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पाक्षिक ब्लॉग राजा अवस्थी की कलम से....

जीवन-बोध से भरी नवगीत कविताओं का कवि सुभाष वसिष्ठ

         कविता पर बात करने का प्रथमतः अर्थ गीत पर बात करना होना चाहिए या जो कुछ और जितना भी गीतात्मक है, उस सब पर। इस दायरे में सभी छंदों के साथ ग़ज़ल भी शामिल है। कविता सदैव अपने समय का हाथ पकड़कर भूत के अनुभवों के आलोक में आगत भविष्य का अनुसंधान करती है। कविता हजारों-हजार अनुभव सरणियों के सार को व्यक्त करती है। कविता में नवगीत कविता ने व्यक्ति मन की कल्पनाजीविता को समष्टि की कल्पना का आधार बनाकर एक बड़े परिसर की जरूरतों, आशाओं, आकांक्षाओं और संघर्ष, समन्वयन को संभव बनाया है। नवगीत कविता ने कवि को नितान्त निजी अनुभूतियों को कहने की आत्मश्लाघी प्रवृत्ति से उबारकर उसे समाजोन्मुखी बनाया है। नाट्य कर्मी, अभिनेता सुभाष वसिष्ठ नवगीत कविता के इस व्यापक परिसर के एक प्रदीप्त नक्षत्र हैं।

गीत सृजन में रत ऐसी पीढ़ी, जो सन् 1958 में पिछले 20-30 सालों से सक्रिय थी, उसके साथ एक नई पीढ़ी ने भी गीत कविता के क्षेत्र में प्रवेश किया। उनमें उमाशंकर मालवीय, शांति सुमन, शलभ श्रीराम सिंह,माहेश्वर तिवारी, राम सेंगर, नचिकेता, भगवान स्वरूप सरस, महेश अनघ प्रभृति कुछ ऐसे कवि भी आए, जिनकी गीत कविताओं ने ‘नवगीत कविता ‘ का रूप और एक सीमा तक प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट कर दिया। इन्हीं रचनाकारों के बीच 8 वें दशक में एक मन्द बयार की भांँति नवगीत कविता संसार में प्रवेश करने वाले एक कवि सुभाष वसिष्ठ भी थे, जिन्होंने नवगीत कविता को अपने अलग शिल्प और भाषा-गठन के नवगीत दिये।

सुभाष वसिष्ठ का जन्म उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में सिकन्दरपुर काकौड़ी गांँव में 4 नवम्बर सन् 1946 को हुआ। सुभाष वसिष्ठ जी के अनुभव का परिसर एक बड़े केनवास पर फैला हुआ है। इस परिसर में नाटकों के निर्देशन से लेकर नाटकों और फिल्मों में अभिनय के साथ उनकी कविताई निरन्तर चलती रही है।

इनका पहला कविता संग्रह ‘बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा’ ईस्वी सन् 2012 में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में उनकी मात्र 46 नवगीत कविताएंँ संकलित हैं। बाद में 2023 में इसका दूसरा संस्करण भी प्रकाशित हुआ है, जिसमें 48 नवगीत कविताएंँ संकलित हैं। इस संग्रह में अपने आत्मकथ्य में सुभाष वसिष्ठ जी ने अपनी काव्य – यात्रा के बारे में विस्तार से बताया है। उसमें और बातों के साथ, यह बात भी महत्वपूर्ण है कि सन् 1968 में उनके मन में काव्य संग्रह प्रकाशित कराने की तीव्र इच्छा हुई। सन् 1968 से 1970 तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम. ए. करने के दौरान इन्हें कुंवरपाल सिंह और रवींद्र भ्रमर जैसे नवगीत कवि से पढ़ने के साथ माहेश्वर तिवारी, ठाकुर प्रसाद सिंह, सोम ठाकुर, रमेश रंजक जैसे कवियों को सुनने का मौका मिला। यहीं से उनकी काव्य प्रवृत्ति में एक नवोन्मेष होता है और वे नवगीत कविता की ओर प्रवृत्त होते है। यानी वे 1970 के बाद नवगीत कविताएंँ लिखते हैं। यही कारण है कि उनके पहले कविता संग्रह ‘बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा’ में 1970 से 1990 के दौरान लिखी नवगीत कविताएंँ संकलित हैं। यह विवरण देने का अर्थ मात्र इतना है कि सुभाष वसिष्ठ उस दौर में सक्रिय रहे नवगीत कवि हैं,जो दौर नवगीत कविता के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है। इसी कालावधि में नवगीत कविता न सिर्फ अपनी उन पुरातन प्रवृत्तियों से मुक्त होती और उनमें परिष्कार भी करती है, बल्कि अपने शिल्प, भाषा, बिम्ब, प्रतीक व गठन के साथ इस तरह प्रस्तुत होती है कि वह अपने समय की चिन्ताओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है और ये सारे बदलाव हम सुभाष वसिष्ठ जी की नवगीत कविताओं में लगातार विकसित होते हुए देखते हैं। एक तरह से हम इन नवगीत कविताओं में नवगीत कविता की विकास यात्रा को पहचानने-पढ़ने की कोशिश कर सकते हैं।

वास्तव में बीती सदी का छठवाँ दशक आज़ादी के दौरान देखे गए सपनों से देश के मोहभंग का समय था। गांवों से शहरों की ओर बेतहाशा पलायन और शहरों में आकर अथाह उम्मीदों के बीच शहरों में एक सड़ी-सी ज़िन्दगी जीने को अभिशप्त युवा था। लगातार पनपता आक्रोश, जो आठवें दशक में एक विस्फोट का रूप भी लेता है। इन्हीं सब कारणों के साथ आधुनिक भाव बोध या आधुनिकता बोध पूरे समाज में व्याप्त था। यही आधुनिक भाव बोध इस कालावधि की नवगीत कविता में बहुत गहराई तक और लगातार व्याप्त है। सुभाष वसिष्ठ की नवगीत कविताओं में भी हमें इसी आधुनिक भाव बोध की व्याप्ति मिलती है। नौकरी पेशा रहे व्यक्ति की दशा, हताशा और इस सबके बीच किसी प्रतिकार से रहित रहने के लिए उम्मीद से जुड़े रहने को विवश पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती यह नवगीत कविता दृष्टव्य है। देखिए –

जबसे होश सँभाला, तब से पाया कालापन 
टलता रहा महज़ तारीखों में उजियार बदन

आज मिलेगा तीजा वेतन / गत दो का पता नहीं 
सिर्फ भरेगा पेट रसोई / सब क़र्ज़ा छोड़ वहीं
तपते जेठों में बरसेगा दो दिन का सावन

स्याही ने हर सीढ़ी / ऐसा रौब जमाया अपना 
सहमा छिपता-सा फिरता है / सूर्य उदय का सपना
तो भी, फाँक रोशनी थामे, तकता पागल मन !

इस नवगीत में सातवें-आठवें दशक के उस मनुष्य की दयनीय स्थिति का पूरा का पूरा चित्र अंकित है। गांँव से शहर और महानगर में जाकर काम करने वाले व्यक्ति का पूरा माह ही अभाव और कर्जे के बीच ही कट रहा था। इस सबके बावजूद वह हर बार एक उम्मीद बांँध ही लेता है। लेकिन, कवि इस उम्मीद के खोखलेपन को पहचानता है, इसीलिए वह ” तो भी, फांँक रोशनी थामे, तकता पागल मन! ” कहकर अपना गीत पूरा करता है। उस समय को सामने उपस्थित कर देने वाली कई नवगीत कविताएंँ हमें ‘बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा’ में मिलती हैं। शहरों में बढ़ रही बेतहाशा भीड़ का एक दृश्य, जिसमें भीड़ तो है, लेकिन कोई चेहरा नहीं है, जैसे यह शहर, इसके चौराहे व्यक्ति को समूचा निगलकर मात्र एक भीड़ में बदल रहे हों। देखिए –

चौराहा: एक वायदा/पीने का भीड़भाड़ को 
तौल रहीं खाली बांँहें/भरमाये हर विचार को 
दर्दनाक मौसम के तेवर निखरें।

इन दशकों में शहरी बन रहा व्यक्ति एक ऐसी ऊब भरी नियोजित दिनचर्या जीने को विवश हो रहा था, जिसमें आपसी सम्बन्धों के मूल राग का निरन्तर ह्रास हो रहा था। उसके पास अपने लोगों के लिए भी समय नहीं था। वह अपना गांँव-घर देखने को तरस रहा था। ऐसे में इनका नवगीत  ‘विभाजित जिंदगी’ देखें –

हम विभाजित ज़िंदगी को जी रहे ऐसे 
जुड़ेपन की प्यास टूटा मन सहे जैसे
जब नियोजित रूप में /खानों बँटी हो जाय दिनचर्या 
अन-कहे ही उधड़ती है, कसमसा कर राग की बखिया
चटक धरती ने कहा सब /बिन कहे जैसे 
हम विभाजित ज़िंदगी को जी रहे ऐसे।

सुभाष वसिष्ठ जी की नवगीत कविताओं में “हर किसी ने, निरी कसकर, चढ़ा ली सांँकल!”,  “इस क़दर रीते हुए भर-शोर चौराहे”, “दिशाहीन चौराहे चौराहे चौराहे “,दिवस ढला/उठ चल दीं/थकी-थकी संज्ञाएंँ”, “बिन चेहरे की भीड़ों” जैसे कई अंश मिलते हैं, जिनमें इन नवगीत कविताओं का रचना समय जीवंत हो उठता है। सुभाष वसिष्ठ जी की नवगीत कविताओं में दृश्य छवियों की ऐसी श्रृंखलाएं मिलती हैं कि, जिनसे निर्मित होने वाली अर्थ छवियों से वह समय न सिर्फ साकार हो उठता है, बल्कि सीमित शब्दों को एक व्यापक अर्थविस्तार के साथ पढ़ना और समझना सरल ही नहीं सहज भी हो जाता है। प्रयत्नों के बाद भी यथास्थिति का न बदलना उस युग का एक अभिशाप की तरह का तथ्य है। इसे कहने का ढंग इनका देखने लायक है। ये लिखते हैं –

मैं भी आ खड़ा हुआ आख़िर को
जड़धर्मा लोगों के बीच!

गड्ढा है ज्यों का त्यों
कीचड़ भी ठीक वही 
क्या है फिर जिसको मैं रहा था उलीच?
जड़धर्मा लोगों के बीच!

सुभाष वसिष्ठ की काव्यभाषा में व्यञ्जना एक महत्वपूर्ण तत्व है। व्यञ्जना का आश्रय लेकर ये कथ्य को तथ्य से जोड़ने और भाव व अर्थ को मन्तव्य तक पहुंँचाने का काम करते हैं। “टोपियों के वायदों से हर जतन हारा”, “नेतई बक-बक “, स्वार्थमयी मिट्टी में उगते हैं /आज के प्रणाम। बिन लगाम।”, कागज़ी मुस्कान के मधुमास में खोये ” जैसे गीतांशों से इसे समझा जा सकता है। ऐसा ही एक गीत देखते हैं –

“ऐसी कुछ स्थितियों ने घेर लिया
कुछ भी आभास मुझे नहीं हुआ

अनचाहे बोझ तले / दबा कब अहम्
जाने कब टेक दिये घुटने !
रेशमी सुझावों के घेरे में
मेरा अपना मत काफ़ूर हुआ 
विद्रोही आसमान सिर्फ़ शून्य-सा होकर
जीवन नासूर हुआ
एक आग खंडहर के शरण हुई
लपटों के शीश लगे कटने !” 

यहांँ “जाने कब टेक दिये घुटने !”, “रेशमी सुझाव “,”विद्रोही आसमान “,”एक आग खंडहर के शरण हुई”,”लपटों के शीश लगे कटने ” जैसे अंश जैसी दृश्य छवियों से अर्थनिर्मिति करते हैं, उसमें शब्दों के प्रतीक बनकर व्यञ्जना को बहुत प्रभावी बनाने की क्रिया सम्पन्न होती है। यह कवि का कौशल ही नहीं स्थितियों से उसकी सम्पृक्तता और उनको भीतर तक जीने के दशा से प्राप्त अभिव्यक्ति कौशल है। यही कारण है कि वे पूरी सम्वेदना के साथ मन्तव्य सहित स्थितियों के चित्र अंकित कर पाते हैं। अपने समय को जीना, उस समय में व्याप्त छल, समय से सौदेबाजी, समय में व्याप्त विद्रूप मंशाओं और विद्रूप चेहरों को वे अपने काव्य में उनके यथार्थ में कह पाते हैं।

कवि हो या कलाकार, जहांँ वह अपने समय के वास्तविक चेहरे से समाज को परिचित कराता है, वहीं वह अनपेक्षित स्थितियों से जूझ जाने और उनको बदलने की इच्छा को, उम्मीद को न सिर्फ पैदा करता है, बल्कि उनको बल भी देता है। 

सन् 1950 के बाद का समय हिन्दी साहित्य में अस्तित्ववादी दर्शन से आक्रांत होने का समय है। सातवें -आठवें दशक में इसका प्रभाव कुछ अधिक ही दिखता है। सुभाष वसिष्ठ जी की भी कुछ नवगीत कविताओं में अस्तित्ववादी दर्शन और अनास्था के स्वर बहुत तीव्र होकर मुखर हुए हैं। जहांँ एक नवगीत में वे –

“कितनी ही दांँत-कटी रोटियांँ
नपे-तुले शब्दों की हो गयीं
चटकते इरादों की आवाज़ें
बदहवास जंगल में खो गयीं
और आग के ज़र्रे/’आज’ ‘कल’ के बारे में/बस,केवल सोचते रहे।
और पसीने के कण/बिखरा अस्तित्व लिए/मुंँह अपना नोचते रहे!”

लिखकर अस्तित्व के बिखरने की बात करते हैं, वहीं व्यक्ति के भीतर नितान्त अकेलेपन में डूबने से उपजती बेचैनी और श्रद्धा को भी संदेह के दायरे में रखकर सोचते मनुष्य की बात भी कहते हैं। वे लिखते हैं –

“सड़क के किनारे की पुलिया सा जीवन है
अन्दर बिल्कुल सूना/बाहर हलचल-पन है
ठहरे ही रहने दो, बंँधी जो दिशाएंँ। 

पिटी हुई लीकों से, मैं क्या, बहु छितराए
श्रद्धा के माथे पर सम्भ्रम लो उग आए
उगें अगर, उगने दो तीखी शंकाएंँ।”

अनास्था और सम्भ्रम का यह स्वर यहीं रुक जाता, तो भी ठीक था किन्तु जब वे-

“यह सही है
पुत्र नामक ख़ून का क़तरा तुम्हारे, हम
पर, कहांँ यह सिद्ध होता
खिड़कियों को बन्द कर जीते रहें सम्भ्रम?”

लिखते हैं, तो यहाँ अनास्था की भी अति हो जाती है। इस अनास्था और सम्भ्रम के बावजूद कवि को थोथी कीर्ति पर गर्व करने की बढ़ती प्रवृत्ति के खोखलेपन को समझता है और यह भी जानता है कि ऐसा पहले नहीं था। वे लिखते हैं-

“सुर्खियों के ही सहारे जो
आकाश में बेवक्त हैं उछले  
गुम्बदी अस्तित्व के पोषक
तनिक झोंके से बहुत दहले 
कहांँ पहुँचेंगे अजब-सी दौड़ के घोड़े
जी सकेंगे या नहीं श्मशान को ओढ़े 
एक पीढ़ी का कथानक-यों
होता नहीं था इस तरह पहले” 

इस आधुनिकतावादी और अस्तित्ववादी भाव-बोध से ग्रसित समय से समय के साथ कवि उबरता भी है। वास्तव में कवि अपने समय, समाज और उस समय की प्रवृत्तियों के बीच रहकर सृजनकर्म में लगा है किन्तु अन्ततः उसकी चेतना समष्टि की ओर लौटती है और वह व्यक्तिगत कुण्ठाओं से उबरकर संसार की पीड़ा को अनुभव करना और व्यक्त करना चाहता है। वह लिखता है –

“मैंने चाहा बाँहों में भर लूँ अम्बर
टूटे पंखों के कुछ टुकड़े हाथों में रह गये!
कुण्ठाओं के चक्रव्यूह में/उलझा मेरा मन 
उमड़ा फिर भी आँखों में जग पीड़ा का सावन 
मैने चाहा सोनमहल कर दूंँ हर घर
पर सपनों के राजमहल, बन बालू के ढह गये!”

नौवें दशक के अंत तक जो हर घर को सोनमहल करने की इच्छा सुभाष वसिष्ठ जी के कवि मन में पैदा हुई, उसकी परणति 2024 में प्रकाशित उनके दूसरे नवगीत संग्रह ‘पंख का नुचना ‘ की नवगीत कविताओं में देखने को मिलती है। दरअसल नौवें दशक के उत्तरार्द्ध से ही नवगीत कविता के कथ्य में बड़े बदलाव की आहट मिलने लगती है। एक तो जनवादी स्वर वाले नवगीतों का स्वर मद्धिम पड़ने लगता है और नवगीत कविता के मूल स्वर में जनाकांक्षाओं को जगह मिलनी शुरू हो जाती है। जन की मूल आकांक्षाओं का यह स्वर नवगीत कविता में आखिरी दशक में और तेज होता है। यही वजह है कि इक्कीसवीं सदी की नवगीत कविता का तेवर जितना लोक के राग-विराग को, उल्लास-उछाह को स्वर देता है, उतना ही उसमें जन की आकांक्षाओं को, संत्रास को, संघर्ष को और प्रतिरोध को भी स्वर मिलता है। सुभाष वसिष्ठ ‘पंख का नुचना’ नवगीत संग्रह में अपने आत्मकथ्य ‘कुछ शब्द ‘में लिखते हैं -“मैं एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति हूँ। शायद इसीलिए मेरे गीत-शब्दों ने मध्यमवर्गीय, निम्नमध्यवर्गीय व निम्नवर्गीय व्यक्ति के आकाश को देखा जाना और उसे नापने के लिए पंखों को फैलाने की जीवन्त प्रक्रिया को देखा जाना…शिद्दत के साथ जिया है।”

डाॅ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर जी भी कहते है -“सुभाष वसिष्ठ जी का संवेदना-पक्ष बहुत सशक्त और विस्तृत है।” इनके भीतर का यह बोध, यह जीवन और इससे जुड़ा जीवन संघर्ष इनकी नवगीत कविताओं में मुख्य संवेदना और कथ्य के रूप में आद्यांत विद्यमान है। ‘बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा’ में जहाँ यह आधुनिक भाव-बोध के रूप में विन्यस्त है, तो वहीं ‘पंख का नुचना’ की नवगीत कविताओं में समस्याओं के लिए जवाबदेह और अनयकारी तंत्र के प्रति प्रतिकार और प्रतिरोध का स्वर प्रमुख होने लगता है। सन् 2012 में ‘बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा’ के लिए नवगीत कविताओं के चयन से गुज़रते हुए इसी किताब के आत्मकथ्य में सुभाष वसिष्ठ लिखते हैं -“कि क्या समय है कि वही समय यह समय है। वही व्यवस्था का मनमानापन है। वही समाज की धूर्तता है। वही हर्राफों की सही को प्रताड़ित करने की धृष्टता है। वहीं, सही आदमी का दबावों, कुण्ठाओं, हताशाओं, किन्हीं – किन्हीं का निराशाओं के परिणामस्वरूप स्वयं को समाप्त कर लेना तक है। महज़ इसलिए, कि वह श्वेद से पृथक, अन्य साधन नहीं जुटा पाता या अहद करके प्रयोग में नहीं लाता। कैसा जीवट वाला है कि फिर भी इधर-उधर से ललकारा खाये जाने और धकियाये जाने के बावजूद, रोशनी की किरण पकड़ने और थामे रहने की अपनी ज़िद व जिजीविषा को न ही त्याग पाता है और न ही त्यागता है। जूझता रहता है …जूझते रहने को अभिशप्त!” हाल के सुभाष वसिष्ठ के नवगीत कवि को और उनकी नवगीत कविताओं को समझने के लिए उनके आत्मकथ्य का यह अंश एक सूत्र की तरह है। ‘बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा’ की पहली ही नवगीत कविता में जहाँ वे प्रार्थना के स्वर में “भग्न हृदय की तमघाटी में/आस किरन भर दे!” कहकर उम्मीद की किरण बचाए रखना चाहते हैं, वहीं ‘पंख का नुचना’ की पहली नवगीत कविता का आरम्भ एक विकट यंत्रणा से करते हैं। “दूर तक फैले खुले आकाश में/फिर कबूतर झेलता है/पंख का नुचना!” यह सिर्फ वास्तव का दर्शन नहीं है, बल्कि इसमें भीतर दबी किसी चिंगारी की ऊष्मा के संकेत भी ध्वनित होते हैं। 

‘पंख का नुचना’ संग्रह में इस शीर्षक से इनकी सात नवगीत कविताएंँ संकलित हैं। पहली कविता में वे -“दूर तक फैले खुले आकाश में/फिर कबूतर झेलता है/पंख का नुचना! झील की गहराइयों को बाज़-पंजों का निरन्तर ताकना/सहमते खरगोश का आवाज़ से भी प्राण लेकर भागना/चीखते टुकड़े हवा के/शून्य की ऊँचाइयों तक/सागरों कुछ ना!” जैसी विकट स्थिति को दिखाते है। पंख का नुचना-2 में “साम्प्रदायिकता – विरोधी/आह/क्यों/हर तरह से/झेलता है पंख का नुचना!” लिखकर साम्प्रदायिकता का विरोध करने वाले व्यक्ति की कठिनाइयों को लिखकर प्रकारांतर से साम्प्रदायिक शक्तियों के ताकतवर और यंत्रणादायक होते जाने को भी दिखा रहे हैं। पंख का नुचना-3 में “त्यक्त पत्नी झेलती है पंख का नुचना” लिखते हैं और पूरी कविता इसी केन्द्रीय भाव पर रची गई है। इसी तरह पंख का नुचना-4 में दलित को केन्द्र में रखते हैं, पंख का नुचना – 5 में चिड़िया को प्रतीक लेकर “एक चिड़िया झेलती है पंख का नुचना” लिखते हैं। पंख का नुचना – 6 में आम जन को और पंख का नुचना – 7 में “घुटन जकड़े हवा पानी में/मूल्यधर्मी झेलता है/पंख का नुचना। आत्म ही हो/आत्म ही हो/आत्म ही जब हर जगह/बेवजह ही ढूँढ़ना है/नयित चालन की वजह/स्वयं श्लाघा आसमानी में/मूल्यधर्मी झेलता है/पंख का नुचना।” रचते हुए समाज में मूल्यधर्मी व्यक्ति के हाशिए पर चले जाने की बात करते हैं।

सुभाष वसिष्ठ जी की नवगीत कविताओं के गठन में शब्दों की दृष्टि से मितव्ययिता मिलती है। वे प्रायः कारक चिह्नों का लोप करते चलते हैं। ज्यादातर इसमें कहीं अर्थ-बोध या भाव-बोध में व्यवधान नहीं पड़ता। सुभाष वसिष्ठ जी अपनी जरूरत के अनुसार शब्दों को तोड़ते – मरोड़ते भी हैं। कई स्थानों पर तो यह अच्छा हो जाता है, लेकिन कई स्थानों पर वे ऐसा अटपटेपन की हद तक करते हैं। कारक चिह्नों के लोप ने भी कुछ जगहों पर ऐसा किया है। दरअसल ऐसा करते हुए अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है, वह हर हाल में होनी ही चाहिए।

सुभाष वसिष्ठ अपने समूचे कवि-कर्म में गहन जीवन-बोध के कवि हैं। वे प्रश्नाकुल हैं और प्रश्न करने से चूकते नहीं। हमारे समय के समर्थ काव्य-आलोचक डाॅ. श्रीधर मिश्र की सुभाष वसिष्ठ जी के नवगीतों के सम्बन्ध में यह उक्ति बहुत प्रामाणिक लगती है कि, “वे अतिकथन से बचते हैं। उनकी बिम्ब और प्रतीक व्यवस्था, हमेशा सार्थक और सुगठित है। सुभाष वसिष्ठ का काव्य संसार बिम्ब केन्द्रित और ऐन्द्रिक व्यवस्था है। भाषा में निजी भूमि की तलाश है।” लोकचेतना, लोकसम्पृक्ति, शोषण, संत्रास, मानवीय सरोकारों से सम्पृक्त नवीन तथ्य, प्रयोगधर्मी शिल्प व प्रयोगधर्मी छंदविधान जैसी प्रवृत्तियाँ इनके काव्य की भी प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं। सुभाष वसिष्ठ के गीतों पर श्रीधर मिश्र कहते हैं -“सुभाष वसिष्ठ के गीतों में जीवन के प्रति गहरा अनुराग भाव है। विपरीत परिस्थितियों में यह अनुराग कब उम्मीद में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता।”

समालोचक शिवकुमार मिश्र की गीत के सम्बन्ध में यह स्थापना है,कि आज का गीत “किसी भावुक मन की अभिव्यक्ति-भर या गाने-गुनगुनाने-भर की चीज़ न रहकर   समय की विसंगतियों से सीधे आँख मिलाते हुए कविता और आदमीयत को बचाए रखने की मुहिम में अपनी गीतात्मक धुरी पर संयत है, और किसी से कमतर नहीं है।”  सुभाष वसिष्ठ की नवगीत कविताएंँ इस उक्ति को पूरी तरह चरितार्थ करती हैं। एक उदाहरण देखिए-

“यह व्यवस्था-चक्र है या सानधर आरा?
आदमी है ख़ौफ़ज़द-सा काँपता पारा!
सब तरफ बद-इंतज़ामी ज्यादती हर सू
आदमी को लीलती है फ़ाइलों की बू
श्वेतपत्रों पर प्रवाहित कालिमा-धारा!…
चटक धरती ने कहा सब बिन कहे जैसे
हम विभाजित ज़िन्दगी को जी रहे ऐसे!”

इन दो अंतरों में सुभाष वसिष्ठ की कविता की भाषा, शिल्प, शब्द-गठन, युगबोध, जीवनबोध, प्रतीकों की प्रवृत्ति, बिम्बों की अर्थगर्भिता जैसे प्रमुख गुणों को या कहें उनकी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियों को देखा-परखा जा सकता है।

सुभाष वसिष्ठ का रचना समय चार दशकों से भी अधिक की कालावधि को घेरता है। इस दृष्टि से वे थोक में कविताएँ लिखने वाले कवि नहीं ठहरते। किन्तु उनके अब तक प्रकाशित दो नवगीत कविता-संग्रहों और कुछ प्रकाशनाधीन नवगीत कविताओं को देखें तो उनके यहांँ गहन अनुभूति और गहन जीवन-बोध से भरी युग-बोध वाली नवगीत कविताएंँ हैं। उनके यहाँ विषयों, बिम्बों और प्रतीकों में दोहराव की समस्या नहीं है। यही कारण भी हो सकता हैं कि उनके पास कविताओं का ढेर नहीं है। इनकी भाषा को एक विरल भाषा कह सकते हैं। ये अरबी-फारसी के ऐसे सार्थक शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो प्रायः हिन्दी कविता में नहीं किए गए हैं या बहुत कम किए गए हैं। सुभाष वसिष्ठ की कविताओं पर अभी गहन विमर्श की ज़रूरत है।

राजा अवस्थी

राजा अवस्थी

सीएम राइज़ माॅडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटनी (म.प्र.) में अध्यापन के साथ कविता की विभिन्न विधाओं जैसे नवगीत, दोहा आदि के साथ कहानी, निबंध, आलोचना लेखन में सक्रिय। अब तक नवगीत कविता के दो संग्रह प्रकाशित। साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित 'समकालीन नवगीत संचयन' के साथ सभी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समवेत नवगीत संकलनों में नवगीत संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, दोहे, कहानी, समीक्षा प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्र जबलपुर और दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से कविताओं का प्रसारण।

1 comment on “जीवन-बोध से भरी नवगीत कविताओं का कवि सुभाष वसिष्ठ

  1. सुभाष वशिष्ठ की नवगीत सृजन यात्रा के साथ साथ हिंदी नवगीत के इतिहास की यात्रा , उसमें समय समय पर परिवर्तन या परिष्कार, ठहराव या विकास की समीचीन चर्चा ने आलोचना को सफल एवं उत्कृष्ट बनाया है।

    अवस्थी जी ने कवि‌ के मन के द्वन्द्व, कशमकश, चिंतन और बेचैनी का सूक्ष्म अवलोकन किया है।
    वे लिखते हैं –
    दूर तक फैले खुले आकाश में/फिर कबूतर झेलता है/पंख का नुचना —
    इसमें भीतर दबी किसी चिंगारी की ऊष्मा के संकेत भी ध्वनित होते हैं।
    सुभाष वशिष्ठ के नवगीतों में लोक के राग-विराग ,उल्लास-उछाह के स्वर, संत्रास -संघर्ष प्रतिरोध के स्वर उनके संवेदना पक्ष की चर्चा करते हुए उनकी भाषा,शिल्प शब्द -गठन ,प्रतीकों की प्रवृत्ति,बिम्बों की अर्थगर्भिता जैसे कला पक्ष की भी खूब चर्चा की है
    जिसे आज की समीक्षाओं में उपेक्षित सा छोड़ दिया जाता है।

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