लगे और हिंदी रंगमंच में उनकी उपस्थिति पहले की तुलना में अधिक सुदृढ़ हुई। इस काल के नाटककारों में हरिकृष्ण ‘प्रेमी’, विष्णु प्रभाकर, नरेश मेहता, विनोद रस्तोगी और डॉ. शंकर शेष के नाम प्रमुख हैं।

नरेश मेहता ने “सुबह के घंटे में” तत्कालीन राजनीति एवं दलीय प्रजातंत्र प्रणाली की विषमताओं का उद्घाटन किया है। शंकर शेष का “बिन बाती के दीप” भी एक चर्चित नाटक रहा है। राजनीतिक विडंबनाओं और विषमताओं पर अनेक रचनाकारों ने प्रभावी नाटक लिखे जिनमें दयाप्रकाश सिन्हा, विपिन अग्रवाल, हमीदुल्ला (समय संदर्भ), गिरिराज किशोर (प्रजा ही रहने दो), विष्णु प्रभाकर (सत्ता के आर पार) के नाम उल्लेखनीय हैं। मुद्राराक्षस के “तिलचट्टा” में प्रेम और परंपरागत विवाह मूल्यों के विरुद्ध विद्रोह के स्वर मुखरित होता है।

फिर व्यंग्य की नयी धार का दौर

प्रसादोत्तर काल के पश्चात्, स्वातंत्र्योत्तर युग में हिंदी व्यंग्य-नाट्य लेखन को नई धार और व्यापक पहचान देने में अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाकारों की भूमिका रही। मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, केशवचंद्र वर्मा, डॉ. सत्यप्रकाश संगर, विनोद रस्तोगी, शरद जोशी, शंकर पुणतांबेकर, डॉ. विनय, लक्ष्मीनारायण, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, सुधीर कुमार, नरेंद्र कोहली, मणि मधुकर, के.पी. सक्सेना, असगर वजाहत, विजय विजन तथा प्रेम जन्मेजय जैसे रचनाकारों ने व्यंग्य-नाटकों की परंपरा को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उसे समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक सरोकारों से जोड़कर नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। इन रचनाकारों के नाटकों में मध्यवर्गीय पाखंड, नौकरशाही की जड़ता, लोकतांत्रिक विडंबनाएँ और आम आदमी की विवशताएँ प्रमुख विषयों के रूप में उभरती हैं। मंचीय दृष्टि से भी इन नाटकों ने संवाद-केंद्रित तीखे व्यंग्य और स्थितिजन्य हास्य के माध्यम से हिंदी रंगमंच को नया तेवर दिया।

केशवचंद्र वर्मा के एकांकी-संग्रह “चिड़ियों के गुलाम” को पाठकों का अच्छा प्रतिसाद मिला। इसके बाद शंकर पुणतांबेकर के दो एकांकी-संग्रह- “बचाओ मुझे डॉक्टरों से बचाओ” और “बचाओ मुझे कवियों से बचाओ” अपने निर्मल हास्य और व्यंग्यात्मक तेवर के कारण चर्चित रहे। “बचाओ मुझे डॉक्टरों से बचाओ” संग्रह में कुल 14 एकांकी संकलित हैं जो सामाजिक, पारिवारिक एवं राजनीतिक विषयों पर लिखे गए हैं। “बचाओ, मुझे डॉक्टरों से बचाओ”, “रंग में भंग”, “अनोखेलाल को ऑफिस का चार्ज” तथा “इंटरव्यू की तैयारी” संग्रह के उल्लेखनीय एकांकी हैं। सुधीर कुमार का “सूत्रधार” (1991) भी एक उल्लेखनीय विनोदी एकांकी-संग्रह माना जाता है। प्रताप सहगल के “तीन गुमशुदा लोग” तथा “चार रूपान्त” (1992) नब्बे के दशक में लिखे गए नाटकों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। के.पी. सक्सेना के “गज, फुट, इंच” एवं “बाप रे बाप” अपनी खास हास्य शैली के लिए जाने जाते हैं।

शरद जोशी ने अपने जीवनकाल में केवल दो नाटक लिखे- “एक था गधा उर्फ़ अलादाद खाँ” और “अंधों का हाथी”। उनके दोनों ही नाटक अत्यंत प्रशंसित रहे। लोकनाट्य शैली में रचित “एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ” तत्कालीन राजनीतिक भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करता है। “अंधों का हाथी” में पाँच अंधों और एक हाथी की रूपक-कथा के माध्यम से सत्ता-व्यवस्था और वैचारिक संकीर्णता पर प्रहार किया गया है। प्रेम जन्मेजय का “सीता अपहरण केस” एक चर्चित और अनेकों बार मंचित नाटक है। सुरेश कान्त का “विदेशी आया” नाटक भी इस समय की उल्लेखनीय कृति है।

इसी काल में रेडियो पर रात्रि में प्रसारित लोकप्रिय कार्यक्रम “हवामहल” ने नाटकों के प्रति जन-रुचि जागृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसने एक व्यापक और समर्पित श्रोता-वर्ग तैयार किया तथा रेडियो-नाटक लेखन को नई ऊर्जा प्रदान की। इस दौर में अनेक सशक्त रेडियो-नाटककार सामने आए। डॉ. सत्यप्रकाश संगर का “दामाद का चुनाव”, विनोद रस्तोगी का “जनतंत्र ज़िंदाबाद”, लक्ष्मीनारायण लाल के “कलंकी” और “अब्दुल्ला दीवाना”, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का “बकरी” (1970, राजकमल प्रकाशन), मणि मधुकर का “बोलो बोधिसत्व”, विजय विजन के “यंत्र-बाधा” और “तंत्र-बाधा”, तथा नरेंद्र कोहली का “शंबूक की हत्या” उल्लेखनीय रहे। “बकरी” के माध्यम से सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने ग्रामीण समाज में देवी-देवताओं और महापुरुषों के प्रति व्याप्त अविवेकपूर्ण अंधश्रद्धा पर तीखा व्यंग्य किया है। स्वतंत्रता के बाद सत्ता द्वारा जनता को भ्रमित और शोषित करने के जो हथकंडे अपनाए गए, उन्हें इस नाटक में प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित किया गया है। लक्ष्मीनारायण लाल की कृतियाँ “मादा कैक्टस” (1959), “तीन आँखों वाली मछली” (1960), “रक्तकमल” (1962) और “मिस्टर अभिमन्यु” (1971), अपने व्यंजनात्मक संवादों और प्रतीकात्मक शिल्प के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करती हैं।

प्रयोगधर्मी दृष्टि और नये फ़लक

सत्तर और अस्सी के दशक में हिंदी नाट्य-साहित्य में व्यंग्यात्मक और राजनीतिक चेतना से संपृक्त अनेक महत्त्वपूर्ण नाटक लिखे गये। इसी समय कुछ नाटककारों ने प्रयोगधर्मी दृष्टि अपनाते हुए ‘एब्सर्ड’ (असंगत/विसंगत) नाटक भी रचे। ऐसे नाटकों में विपिन कुमार अग्रवाल का “तीन अपाहिज”, शंभुनाथ सिंह का “दीवार की वापसी”, लक्ष्मीकांत वर्मा का “अपना-अपना जूता”, रमेश बक्षी का “भग्न स्तूप का अक्षत स्तंभ” तथा मणि मधुकर का “रस गंधर्व” विशेष रूप से चर्चित रहे। इन प्रयोगों ने हिंदी नाटक को अभिव्यक्ति की नयी संभावनाओं और शिल्पगत विविधता से समृद्ध किया।

इसी दौर में नुक्कड़ नाटकों ने भी लोकप्रियता के नये आयाम स्थापित किये। वे नाटक की सर्वाधिक सहज, प्रत्यक्ष और जन-संवादी विधा के रूप में उभरे। मंच, प्रकाश और औपचारिक रंग-सज्जा की जटिलताओं से मुक्त ये नाटक सीधे सड़क, चौक-चौराहों और बस्तियों में खेले जाते थे, जिससे आम जनता से उनका सीधा संवाद संभव हो सका।

नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से आम आदमी के जीवन का यथार्थ रूप प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विसंगतियाँ इनके कथ्य के केंद्र में रहीं। इन नाटकों ने व्यवस्था की विडंबनाओं, शोषण और अन्याय के विरुद्ध जनचेतना जगाने का कार्य किया तथा प्रतिरोध की संस्कृति को स्वर प्रदान किया।

सफ़दर हाशमी को इस विधा का शिखर पुरुष माना जाता है। वे नुक्कड़ नाटकों को आधुनिक समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करने और उनके विरुद्ध मुखर प्रतिवाद दर्ज करने का सशक्त माध्यम मानते थे। उनके प्रमुख नाटकों में” हल्ला बोल”, “गाँव से शहर तक”, “तीन करोड़”, “औरत” तथा “डीटीसी की धांधली” उल्लेखनीय हैं। इन नाटकों ने न केवल जन-आंदोलनों को वैचारिक ऊर्जा दी, बल्कि हिंदी रंगमंच को जनपक्षधरता की नई दिशा भी प्रदान की।

इसी कालावधि, विशेषतः आठवें और नवें दशक में, हिंदी नाट्य-लेखन में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखायी देता है। इस दौर में अनेक महिला नाटककारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई और स्त्री-दृष्टि, घरेलू सत्ता-संरचनाओं तथा लैंगिक असमानताओं को नए कोण से प्रस्तुत किया। डॉ. कुसुम कुमार का “ॐ क्रांति-क्रांति” (1978) इस समय का उल्लेखनीय नाटक है। उनके बाद के नाटकों- “दिल्ली ऊँचा सुनती है”, “संस्कार को नमस्कार” और “रावणलीला” में सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य मिलता है। मृणाल पांडे ने “जो राम रची राखा”, “आदमी जो मछुआरा नहीं था”, “चोर निकल कर भागा” और “मौजूदा हालात को देखते हुए” के माध्यम से समकालीन समाज, राजनीति और स्त्री-अनुभव को सशक्त अभिव्यक्ति दी।

मन्नू भंडारी का “महाभोज” (1979, राजकमल प्रकाशन) इस दौर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृति है। यद्यपि यह मूलतः उपन्यास के रूप में रचित था, किंतु बाद में नाट्य-रूपांतर के माध्यम से अत्यंत चर्चित और बहु-मंचित हुआ। “महाभोज” भारतीय ग्रामीण राजनीति, चुनावी हिंसा और सत्ता-संरचना की क्रूरता का सशक्त दस्तावेज़ माना जाता है। इसके अतिरिक्त शांति मल्होत्रा का “एक और रील” तथा मृदुला गर्ग का “एक और अजनबी” भी इस काल के उल्लेखनीय नाटक हैं, जिनमें सामाजिक यथार्थ और व्यंग्य का प्रभावी संयोजन दिखायी देता है।

और इस सदी का मिज़ाज

इक्कीसवीं सदी में हिंदी व्यंग्य नाटक लेखन का प्रवाह थम-सा गया है। इस सदी के पच्चीस वर्षों में बहुत कम व्यंग्य नाटक लिखे गये हैं, जो नाटक लिखे भी गये उनमें हास्य की प्रधानता रही। इस सदी के नाटकों पर दृष्टि डालने पर जिन नाटकों पर दृष्टि ठहरती है उनमें प्रमुख हैं – अजग़र वजाहत का “गाँधी@गोडसे”, प्रताप सहगल का “रास्ता इधर भी है” तथा “पांच रंग नाटक”, अजय शुक्ला का “ताजमहल का टेंडर”, देवेन्द्रराज अंकुर का “हाथी के दाँत”, राजेश जैन का “वायरस” व “धक्का पंप”, डॉ कुमार संजय का “भाग कर शादी”, एच.डी. कुम्हार का “बेकार की चर्चाएँ”, विनोद कुमार गुप्त का “आम आदमी”, अशोक नंदा का “लठतंत्र”, राकेश कुमार त्रिपाठी का “लड़की नहीं मिली”, राम किशोर नाग का “हम तो चले हरिद्वार” आदि। गत वर्ष दीपक रंजन झा का नुक्क्ड़ नाटकों का एक संग्रह “इंसान कहीं के” शीर्षक से आया।

इक्कीसवीं सदी में हास्य–व्यंग्य नाटकों के प्रति लेखकों की घटती रुचि निश्चय ही एक चिंताजनक प्रवृत्ति है। यह सदी मानव जीवन को सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक, सभी स्तरों पर गहराई से प्रभावित कर रही है। मनोरंजन के असंख्य साधन आज घर बैठे उपलब्ध हैं, जिससे दर्शक की संवेदना, धैर्य और रुचि, तीनों में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। जीवन की तेज़ रफ्तार, समयाभाव, त्वरित उपभोग की मानसिकता और डिजिटल माध्यमों की सहज उपलब्धता के कारण पारंपरिक रंगमंच और नाट्य-प्रस्तुतियों का दायरा क्रमशः सिमटता जा रहा है। फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि कोई विधा कभी पूर्णतः समाप्त भी हो सकती है। साहित्य और कला समय के साथ अपना रूप, माध्यम और शिल्प बदलती रहती हैं। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और यूट्यूब जैसे नए माध्यमों के आगमन से भले ही नाटक की पारंपरिक और शास्त्रीय प्रस्तुति में एक प्रकार का ठहराव आया हो, लेकिन विषयवस्तु और कंटेंट के स्तर पर उसमें अधिक गहराई, समसामयिकता और प्रयोगशीलता भी देखने को मिलती है। आज का हास्य–व्यंग्य नाटक मंच के साथ-साथ डिजिटल स्पेस में नए दर्शक खोज रहा है और बदलती सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं को नए तेवर और नए माध्यमों के साथ अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रहा है। इस संक्रमणकाल में चुनौती के साथ-साथ संभावना भी निहित है कि हास्य–व्यंग्य नाटक अपने नए रूप में फिर से प्रभावी और प्रासंगिक बन कर सामने आएँगे।

संदर्भ
– रामचंद्र शुक्ल: हिंदी साहित्य का इतिहास
– नगेन्द्र: हिंदी नाटक और रंगमंच
– नामवर सिंह: आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियाँ
– डॉ. दशरथ ओझा: हिंदी नाटक उद्भव और विकास
– बच्चन सिंह: हिंदी नाटक : परंपरा और प्रयोग
– विश्वनाथ त्रिपाठी: हिंदी नाटक का इतिहास
– अभिव्यक्ति एवं हिंदी समय वेब
– महेश आनंद: रंग दस्तावेज सौ साल

अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare

अरुण अर्णव खरे

अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो ​विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।

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