Shashi khare, शशि खरे
प्रकृति जब अपने विराट् रूप में खुलती है, तब दरअसल मन के भीतर के रहस्यों के खुलने की घटना होती है। कथा साहित्य में पहचान बना रहीं शशि खरे की यह कहानी प्रकृति के रूपक से मन के भीतर की खिड़कियां खुलने के कथानक को बुनती है। और यह बुनाई कितनी जादुई है, पढ़ने वाले महसूस करें...
शशि खरे की कलम से....

जादू

             वह दबे पाँव आकर खिड़की पर बैठ गया और बहुत एकाग्र होकर सूर्योदय देखने लगा मानो यह सृष्टि का प्रथम सूर्यागमन हो। समुद्र के पीछे क्षितिज पर सूर्यदेव का भव्य सुनहरा उत्तरीय लहरा रहा था। लहरें मानो सम्मान दे रही हों सो धीरे-धीरे पंँक्तिबद्ध होकर चल रही थीं। रात में लहरें पूरा तट पार कर यहाँ तक आयी होंगी। उनके ख़ूबसूरत लहरीले निशान अभी बाक़ी थे। पूरा सागर तट जैसे एक विशाल चादर हो रुपहली रेत की, उस पर किसी ने मोतियों से कशीदा किया हो।

बड़े-बड़े फूल-पत्ते बिल्कुल वैसे, जैसे यहाँ बिस्तर पर बिछे चादर पर बने हैं। सागर तट पर ये मोतियों के फूल-पत्ते किसने बनाये होंगे?

सूर्यदेव ज़रा और ऊपर आये। पक्षियों के झुंड ने एक विशाल पर वाले परिन्दे के आकार में किनारे के ऊपर चक्कर काटना शुरू किया। दो-तीन गोते लगाकर धीरे-धीरे तट पर बैठ गये और उन मोतियों में से कीड़े निकालकर खाने लगे। वे मोती रेत से निकलने वाले छोटे कीड़ों के बाहर निकलने से बने निशान थे।

वह एकटक देख रहा था। जब खिड़की के पास से कई पक्षी टिटकारते हुए निकलते तो वह चिंहुक जाता। कंधे उचकाकर पंख फड़फड़ाकर आँखे गोल-गोल घुमाकर वह फिर सलाखों के उस पार खुले गगन में उड़ान भरते आज़ाद पंछियों को देखने लगता।

अब उसे कुछ और सूझा शायद प्राकृतिक पुकार का अनुभव हुआ। वह खिड़की से नीचे उतरने लगा। इस कोशिश में बाला के ठीक माथे पर टूथपेस्ट जैसा पच्च से कुछ गिरा। बाला हड़बड़ाकर उठ बैठी, ज़ोर से चिल्लायी- मेरे सिर पर ही मरो तुम.. बेवकूफ़ कहीं के।

जब बाला नहाकर निकली तो पौने छह हो गये थे। बैग उसने रात को ही तैयार कर रखा था। एक-एक कप पानी दो अलग-अलग जगहों पर रखा। अमेरिकन कॉर्न, गाजर, शिमला मिर्च, मटर वग़ैरह रख दिये, मुट्ठी भर सूरजमुखी बीज रखे।

वह पीछे पीछे घूम रहा था।

उसकी तरफ़ मुस्कुराकर देखते हुए कहा, राधे-राधे कहो मिट्ठू। चाय बन जायेगी तो पिला दूँगी। अभी तुम खिड़की में जाकर बैठो, मुझे कमरा ठीक करने दो, जाओ परदे पर लटक जाओ।

बाला ग्यारह बजे तक पूना पहुँच गयी थी। बस स्टॉप पर ही नीरज मिल गया, बाइक लेकर उसी की प्रतीक्षा में था। नीरज और बाला एक बहुत बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं, दोनों सिविल इंजीनियर हैं। बाला जब नौकरी छोड़कर जाने का विचार बना रही थी, तभी नीरज ने वहाँ काम करना शुरू किया था।

नीरज ने उसे रोकते हुए कहा था- हर साल नौकरी बदल देती हो। न्यूज़पेपर में भी काम किया, एस्सैल वर्ल्ड में भी। एडवेंचर ट्रिप आयोजित करने वाले ग्रुप में भी रह लिया है न?
क्यों भटकती हो इतना?

–हाँआँ.. पर वो ज़रूरत के लायक़ सैलरी दे नहीं पा रहे थे। न्यूज़पेपर और मैगज़ीन, प्रकाशन वाले बहुत कम पैसा देते हैं। एस्सैल और एडवेंचर मेरी पसंद का काम नहीं था इसलिए। काफ़ी पैसा होने पर भी छोड़ दिया।

फिर अपनी डिग्री के अनुसार आ गयी हूं पर बिल्डर लोग, कंस्ट्रक्शन वर्क संसार के सबसे पापी काम हैं, किसी भी प्रकार के माफ़िया जैसे।

— ऐसा क्यों?
— नीरज ये बिल्डर एक प्रकार से सुपारी लेते हैं, ज़मीन के किसी हिस्से की चाहे वहाँ सैकड़ों वृक्ष तने खड़े हों, चाहे बीती किसी विशेष घटना की यादें हों।
— हूुं। बात तो सही है पर क्या करोगी? किस-किस से भागोगी? एक काम करो चाँद पर चली जाओ।
— उन सबको आग न लगा दूँ, जो मेरी दुनिया को बर्बाद कर रहे हैं।
— अच्छा। आज की बात करो आज क्या करना है?
— वैसे नीरज तुम क्या करते हो बोरियत मिटाने को?
— यह किस चिड़िया का नाम है? पल भर की ज़िंदगी है, समय कहांँ है? मैं अपने ढंग से भी जीता हूँ और जो विरासत में मिला, उस परंपरा का भी आनंद लेता हूँ। सबमें आनंद है, प्रत्येक घटना में आनंद है, छोटी से छोटी बात में सुख है। अभी की बात सुनो, आई ने पूछा कहाँ जा रहा है? जाने से पहले चाय बनाकर देता जा। आई-बाबा के लिए चाय बनायी, जानबूझकर शक्कर बहुत कम डाली, दोनों बहुत बड़बड़ाये। आई बोली अब इस बात का बदला लूँगी, अब बाल्टी में जो धुले कपड़े हैं उन्हें फैलाकर जा। कपड़े झटकारने में बारिश की बूँदों जैसा मज़ा आया, बस फिर तुम्हें लेने चला आया।

बाला सुनती रही हैरानी से– मैं कहीं जाने वाली हूँ और कोई टोक दे तो चिढ़ जाती हूँ।

बरगद के पुराने-मंझोले-नये हर प्रकार के पेड़ों का कुनबा कई एकड़ भूमि पर पसरा हुआ था- पीपल, जामुन, आम, सोनचाफा, पलाश, नीम और कचनार सभी भाई बन्धुओं के साथ। बहुत से पुराने वृक्ष अपनी जड़ों को ज़मीन के ऊपर इस तरह मोड़ कर खड़े हैं मानो बहुत-से‌ बूढ़े घुटने मोड़े धूप ताप रहे हों। नरम-पतली शाख़ें पत्तों के लिए घुड़सवारी का काम करती मालूम देती हैं। हवा के झौंकों के संग जब वे डोलतीं तो सारे पत्ते खी-खी खिलखिल कर हंँस पड़ते। पतली-पतली सड़कें कहीं ईंटों को जमाकर कहीं डामर डालकर बनायी गयी हैं। इन नाज़ुक रास्तों के दोनों किनारों पर वृक्ष पंँक्तिबद्ध होकर एक-दूसरे का हाथ थामकर खड़े हुए हैं।

किसी का आश्रम है क्या? अनहद नाद-सा यहाँ के सन्नाटे में गूँज रहा है। बाला ने पूछते हुए बैग पटका।

हाथों को फैलाकर दो-तीन फिरकी ली, फिर किलकारी के साथ बोली, इतनी सुंदर जगह शहर के मध्य में है और मुझे पता भी नहीं। नीरज बोला, मैं हमेशा ही सबसे अलग शान्त-एकांत स्थानों पर अपनी छुट्टियों का आनंद लेता हूँ। गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात के बहुत सारे गाँव इसी चक्कर में घूमे हैं। या तो अपने खानदान के साथ सबके बीच में रहता हूंँ या इसी तरह एकांत में। पहली बार कोई मिला है, जो मेरी तरह के शौक़ रखता है यानी तुम।

बाला लगातार यहाँ-वहाँ चलकर किसी पेड़ से लिपट सिर टिका लेती और चलते-फिरते गिट्टी को पैर से उछालने का मज़ा ले रही थी। अबकी बार गिट्टी ज़ोर से उछली और सामने से आ रही एक लड़की की साइकिल से टकरायी। लड़की साइकिल से उतर पड़ी। बाला घबरा गयी, लगता है चोट लगी है। पास जाकर बोली- साॅरी। लड़की बोली, अरे आप खेलो, मैं तो यहाँ लैंडस्केप बनाने आयी हूँ। उसने इत्मीनान से साइकिल टिकायी, दो पेड़ों के बीच में ईजल खड़ा किया और पेंटिंग शुरू कर दी।

बाला हैरान रह गयी। सारे कलाकार ऐसी जगह खोजकर रखते हैं। बोली, ‘मैं बाला ठाणे में रहती हूँ, ये नीरज अंधेरी में रहते हैं, हम एक ही कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं, आज यहाँ घूमने आये हैं।

मैं सुहाना आप्टे, फ़ाइन आर्ट्स स्टूडेंट, बिल्कुल पास में रहती हूँ, वो जो पुराने बंगले दिखायी दे रहे हैं। आपको पेंटिंग पसंद है?

बाला ज़ोर से उछली खुशी से, अरे वाह, आप नहीं तुम, मुझे भी बनाने देना न। नीरज एक फलवाले को बुलाकर लाया था। बाला बोली, पद्मश्री देने लायक़ काम किया है तुमने। मैं भूख से बस मरने ही वाली थी।

क्यों सुबह के नाश्ते का क्या हुआ?

-अरे यार! सुबह-सुबह उस हीरामन ने काम बढ़ा दिया… उस बेहूदा जानवर ने मेरे माथे पर बीट कर दी, बाल धोने में टाइम लग गया। नीरज हँस-हँस कर दुहरा हो रहा था, सुहाना ने पूछा हीरामन कौन?

-नीरज बोला मिट्ठू है इसका, बिगड़ैल मिट्ठू। बाला ने सुहाना को बताया उसे पिंजरे में नहीं रखा कभी। पूरा घर उसका है। सुबह मुझे जगाने आ जाता है। आज ख़ूब डाँटा मैंने उसको। जाऊँगी तो मनाऊँगी- अहा हीरामन क्या चाल है आपकी, कैटवॉक करते हो।
नीरज बोला, कोई नहीं शुतुरमुर्ग दिखता है।

बाला को ब्रश पकड़ाते हुए सुहाना बोली, अब तुम हाथ आज़माओ और मैं फलों पर हाथ आज़माती हूँ।

बाला ने ब्रश हाथ में लिया और बोली कैसे बनाऊँ इस दूसरी दुनिया के दृश्य, यहाँ का अद्भुत सौंदर्य देखकर आँखें, मन सब स्तब्ध रह गया है। सुहाना बोली, मैं यहाँ आती रहती हूँ। तुम्हें पहली बार लेकिन नीरज को कई बार देखा है। यहाँ इन संकरी पगडंडियों पर, किसी पेड़ के नीचे किताब पढ़ते हुए।

नीरज बोला- हाँ मैं जीवन का भरपूर स्वाद लेना चाहता हूँ। ख़ुद को भी समय देना चाहता हूंँ। जब जीवन की साँझ आये तो ये न अफ़सोस हो कि आफ़िस में, ट्रैफ़िक में और न जाने किस-किस में समय निकल गया, मैंने तो कुछ देखा ही नहीं। उस छुपे रुस्तम ने क्या-क्या बनाया है। ईश्वर ने हमारे लिए क्या ख़ज़ाना भरा है, यह देखने प्रकृति की शरण में आता हूँ।

— ओ गौतम बुद्ध!! मेरा चित्र देखो, कैसा बना है? देखने से अच्छा है मैं दो घंटे ट्रैफ़िक में फंसा रहूँ।

वह दोनों हाथों में फैलाकर लिये हुए प्रदर्शित कर रही थी। दोनों ने देखा सचमुच अच्छा था। सुहाना ने पूछा– सीखा है यह भी?

बाला बोली, नहीं, छुट्टी के दिन यही करती हूंँ, कभी साइकिलिंग के लिए कभी रिवर-राफ्टिंग के लिए चली जाती हूँ पर सबसे थक चुकी हूँ। क्या करूँ! छुट्टी के दिन यही करती हूँ।

दोनों हाथों में वह चित्र को झुला ही रही थी कि एक गेंद आकर सीधे चित्र में लगी और वह नीचे गिर गया। नीरज ने हँसते हुए कहा, इन बच्चों से अच्छा-सच्चा समीक्षक कोई नहीं। लेकिन बच्चे साॅरी बोल रहे थे। बाला बोली, कोई बात नहीं पर क्रिकेट तो हम लोग भी खेलेंगे।

तुरंत दो पार्टी बन गयीं। प्रत्येक बॉल पर, प्रत्येक रन पर चीखें गूँजतीं। घास में, झाड़ियों में, विशाल वृक्ष दादाओं के धरती पर पसरी पड़ी जटाओं और भूमि फोड़कर बाहर आयी जड़ों के बीच गेंद को ढूँढने में इतना कोलाहल मचा कि ऊपर फैले घनेरे पत्तों से नीला आसमान झांकने लगा। बैट वाले बच्चे ने नीरज को झकझोरते हुए अपनी छोटी वाली अंगुली दिखायी…

–क्या हुआ चोट लगी है?
–बाला बोली- नीरज उसे वॉशरूम जाना है।

सुहाना हँसने लगी। दो-तीन बच्चे भी साथ हो लिये, हम भी।

बाक़ी तीन बच्चों को भूख लगी थी। नीरज बोला, ठीक है सब घर जाओ। सुहाना बोली, और तुम दोनों? चलो मेरे घर, आई खाना बना देगी। नीरज बोला, नहीं आज तो नगर जीवन का पूर्ण बहिष्कार। यहीं कुछ ढूँढते हैं।

— सुहाना! तुम हॉस्टल में रहती हो या कमरा किराये पर?
— नको बाबा, मैं अपने पूरे बड़े परिवार सहित रहती हूँ। यहाँ कई पीढ़ियों से, अभी आई, बाबा, ताई, आजी-आजोबा, दो छोटे भाई, हम सब एक साथ रहते हैं। पुराना बंगला है, यह पुणे का कैंट एरिया कहलाता है। यहाँ चारों तरफ़ तुम देख रही हो ना, अंग्रेज़ों के समय के बंगले बने हुए हैं। यह वृक्षों का घना जंगल भी बहुत पुराना है।

और तुम?

मैं तो एक कमरा किचन वाले 300′ स्क्वायर फ़ीट के घर में किराये से रहती हूँ। राजस्थान में है मेरे परिवार के लोग, घर, रिश्तेदार।

— उसे क्यों छोड़ दिया? वह तो बड़ा सुंदर और रंगीला देश है।

— हाँ है, लेकिन वहाँ इतना पैसा नहीं मिल रहा था। ऊपर से बहुत बंधन।

— उफ़ बुरा लगता होगा ना अकेले?

— नहीं मुझे ऐसे ही अच्छा लगता है। समय बचता कहाँ है कुछ अच्छा-बुरा महसूस करने के लिए, यहाँ तो बस भागते रहो लगातार।

चलते-चलते नीरज ठिठका और बोला, सुहाना ये अकेली नहीं है वो है ना इसका साथी हीरामन तोता। इसे यही अच्छा लगता है, न मम्मी की चें-चें, न पापा का आँखें दिखाऊ कार्यक्रम। न छोटे भाई-बहन से कुछ हिस्साबाँट। जो है सब पूरा इसका… है ना?

बाला को अच्छा नहीं लगा। रूखे स्वर में बोली तुम क्या जानो, लड़कियों पर फ़िज़ूल की कितनी पाबंदी होती है, पढ़ने की, नौकरी करने की तो आज़ादी हो, मैं समझती हूंँ आज़ादी का कहाँ दुरपयोग होगा। अपना जीवन अपने ढंग से जीना चाहती हूँ, इसमें ग़लत क्या है? तुम भी तो एकांत खोजते आते हो, हर हफ़्ते घर से भागकर। मैंने बिंदास बोल दिया। तुम शरमाते हो, झिझकते हो पर मन ही मन कुढ़ते हो तभी तो गाँव जंगल पहाड़ सब तरफ़ भागते हो…

— नीरज ने उसे ध्यान से देखते हुए कहा- तुमी कशा करता, तुम्हाला ठाउक आहे का? तुम्हें मैं ऐसा दिखता हूँ तो चश्मा बदल लो। मेरा परिवार बैलैन्स्ड है। हम सब एक-दूसरे के पूरक और मददगार बनकर रहते हैं। आई-बाबा, भाऊ-वहिनी, ताई‌ आणि मी, सभी। बहुत सुखी हूँ। एकांत ढूँढता हूँ आफ़िस और साइट के आठ दिन के कोलाहल से आराम पाने के लिए। सामाजिक प्राणी हूँ। अकेलेपन की कल्पना भी नहीं कर सकता। जिस तरह परिवार से प्यार है उसी तरह प्यार है प्रकृति से, जिसे ज़िंदा रहने के लिए इंसान ने कहीं जगह नहीं छोड़ी, उसी प्रकृति के टुकड़े ढूँढता हूँ। शायद कुछ टुकड़े जोड़ पाऊँ।

बाला ने पास आकर कहा, साॅरी..।

टहलते हुए तीनों एक बिल्कुल सुनसान हिस्से में आ गये। पाँच-छह पेड़ों का एक-दूसरे से जुड़े हुए विशाल वृक्ष परिवार बन गया था। मोटे-मोटे तने, सटे हुए, जिधर जगह मिली उधर झुके, बढ़े, फैले हुए। दो तने सटकर चौड़ा पलंग-सा बना हुआ था। देखते ही मन में विचार आता है लपककर चढ़ जाओ, टाँगें लटकाकर बैठ जाओ, हाथों का सिरहाना बना कर लेट जाओ, शाखों पर लटककर झूलो।

सामने किन्तु दूर वर्षों से बंद एक बंगले के अहाते में एक पति-पत्नी, ईंटों का चूल्हा जलाकर रोटी बना रहे थे। धरती पर घोर हरियाले और ऊपर नीले आसमान के बीच यह पीली लपटें बहुत सुंदर लग रही थीं। ये तीनों भी गेट फाँदकर अंदर पहुँच गये। दो-दो रोटियाँ हमें भी बनाकर दे दो। तुम चाहो तो ये लड़कियांँ बना देंगी।

हाँ-हाँ दोनों उत्साह से बोलीं। वे लोग फिर भी चुप रहे तब नीरज बोला- आटा ख़त्म हो जाएगा, इसकी चिंता मत करो। ये दो सौ रुपये रखो और ख़रीद लेना।

मज़दूर बोला, अच्छा ठीक है आप लोग वहीं पेड़ के नीचे जाकर बैठो।

उस वट निवास में तीनों ने अपनी-अपनी पोज़ीशन ले ली। एक मोटी शाखा के दोनों तरफ़ पैर झुलाकर सुहाना और नीरज आमने-सामने बैठे थे। कुछ देर एक गीत गुनगुनाने के बाद नीरज ने आवाज़ लगायी- कुछ बोलो, चपड़-चपड़! हीरामन की याद आ रही है क्या? बाला बोली, इतना सुख इतना आनंद इस जनम में पहले कब मिला था, याद कर रही हूँ। और सुहाना तुम्हें घर पर कुछ कहना नहीं है?

— दो बार फ़ोन कर पूरा विवरण दे चुकी हूँ। घर पर सब मुझे समझते हैं। तुम दोनों के फ़ोटो भी भेज चुकी हूंँ क्रिकेट वाले बच्चों के भी।

— वाओ समझदार हो, ज्ञानी हो, मासूम बच्ची के भेष में शैतान की नानी निकली। ये लो हमारा स्पेशल भोजन गर्मागर्म आ गया। इसकी तस्वीर भी भेज दो नहीं तो आई और आजी फ़िक्र करेंगी कि बच्ची जाने किसके चंगुल में भूखी है।

सुहाना ने कहा यहाँ तक पहुँचने पर भी मैंने नहीं सोचा था कि आज का दिन इतना ख़ास होगा। सबसे अलग.. बहुत-बहुत आनंद है। दो नये दोस्त जैसे बहुत पुराने हों।

— ठीक कहती हो, अब मैं इस पलंग जैसे चौड़े पेड़ पर एक झपकी लेने वाली हूँ।

नीरज बोला– ओ छोटू! तुझे चील कब उठाकर ले गयी हम-दोनों जान भी न पाएंगे। सोना मत।

नीरज और सुहाना ने भी सुविधाजनक शाखों पर आसन जमाया किन्तु तब तक बच्चे फिर आ गये- भैया चलो क्रिकेट खेलें? भैया, दीदी वहाँ एक जादू वाले भैया बैठे हैं, बहुत सुंदर हैं राजकुमार जैसे। वे भी यहाँ आते रहते हैं। आप बोलेंगे तो जादू दिखाएंँगे।

बाला ने ज़रा देर की झपकी ले ली। आँख खुली तो सुहाना को सामने देखकर बोली, इतनी शांति क्यों है? अपना गब्बर कहाँ गया?

— जादूगर को लेने गया है।
— हें.. बाला उठकर बैठ गयी, वह मुझे ग़ायब करवाकर ही मानेगा। बहुत दिनों से मुझे भेड़ बनाने की फ़िराक में है।

सुहाना हँसने लगी और दोनों का ध्यान गया सामने आते हुए झुंड में एकदम अलग दिखायी देते जादूगर पर। लगभग सत्ताइस-अट्ठाइस वर्षीय बहुत संपन्न घराने का लगने वाला सुदर्शन युवक।

यह जादूगर है? दोनों सोच रही थीं। नीरज ने सबको बिठाया और काल्पनिक माइक संँभालते हुए जादूगर, बाला, सुहाना और सभी बच्चों का परिचय एक-दूसरे से करवाया। जादूगर ने वृक्ष के विशाल तने को अपना मंच बनाया उस पर अपना सामान रखा। बैग में से सुनहरे दस्ताने और गुलाबी साफ़ा निकालकर पहन लिया। अब वह सचमुच राजकुमार लग रहा था।

— मैं जादूगर आनंद। मुंबई में घर है पर अकेला हूँ दुनिया में। एक स्कूल में जादू दिखाने जा रहा हूँ। जब भी पूना आता हूँ, इस स्थान पर अवश्य आता हूँ। स्कूलों में, कालेज या किसी संस्थान से जब बुलावा आता है वहाँ अपना शो करता हूँ।

परन्तु पाँच छोटे बच्चे और तीन थोड़े बड़े, इतने कम दर्शकों के सामने जंगल में जादू कभी नहीं दिखाया। आज यह भी सही। सबसे बड़ा जादूगर वक़्त होता है, वह कब किस घड़ी क्या दिखा दे, किसी को पता नहीं।

जादूगर ने ताश के पत्ते बिछाये। उन पर कंचे और फूल रखे फिर एक बच्चे को बुलाया, कहा- अपनी पसंद से एक उठा लो, जैसे ही एक बच्चे ने कंचा उठाया वह एक चॉकलेट बन गया, जादूगर आनंद बोला- विशेष, विशेष नाम है तुम्हारा।

फिर उसने एक-एक कर सभी बच्चों को इसी तरह बुलाकर कंचे को चॉकलेट में बदलकर दिया। जादूगर आनंद हँसते हुए बोला- अब आप तीनों के नाम भी बताऊँ। सुहाना खिलखिलाकर हँसी। बाला बोली- नीरज ने पहले ही सबके नाम बता दिये हैं। सचमुच कोई जादू दिखाइए ना, आज जादू देखने की इच्छा जाग गयी है।

जादूगर ने पेड़ के पीछे खड़े होकर अपना थैला खोला। उसमें से एक ख़ाली डिब्बा निकालकर सबको दिखाया, वह पूरी तरह से ख़ाली था। अब उसने उसमें से गुलदस्ता, रबर का हाथी, मोतियों का हार, एक चिड़िया, एक किताब, रूमाल वग़ैरह निकाले। अब देखो बच्चो! डिब्बा ख़ाली और थैला भी खाली है। मेरे पास कुछ नहीं है उसने अपनी तलाशी दी…

सबने माना अब उसके पास कुछ नहीं है। पलक झपकते ही उसने थैले में से एक बाँसुरी निकाली, लाल रंग की सुनहरी पट्टियों वाली और उसे हिलाकर दिखाया, सबने फिर तालियाँ बजायीं। जादूगर ने उसे होंठों से लगा लिया और बजाने लगा।

धीरे-धीरे सब पर मोहनी छा गयी। यह बाँसुरी उसे पापा ने दी थी, जब वह अनिच्छा से आस्ट्रेलिया जा रहा था पढ़ाई करने के लिए। दो महीने ही बीते थे कि भैया की आवाज़ में पापा की मौत की ख़बर ने उसे घोर अन्धकार में फेंक दिया था। काश कोई जादू होता और पहले वाला समय लौट आता। काश कोई ऐसा जादू होता कि भैया का कठोर भावहीन चेहरा बदल पाता, जब उन्होंने कहा था कि पापा सारा व्यापार उनके नाम कर गये हैं, तुम्हारे लिए बस एक फ़्लैट है। काश किसी जादू से भैया मेरे गले में ही घुट गये शब्द सुन लेते, जब मैं कह रहा था सब ले लो भैया, पर मुझे अकेला मत छोड़ो।
हर पल जादू ही तो होता रहता है जीवन में…

जादूगर कालचक्र अपने झोले में से अब क्या निकालेगा, हमें क्या पता..!

नीरज बांसुरी के सम्मोहन से स्वयं को बचा न सका। आँखें बंद करते ही उसे मयूशा की झलक दिखी, आसमानी साड़ी में अप्सरा जैसी। नीरज के गले से झूलते हुए कहा था, प्यार तो करती हूँ तुमसे, बहुत प्यार करती हूँ पर बाबा ने अरबपति ढूँढ लिया है। उसका वह घर था, जिसे मैं सेवन स्टार होटल समझी थी। समुद्र में उसकी जेटी चलती हैं… नीरज का मन डांवाडोल हो गया है। आई-बाबा का विरोध कर तुमसे शादी करके कहीं ज़िंदगी भर तुम्हें ताने देती रही तो? वह तो तुम्हें दुख देना हुआ। मैं तुम्हें इतना-सा भी दुख नहीं दूँगी, सच्चा प्यार करती हूँ तुमसे।

नीरज जब भी उसे याद करता है, मन ही मन पूछता है मयूशा तुमने स्वयं निर्णय लिया था। मुझे छोड़कर उस अरबपति से विवाह का, फिर उस भव्य ख़ूबसूरत चलती जेटी से सागर में कूदकर जान क्यों दी?

बांसुरी की मोहनी पलकें खुलने नहीं दे रही थी। सुहाना को लगा धरती से अनेक रंग उड़-उड़ कर आसमान तक फैल गये हैं। उन रंगों से फूल बने, तितलियांँ बनीं, मीठे स्वर वाले पंछी बने और एक ऐसा स्वर्गिक इन्द्रधनुष, जिसे पहले नहीं देखा था, सृष्टि कितनी सुंदर है।

बाँसुरी के जादू में बाला एक अति सुंदर अंतहीन रास्ते पर चलती जा रही थी। आकाश धू्म्र धुंआरा था पर बादल रुपहले, साथ-साथ चल रहा था चाँद, मोती बरस रहे थे पर जैसे ही वह बटोरने का जतन करती सब कुछ ग़ायब हो जाता।

इन्द्रधनुष भी दूर दिखायी देता है, बाँसुरी की चुंबकीय टेर पर वह खिंची जा रही थी। दूर से आती हुई जादूगर आनंद की मखमली आवाज़ ने सबको जगाया- घड़ी देखिए, कितना समय बीता है। सुहाना बोली बहुत सुकून मिल रहा था, आधा घंटा तो बीत गया होगा।
आनंद हँसकर बोला- नहीं, केवल दो मिनट हुए हैं। और अब आज एक विशेष जादू केवल आप लोगों के लिए तैयार हो जाइए।

इस पेड़ के पीछे से ऊपर उठती हुई एक परी दिखेगी। जैसे ही मैं कहूँगा- एक, आँखें बंद कर लेना फिर जैसे ही कहूँगा- दो, मन को हर ओर से समेटकर सन्नाटे में डूब जाना, जैसे ही कहूँगा- तीन, आंखें खोलना पर हिलना-डुलना मत, साँस भी रोक लेना, बस उस परी से कुछ माँग लेना मन ही मन।

सचमुच सब साँस रोक कर बैठ गये। भुवन भास्कर दूसरी ओर जा रहे थे। वृक्षों की बस्ती में अंधेरा-सा हो रहा था, चारों तरफ़ मौन पसर गया था। जादूगर आनंद की प्रभावशाली आवाज़ गूँजी- एक.. दो.. तीन..! किसी ने उत्सुकता से, किसी ने डरते-डरते, किसी ने अविश्वास से आँखें खोलीं वटवृक्ष के विशाल तने के उस पार एक आसमानी परी की धुँधली सी छवि दिखायी दी, सरसराहट हुई… धीरे-धीरे वह ऊपर आकाश में खो गयी। जादूगर ने चुटकी बजाकर कहा तो?

माँगा कुछ?

बाला उदास थी, मुझे कुछ समझ नहीं आया कि मुझे क्या चाहिए।
नीरज शांत था- मुझे कुछ नहीं चाहिए।
सुहाना हँस पड़ी।

आज की सभा समाप्त। बच्चे चले गये।
सुहाना ने अपनी साइकिल सँभाली।
बाला बोली- नीरज साढ़े चार बज गये हैं, मुझे घर पहुँचने में आठ-नौ बजेंगे तो अब चलें?

Shashi khare, शशि खरे

शशि खरे

ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।

2 comments on “जादू

  1. शशि जी की कहानी एक मायाजाल-सा बुनती हैं।
    कहानी के पात्रों की मानिंद हम सब भी कहीं न कहीं अपनी तलाश में हैं। एकाकीपन में स्वयं को खोजना कहानी का मूल तत्त्व है।
    जादूगर की, नीरज की पीड़ाएँ पाठकों का मन अनायास द्रवित करेंगी।
    बाकी भागती-दौड़ती दुनिया में सुकून के पल ऐसे ही लोगों को मयस्सर होंगे।
    बेहद साधुवाद

    ब्रजेश शर्मा
    झाँसी
    7307503275

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