
- February 28, 2026
- आब-ओ-हवा
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प्रस्तुति विवेक मेहता....
रंग-बिरंगी: नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां
हास्य-व्यंग्य बात ही बात में बड़ी सीख दे जाते हैं। सहनशीलता, समझदारी की परीक्षा लेते हुए समाज बात को किस नज़रिये से दिखा रहा है, यह जताते हुए सुधार की संभावना भी बता देते हैं… एक समय था जब बड़े-बड़े नेता अपने पर बने कार्टून को न केवल पसंद करते थे बल्कि कार्टून उनकी लोकप्रियता का नमूना भी हुआ करते थे। आजकल तो ‘मैं’ और ‘मैं’ का ज़माना हो गया है। कार्टून, हास्य और व्यंग्य आदमी को न्यायिक परेशानी में डाल रहे हैं।
60-70 के दशक के साहित्यकार अपने को स्थापित करने के लिए पुराने साहित्यकारों को उखाड़ते/नकारते हुए स्थापित होने का प्रयास कर रहे थे। साथ ही विचार, विषय, शैली को लेकर आंदोलन खड़े कर रहे थे। आपसी प्रतिस्पर्धा में उलझे थे। वे अपने नाम और काम से जाने जा रहे थे। ऐसे वक़्त में उनके बीच के चुटकुले भी प्रसिद्ध हो रहे थे। उन चुटकुलों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य की बात करते हुए गुदगुदाने काम यह प्रस्तुति करेगी, ऐसी आशा है…
पतिव्रता
सचेतन कहानीकारों की बैठक थी। टी-हाउस में मनहर चौहान, शक्तिपाल केवल, महीप सिंह और धर्मेन्द्र गुप्त के बीच जगदीश चतुर्वेदी ने कहा, “हम उन तीनों (कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव) का कभी ज़िक्र नहीं करेंगे। आज से हम सब यह निश्चय करते हैं कि उनका नाम ही नहीं लेंगे।”
यह ख़बर उन तक किसी ने पहुंचायी तो राजेंद्र यादव ने कहा, “ठीक निश्चय किया है उन लोगों ने। पतिव्रता स्त्री पति का नाम कभी नहीं लेती।”
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अंतिम समय
दुष्यंत कुमार ने मोटा उपन्यास लिखा और उसे दोस्तों को सुनाने की गरज़ से दिल्ली पहुंचे। राजेंद्र के घर ठहर गये और मोहन राकेश को बुलाने गये, “यार, जल्दी राजेंद्र के यहां चल मैं एक उपन्यास लिखकर लाया हूं। तुम दोनों को सुनाना चाहता हूं।” दुष्यंत ने जाते ही कहा।
राकेश समझ गये कि बचने की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने ‘अनीता’ को बुलाया और कहा, “देखो अनीता, मैं सोचता था कि ज़िंदगी में कुछ और दिन हम साथ रहते पर… ख़ैर… जो कहा-सुना हो तो माफ़ कर देना और मेरे बाद मुझे भूलने की कोशिश करना..”
वह परेशान! “आख़िर बात क्या है, कुछ तो कहो?” “इस दुष्यंत ने एक मोटा उपन्यास लिखा है और मैं उसे सुनने जा रहा हूं।” और राकेश ने एक लंबी सांस ली।
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अच्छी-सी कहानी
संगम की ओर से आयोजित एक कथा-गोष्ठी में उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. आले अहमद सुरूर कहानी की रचना-प्रक्रिया पर बड़ा पांडित्यपूर्ण भाषण कर कर रहे थे। बंबई से आयी हुई उर्दू कहानी लेखिका श्रीमती इस्मत चुग़ताई अपने बोलने की प्रतीक्षा कर रही थीं। सुरूर साहब के एक घंटा तक लगातार बोलने के बाद इस्मत चुग़ताई ने अपना भाषण इस प्रकार शुरू किया, “सुरूर साहब तो कहानी के बारे में मुझसे कहीं ज़्यादा जानते हैं। इतना जानते हैं कि मैं तो उसका 10 प्रतिशत भी नहीं जानती।” फिर वह सुरूर साहब की ओर मुड़कर बोलीं, “तो फिर सुरूर साहब, आप एक अच्छी-सी कहानी क्यों नहीं लिख देते?”
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दायरा
1965 दिसंबर के कलकत्ता कहानीकार सम्मेलन में शिक्षायतन कॉलेज की लड़कियां आटोग्राफ़ लेने को मंडराती रहती थीं। इस सम्मेलन में जैनेंद्र कुमार और नये लेखकों की काफ़ी चोंच-भिड़ंत होती थी। जो आलोचना से उपहास तक पहुंच जाती थी।
ऐसे माहौल में एक लड़की आटोग्राफ़ बुक लेकर दूधनाथ सिंह के पास पहुंची। दूधनाथ सिंह ने लिख दिया, जैनेन्द्र कुमार को मत पढ़ो।
इसके बाद लड़की श्रीकांत वर्मा के पास पहुंची। श्रीकांत ने लिखा- “मैंने जैनेंद्र कुमार को पढ़ा है और पछता रहा हूं। लड़की ने पास ही खड़े हरिशंकर परसाई के सामने बुक बढ़ायी, तो उन्होंने लिख दिया- “जैनेंद्र कुमार कौन है?” सुना जाता है, इसके बाद लड़की वह कॉपी लेकर जैनेंद्रजी के पास गयी। जैनेंद्रजी ने पढ़ा तो उन्हें सात्विक क्रोध आया। वे सीधे प्रिंसिपल के पास गये और कहा- “देखिए, ये नये लेखक क्या लिख रहे हैं?’ इन्हें आप कॉलेज से निकाल दीजिए।”
प्रिंसिपल ने कहा, “निकाल देते, पर वे मेरे कॉलेज के विद्यार्थी नहीं है।
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ज़िम्मेदार
कलकत्ता कहानीकार सम्मेलन के वक़्त ‘अणिमा’ कार्यालय में एक चर्चा गोष्ठी हुई। विषय था साहित्यिक पत्रिकाओं की समस्या। अमृतलाल नागर, श्रीकांत वर्मा, हरिशंकर परसाई वगैरह बता चुके थे कि उनकी पत्रिकाएं कैसे डूबीं।
तभी डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल बोलने को खड़े हो गये।
श्रीकांत चिल्लाये, “हम लोग तो अपनी पत्रिकाएँ डूबने की बात बता रहे थे। आपने दूसरों की डुबायी है। आप क्यों बोलते हैं?”
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विवेक मेहता
पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम 'किस्से बदरंग कोरोना के संग', 'वेताल कथाएँ', 'बेमतलब की' चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470
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