इक़बाल का तराना बांगे-दरा है गोया
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....

इक़बाल का तराना बांगे-दरा है गोया

        वैसे तो शायर-ए-मशरिक़ (पूर्व का शायर) अल्लामा इक़बाल की बहुत सारी किताबें बेहद मशहूर हैं, लेकिन “बांगे-दरा” सबसे ज़ियादा मशहूर शे’री मजमूआ है। यह मजमूआ दरअस्ल एक गुलदस्ते की तरह है, जिसमें भिन्न-भिन्न रंग और सुगंध के फूल जमा कर दिये गये हैं।

इक़बाल के इस काव्य संग्रह में देशभक्ति से लबालब रचनाएं हैं, तो बच्चों के मनोविज्ञान अनुसार प्रार्थनाएं एवं दुआएं हैं। बहुत-सी नज़्में हैं, जो वार्तालाप की शक्ल में लिखी गयी हैं। इसके अलावा ‘शिकवा’ और ‘जवाब शिकवा’ जैसी मशहूर और बेमिसाल मुसद्दस (उर्दू शायरी की एक विधा) भी इसी संकलन में है। हिंदुस्तानी संस्कृति और सभ्यता, पौराणिक कथाओं, प्राचीन परंपरा और मिथकों, महापुरुषों आदि पर केंद्रित रचनाएं भी इसमें हैं। “नया शिवाला” जैसी नज़्मों के साथ ही कुछ प्रसिद्ध लोगों की शान में भी नज़्में हैं और थोड़ी-बहुत गज़लें भी।

“बांगे-दरा” के शाब्दिक अर्थ हैं ‘काफ़िले की घंटी की आवाज़’, यानी वह आवाज़ जो काफ़िले में चलते वक्त घंटे से आती है, ताकि भूले-भटके मुसाफ़िरों की रहनुमाई हो सके। जो सो रहे हैं, जाग जाएं और कारवां में शामिल होकर सफ़र के लिए तैयार हो जाएं। वैसे “बांगे-दरा” के और भी सांकेतिक या प्रतीकात्मक अर्थ होते हैं जैसे “सोयी हुई क़ौम को जगाने की आवाज़”। “बांग” का मतलब सदा या आवाज़। “दरा” का मतलब है घंटी। यानी कारवां में चलने के लिए गफ़लत की नींद से जगाने वाली आवाज़।

यह अल्लामा इक़बाल का पहला उर्दू शेरी मजमुआ है, जो 3 सितंबर 1924 में प्रकाशित हुआ। रचनाकाल के अनुसार इसके तीन हिस्से हैं। हिस्सा अव्वल/पहले भाग में नज़्मों का हिस्सा ज़ियादा बड़ा है। कुल 59 नज़्में हैं और महज़ 13 गज़लें। हिस्सा दोयम/दूसरे भाग में 24 नज़्में और 7 गज़लें शामिल हैं। हिस्सा सोम/तीसरे भाग में 69 नज़्में और 8 गज़लें और कुछ ज़रीफ़ाना (हास्यपूर्ण, मनो-विनोद) अंदाज़ में नज़्में हैं।

इक़बाल का तराना बांगे-दरा है गोया

इसकी पहली नज़्म ‘हिमालय’ है। प्रस्तावना सर अब्दुल क़ादिर ने लिखी, जो “मख़ज़न” रिसाले (पत्रिका) के मुदीर (संपादक) थे। निहायत विद्वान शख्स थे। उन्होंने इक़बाल से उर्दू में ज़्यादा कलाम कहने की सलाह भी दी है, क्योंकि इससे पहले इक़बाल की फ़ारसी में तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी थीं। इसे तीन हिस्सों में दौर के ऐतबार से तक़सीम किया गया है। पहले दौर का कलाम 1905 तक है, जिसमें संघर्ष, राष्ट्रीयता और प्राकृतिक दृश्य वग़ैरह शामिल हैं। दूसरा दौर 1905 से 1908 तक का है, इसमें यूरोप में निवास के समय का राष्ट्र और समुदाय और रूहानी अनासिर (आध्यात्मिक तत्व) पर कलाम हैं। तीसरा दौर 1908 से इस पुस्तक के प्रकाशन तक का है, जिसमें मिल्लत-ए-इस्लामिया के उतार-चढ़ाव और भविष्य की बेहतरी की तड़प आधारित विषय-वस्तु है।

अल्लामा इक़बाल अपनी शायरी से क़ौम के सोये हुए लोगों को बेदार करना चाहते थे, उन्हें जीवन उद्देश्य याद दिलाने और क़ौम के साथ मिलकर आगे से आगे बढ़ने पर तैयार करना था, जिसका उदगार उन्होंने इस शेर में किया है:

इक़बाल का तराना बांगे-दरा है गोया
होता है जाद-ए-पैमां* फिर कारवां हमारा
*सफ़र के लिए वचनबद्ध

इक़बाल की ज़िंदगी में यह किताब तीन बार प्रकाशित हुई। इस मजमूए में जो भी गज़लें हैं, वह ज़बान, बयान और फ़िक्र के लिहाज़ से निहायत बुलंद और आला हैं। पहले हिस्से में मशहूर नज़्में हैं, जिनमें से चंद उन्वान इस तरह हैं: हिमालय, मिर्ज़ा ग़ालिब, एक मकड़ा और मक्खी, एक पहाड़ और गिलहरी, एक गाय और बकरी, बच्चे की दुआ, माँ का ख़्वाब, परिंदे की फ़रियाद, शमा-ओ-परवाना, इंसान और बज़्म-ए-कुदरत, पैग़ाम सुबह, इश्क़ और मौत, शायर, तराना-ए-हिंदी, जुगनू, हिंदुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत, नया शिवाला, एक परिंदा और जुगनू, बच्चा और शमा वग़ैरह। इसके बाद गज़लियात हैं।

हिस्सा दोयम में मशहूर नज़्में हैं, मुहब्बत, स्वामी राम तीरथ, तलबा अलीगढ़ कॉलेज के नाम, हुस्न-ओ-इश्क़, चाँद और तारे, पैग़ाम इश्क़, अब्दुल क़ादिर के नाम और गज़लियात हैं। हिस्सा सोम में मशहूर नज़्में हैं। बिलाद इस्लामिया, सितारे, फूल का तोहफ़ा अता होने पर, एक हाजी मदीने के रास्ते में, रात और शायर, राम, शमा और शायर, शिकवा, जवाब-ए-शिकवा, नवीद-ए-सुबह, शब-ओ-सितारे, नानक, कुफ़्र व इस्लाम, फूलों की शहज़ादी, मज़हब, शेक्सपियर, हुमायूं, ख़िज़र-ए-राह, तूलू-ए-इस्लाम वग़ैरह के बाद गज़लियात और कुछ ज़रीफ़ाना कलाम हैं।

एक नज़र : डॉ. इक़बाल

डॉक्टर सर अल्लामा मुहम्मद इक़बाल की पैदाइश 9 नवंबर 1877 में हुई थी। वह उर्दू शायरी के स्तंभों में गिने जाते हैं। वह शायर, क़ानूनदान और सियासतदान थे। उर्दू और फ़ारसी में शायरी करते थे। उनका रुजहान तसव्वुफ़ (अध्यात्म) और उम्मत-ए-इस्लाम (मुस्लिम समुदाय) के पुनरुद्धार की तरफ़ था।

पिता का नाम शेख़ नूर मुहम्मद था, जो कश्मीर के सप्रू ब्राह्मणों की नस्ल से थे जिन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था। और वालिदा का नाम इमाम बीबी था। उनके बेटे का नाम डॉक्टर जावेद इक़बाल है।

उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। बीए, डॉक्टर ऑफ़ फ़िलासफ़ी, एमए, एलएलबी आदि। बतौर सियासतदान (राजनीतिज्ञ) और वकील काम करते रहे, इसके अलावा शायरी करते रहे। कई ज़बानें जानते थे जैसे उर्दू, फ़ारसी, अरबी, जर्मन और अंग्रेज़ी आदि।

उनकी उर्दू और फ़ारसी रचनाएं: इल्म-उल-इक़तिसाद, मावरा अल-तबईअत का इर्तक़ा, तजदीद फ़िक्रियात इस्लाम, असरार-ए-ख़ुदी, रमूज़-ए-ख़ुदी, पैग़ाम-ए-मशरिक़, बांगे-दरा, ज़बूर अजम, जावेद नामा, बाल-ए-जिब्रील, ज़र्ब-ए-कलीम, पस चेह बायद करद ऐ अक्वाम शर्क और अरमुग़ान-ए-हिजाज़ वग़ैरह हैं।

तराना-ए-हिंद “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” और “लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी” जैसी सर्वकालिक महान रचनाओं की वजह से उनका नाम हर कोई जानता है। 1922 में अंग्रेज़ी सरकार ने “सर” के ख़िताब से नवाज़ा। 21 अप्रैल 1938 में इंतिक़ाल हुआ। मज़ार लाहौर में शाही मस्जिद के साथ है।

उपाधियां: उन्हें ‘शायर-ए-मशरिक़’ (Poet of the East) और पाकिस्तान का राष्ट्रीय कवि (National Poet of Pakistan) कहा जाता है। हालांकि पाकिस्तान बनने से पहले उनका देहांत हो चुका था।

दर्शन (खुद़ी): इक़बाल ने ‘ख़ुदी’ का सिद्धांत दिया, जो आत्म-साक्षात्कार, आत्मविश्वास और प्रेम के माध्यम से छिपी हुई प्रतिभा को खोजने पर ज़ोर देता है।

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

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