हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो

         दुनिया इस वक़्त युद्धरत है। एक इंसान अपनी पूरी ज़िन्दगी में युद्धरत रहता है। वह लड़ता है अपने भीतर के डर से। वह लड़ता है अपनी कमियों से। वह लड़ता है व्यवस्था की विसंगतियों से। वह लड़ता है बाज़ार के खौफ़नाक साये से। उसके जीवन का हर पल एक युद्ध के समान ही होता है। लेकिन इस युद्ध के बाद उसे मिलता है कुछ सुकून, कुछ बेहतर पल, कुछ सुख, कुछ सुविधाएं और कुछ हंसी, ख़ुशी।

दुनिया जिस युद्ध में है, उससे किसे क्या हासिल हो रहा है? यह किसी को नहीं मालूम। हर कोई दूसरे को तबाह कर रहा है। मार रहा है। बर्बाद कर रहा है। कितना डरावना है यह समय, जब एक-दूसरे की बर्बादियों के दावे मुस्कुराते हुए किये जा रहे हैं। युद्ध से हासिल होने वाले लाभ को कोई नहीं बता पा रहा है। साहिर लुधियानवी कहते हैं:

जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी

इस जंग से पहले ज़ुबानी जंग होती है। चूंकि अब किसी भी मुल्क के पास सिवाय तबाही, तानाशाही और तनातनी के कुछ है नहीं इसलिए ज़ुबानी जंग ज़्यादा नहीं चलती है और वह ज़मीनी और अब तो आसमानी युद्ध में तब्दील हो जाती है। मार्गरेट एटवुड ने कहा भी है:

जब भाषा विफल हो जाती है
तब युद्ध होता है

लेकिन हर युद्ध भाषा की विफलता नहीं होता। यह किसी मग़रूर इंसान के अहम का परिणाम होता है। शाइरी उस मग़रूर इंसान के नापाक इरादों को बेनक़ाब करती है। उसे ज़िन्दगी की असली तस्वीर दिखाती है। उसे आईना दिखाती है। उस आईने में वे चेहरे भी दिखाती है, जो अहंकार के कारण समय से पहले मौत के क़रीब पहुंच गये। उन अनाम लोगों को युद्ध से आख़िर क्या मिलता है जो समय से पहले मौत के साये में चले जाते हैं? उन परिवारों को क्या मिलता है जिनका रक्षक किसी युद्ध में मारा जाता है? क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम कहते हैं:

किस युद्ध में कितने पुरुषों ने रक्त दिया
यह इतिहास में लिखा हुआ है, लेकिन
उसके समीप में यह नहीं लिखा है कि
कितनी स्त्रियों ने अपना सुहाग दान किया
कितनी माताओं ने कलेजा निकाल कर दिया
कितनी बहिनों ने सेवाएँ अर्पित की

दुनिया में हर युद्ध अपनी पहचान क़ायम रखने, अपना वर्चस्व बढ़ाने, अपनी शक्ति के दम पर दूसरों को दबाने और अपना वरदहस्त क़ायम करने के लिए हो रहे हैं। युद्ध की चालाकियां देखिए, भाई-भाई का दुश्मन बना हुआ है। इंसान, इंसान को मौत के घाट उतार रहा है। इंसानियत, इंसानियत का क़त्ल कर रही है। ऐसे में, रविंद्रनाथ टैगोर की वे पंक्तियां याद आती हैं, जिनका हिंदी अनुवाद मोहनदास करमचंद गांधी ने किया है:

वह लड़ाई ईश्वर के ख़िलाफ़ लड़ाई है
जिसमें भाई भाई को मारता है
जो धर्म के नाम पर दुश्मनी पालता है
वह भगवान को अर्ध्य से वंचित करता है
जिस अंधेरे में भाई, भाई को नहीं देख सकता
उस अंधेरे का अंधा तो
स्वयं अपने को नहीं देखता

यह दौर ऐसे अंधे लोगों का ही है, जो अपनी अंधेरे का राज ढूंढने के चक्कर में पूरी दुनिया को अंधेरे में धकेल रहे हैं। अपनी बादशाहत क़ायम करने की चाह में दुनिया के कितने ही बच्चों को यतीम बना रहे हैं। कितनी ही औरतों को विधवा बना रहे हैं। ये कभी अपनी लड़ाई इन औरतों की भलाई के लिए, इन बच्चों के उत्थान के लिए नहीं करते। दुनिया के मुल्क लड़ने का एक अंदाज़ अदम गोंडवी के इस शेर से भी सीख सकते हैं:

छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मज़हबी नग़मात को मत छेड़िए

ये लड़ने वाले कभी ऐसा क्यों नहीं सोचते कि लड़ाई ऐसे भी की जा सकती है कि हम औरों से अच्छे बनें। हम दूसरों से नेक बनें। हम दूसरों की नज़रों में बसने की कोशिश करें। लड़ाई का एक नज़रिया लाला माधवराम जौहर के इस शेर से बेहतर समझा जा सकता है:

लड़ने को दिल जो चाहे तो आँखें लड़ाइए
हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो

मगर दुनिया को अभी ऐसी लड़ाई लड़ने की फ़ुर्सत ही नहीं है।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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