
- March 31, 2026
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उत्तर प्रदेश में अमर शहीदों की धरा पर बलिदान का अपमान हुआ। यह पूरा घटनाक्रम क्या रहा, किस तरह जनभावनाएं भड़कीं और इस पूरे मामले को किस तरह समझा जाना चाहिए? शाहजहांपुर के स्थानीय पत्र लोकपहल के संपादक सुयश सिन्हा का यह लेख एक स्पष्ट समझ देकर ज़रूरी सवाल उठाता है...
क्या यही है देशभक्ति का नया चेहरा?
शाहजहांपुर नगर निगम के बाहर स्थापित काकोरी कांड के अमर शहीदों पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला ख़ां और ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमाओं को सौंदर्यीकरण के नाम पर बुलडोज़र से ढहाये जाने की घटना ने पूरे देश की चेतना को झकझोर कर रख दिया।
यह केवल मूर्तियों का टूटना नहीं था, यह उस आत्मा पर आघात था, जिसने कभी अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला दी थी। ये प्रतिमाएं पत्थर की निर्जीव आकृतियां नहीं थीं, ये उस क्रांतिकारी चेतना की जीवित मशाल थीं, जिसने काकोरी एक्शन के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य को खुली चुनौती दी थी। दशकों से ये स्मारक हर गुज़रते नागरिक को याद दिलाते थे कि आज़ादी केवल शब्द नहीं, बल्कि बलिदानों की अमिट गाथा है।
लेकिन शाहजहांपुर के नगर निगम प्रशासन की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिए कि उसने हमारे अमर शहीदों की स्मृतियों को मलबे में तब्दील कर दिया।
रात के अंधेरे में चली मशीनों ने इतिहास की रोशनी बुझाने का दुस्साहस किया। जिन प्रतिमाओं के समक्ष कभी “इंक़लाब ज़िंदाबाद” के स्वर गूंजते थे, उन्हें मलबे में बदलकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया गया। यह दृश्य केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता के अपमान का प्रतीक बन गया।
इन प्रतिमाओं को खंडित करना केवल एक निर्माण को हटाना नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक स्मृतियों और नयी पीढ़ी की प्रेरणा को चोट पहुंचना है। यहां हर राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति का ज्वार उमड़ता था। शहर में कोई भी नेता हो, अधिकारी हो, सभी इन प्रतिमाओं पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
नगर निगम प्रशासन के इस कृत्य ने जनमानस में आक्रोश फैल गया। लोगों ने इसे “बुलडोज़र संस्कृति” का दुरुपयोग बताया। लोगों का स्पष्ट कहना है “क्या विकास का अर्थ अपने शहीदों की स्मृतियों को रौंद देना है?
इस घटना के बाद शाहजहांपुर की राजनीति गरमा गयी और कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी तथा कुछ सामाजिक संगठनों इस घटना के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। लोगों का कहना था जिस बुलडोज़र का उपयोग अपराधियों की अवैध संपत्तियों पर होना चाहिए, उसे देश के नायकों के स्मारकों पर चला दिया गया।
जनभावनाओं को देखते हुए शासन-प्रशासन बैकफ़ुट पर आया और आनन-फ़ानन में प्रतिमाओं के फिर से लगाने की प्रक्रिया शुरू की गयी ताकि बढ़ते विवाद को शांत किया जा सके। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हस्तक्षेप के बाद प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन कराया गया, परंतु जो आघात जनमानस को लगा, वह इतनी आसानी से मिट सकेगा, इसमें संदेह है।
इतिहास की धड़कन
शाहजहांपुर कोई साधारण नगर नहीं, यह वह पावन धरा है, जहां से क्रांति की चिंगारी भड़की थी। पं. राम प्रसाद बिस्मिल के स्वर “सरफ़रोशी की तमन्ना” और अशफ़ाक उल्ला ख़ां के ‘कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे, आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे…’ तराने क़ौमी एकता की मिसाल आज भी भारत की आत्मा में गूंजती है।
शाहजहांपुर को ‘शहीदों की नगरी’ कहा जाता है, क्योंकि यहां की मिट्टी ने एक साथ बिस्मिल, अशफ़ाक और रोशन सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों को जन्म दिया।
1925 की वह ऐतिहासिक घटना, जब इन वीरों ने अंग्रेज़ी ख़ज़ाना लूटकर क्रांति को गति दी, केवल एक घटना नहीं एक युगांतकारी संदेश था कि ग़ुलामी की ज़ंजीरें अब टूटने वाली हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बिस्मिल, रोशन सिंह और अशफ़ाक की तिकड़ी अदम्य साहस और सांप्रदायिक एकता का प्रतीक है। ये तीनों ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के प्रमुख सदस्य थे, जिनका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को ब्रिटिश हुकूमत से मुक्त कराना था।
9 अगस्त, 1925 को इन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर लखनऊ के पास काकोरी रेल एक्शन को अंजाम दिया, ताकि क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाया जा सके। इस साहसिक घटना ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी।
काकोरी एक्शन के बाद ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीति अपनायी और इन क्रांतिकारियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद, दिसंबर 1927 में बिस्मिल को गोरखपुर, अशफ़ाक को फ़ैज़ाबाद और रोशन सिंह को इलाहाबाद की जेल में फांसी दे दी गयी। फांसी के फंदे को चूमते समय बिस्मिल ने ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ का नारा बुलंद किया, तो अशफ़ाक ने ‘कुछ आरज़ू नहीं है, है आरज़ू तो ये है, रख दे कोई ज़रा-सी ख़ाक-ए-वतन कफ़न में’ कहते हुए फांसी का फंदा चूम लिया और हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की।
कठिन सवाल का समय
हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े निर्देशों के बाद अब इन प्रतिमाओं को फिर ससम्मान स्थापित किया गया है। प्रतिमाएं फिर से स्थापित हो गयीं पर क्या वह सम्मान, वह श्रद्धा, वह भावनात्मक जुड़ाव भी वापस आ पाया? यह घटना आने वाले समय के लिए चेतावनी है कि विकास की अंधी दौड़ में यदि इतिहास को कुचल दिया गया, तो शहर केवल कंक्रीट का ढांचा बनकर रह जाएगा, आत्मा विहीन। एक तीखा प्रश्न, जो गूंजता रहेगा।
“क्या हम उन शहीदों के कर्ज़दार नहीं, जिनकी फांसी ने हमें आज़ादी दी?”
यदि उत्तर “हाँ” है, तो यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई भी बुलडोज़र किसी भी नाम पर हमारी विरासत, हमारी अस्मिता और हमारे शहीदों के सम्मान पर न चले। यह केवल विरोध नहीं, यह राष्ट्र की स्मृति को बचाने का संकल्प है। प्रतिमाओं की वापसी तो हो गयी, लेकिन उनकी अवमानना की कसक शहर के लोगों के मन में हमेशा रहेगी।
शहीदों का अपमान-संवेदनाओं का पतन?
शाहजहांपुर की पावन धरती पर सौन्दर्यीकरण के नाम पर अमर बलिदान का अपमान कर दिया गया। घटना की सूचना मिलते ही जनमानस में आक्रोश की ज्वाला भड़क उठी। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया ने ख़बर प्रमुखता से प्रकाशित की। परिणामस्वरूप इस घटना के विरोध में पूरे देश में विरोध के स्वर गूंजने लगे। यह केवल मूर्तियों का ध्वंस नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, त्याग और बलिदान की उस विरासत पर प्रहार था, जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलायी।

विपक्षी दलों ने इसे अमर शहीदों का घोर अपमान बताते हुए सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने धरना-प्रदर्शन कर प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया। वहीं हनुमान आराधना सेवा समिति के प्रदेश महामंत्री राजेश अवस्थी ने ज़िलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई की मांग की। क्रांतिकारी लेखक सुधीर विद्यार्थी व शहीद अशफ़ाक के प्रपौत्र अशफ़ाक उल्ला ने प्रेसवार्ता कर विरोध जताया। मेयर अर्चना वर्मा ने भी निगम के अधिकारियों को इस घटना को लेकर कठघरे में खड़ा किया।
समाजसेवी नबी सलमान ने तो विरोध का अनूठा तरीक़ा अपनाते हुए ‘समाधि’ लगाकर अपनी पीड़ा व्यक्त की, लेकिन विडंबना रही कि छोटे-छोटे आयोजनों में मोमबत्तियां जलाकर श्रद्धांजलि देने वाले कई तथाकथित समाजसेवी शहीदों का अपमान करने वाली इस बड़ी घटना पर ख़ामोश रहे। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हर मंच से “शहीदों की नगरी” का गौरवगान करने वाले नेताओं की आवाज़ इस मुद्दे पर क्यों थम गयी? क्या राजनीतिक स्वार्थ और निजी निष्ठाएं देशभक्ति से बड़ी हो गयी हैं? सत्ता पक्ष के नेता भी इस घटना पर मौन साधे रहे।
हालांकि, कुछ पार्षदों ने विरोध दर्ज कराया, लेकिन जैसे ही मूर्तियों का पुर्नस्थापन हुआ, नगर निगम की मेयर अर्चना वर्मा सहित तमाम पार्षद माल्यार्पण कर फोटो खिंचाने की होड़ में नज़र आये। मूर्तियों की स्थापना के बाद मोमबत्ती गैंग के लोग भी माला लेकर दौड़ पड़े। जो इस पूरे घटनाक्रम पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
यह घटना केवल शाहजहांपुर की नहीं, बल्कि पूरे देश की संवेदनाओं को झकझोरने वाली है। सवाल यह है कि क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि शहीदों के अपमान पर भी हम चुप्पी साध लें?
यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि देशभक्ति, ज़िम्मेदारी और नैतिकता की कसौटी बन चुकी है, जिसका उत्तर समाज और नेतृत्व, दोनों को देना होगा।
न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन
इतिहासकार डा. विकास खुराना का कहना है ये प्रतिमाएं शाहजहांपुर की सांस्कृतिक और क्रांतिकारी पहचान का अभिन्न हिस्सा रही हैं। उन्होंने बताया 1972 में नगर पालिका परिषद के तत्कालीन चेयरमैन वासुदेव शरण गुप्ता के कार्यकाल में इन तीनों महान क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं स्थापित की गयी थीं। इसके बाद 2003 में महान क्रांतिकारी प्रेम किशन खन्ना की प्रतिमा भी यहां लगायी गयी। ये मूर्तियां शहर के युवाओं के लिए ऊर्जा का केंद्र थीं, जहां हर राष्ट्रीय पर्व या आंदोलन के समय इंक़लाब के नारे गूंजते रहे।
डा. खुराना का कहना है वर्ष 2013 में उच्चतम न्यायालय द्वारा महापुरुषों की मूर्तियों के स्थानांतरण के संदर्भ में व्यापक दिशा-निर्देश दिये गये थे, जिसके आधार पर भिन्न-भिन्न प्रांतों द्वारा नियमावलियां बनायी गयी थीं।
उत्तर प्रदेश में, प्रतिमा अगर ज़मीन के साथ जोड़ी गयी है तो उसे अचल मानते हुए सिविल संहिता से उसका संरक्षण सुनिश्चित किया गया है। अगर कोई प्रतिमा सौ वर्ष से अधिक पुरानी है, तो उसके स्थानांतरण हेतु भारत के पुरातात्विक विभाग की अनापत्ति एवं उसके द्वारा नामित प्रतिनिधि की उपस्थिति में उसका स्थानांतरण किया जाये, स्पष्ट उल्लेख है। जबकि अन्य समयावधि की तथा उन प्रतिमाओं, जिनसे यातायात प्रभावित होता है अथवा कोई धार्मिक महत्व अंतर्निहित है, के संदर्भ में ज़िला प्रशासन को संज्ञान में लिया जाएगा। ज़िलाधिकारी अथवा उसके द्वारा नामित अन्य अधिकारी यह सुश्चित करेंगे कि मूर्ति का अनादर न हो तथा यथासंभव उसे अन्यत्र किसी पार्क अथवा म्यूज़ियम में ससम्मान स्थापित करवाएंगे।
इस संदर्भ में माननीय उच्च न्यायालय में धारा 226 एवं 227 के अंतर्गत रिट का भी प्रावधान है। डा. खुराना का कहना है नगर निगम के अधिकारियों की अनदेखी के चलते न केवल शहीदों का अपमान हुआ बल्कि भारत के उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों के दिशा-निर्देशों में बनी नियमावलियों के उल्लंघन का मामला भी बनता है।

सुयश सिन्हा
वरिष्ठ पत्रकार, लोक पहल समाचार पत्र के संपादक। इससे पूर्व दैनिक जागरण, जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्रों में संवाददाता के रूप में सेवाएं। लगभग 6 वर्षों तक बाल न्यायालय में न्यायिक मजिस्ट्रेट रहते घर-परिवार और मां-बाप से बिछड़े क़रीब 1500 बच्चों को उनके परिजनों तक पहुंचाने में अहम भूमिका का निर्वहन। मीडिया एवं समाजसेवा संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान। संपर्क: 99357 40205।
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