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फ़िल्म चर्चा ख़ुदेजा ख़ान की कलम से....

होमबाउंड: समाज का एक्स-रे

            आम लोगों से निर्मित हमारा समाज बहुकोणीय स्तरों पर संघर्ष करता हुआ दिखायी देता है।ये स्तर बंटे हुए हैं सामाजिक भेद-भाव, जात-पांत, आर्थिक असमानता और पहचान की चुनौतियां। फ़िल्म ‘होमबाउंड’ देखकर लगता है कि हम इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग में जी रहे हैं या अब भी उन संकुचित रूढ़ियों में जकड़े हैं जिनसे उबरने के लिए हमारे महापुरुषों व जननायकों-नेताओं ने एक लम्बा संघर्ष किया। इससे भी आगे अब तो AI आ गया है लेकिन हमारी मानसिकता इस तरक़्क़ी के बनिस्बत उतनी व्यापक व सम्यक दृष्टि सम्पन्न नहीं हो सकी, जितनी होना चाहिए।

शोएब अली (मुस्लिम) और चंदन (दलित) की प्रगाढ़ दोस्ती पर इनके समुदाय और जातिगत पृष्ठभूमि का प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन इसी जातिगत पृष्ठभूमि को इनके भविष्य की उड़ान में सर्वाधिक बाधा बनाया जाता है। बार-बार इन्हें ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जिनसे इन्हें अपनी हीनता, असहायता व तुच्छता का बोध होता रहे। ऐसी मानसिक यंत्रणा, जो अदृश्य वार करके इनकी अंतरात्मा को घायल करती रहे। हिंसा का ये अदृश्य रूप बड़ा ही घातक सिद्ध होता है। जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है इसके दुष्परिणाम एवं प्रभाव सामने आने लगते हैं।

दोनों दोस्तों का छोटा-सा सपना था, जिसे हासिल कर वे समाज में अपनी पहचान और आमदनी के ज़रिये एक इज़्ज़तदार ज़िन्दगी बिता सकें.. और यहां हमारी व्यवस्था की सबसे बड़ी विडम्बना उजागर होती है।

फ़िल्म की कहानी में समाज के ताने-बाने पर भरपूर कटाक्ष और शोकालाप हैं। जैसे तादाद से अधिक उम्मीदवार‌ और भर्ती के पद ऊंट के मुंह में जीरा। बार-बार निरस्त होती परीक्षाओं से युवाओं का भविष्य कितना उज्ज्वल है, समझा जा सकता है। जबकि युवाओं के मामले में हमारा देश बहुसंख्यक है।

शोएब और चंदन की दोस्ती को बुनती फ़िल्म के कथानक के अनुसार परीक्षा स्थगित होने की प्रक्रिया के चलते आख़िर थक-हारकर चंदन मिल में मज़दूरी करने चला जाता है। एक दिन शोएब भी जातिगत प्रताड़ना से अपना मनोबल खो देता है और नौकरी छोड़कर चंदन के पास ही मिल में काम करने चला जाता है। श्रमिक जीवन के संघर्ष की झांकी यहां देखने को मिलती है। एक दूसरे के सुख-दुख को आपस में साझा करते हुए अपनी महत्वाकांक्षाओं को प्रतिदिन तिरोहित हुए देखना, इनकी दिनचर्या बन जाती है। जीवन की मजबूरी, सपनों को कुचलते हुए इन्हें ज़िन्दा रहने को विवश करती है।

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चंदन की मां जिस स्कूल में मध्याह्न भोजन बनाती है, उसके बनाये भोजन को सवर्ण शिक्षिका द्वारा फेंक दिया जाता है कि इसके हाथ का बना भोजन नहीं खाएंगे। मतलब किसी के छूने से अनाज भी अछूत की श्रेणी में है। ये बात अस्पतालों में लागू नहीं होती जब जाने किसका ख़ून किसे चढ़ाया जाता है। जान बचाने के लिए इंसान ही इंसान के काम आता है। इतनी छोटी-सी बात भी संकीर्णता की दीवारों को भेद पाने में अक्षम है।

इसी बीच लाॅकडाउन लग जाता है। अब दूसरी तरह की त्रासदियों का सामना करना पड़ता है। मिलें बंद हो जाती हैं। लोगों के काम छूट जाते हैं। अन्य मज़दूरों की तरह शोएब और चंदन भी कभी पैदल, कभी ट्रक में बैठकर लम्बा, कठिन, दर्द और थकन भरा सफ़र तय करते हैं।

शोएब का दोस्त चंदन बीमार हो जाता है। कोरोना-कोरोना चिल्लाकर ट्रक में सवार लोग उसे बीच रास्ते में उतार देते हैं। अब दिखायी देता है कि किस तरह समाज, जातिवाद, बेरोज़गारी और महामारी इंसान को तोड़ने का काम करती है।

असहिष्णुता, चरम सीमा लांघकर निरीह मनुष्यों को बेमौत मरने के लिए छोड़ देती है। सपने, उम्मीदें, दोस्ती और इंसानियत के बीच संघर्ष चलता रहता है। इस समय पता चलता है हमारा समाज, इंसानियत, न्याय और पहचान को लेकर कितना असंवेदनशील है। सिस्टम कमज़ोरों को नहीं बचाता। इंसान, इंसान को बचाता है। दोस्ती और इंसानियत ही मनुष्य का अंतिम सहारा बनती है।

इस कष्टदायक यात्रा में चंदन की मौत केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं लाखों प्रवासियों के सपनों और आशाओं के टूटने का त्रासदी है।

खेत में काम करते-करते चंदन की मां की फटी एड़ियों की बिवाइयां देखकर, चंदन चप्पल पहनने की बात करता है; इस पर माॅं का जवाब सुनने लायक़ है-‘इन बिवाईयों की धार से तो हम खेत में ऊगे खरपतवार काट दें’, जीवंत कर्मठता की मिसाल। श्रमिक वर्ग किस तरह अभावों में रहकर जीवन-यापन करते हैं, ये सुविधाभोगी सम्पन्न वर्ग समझ ही नहीं सकते क्योंकि स्वहित और आत्मकेंद्रितता समाज में इतनी गहरी है कि इससे परे सोचने का इनके पास न समय है न ज़रूरत।

फ़िल्म के अंत में शोएब का कहना, “मैं ही चंदन हूं”… यह बात भावनात्मक और प्रतीकात्मक स्तर पर उस व्यवस्था के चेहरे को बेनक़ाब करती है जिसके पीछे विद्रूपताओं का सघन जाल बिछा है। इस घड़ी, दर्द, प्रेम, आक्रोश, क्षोभ सब एक साथ उपजता है। फिर भी ज़िम्मेदारी का भाव, दोस्त की अंतिम इच्छा पूरी करने का संकल्प लेकर उसके परिवार को संबल देने का प्रण दिखायी देता है। यह शोएब की दोस्ती के प्रति निष्ठा और व्यवस्था के मुंह पर ज़ोरदार तमाचे की तरह परिलक्षित होता है।

निचले पायदान का जीवन संघर्ष, असमानता का प्रतीक है। सामाजिक विभाजन से ऊपर इंसानियत का जज़्बा और दोस्ती, समाज की लचर संरचना को चुनौती देती है। जितने महामारी से मरे, उससे अधिक अव्यवस्था और उपेक्षा से मर गये। यह फ़िल्म इन सारी सामाजिक तथा व्यवस्थागत विसंगतियों को उद्घाटित कर हमारे समाज का एक्स-रे कर देती है।

परदे पर कलाकार ईशान खट्टर, विशाल जेठवा, जाह्नवी कपूर और अन्य लगभग सभी ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। धर्मा प्रोडक्शन निर्मित और नीरज घेवान निर्देशित ‘होमबाउंड’ इस समय की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिल रही है और यह इसके सर्वथा योग्य दिखती भी है।

ख़ुदेजा ख़ान, khudeja khan

ख़ुदेजा ख़ान

हिंदी-उर्दू की कवयित्री, समीक्षक और एकाधिक पुस्तकों की संपादक। अब तक पांच पुस्तकें अपने नाम कर चुकीं ख़ुदेजा साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं से सम्बद्ध हैं और समकालीन चिंताओं पर लेखन हेतु प्रतिबद्ध भी। एक त्रैमासिक पत्रिका 'वनप्रिया' की और कुछ साहित्यिक पुस्तकों सह संपादक भी रही हैं।

1 comment on “होमबाउंड: समाज का एक्स-रे

  1. अच्छी समीक्षा। मैंने भी देखी है ये फिल्म।

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