विजय कुमार स्वर्णकार, vijay kumar swarnkar
पाक्षिक ब्लॉग विजय स्वर्णकार की कलम से....

हम, तुम और वो

            वो आये घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
            कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं

‘ग़ालिब’ का यह शे’र एक विशेष ध्येय से उद्धृत किया गया है। संकेत यह कि शे’र जिसके बारे में है वह व्यक्ति सामने ही है, तब भी “वो” कहा है, “तुम” क्यों नहीं। यह भोलापन नहीं चलेगा कि वज़्न पूर्ति जैसा कोई कारण रहा होगा। शे’र आराम से यूं हो सकता था:

तुम आये घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी तुम्हें तो कभी अपने घर को देखते हैं (डमी 1)

हालांकि सानी मिसरा अब उतना प्रभावी नहीं लगता। इस पर अलग से बात होगी। पहले यह कि “वो” और “तुम” दोनों के होने से क्या अंतर आता है। “वो” एक ऐसा व्यक्तित्व है जो ठीक सामने नहीं होता और कभी कभी तो होता ही नहीं है, बस उसका आभास होता है। ऐसी आइडेंटिटी के बारे में बहुत दावे के साथ कुछ कह देने पर उसकी पुष्टि के लिए आवश्यक सबूत और साधन नहीं मिलते। “तुम” के साथ यह सुविधा नहीं है। वह तो सामने है। उससे कुछ छुपा भी नहीं है। उसके बारे में कुछ भी कहे जाने पर वह या तो उसकी पुष्टि करेगा या नकारेगा। अर्थात “तुम” के बारे में कुछ भी बोलने से पहले अतिरिक्त सावधानी रखनी होती है। यह तो हुआ “वो” और “तुम” के बीच का सामान्य अंतर, जो शे’र कहने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। यहां “ग़ालिब” के शे’र में “वो” आने का कारण अलग है। यहां जो “तुम” को संचालित करता है उस “वो” की बात हो रही है। उसी तरह जैसे शाइर के अंदर जो “ग़ालिब” है, वह शे’र कह रहा है। अब इस “तुम” के “वो” के बारे में कहने से क्या लाभ हुआ है? वही लाभ जो इस शे’र के सानी मिसरे में उद्घाटित है। “कभी हम उनको… देखते हैं” में जो सुविधा है, बांकपन है; वह “कभी हम तुमको… देखते हैं” में नहीं है। भारतीय मान्यता है कि हमारे भीतर कोई और होता है, जो हमें संचालित करता है। प्रत्यक्ष से अधिक महत्वपूर्ण वह अप्रत्यक्ष है। उस अप्रत्यक्ष को बार बार देखने से शिष्टाचार भंग नहीं होता वरन प्रत्यक्ष का सम्मान बढ़ जाता है। यहाँ शे’र कहते समय शाइर अभिभूत है, विस्मित है, विह्वल है अतः ऐसे में वह उस “वो” से अधिक जुड़ पा रहा है। देह से सम्बद्ध होते हुए भी उससे परे “वो” है। इसी तरह मकान से सम्बद्ध होते हुए भी “घर” एक अलग आइडेंटिटी है। “घर” और “वो” दोनों को देखने की दृष्टि एक ही है; “प्रत्यक्ष तुम” और “मकान” को देखने के लिए आवश्यक दृष्टि से कहीं अलग।

अगर इसके विपरीत जो प्रत्यक्ष है उसको संबोधित किया जाता तो शे’र की एक संभावित सूरत ऐसी बनती। (इस बार वज़्न को अनदेखा करें)

तुम आये मकान में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी तुम्हें तो कभी अपने मकान को देखते हैं (डमी 2)

अब इसमें एक विशेष आयाम का दम घुट जाएगा। ग़ौर कीजिए मूल शे’र किसको संबोधित है या यूं कहिए कि मूल शे’र को सुनने वाले कौन कौन हैं। क्या वही “तुम” से जो सामने है, या स्वयं से या उस क्षण उपस्थित सभी से (जिसमें मकान भी सम्मिलित है)।

मुझे लगता है इन सभी से, भाव विह्वल होने पर मनुष्य चर अचर दोनों से मुख़ातिब हो सकता है। मूल शे’र स्वयं से जब कहा जाएगा तो यह आत्मलाप हो जाएगा। अपने मकान के आंगन, दरो-दीवार, पेड़, दरवाज़े आदि से भी कहने की स्थिति बनती है क्योंकि शाइर “घर” देख रहा है मकान या मकान का कोई हिस्सा नहीं। घर प्राण प्रतिष्ठित होता है।

अब “डमी 2” शेर को देखिए। यह सीधे-सीधे “तुम” के बारे में “तुम” ही से शे’र कह रहा है। मकान से या किसी अन्य से (जैसे स्वयं से) कहने की स्थिति अब नहीं रह गयी। केवल “वो” के आने से इतना अंतर आ गया। इसी क्रम में तुम और वो के महत्व को समझने के लिए एक और मशहूर शे’र पर चर्चा करते हैं:

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

यह ग़ज़ल की परम्परा का हिस्सा है कि अपनी आन-बान भले चली जाये, महबूब को रुसवा न करें। हिन्दी के ग़ज़लकारों के लिए इस गूढ़ तथ्य से यह ग्रहण करना चाहिए कि महबूब तो छोड़िए (वह तो कभी-कभी सामने भी नहीं होता) शे’र जिसे सुनाया जा रहा हो उसे बुरा नहीं लगना चाहिए क्योंकि वह हमेशा आपके सामने होता है। एक काल्पनिक स्थिति से इसे समझते हैं। मान लीजिए आप सेना या पुलिस के किसी बड़े अधिकारी (सरपंच, मंत्री, उद्योगपति आदि भी) या मित्र ही को अपना यह शे’र सुनाते हैं और कहते हैं कि एक शे’र सुनिए…

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
‘तुम’ तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

वह आपके बारे में क्या सोचेगा? भाई, मैंने ऐसा क्या किया है? मुझे यह क्यों सुना रहे हो? फिर आप यह सफ़ाई देंगे कि यह आपके बारे में नहीं था। आप जिस जिसको यह शे’र सुनाएंगे वह कुछ कहे या न कहे, असहज अवश्य हो जाएगा। इस शे’र की बात करें तो अवश्य ही यहां “तुम” आने का कारण पहली पंक्ति में उपस्थित “लोग” हैं, अन्यथा शाइर “वो” ही का प्रयोग करता। “तुम” की जगह “वो” लाने पर निम्नानुसार स्थिति होती। “वो” “लोग” का सर्वनाम (अर्थात दोनों एक ही हैं) प्रतीत होता।

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
वो तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में (डमी 1)

इसी ग़ज़ल में एक अन्य शे’र में यह ध्यान रखा गया है कि “तुम” को टाला जा सके।

दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है ‘उस’को भूल जाने में

अब इस शे’र में अगर “उस” की जगह “तुम” आता तो कितना बुरा लगता। इस तरह कुछ परिस्थितियों में “तुम” का आना खटकता है। एक और उदाहरण से शायद यह तथ्य स्पष्ट हो।

आंख में गंगा की आंसू भर गये
किस तरह के पाप सब धोकर गये

इस शेर में “सब” की जगह “तुम” रखकर देखिए। अंतर स्पष्ट हो जाएगा।

विजय कुमार स्वर्णकार, vijay kumar swarnkar

विजय कुमार स्वर्णकार

विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में ​सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

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