
- November 11, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
भवेश दिलशाद की कलम से....
बस दो किरदारों से मेरे लिए महान जॉनी वॉकर
महान लोग हों या महान बातें, अक्सर पसंद-नापसंद के दायरे में क़ैद नहीं हो पातीं। मसलन जॉनी वॉकर (11.11.1926-29.07.2003)। एक महान कलाकार। अपनी कामयाबी, अपनी कला की वजह से हासिल मक़ाम और मिसाल के रूप में महान। फिर भी अब मैं कहूं कि मुझे जॉनी वॉकर साहब एक एक्टर के तौर पर बहुत पसंद नहीं रहे, तो इस बात से कुछ दोस्त ख़फ़ा हो सकते हैं, कुछ उनकी ज़बरदस्त फ़िल्मों के नाम बताने लग सकते हैं और कुछ उनके निभाये किरदार या फिर उनकी ज़िंदगी से जुड़े क़िस्से वग़ैरह…
उनके जीवन और फ़िल्मी यात्रा में यक़ीनन कई पड़ाव ऐसे हैं, जो यादगार हैं, ऐतिहासिक हैं और वाक़ई बेहतरीन भी। ख़ास तौर से उन पर जो गाने फ़िल्माये गये, कई मुझे बेहद पसंद रहे हैं। पर यहां मैं अलग सिरे से बात रख रहा हूं। मुझे जॉनी वॉकर बतौर हास्य कलाकार या बतौर अभिनेता दर्जे के ही मालूम होते रहे। शायद उनके पास एक पैटर्न का होना या एक स्टाइल का दोहराव होना कोई वजह रहा हो। ज़ाहिर है यह स्टाइल उन्होंने अर्जित किया था। फिर भी यह उनके अभिनय के विस्तार के बजाय मुझे सीमा ही ज़ियादा लगता रहा। जैसे दिलीप कुमार साहब ने भी एक स्टाइल अर्जित किया लेकिन वो अपने किरदारों में नयापन, ताज़गी और कन्विक्शन देने में बहुत हद तक कामयाब रहे। संजीव कुमार हों या नसीर साहब या इरफ़ान साहब तक अनेक अभिनेता ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपना एक स्टाइल गढ़ा और उसे अपने फ़न, अपने कलात्मक विस्तार का सबब बनाया।
शुरूआती फ़िल्मों में एक आम दर्शक के लिए एक बहुत आम दिखने वाला और एक बहुत अजीब ढंग से चलने-फिरने वाला और एक विदूषक की तरह आवाज़ की करामात दिखाने वाला अभिनेता परदे पर आया तो मनोरंजन तो उसने ख़ूब पैदा किया। कहीं किसी जगह इस तरह के अभिनय को आप नैचुरल भी कह सकते हैं और कहीं निहायती बनावटी। विचित्र तरह की हरक़तों से हंसाने की परंपरा या फ़ॉर्मूला भी हिंदी फ़िल्मों में यहीं से चल निकला हो, मुमकिन है।

यह भी मुमकिन है कि बहुत से हास्य कलाकारों और सरोकारों वाली स्टैंड अप कॉमेडी के दौर से आशना होने के बाद मैं जॉनी वॉकर को तुलना की तराज़ू पर इस तरह तौलने की हिमाक़त कर रहा हूं। वक़्त के साथ कॉमेडी का मेआर बहुत आगे निकल चुका। कॉमेडी बनाम ह्यूमर की एक झलक शायद सत्तर के दशक में तब भी नज़र आयी हो, जब ऋषिकेश मुखर्जी ने विशुद्ध हास्य फ़िल्मों का निर्माण किया और दर्शकों ने जाना कि वास्तविक हास्य क्या होता है। जबरन हंसाने के लिए अभिनेता को कसरत नहीं करना पड़ती बल्कि अपने किरदार और कहानी के मोड़ों से गुज़रते हुए ख़ुद-ब-ख़ुद हास्य पैदा होता है और अभिनेता अपने फ़न को उसका सहज माध्यम बनाता है।
जब सिनेमा अपनी उम्र के हिसाब से मैच्यॉर नहीं था, जॉनी वॉकर साहब उस दौर के एक कामयाब कलाकार थे। बचपन में जिस तरह अंदाज़ अपना-अपना जैसी फ़िल्में गुदगुदाती थीं लेकिन बड़े होने के बाद बहुत हल्की लगीं, उसी तरह बचपने में हमने भी जॉनी वॉकर से ख़ूब मनोरंजन हासिल किया और बड़े हुए तब उन फ़िल्मों में वह सब कुछ उसी तरह तो गवारा नहीं हो सकता था। लेकिन जॉनी वॉकर के दो किरदार आज तक मुझे बहुत गहरे कहीं छूते हैं। मैं उन फ़िल्मों को कई बार और देख सकता हूं और हर बार उसमें जॉनी वॉकर जंच ही जाएंगे, यक़ीन है।
एक है आनंद। ईसा भाई के किरदार में जॉनी वॉकर हममें से कइयों को याद रह गये हों, मुमकिन है। अमिताभ, धर्मेंद्र, जया, उत्पल दत्त जैसे कलाकारों के साथ कई फ़िल्में बनाने वाले ऋषिकेश मुखर्जी की शायद ही और किसी फ़िल्म में जॉनी वॉकर हों। ख़ैर, आनंद फ़िल्म में एक नाटक कंपनी चलाने वाले ईसा भाई के रोल में जॉनी वॉकर कुछ हिस्सा तो अपने पैटर्न/स्टाइल से ही निभाते हैं लेकिन उनके रोल की एंट्री और एग्ज़िट वाले दृश्य प्रभावी हैं।
एक अजनबी से शनासा की तरह मिलने वाले पहले सीन में और अपने आख़िरी सीन में मरीज़ आनंद के कमरे से बाहर निकलकर रूमाल में मुंह छुपाकर सुबकने वाले ईसा भाई कमाल कर जाते हैं। एक क़िस्सा कहीं पढ़ने/सुनने में कभी आया था कि रूमाल में मुंह छुपाकर रोने की तरक़ीब जॉनी वॉकर ने ही ऋषि दा को बतायी थी और परदे पर जो अभिनेता पहले कभी इमोशनली रोता हुआ नज़र नहीं आया था, इस फ़िल्म में उसका रोना भले ही नज़र न आता हो, रुला ज़रूर जाता है।
दूसरी है चाची 420, मेकअप आर्टिस्ट जोसेफ़ के किरदार में जॉनी वॉकर मैच्यॉर हास्य अभिनय करते दिखते हैं। ब्लैक-एंड-व्हाइट फ़िल्मों वाले जॉनी वॉकर की तुलना में काफ़ी अलग, काफ़ी नैचुरल और कलात्मक। इस फ़िल्म में भी वे शराबी हैं, लेकिन पुरानी फ़िल्मों जैसे बनावटी या जबरन हंसाने पर आमादा अभिनेता नहीं दिखते। ख़ैर ये सब मेरी ज़ाती पसंद-नापसंद, मेरी ज़ाती सिनेमाई समझ का बयान ही है। इन दो फ़िल्मों की वजह से मैं उनका और सब काम ताक़ पर रख देता हूं। यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है। उनकी प्रतिभा, उनकी कला और उनकी उस ज़िंदगी को सलाम करता हूं, जिसने पीढ़ियों तक हास्य कलाकारों को प्रेरणा देने और रास्ता बनाने का काम भी किया हो।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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बहुत खूब लिखा।सहमत हूं। हास्य अभिनेताओं का जो पुराना दौर था,उसमें सभी से ओवर और बचकाना एक्टिंग कराई जाती थी।फिर भी गुरू दत्त की फिल्मों में जानी वॉकर अलग और कम लाउड दिखते हैं।पर यकीनन चाची 420 में उनके अभिनय का मैं भी कायल हुआ।
जॉनी वाकर ने हास्य के नया रास्ते खोले … भले ही वे आज बचकाने लगे । हमारे समय फ़िल्म देखने का एक मानक जानी वाकर भी थे ।
मुझे तो उनका वही गाना याद रहता है ..
सर जो तेरा चकराए ..
सादर नमन ..
बहुत खूब!