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'गूंज बाक़ी' में एक यादगार संस्मरण, सौजन्य-प्रस्तुति: विवेक मेहता....

जैनेंद्र-ओशो की मुलाक़ात : चूहा-बिल्ली का खेल

             जैनेंद्र कुमार और रजनीश दो अलग-अलग व्यक्तित्व। अलग-अलग छोर पर। एक दार्शनिक साहित्यकार तो दूसरा दार्शनिक भगवान। एक अंतर्मुखी तो दूसरा बहिर्मुखी। दोनों के अपने-अपने चाहने वाले। कोई समानता दिखती नहीं। एक गांधीवादी, जैन धर्म से प्रभावित तो दूसरा गांधीवाद और धर्मों का कटु आलोचक- इन सबको उखाड़कर अपने आप को स्थापित करता हुआ। एक इंद्रियों को जीतकर जैनेंद्र बनना चाहता तो दूसरा इंद्रियों को मुक्त छोड़कर, तृप्त कर शांति पाने की बात करने वाला। एक ने ‘काम, प्रेम और परिवार’ लिखी तो दूसरे ने ‘संभोग से समाधि’ का रास्ता दिखलाया।

कुछ समानता खोजने की कोशिश करें तो- एक आनंदीलाल से जैनेंद्र बना तो दूसरा चंद्रमोहन से रजनीश/ओशो। दोनों ही जैन। दोनों ही लीक से हटकर चले। एक ने प्रेमचंद की परंपराओं को तोड़कर अलग तरह की कहानी लिखी। घटनाओं के बजाय पात्रों की मनोदशा और मनोविश्लेषण को महत्व दिया तो दूसरे ने धर्म की परंपरागत सोच पर हथौड़ा मारकर, भीड़ के मनोविज्ञान को समझा और प्रभाव पैदा किया।

दोनों की उम्र में 25-26 साल का अंतर। यानी एक पीढ़ी का। जेनरेशन गैप तो होना ही था। ऐसे समय में जब एक अपनी ऊंचाइयों को छू चुका था, उसका स्थान लेने के लिए कई लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, तो दूसरे को चोटी दिखलायी पड़ रही थी। उसे अभी विलियम जेम्स की कविता ‘ओशनिक एक्सपीरियंस’ से प्रभावित होकर, ‘सागर से एक हो जाने का अनुभव रखने वाला’ – ओशो बनना था। इन परिस्थितियों में दोनों की फिर से मुलाक़ात होती है। यह दो महान हस्तियों की सामान्य मुलाक़ात तो नहीं हो सकती। इसमें दांव-पेंच खेले ही जाना थे। उस मुलाक़ात का वर्णन ‘सारिका’ के 1989 के अंक में जैनेंद्र कुमार के अतिनिकट (शायद बेटे) अरविंद कुमार ने प्रभावी ढंग से किया था। आप भी शब्दशः पढ़िए और उस खेल का आनन्द लीजिए-

जैनेंद्र और रजनीश की यादगार मुलाक़ात

प्रतीक्षा करते-करते हमें साढ़े नौ बज गये थे। बाबूजी (जैनेंद्र कुमार) के चेहरे पर प्रतीक्षाजन्य अरुचि उभरने लगी थी। तभी भीतर से संदेश आया कि भगवान जैनेंद्र जी से मिलने को बहुत उत्सुक थे पर पूजा में है, वहीं से उन्होंने कह‌लवाया है कि तब तक हम लोग उनके निजी कक्ष में विराजें।

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यह जैनेंद्र जी की प्रतिष्ठा के अनुकू‌ल ही था। उनके चेहरे की अरुचि प्रसन्नता में बदल गयी। मुझे इंदरराज आनंद याद आ गये- इसी तकनीक का एक और रूप। पहले चोट बाद में मरहम।

हम भीतरी कक्ष में पहुंचे। यहां केवल गिने-चुने लोग ही जा सकते हैं। एक तीर से दो शिकार- यहां बुलाये जाने वालों को उनका महत्व बताने के साथ-साथ यह अनुभूति कि भगवान तुमसे बहुत बड़े हैं और यहां बुलाकर तुम पर एहसान कर रहे हैं।

एक कोने में अत्यंत उच्च मध्यमवर्ग के लोगों के घर जैसा पलंग बिछा था। दूसरे कोने में बाहर झांकने वाली खिड़की के साथ छोटी लेकिन शानदार राइटिंग टेबल थी। उसके सामने अफ़सरों जैसी महंगी घूमने वाली कुर्सी थी। खिड़की पर वेनेशियन चिक पड़ी थी, जो इस समय बंद थी।

हर चीज़ सुंदर, सुरुचिपूर्ण, सादी और महंगी।

मेज़ से सटा हुआ बड़ा सोफ़ा था। हमें वहां बैठा दिया गया। प्रवेश द्वार हमारे दाहिने हाथ पर था। थोड़ी देर और इंतज़ार करवा के भगवान ने उधर से प्रवेश किया।

बात रजनीश ने शुरू की। आरंभिक उपचार की बातें, बाबूजी की साहित्यिक प्रतिष्ठा के महात्म्य का वर्णन।

जैनेन्द्र जी और रजनीश के आपसी संबंध और परस्पर स्तर अभी तक अनिर्णीत थे। बाबूजी ने आधा-सा उठकर उनका स्वागत किया। वह तय नहीं कर पाये मालूम पड़ते थे कि दोनों में कौन बड़ा है।

मैं भांप रहा था कि व्यक्तियों का मैच अब शुरू होने वाला है। पहली ही मुलाक़ात में, पहली ही प्रतिक्रिया में भावी संबधों की नींव रखी जाती है। रजनीश ने उन्हें कुछ देर अनिश्चय में लटके रहने दिया। फिर मेज़ के सामने वाली कुर्सी में धंसते हुए संकेत-सा किया। जिसका अर्थ था कि बाबूजी भी आराम से बैठ जायें।

पहली टक्कर में कोई नहीं हारा लेकिन बाबूजी थोड़े घाटे में रहे मालूम पड़े।

खिड़की रजनीश के उस तरफ पड़ती थी। उन्होंने वेनेशियन चिक को खोल दिया। अंधकार और प्रकाश की धारियों ने पृष्ठभूमि को इतना चमका दिया कि हमारे लिए रजनीश के चेहरे को पढ़ पाना असंभव हो गया। जबकि हमारे चेहरे पूरी तरह प्रकाशित हो गये।

इस गतिविधि का एक और मानसिक प्रभाव हुआ। बाबूजी को बात आरंभ करने से पहले रजनीश का इंतज़ार करना पड़ा। बाबूजी ने उस पुरानी मुलाक़ात की चर्चा की। रजनीश ने ऐसा दिखाया जैसे शुरू में उन्हें याद ही न आ रहा हो कि एक अकिंचन की हैसियत से वे प्रतिष्ठित जैनेंद्र में मिलने गये थे। हालांकि उन्हें वह मुलाक़ात सब-सब याद रही होगी। बाबूजी को याद न रहती तो आश्चर्य की बात न होती। फिर दिखाया कि जैसे उन्हें सब याद आ रहा हो।

एक बार फिर एक व्यक्ति की भाषा की प्रांजलता, आधुनिक कविता की-सी उपमा शैली और भावों के चित्रीकरण की सामर्थ्य ने मुझे मुग्ध कर दिया। उसने कहा कि (बाबूजी द्वारा उस पिछली मुलाक़ात के व्यक्ति से) याद मस्तिष्क के दरवाज़े तक आयी, भीतर आने से पहले ठिठकी, फिर उसने किवाड़ों पर दस्तक दी और एक-दम कमरे को प्रकाशित करती भीतर चली गयी।

फिर इधर-उधर की बातें।

मुझे लगा कि बाबूजी किसी ऐसी ओपनिंग की तलाश में हैं जो एक बार रजनीश को अपोलोजेटिक बना दे, उन्हें एक्सप्लेन करने पर मजबूर कर दे।

फिर लगा कि उन्हें वह ओपनिंग मिल ही गयी। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध जैनेंद्री शैली में, अर्ध आलोचना के लहजे में कहा, “पढ़ा अभी कहीं कि आपने दावा किया है अपने किसी पूर्वजन्म के बारे में जानने का। यह कि आठवीं शताब्दी में कान्यकुब्ज में (शायद यही नाम लिया था उन्होंने) एक ब्राह्मण-परिवार में आपका पिछला जन्म हुआ था। और अब नया जन्म बारह सौ वर्ष बाद…”

जो द्वंद्व अब तक अपरोक्ष में चल रहा था, वह खुले में आ गया। अब तक खंभ ठोंके जा रहे थे। अब पिछला दांव चल रहा था। पहल बाबूजी ने की थी।

“पुनर्जन्म!” भगवान रजनीश ने आश्चर्य से कहा, “कौन कहता है पुनर्जन्म होता है? पुनर्जन्म की बात करन वाले मूर्ख हैं। जीवन क्षणभंगुर होता है। हर एक क्षण का अपना जीवन होता है। जो क्षण चला जाता है, वह हमेशा के लिए चला जाता है। वह फिर कभी लौटकर नहीं आता। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इस एक क्षण को जीना पूरी तरह जीना…”

इसी धुन में वे फ्रांसीसी अस्तित्ववाद की अंटशंट और भ्रामक व्याख्या किये जा रहे थे। बाबूजी बेचारे परेशान थे। पुनर्जन्म संबंधी मौलिक वक्तव्य बाबूजी का नहीं था। स्वयं रजनीश का रहा होगा। शायद बाबूजी ने इसके बारे में बाहर बैठे-बैठे आश्रम की किसी पत्रिका में पढ़ा था। बाबूजी ने उसे बस दोहराया भर था। पर ऐसी कमज़ोर स्थिति में भी रजनीश ने बाबूजी का इंदरराज आनंद बना दिया था।

मैंने बाबूजी को इस तरह अप्रतिभ कभी और नहीं देखा..

लेकिन रजनीश ने धुन बदलकर बाबूजी को प्रसन्न करने की कोशिश की “हां, यदि पुनर्जन्म से आपका मतलब वह है जो जन-साधारण समझते हैं और मुझे लगता है कि इसका वही अर्थ आपके मन में था, तो मेरा पूर्वजन्म सम्राट हर्ष के युग में कान्यकुब्ज नगर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस घर के आंगन में एक पेड़ लगा था…”

अब वह उस पेड़ का वर्णन करने लगे। खिड़की में से एक पेड़ दिखायी दे रहा था। हर्षकालीन पेड़ में और इस पेड़ में मुझे कोई अंतर नज़र नहीं आ रहा था। पता नहीं बाबूजी की नज़र उस समय उस पेड़ तक गयी या नहीं। मैं बराबर उसी पेड़ को देख रहा था।

फिर एक पल की ख़ामोशी। बाबूजी शायद तय नहीं कर पा रहे थे कि अपने मिशन की बात कैसे आरंभ करें, और करें भी या नहीं। वे ‘अनाम स्वामी’ के मॉडल की बात करने लगे। रजनीश ने जैनेंद्र को उनके पधारने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद प्रकट करना शुरू कर दिया। मतलब स्पष्ट था। हमें अनुमति लेकर उठ आना पड़ा।

(काल्पनिक चित्र एआई की मदद से)

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