
- February 16, 2026
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स्मरण.. चित्रकार सुभाष अरोड़ा की कलम से....
कलाऋषि एल.एन. भावसार स्मृति शेष
ग्वालियर। कला गुरु उमेन्द्र वर्मा एवं कला मित्र वीरेन्द्र नागवंशी से 14 फरवरी को आदरणीय कलाऋषि एल.एन. भावसार के संसार से विदा होने का दुखद समाचार मिला। दरअसल कलाऋषि भावसार स्वयं में एक संस्था थे और साथ ही भारतीय कला शास्त्र के पुरोधा भी। रंग विधान में दक्ष, विस्तृत ज्ञान भण्डार संजोये प्रभावकारी चितेरे कलाऋषि भावसार के सम्पर्क में आने वाला कलाकार तथा कलारसिक बस उन्हीं का हो जाता।
मध्य प्रदेश के शिखर सम्मान सहित ढेरों अलंकरणों से विभूषित वयोवृद्ध कलाऋषि भावसार 90 वर्ष की आयु पार भी अपने पुराने शिष्यों से लेकर युवा कला छात्रों से घिरे रहते थे। उनका ऐसा ही एक मुरीद मैं भी हूँ। दरअसल संयुक्त संचालक जनसंपर्क के पद से अक्टूबर 2010 में सेवानिवृत्ति के तक़रीबन 5 साल बाद जब मैं राजा मानसिंह संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में मूर्तिकला का छात्र रहा था, तब संयोगवश तिघरा डैम पर 10 जुलाई 2017 को कलाकारों की एक आउटडोर कार्यशाला में मुझे उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ। कार्यशाला में उन्होंने डेमो देते हुए स्पॉट पेटिंग की। इस दौरान उनका कला शिक्षकों और कला छात्रों के प्रति मार्गदर्शी सद् व्यवहार और लगाव से मैं अभिभूत हुए बिना न रह सका।
अगस्त 2017 में राजा मानसिंह संगीत और कला विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी दौरान उनके उद्बबोधन की स्मृति आज भी मेरे मानस पटल पर ताज़ा है। इस कार्यशाला में नैशनल गैलरी आफ़ मॉडर्न आर्ट के तत्कालीन महानिदेशक प्रसिद्ध मूर्तिकार अद्वैत गणनायक सहित चाक्षुय और निष्पादन कलाओं की नामचीन अंतरराष्ट्रीय हस्तियां शामिल थीं।
विश्वविद्यालय में कलाऋषि भावसार के मार्गदर्शन में एक अन्य राज्यस्तरीय कला शिविर का भी मुझे स्मरण है, जिसमें देश प्रदेश के कई स्थानों से उनके शिष्य कलाकारों और स्थानीय कलाकारों ने शिरकत की थी। छात्रों को भी शिविर में बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला था। वर्ष 2018 में खजुराहो फेस्टिवल में भी एक संगोष्ठी में मुझे उनको सुनने का अवसर मिला।
ऐसे कई अवसर आये, जब मैंने उन्हें डेमो देते हुए, कला विस्तार का पवित्र ज्ञान बांटते देखा और कुछ बटोरा भी। उन्हें ग़ज़ब करते तो तब देखा जब कई दिन के अनथक प्रयास से उन्होंने राजा मानसिंह संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के प्रवेश कक्ष की दीवार पर बाघ गुफा के एक प्रसिद्ध भित्ति चित्र की लाजवाब प्रतिकृति बनायी, जिसका तब के केंद्रीय कृषि मंत्री और वर्तमान में मध्यप्रदेश की विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अनावरण किया था। कलागुरु श्री भावसार की विश्वविद्यालय को उनकी यह बेशकीमती भेंट है।

उल्लेखनीय है कि बाघ गुफाएं मध्य प्रदेश में धार जिला मुख्यालय से 97 किलोमीटर दूर विंध्य पर्वत की दक्षिणी ढलान पर बाघिन नदी के किनारे स्थित हैं। अजंता और एलोरा की तरह यह सातवीं शताब्दी की बेजोड़ बौद्ध धरोहर है। इन गुफाओं में बनी चित्रकारी सचमुच विस्मयकारी है।
उसी वर्ष 13-14 मार्च को मुरैना ज़िला स्थित आठवीं से दसवीं शताब्दी पूर्व के 25 एकड़ में फैले विशाल मंदिर समूह वाले बटेश्वर परिसर में “हृदय दृश्यम” कला एवं संगीत समारोह में कलाऋषि भावसार की सदारत में अविस्मरणीय दो दिवसीय कला शिविर, प्रदर्शनी और संगीत संध्या ने कलाकारों और दर्शकों का मन मोह लिया। इस कला शिविर में उन्होंने अपनी कला सृष्टि से कैनवास पर बटेश्वर प्रतीक मंदिर और नंदी पर सवार शिव का चित्रण कर शिविर के कलाकारों को अभिप्रेरित किया। उनके चित्रण में स्थूलता, लघुता, दूरी और नैकट्य का अद्भुत अहसास होता है। उनकी इस पेंटिंग को देखकर सुमित्रानंदन पंत जी की कविता का अंश स्मरण हो आता है:
“वही प्रज्ञा का सत्य स्वरूप
हृदय में बनता प्रणय अपार
लोचनों में लावण्य अनूप
लोक सेवा में शिव अविकार”
कलाऋषि भावसार की चित्रकला भी इसी श्रेणी में आती है। उनकी कला में रूप भेद, प्रमाण, भाव, लावण्य और सादृश्यता का सार्थक निर्वहन होता है, जो भारतीय कला दर्शन के अनुरूप है। ऐसे कला ऋषि का सृजन और मार्गदर्शन कला जगत को सदैव समृद्ध करते रहा। ग्वालियर ही क्या हर जगह के कलाकार उनके योगदान को हमेशा याद करेंगे।
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