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पाक्षिक ब्लॉग विजय कुमार स्वर्णकार की कलम से....

ग़ज़ल का वज़्न निकालिए: सिर्फ़ एक मिनिट में

              ग़ज़ल का वज़्न में होना अनिवार्य है। वज़्न में लिखना और किसी ग़ज़ल का वज़्न पता करना दो अलग अलग काम हैं। मैंने देखा है बहुत से ग़ज़लकार केवल लय के उतार चढ़ाव को ध्यान में रखकर ही ग़ज़ल कह लेते हैं। वे मात्रा गणना नहीं करते। मात्रा गणना से तात्पर्य है कि शेर में लघु दीर्घ की शृंखला या संयोजन को ज्ञात करना। इसे तकतीअ कहते हैं। कहते हैं अगर नवोदित ग़ज़लकार तकतीअ सीख लेता है, तो यह समझना चाहिए कि वह ग़ज़ल के व्याकरण का आधा ज्ञान प्राप्त कर चुका है। अर्थात एक तरफ़ तकतीअ है और दूसरी तरफ़ व्याकरण का शेष ज्ञान।

हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों की पहली चुनौती वज़्न ही रही है। वज़्न में लिखने के लिए आवश्यक है वज़्न को समझना और उसका अभ्यास करना। मेरा अध्ययन इस नतीजे पर पहुंचा है कि 2010 से पूर्व तक हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों के सृजन में वज़्न की गड़बड़ी अधिक पायी जाती है। इसका एक कारण व्याकरण के प्रति उनकी उदासीनता थी तो दूसरी ओर समुचित प्रशिक्षण की कमी। अपने प्रशिक्षण सत्रों के दौरान मैंने अनुभव किया कि हिन्दी भाषियों के लिए अरबी फ़ारसी के तरीक़े से तकतीअ कठिन हो जाती है इसलिए मैंने हिन्दी की अप्रोच ही को केंद्र में रखकर ऐसी विधि को सामने रखा जिससे एक मिनिट में ग़ज़ल का वज़्न आसानी से ज्ञात किया जा सके।

आइए इस विधि को समझते हैं। किसी बड़े उस्ताद ग़ज़लकार की ग़ज़ल, जिसमें पांच सात शे’र हों, का चयन कीजिए। इस विधि को अपनाने के लिए पहली शर्त है कि आपको शब्दों के मात्राभार निकालना आता हो। दूसरी यह कि आपको मात्रा पतन का ज्ञान हो। तीसरे आपको अलिफ़ वस्ल या संधि के कारण मात्राभार परिवर्तन की जानकारी हो। चौथी आवश्यकता है कि आपके पास प्रचलित औज़ान की एक रेडीमेड लिस्ट हो। ये कोई बहुत बड़ी शर्तें नहीं हैं। जो भी ग़ज़ल लिखना जानता है ये सब जानकारियां उसे होती ही हैं।

आइए आगे बढ़ते हैं। इस तकनीक का मुख्य आधार यह है कि लघु दीर्घ के क्रम को तय करने के लिए शेर के पहले अक्षर से आख़िरी अक्षर की ओर मात्रा भार निकालते हुए आगे बढ़ना है। अब एक सरल सीधी रेखा में रेल के डिब्बों की तरह बॉक्स बना लीजिए। जैसे गणित में हम प्लेस वैल्यू या स्थानीय मान निकालने के लिए इकाई, दहाई, सैकड़ा, हज़ार आदि के लिए बॉक्स बनाते थे, उसी तरह के बॉक्स बनाते हुए उनमें 1 या 2 लिखते हुए आगे बढ़ना है। स्पष्टता के लिए एक उदाहरण लेते हैं:

मत कहो आकाश में कुहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से
क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है

इस ग़ज़ल में अन्य शे’र भी हैं लेकिन अभी उनकी आवश्यकता नहीं है। अब शे’र की पंक्ति के प्रत्येक अक्षर या अक्षर समूह को दीर्घ या लघु के निर्धारण लिए चिह्नित कीजिए। सुविधा के लिए देखिए:

मत, क,हो, आ,का,श, में, कुह,रा ,घ,ना, है
यह, कि,सी ,की, व्यक् ,ति, गत, आ,लो,च,ना, है

अब अगर पहली पंक्ति में बारह टुकड़े हैं तो दूसरी पंक्ति में भी बारह टुकड़े ही हैं। यह सुविधाजनक स्थिति है। किसी कारणवश अगर यह संख्या अलग अलग हो कुछ अतिरिक्त जुगत लगानी होती है। फ़िलहाल इस शे’र का वज़्न निकलना बहुत आसान है।

पहली पंक्ति के आरंभ से अंत की ओर बढ़ते हुए बॉक्स बनाते चलिए। पहले बॉक्स में “मत” को ध्यान में रखते हुए आप एक दीर्घ अर्थात 2 लिखेंगे। यह ध्यान दीजिए कि “मत” एक शाश्वत दीर्घ है और इसका मात्रापतन संभव नहीं है। साथ ही साथ “मत” के बाद “कहो” आने के कारण इन शब्दों में संधि की संभावना भी नहीं है अतः किसी तरह का मात्रा परिवर्तन भी नहीं हो सकता। इससे स्पष्ट है और निर्विवाद भी कि पहले स्थान पर दीर्घ ही है। अब अगर पहली पंक्ति के पहले बॉक्स में निर्विवाद रूप से दीर्घ है तो दूसरी पंक्ति में भी ऐसा ही होना चाहिए। दूसरी पंक्ति के पहले बॉक्स में “यह” के कारण 2 ही आएगा। “यह” शाश्वत दीर्घ है और इसके बाद आने वाला शब्द “किसी” के कारण (“यह” और “किसी” में) संधि संभव नहीं है, अतः मात्रा परिवर्तन नहीं हो सकता है। तो इस प्रकार पहले स्थान या बॉक्स के बारे में हमने पहली पंक्ति से आंकलन किया और दूसरी पंक्ति से सत्यापन किया।

इसी तरह पहली पंक्ति के दूसरे और तीसरे बॉक्स में “कहो” का मात्राभार 12 आना चाहिए लेकिन इसमें एक पेंच है। “कहो” 12 भी हो सकता है और “हो” की मात्रा पतन के बाद 11 भी। इसी तरह दूसरी पंक्ति में भी “किसी” 12 और 11 दोनों हो सकते हैं। अतः दूसरे स्थान पर निर्विवाद रूप से 1 होगा लेकिन तीसरा स्थान तय नहीं हो सकता। यहां 1 भी हो सकता है और 2 भी। इस संशय को दूर करने के लिए इस ग़ज़ल के दूसरे शे’र की आवश्यकता होगी। आइए इस शे’र से मदद लेते हैं।

सू र्य हम ने भी न हीं दे खा सु बह से
क्या क रो गे सू र्य का क्या दे ख ना है

अब इस शे’र के तीसरे बॉक्स में पहली पंक्ति के “हम” के कारण 2 आएगा। “हम” शाश्वत दीर्घ है, इसका मात्रा पतन संभव नहीं है और “हम” के बाद “ने” आने से किसी संधि की भी संभावना नहीं है। इसी तरह इस दूसरे शे’र की दूसरी पंक्ति के तीसरे बॉक्स में “रो” का मात्राभार 2 ही होगा क्योंकि यह “करोगे” के बीच में है और इसका भी मात्रा पतन संभव नहीं है। तो यह तय हुआ कि तीसरे स्थान पर दीर्घ ही है।

इसी एक्सरसाइज़ को आगे के स्थानों के लिए भी करते चलिए। सारे स्थान भरने पर ग़ज़ल का वज़्न ज्ञात हो जाता है।

इस विधि से ज़रा सा अभ्यास होने पर एक अन्य निराले ढंग से और तेज़ी से वज़्न ज्ञात कर सकते हैं। इसमें निर्विवाद मात्राभार वाले अक्षर या अक्षर समूह को चुना जाता है। देखिए:

1 2 3 4 5
मत क हो आ का श, में , कुह,रा ,घ,ना , है
यह कि सी की व्यक् ति, गत ,आ,लो,च,ना,
सूर य हम ने भी न हीं दे खा सु बह से
क्या क रो गे सूर य का क्या दे ख ना है
इस स ड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर कि सी का पां व घुटनों तक सना है
हो ग ई हर घा ट पर पूरी व्यवस्था
शौ क से डू बे जिसे भी डूबना है

इन आठ पंक्तियों में प्रत्येक बॉक्स या स्थान पर निर्विवाद लघु या दीर्घ चिह्नित कीजिए। ऊपर मैंने सहूलियत के लिए केवल पहले पांच बॉक्स को लिया है। पहले स्थान पर आठ में से चार पंक्तियों में शाश्वत दीर्घ है। “मत”, “यह”, “इस”, “हर” शाश्वत दीर्घ हैं और इनके बाद कोई अ आ इ ई ए ऐ ओ औ जैसे स्वर नहीं हैं जिससे संधि होकर मात्रा परिवर्तन हो सके। एक ग़ज़ल में अगर चार पंक्तियां किसी भी स्थान पर निर्विवाद दीर्घ की पुष्टि करती हों तो फिर कोई संशय नहीं रह जाता है।

इसी तरह दूसरे स्थान पर “कहो”, “किसी”, “करो”, “सड़क” जैसे शब्द हैं जिनका पहला अक्षर निर्विवाद लघु है। अतः दूसरे स्थान पर लघु की पुष्टि होती है। तीसरे स्थान पर “हम” और “ड़क” शाश्वत दीर्घ हैं। इनके ठीक बाद के शब्द का आरंभ स्वर से नहीं हो रहा है अतः यह स्थान भी निर्विवाद दीर्घ को जाता है।

चौथे स्थान पर पांचवीं पंक्ति में “पर” शाश्वत दीर्घ है लेकिन उसके ठीक बाद “इस” आने भ्रम बना रहेगा। “पर” और “इस” संधि के उपरांत “परिस” की ध्वनि देंगे, जिसका मात्रा भार 12 हो जाएगा। अर्थात 2 और 2 की जगह मात्रा भार 12 में परिवर्तित हो जाएगा। अतः यह हमारी सहायता नहीं कर सकता। सातवीं पंक्ति का “हर” हमारी मुश्किल आसान कर दे रहा है। यह शाश्वत दीर्घ है।

पांचवें स्थान के लिए दूसरी और पांचवीं पंक्ति में उपस्थित “व्यक्” और “इस” शाश्वत दीर्घ हैं। अतः पांचवां स्थान भी निर्विवाद रूप से दीर्घ को जाता है।

इस तरह शाश्वत दीर्घ और शाश्वत लघु को चिह्नित करते चलें, ग़ज़ल का मात्राभार एक मिनट से कम समय में आपके सामने होगा।

विजय कुमार स्वर्णकार, vijay kumar swarnkar

विजय कुमार स्वर्णकार

विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में ​सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

1 comment on “ग़ज़ल का वज़्न निकालिए: सिर्फ़ एक मिनिट में

  1. यह ग़ज़ल लिखने वालों के लिए आम बात है ग़ज़ल की डेप्थ में जाके बात कीजिए आदरणीय जैसे कि बह्र का ग़ज़ल में क्या कांट्रीब्यूशन है और बह्रे निर्धारित क्यों है जैसे कि बह्र ए मीर की डिमांड दोनों मिसरो में 2122 1212 22 होना चाहिए। हम अपने अनुसार भी तो बह्र तय कर सकते हैं जैसे कि दोनों में 2222 2222 2222 22 या कोई भी एक समान मात्रा दोनों मिसरो में।

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