yashpal, upendra nath ashk, साहित्यकार, cartoon
पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से....

नामचीन साहित्यकारों के चुटीले प्रसंग-2

           हिंदी साहित्य जगत में एक ऐसा दौर था, जब बड़े हस्ताक्षर प्रतिष्ठित हो रहे थे, स्थापित हो रहे थे और ऐसे वक़्त में उनके बीच के चुटकुले/कटाक्ष/हास्य लहरियां भी प्रसिद्धि पा रही थीं। उन रंग-बिरंगी यादों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य की बात करते हुए गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति करेगी, ऐसी आशा है…

मोची से बदतर

एक नयी लेखिका ने अपनी कुछ प्रकाशित पुस्तकें यशपाल को भेंट स्वरूप भेजीं और उनकी सम्मति व आशीर्वाद के लिए प्रार्थना की।

यशपाल जी ने सधन्यवाद प्राप्ति-स्वीकार की। इसके उपरान्त उसी लेखिका का एक पत्र आया कि आपकी अमुक अमुक पुस्तकें यदि आप भेज दें तो बड़ी कृपा होगी। यशपाल जी ने वह पत्र अपनी प्रकाशक प्रकाशवती पाल जी को यथोचित कार्रवाई के लिए सौंप दिया।

वी.पी. पार्सल को स्वीकारते हुए उस लेखिका ने पत्र भेजा: “नाई नाई से बाल कटाने की मजदूरी नहीं लेता और मोची मोची का जूता गांठने की मगर आपने…”

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महाकाव्य-विक्रेता

श्री भगवतीचरण वर्मा उन दिनों इलाहाबाद में थे। लेखकों के साथ व्यावहारिक मज़ाक़ करने में उन्हें मज़ा आता था। एक दिन महाकवि शरद जी रास्ते में टकरा गये- उनके हाथों उनके सद्यःप्रकाशित महा-काव्य के कई खण्ड थे। एक प्रति वर्मा जी के हाथों में देकर उन्होंने कहा, “घर-घर जाकर बेच रहा हूं। ख़ैर, तुम यह प्रति ले लो और इसकी बढ़िया-सी समीक्षा लिख देना।”

वर्मा जी ने धन्यवाद दिया और राजा भदरी की कोठी गये। वहां वह न मिले तो वह अन्य एक धनी व्यक्ति के घर गये। गृहस्वामी ने वर्मा जी का स्वागत किया और पूछा कि हिन्दी में अब क्या-क्या लिखा जा रहा है। वर्मा जी ने हाथ में लिये महाकाव्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की और मज़ाक़ में उसे उनके हाथ बेच दिया और कहा, “मैं दूसरी प्रति ख़रीद लूंगा।”

कुछ ही देर के बाद महाकाव्य बेचने के अभिप्राय से उसी धनी के घर पहुंचकर शरद जी को पता लगा कि वर्मा जी उन्हें अपनी प्रति बेच गये हैं।

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धन्यवाद ज्ञापन

अश्कजी (उपेन्द्र नाथ अश्क) दिल्ली आये तो कौशल्या जी के लिए फर का कोट ख़रीदकर ले गये। नयी सौगात पर प्यार से हाथ फेरते-फेरते श्रीमती अश्क अचानक गंभीर हो गयीं।
“क्या बात है डियर! उदास क्यों हो गयीं? कोट पसंद नहीं आया क्या?” अश्क जी ने पूछा।

“नहीं जी! पसंद न आने का क्या सवाल है? मैं तो उस बेचारे जीव के बारे में सोचने लगी थी, जिसकी खाल उधेड़ी गयी है।”

“हमदर्दी के लिए शुक्रिया, कौशल्या!” अश्क जी ने गंभीर होते हुए कहा।

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ज़रूरत?

बात उन दिनों की है, जब कवि सम्राट श्री विश्वनाथ सत्यनारायण ‘रामायण कल्प-वृक्ष’ की रचना कर रहे थे।

उनकी पत्नी पड़ोसिन से बोली, “मेरे पति फिर से रामायण लिख रहे हैं।”

पड़ोसिन ने कहा, “रामायण फिर से लिखने की क्या ज़रूरत थी? एक प्रति बाज़ार से ख़रीद लेते!”

विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

शिक्षा से सिविल इंजीनियर। पेशे से अध्यापक रहे। "क़िस्से बदरंग कोराना के संग", "बैताल कथाएं", "बेमतलब की" जैसे कॉलम थोड़े बहुत चर्चा में रहे। छुटपुट कहानी, कविता आकाशवाणी से प्रसारित होती रही और प्रकाशित भी होती रहती है। कोई पुस्तक, कोई पुरस्कार नहीं।

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