
- March 31, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....
शान्ति के प्रदेश ओस्लो में
ओस्लो में मेरे होस्ट जॉन थे। जॉन कई वर्ष पहले भारत में नॉर्वे के राजदूत बनकर आये थे। वे भारत से काफ़ी परिचित हैं, उम्र 74 से ज़्यादा होगी, लेकिन छरहरे, बेहद स्फूर्ति वाले। जॉन, ओदवे के पति ब्रेयान के मौसेरे भाई हैं और उन्होंने हमें अपने घर में रखना बड़ी ख़ुशी के साथ स्वीकार किया था।
जॉन बेहद बातूनी और हँसमुख हैं। उनकी पत्नी ओसा, बेहद शान्त और गरिमामय महिला है। उनकी इकलौती बेटी ओस्लो में ही अलग रहती हैं। जॉन के पिता अंग्रेज़ थे, इसलिए वे धड़ल्ले से अंग्रेज़ी बोलते हैं। उन्होंने पहली रात से ही घुमाना शुरू कर दिया, वे आसपास की गलियों में घुमाने ले गये, लोगों ने सर्दियों के लिए अपने घर के पिछवाड़े में लकड़ियां काट-काटकर ढेर बना रखे थे। जॉन ने बताया वे लोग सारी गर्मियां जंगलों में जाकर लकड़ी काटकर लाते हैं, जॉन भी लकड़ियां लाते हैं। मैं उनका चेहरा देखने लगी, सत्तर से ऊपर का आदमी लकड़ियां ला रहा है। वह भी, जो दूसरे देशों का राजदूत तक रह चुका है।
गलियों से गुज़रते हुए जॉन हमें एक ऐसी जगह ले गये, जहाँ एक व्यक्ति ने अपने घर के टूटे-फूटे सामान से सजावटी सामान बना रखा था। काफ़ी कुछ वैसा ही जैसा कि हमारे कलाकार नेगी जी ने बनाया है, बस आकृतियों के हाव-भाव में स्थानीय प्रभाव था।
दूसरे दिन मैं अकेले घूमना चाहती थी, जॉन ने कहा वे मुझे सिटी सेंटर में Oslofjord के किनारे छोड़ देंगे और ठीक एक घण्टे बाद वहाँ से पिक-अप कर लेंगे। सिटी सेंटर पहुंचते ही मैं धीमे-धीमे माहौल में पैठने की कोशिश करती हूँ। मेरे पास केवल एक घण्टा है, सबसे पहले मुझे नोबेल पीस प्राइज़ का पीस सेन्टर दिखायी देता है। मैं भीतर जाती हूँ तो पता लगता है पीस सेंटर के लिए टिकिट है। बाहर कुछ सामान बिक रहा है, जिनका दाम भारतीय स्तर से काफी ज़्यादा है। मुझे एक युवक और युवती दिखायी देते हैं, जो मेरी सहायता करना चाहते हैं। वे मुझसे भारत के बारे में बातें करते हैं।

स्लमडॉग मिलिनियर फ़िल्म भी लोगों की उत्सुकता जगाती है। मैं उन्हें बताती हूं विकासशील देश होते हुए भारत कई क्षेत्रों में बहुत आगे है। वे बड़े ध्यान से मेरी बातें सुनते हैं और फिर पीस सेन्टर का एक टिकिट लेकर मुझसे कहते हैं, मैडम, ये हमारी तरफ़ से छोटी-सी भेंट लीजिए। मैं उनसे पैसे लेने को कहती हूँ तो कहते हैं हमें आपसे बातें करके इतना अच्छा लगा कि हम चाहते हैं आप यह पीस सेंटर ज़रूर देखें।
शान्ति और प्रेम
नोबल पीस प्राइज़ ओस्लो का अभिमान है, क्योंकि यह पुरस्कार नॉर्वे में ही दिया जाता है।
मैं दीवारों पर लगी तस्वीरों को ध्यान से नहीं देख पाती हूँ, लेकिन इतना तो पता चल ही जाता है कि इन तस्वीरों में सभी वैश्विक समस्याओं के प्रति जागरूकता है, चाहे वह जातीय या क़ौमी समस्या हो या फिर देह व्यापार, या फिर स्वदेश से पलायन।
एक अंधेरे-से कमरे में विश्व के महान नेताओं के चित्रों को बिजली की बत्ती के स्टैंड पर इस तरह से लगा रखा है कि लगता है वे सब मोमबत्तियाँ हों। मैं भारतीय चेहरों को खोजने की कोशिश में हूं, पर कोई दिखायी नहीं पड़ता। एक अन्य कमरे में पेंटिंग का सामान है, जिस में बैठकर शान्ति के नाम पर कोई चित्र बनाया जा सकता है। सीढ़ी से उतरती हूँ तो एक पेड़-सा दिखायी देता है जिसकी पत्तियाँ सफ़ेद रंग की है। नोटिस पढ़ने पर पता लगता है पास में सफ़ेद धागे और पत्तियाँ रखी हैं, उन पर अपना सन्देश लिखकर इस शान्ति वृक्ष पर टांगा जा सकता है।
मैं एक पत्ती उठाकर उस पर हिन्दी में शान्ति और प्रेम लिखती हूँ और भारत के नाम से टाँग देती हूँ। अपनी भाषा और देश के नाम को वैश्विक वृक्ष पर जगह पाते देखकर मुझे बेहद ख़ुशी होती है। तभी मुझे दो युवक दिखायी दिये, जो इंग्लिश में बात कर रहे थे, मुझे देखकर एक युवक दूसरे से कहने लगा- यह इंडियन है।
मेंने उनकी ओर देखा तो वे मुस्कुरा उठे, वह व्यक्ति कहने लगा हाँ, मैं कई बार ऑफ़िस के काम से इण्डिया गया हूँ- आप साउथ इण्डियन हैं या नार्थ?
मुझे इस तरह के सवालों के जवाब देने में बड़ी कठिनाई होती है, मैंने कहा मैं सिर्फ़ इण्डियन हूं। वह मुस्कुरा दिया, लेकिन आपके यहाँ तो लोग-बाग ऐसा नहीं सोचते।
मैं उससे बात कर रही थी कि जॉन दिखायी दिये। हम लोग Munch Museum की ओर चल दिये, जहाँ कवि दम्पति Torgeir Schjerven और Inger Elisabeth Hansen हमारा इंतज़ार कर रहे थे। Torgeir Schjerven और Inger Elisabeth Hansen बेहद कर्मशील कवि दम्पति हैं, Torgeir Schjerven पेंटर थे, लेकिन पेंटिंग के साथ उन्हें कविता में भी रुचि जाग्रत हुई। Torgeir Schjerven की सबसे बड़ी विशेषता है कि नोर्वेजियन बोली में लेखन करते हैं और आंचलिक भावों को कविता में स्थान देते हैं। Inger Elisabeth Hansen बेहद ख़ूबसूरत कर्मशीला महिला हैं, जो ओस्लो में चलने वाले कवितोत्सव में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
म्यूज़ियम के शिल्प
थोड़ी देर बाद हम लोग Munch Museum के भीतर गये। Torgeir Schjerven कला के पैनेपन पर हमारा ध्यान आकर्षित करते रहे। Munch की प्रमुख कृति The Scream, इसके बारे में Munch ने अपनी डायरी में लिखा है, वे अपने मित्रों के साथ सफ़र में थे, कि उन्हें लगा आसमान में अनेक रंग छा गये हैं, मानो कोई रो रहा हो। प्रकृति के रोदन को हम समझ ही कहाँ पाते हैं, बस उसका दोहन करते रहते हैं।
Oslo Opera House ओस्लो के fjord पर स्थित है। इसके प्रमुख आर्किटेक्ट हैं Snohetta। इसका निर्माण कार्य 2007 में पूरा हुआ था। समुद्र के मुहाने पर बनी यह इमारत अपनी छत के कारण भी यादगार बन जाती है। इसकी विशाल ढलावयुक्त छत से ओस्लो बड़ा ही ख़ूबसूरत लगता है। तभी जॉन आ गये और हम लोग Vigeland पार्क की तरफ़ चलने लगे।
यह पार्क क़रीब अस्सी एकड़ के क्षेत्रफल में फैला है, जिसमें क़रीब 212 शिल्प स्थित हैं, जिनका निर्माण Gustav Vigaland ने किया था। इसके 850 मीटर लम्बे हिस्से में छह प्रमुख हिस्से हैं: प्रमुख द्वार, पुल, बच्चों का खेल-मैदान, फव्वारा, Monolith Plateau, और जीवन चक्र। मूर्ति शिल्प में कल्पना के साथ-साथ यूरोपीय कलात्मकता भी दिखायी देती है, जिसमें देह के सौन्दर्य को अनुपम रूप से उकेरा जाता है। इन शिल्पों में स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों के अतिरिक्त माँ और बच्चों का, पिता और पुत्र के सम्बन्धों को भी स्थान देने की कोशिश की गयी है। सभी शिल्पों में देह को रेखांकित किया गया है, वस्त्रों जैसे आवरणों की आवश्यकता महसूस नहीं की गयी है।
Monolith Plateau इसका सबसे प्रमुख केन्द्र है। यह शब्द monolithus है, जिसका मतलब ही यही है कि एकमात्र पत्थर, इस शिल्प को बनाने के लिए शिल्पी को कम से कम दस महीने लगे थे। यह 46.32 मीटर ऊँचा है, जिसमें 121 मानवींय आकृतियाँ बनी हैं। इसकी परिकल्पना स्वर्ग की सीढ़ी के रूप में की गयी है। भावनात्मक रूप में मानवींय आपसी सम्बन्धों के साथ-साथ स्वर्गीय आनन्द की चाहना को व्यक्त किया गया है।
फिर मिलेंगे नॉर्वे! का वक़्त
घर लौटने पर जॉन रसोई का काम संभाल लेते हैं, मैं उनकी सहायता करने जाती हूँ तो वे मना कर देते हैं- “जब मैं खाना बनाता हूँ तो अपनी पत्नी तक को रसोई में नहीं आने देता हूँ”, उनका कहना था। जॉन ने लेखक मित्रों को डिनर पर बुलाया है, ठीक समय पर लोग आ जाते हैं। मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि नॉर्वे खाना बेहद सहज होता है। चिकन सूप के साथ किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं थी। सूप में चिकन के टुकड़े, सब्ज़ियाँ भी थे। यह पेट भरने के लिए पर्याप्त था। साथ में फल और चॉकलेट आदि थे। वाइन या बीयर भोजन का आवश्यक अंग होता है, संभवतः सर्दी से बचने के उपाय के रूप में, पर मैंने सड़कों पर बहकते शराबियों को कभी नहीं देखा।
खाने की मेज़ पर सबसे बड़ा विषय भारतीय समाज को लेकर था, सभी जानना चाहते थे भारत में लड़कियों को क्यों मारा जाता है। यह विषय ऐसा नहीं है कि मैं इस पर गौरव महसूस कर पाऊँ, दरअसल मुझे तिलमिलाने का मौक़ा यहीं मिल गया। मुझे आश्चर्य नहीं हुआ कि लोग भारतीय जातिगत भेदभाव, या स्त्री पीड़न से परिचित हैं। उन्हें आश्चर्य तो तब हुआ जब पता चला कि जातिगत भेदभाव हिन्दुओं में ही नहीं अन्य जातियों, जैसे कि मुस्लिम समाज आदि में भी है।
दूसरे दिन सामान बाँधने का दिन था। मुझे मोंजा जाना था, मैंने बेहद सस्ती फ्लाइट पकड़ी थी, इसलिए सामान की पाबन्दी थी। विदा नॉर्वे, शुक्रिया ओदवे, यह पूरी यात्रा ओदवे के कारण ही संभव हुई।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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