
- September 14, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग मिथलेश रॉय की कलम से....
बड़ी अनोखी थी प्लेबैक गायकी की पहली-पहली आवाज़
ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा और उसके दशकों की बात और थी। उस दौर में सिनेमा देखना और सिनेमा देखने वाले दोनों को अच्छा नहीं माना जाता था। उस दौर में भी कुछ लोग थे जो अपने हिसाब से चलते थे, किसी की परवा नहीं करते थे। उनमें से ही थे बड़े नाना जी। वे फ़िल्में तो देखते ही थे, साथ ही ख़ूब बनठन कर रहते भी थे। परिवार सम्पन्न था, किसी बात की कोई चिंता भी नहीं थी। उनकी कुछ आदतें आज भी याद हैं। वे फ़िल्म ‘जागते रहो’ के किरदार, जिसे अभिनेता मोतीलाल ने निभाया था, कुछ कुछ वैसे उस तरह दिखते थे और रहते भी थे। “ज़िन्दगी ख़्वाब है, ख़्वाब में सच है क्या, झूठ क्या”, यह गीत उनकी तबीयत से मिलता जुलता लगता है। हालांकि घर में उनका बड़ा रोब था, बड़ी भारी और रोबदार आवाज़ में बातें करते थे। मजाल क्या कोई उनकी बात का विरोध करे। बाबूजी, बड़े पापा, चाचा जी की नज़र में उनका बहुत सम्मान था पर गांव वाले दबे छुपे उनके बारे में कहते थे वे थोड़े आशिक़मिज़ाज थे, कहीं भी बहक जाते थे। गांव में उनके प्रशंसक और समर्थक भी ख़ूब थे। वे अपने समर्थकों को भी फ़िल्म दिखा लाते थे। आम तौर पर उनके समर्थक गांव के सीधे सादे लोग होते। उनके लिए फ़िल्म किसी जादू से कम न थी। वे बड़े नाना जी के इसलिए राज़दार भी थे। बड़ी से बड़ी बात छुपा ले जाते। पर फ़िल्म देखने के बाद वे लोग जीवन भर खुश नहीं रह सके! जब वे लोग फ़िल्म देखकर शहर से गांव लौटते तो अपनी पत्नियों में अभिनेत्रियों सी ख़ूबसूरती, बात करने का अंदाज़ ढूंढ़ते लेकिन ग्रामीण महिलाओं में वे सब बातें न पाकर बहुत दुखी हो जाते। आपस में झगड़ा करते। यानी फ़िल्मों के कारण उनके घर बिगड़ने लगे थे। उनका लगाव घर परिवार में नहीं रह गया था।
बड़े नाना को इसका पूरा फ़ायदा मिलता। वे इन लोगों से अपना सारा काम करवाते, कचहरी जाते हुए बैग उठवाना, दिन भर में कई बार चाय, कपड़े धुलवाना, बाज़ार से सामान मंगवाना आदि। गर्मी के दिनों में एक आदमी उनके शरीर पर सत्तू का लेप लगाता, दूसरा नहाने के लिए पानी कुएं से भरकर रखता। नये ज़माने की फ़िल्मों के बारे में कहते, “आजकल के हीरो कोई हीरो हैं! एक हमारा ज़माना था जब फ़िल्मों में अभिनय व गाने काम अभिनेता को ही करना पड़ता था। यानी अभिनय ही नहीं अभिनेता को गायन भी आना चाहिए था। अभिनेता होना बहुत मुश्किल काम था।” बड़े नाना को सहगल पसंद थे, पर सहगल से ज़्यादा वे एम.जी. दुर्रानी को मानते थे। नाना जी ने अपने बैठक और शयन कक्ष में भी दुर्रानी के नाम वाला फोटो टांग रखा था, जिस पर नीचे काले मोटे हर्फ़ में लिखा होता, गायक अभिनेता ग़ुलाम मुस्तफा दुर्रानी।

अक्सर ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा की चर्चा करते हुए नाना जी.एम. दुर्रानी की चर्चा ज़रूर करते। वे बताते, “दुर्रानी एक क्रांतिकारी आदमी था, उसे परंपरा पर चलना मंज़ूर नहीं था। उस समय जब सहगल को लोग अनुसरण कर रहे थे, दुर्रानी ने नयी गायन शैली को अपनाया। असल में पार्श्व गायन की शुरूआत ग़ुलाम मुस्तफा ने ही की। मर्द आदमी था, उसे निर्देशक के इशारों पर नायिकाओं के आगे पीछे घूमना अच्छा नहीं लगता था इसलिए आगे चलकर उसने पार्श्व गायन को चुना। सिनेमा ने इस दौर में एक करवट भी ली.. अब अभिनेता और गायक अलग अलग की प्रथा चल निकली। दुर्रानी वह महान गायक था जिससे मुहम्मद रफ़ी, तलत महमूद आदि ने सीखा। बल्कि ये कहें कि हिन्दी गानों में बदलाव का जनक भी दुर्रानी ही था।”
उसके गानों की खनक कुछ इस तरह से बड़े नाना के मन बसी थी कि वे अपने ग्रामोफोन पर केवल दुर्रानी के ही गाने बजाते थे, “चलो वहां चले जहां बहार ही बहार हो”, “हमारा नाम भी लिख दो मुहब्बत करने वालों में”, “गोरी की जाति बड़ी बेवफ़ा लूट लेती है नज़रिया मिलाके”, “एक बेवफ़ा ने दिल चूर कर दिया”…
यूं तो नाना दुर्रानी अभिनीत कई फ़िल्मों का नाम बताते पर मुख्य रूप से मैंने उनको गायक के रूप में देखा है। उनके गाने ख़ूब सुने, दुर्रानी ने अपने दौर में अनेक बड़ी गायिकाओं को सिखाया भी और उनके साथ गाने भी गाये। सुरैया, नूरजहां, गीता दत्त, लता मंगेशकर…
बड़े नाना बताते “दुर्रानी पश्तो भाषा के आलावा हिन्दी, पंजाबी भी ख़ूब जानता था। लोग चुनांचे उसके घर के लोग गाने के कारण उसे कंजर कहते थे पर वह बहुत अलग आदमी था। पठान होते हुए भी बहुत सुरीला था, दुर्रानी ने कई ऐसे काम किये, जो उसके ज़माने तक किसी ने भी नहीं किये थे। वह पहला गायक था हमारे देश के लिए देशभक्ति गाना गाने वाला, कृष्ण भक्ति फ़िल्म में काम किया, भक्ति गीत गाया…” नाना दुर्रानी के बहुत बड़े प्रशंसकों में थे तथा अक्सर दुर्रानी के गीत बड़े मन से गुनगुनाते रहते थे, जैसे “लारा लप्पा लारा लप्पा ला” का अंतिम भाग “आजकल की नारियां हैं मुफ़्त की बीमारियां” और बताते भी थे कि इसमें कोरस में रफ़ी ने भी गाया है। दुर्रानी ने अशोक कुमार, मोतीलाल, देवानंद जैसे अभिनेताओं के लिए पार्श्व गायन किया। वो गीत आज भी लोग उतने ही प्यार से सुनते हैं।
बड़े नाना जैसे अपनी शर्तों पर रहने वाले लोग कम होते गये। लिहाज़ा नया ज़माना आया और दुर्रानी जैसे उम्दा गायकों को भी इस नये ज़माने ने अपनी शर्तों पर चलाना चाहा पर ये लोग अलग मिट्टी के बने थे। झुककर जीने का सलीक़ा नहीं सीखा था। दुर्रानी धीरे धीरे गुमनामी के अंधेरे में चले गये। घर में नाना के बाद वह ग्रामोफ़ोन नहीं रहा, न दुर्रानी के गीतों के रेकॉर्ड्स ही रहे। हां “हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले” जगजीत सिंह को गाते सुनता हूं तो बड़े नाना के ग्रामोफ़ोन पर दुर्रानी साहब की गायकी याद हो आती है।

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

बहुत शानदार लेख , बहुत पुराने गायक से परिचय करने के लिए मिथलेश जी को साधुवाद.
इसे पढ़कर गानों को
YOU-TUBE पर खोजकर आजकल की नारियां हैं मुफ़्त की बीमारियां , एक बेवफ़ा ने शीशए दिल ….आदि सुनकर मजा आगया.