
- March 31, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
फकीरा: एक जननायक की गाथा
प्रसिद्ध मराठी उपन्यास फकीरा का हिंदी अनुवाद 2025 में सेतु प्रकाशन से आया। मराठी के बहुत सम्मानित अण्णाभाऊ साठे का यह उपन्यास अपने समय में बहुत चर्चित हुआ था। उन्होंने मराठी में विपुल लेखन किया और उनके 35 उपन्यास, 15 कहानी संग्रह, 15 नाटक एवं एकांकी तथा यात्रा वृत्तांत प्रकाशित हुए। सांगली ज़िले के वाटेगांव में जन्मे अण्णाभाऊ साठे महाराष्ट्र में एक दलित जाति ‘मांग’ में जन्म लेने के कारण समाज की दबी-कुचली जाति की अमानवीय स्थितियों से भली-भांति परिचित थे। इसलिए उनकी रचनाओं के अनेक पात्र एवं नायक दलित, शोषित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। 1969 में उनका निधन हो गया लेकिन उनकी कृतियां मराठी साहित्य में आज भी प्रासंगिक हैं। वे जीवन पर्यंत मज़दूर और किसान आंदोलनों से जुड़े रहे और उन्होंने कामगार-दलित वर्ग में जनचेतना पैदा करने का अद्भुत काम किया। वे प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा से भी जुड़े थे। फ़कीरा उपन्यास का हिंदी अनुवाद उषा वैरागकर आठले ने किया है। वे स्वयं भी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ी हैं और इप्टा की राष्ट्रीय महासचिव हैं। इस बहुचर्चित उपन्यास को राज्य शासन द्वारा सर्वोत्कृष्ट उपन्यास पुरस्कार मिला है और इस पर फ़िल्म भी बनी है। कुछ कृतियां अपने समय का दस्तावेज़ बन जाती हैं और वर्तमान समय के संदर्भों में भी उनकी प्रासंगिकता बनी रहती है। ऐसे कथानायक आने वाली पीढ़ियों के प्रेरणास्रोत बने रहते हैं। प्रस्तुत उपन्यास के नायक फ़कीरा का चरित्र इसी रूप में निर्मित है।
महाराष्ट्र में मांग और महार दलित जातियों में हैं। वारेगांव में नागफनियों के बाड़ों के भीतर मांग समुदाय की बस्ती है। यूं गांव में अन्य समुदाय के लोग भी हैं। मालगुज़ार शंकर राव पाटिल हैं, सरकारी प्रतिनिधि के रूप में विष्णु पंत ब्राह्मण हैं। लेखक ने इस गांव का जो वातावरण निर्मित किया है, उसके अनुसार परस्पर इन जाति समुदायों में सौहार्द्रपूर्ण संबंध हैं। यह एक नया दृष्टिकोण देता है, कथा को समझने के लिए। यह अलग बात है कि मांग समुदाय के लोग अभावग्रस्त जीवन के लिए अभिशप्त हैं। खेती के दिनों में मेहनत मज़दूरी से उनका जीवन चलता है लेकिन यह अल्पकालीन है। शेष दिनों में वे भुखमरी से जूझते हैं और फिर वे चोरी और लूटमारी भी करते हैं। इसीलिए अंग्रेज़ी राज में मांग समुदाय अपराधी जाति में दर्ज था। ये लोग ज़रूरत पड़ने पर हथियार चलाने में भी निपुण थे और गिरोहबंदी के साथ मार-काट भी कर सकते थे।
कहानी शुरू होती है जोगणी के मेले से। जोगणी पड़ोस के शिगांव में है और उसके कारण वहां साल में तीन-चार बार मेला लगता है, आस-पास के गांवों से लोग जुटते हैं और वहां लोगों को रोज़गार मिलता है। दो व्यक्ति दूल्हा-दुल्हन के रूप में जोगी-जोगणी बनते हैं और उनकी रक्षा के लिए हथियारों से लैस बारात सजती है, जो पूरे गांव का चक्कर लगाती है। जोगणी के हाथ में पीले कपड़े में लिपटी नारियल की कटोरी रखी रहती है। अगर कोई कटोरी छीनकर अपने गांव में ले गया तो ले जाने वाले के गांव में जोगणी का मेला लगेगा। इसलिए जोगणी के चारों ओर हथियारबंद लोगों का घेरा रहता है। छीनने वाला अगर उसी गांव की सीमा के भीतर पकड़ा गया तो उसका सिर कलम कर दिया जाएगा, ऐसी प्रथा है। वाटेगांव के सभी जोगणी को अपने गांव लाना चाहते हैं। राणो जी मांग, जो फ़कीरा के पिता थे, ने यह दुस्साहस किया और अपने कुछ साथियों के साथ कटोरी छीन लाये और अपनी सीमा में आने में सफल हो गये। लेकिन शिगांव के सरकारी कर्मचारी बाजीबा खोत के बेटे ने वाटेगांव के भीतर घुसकर राणो जी मांग और उसके एक साथी की हत्या कर दी, हालांकि उसने कटोरी पहले ही अपने एक साथी को पकड़ाकर वाटेगांव भेज दिया था। इन ख़ूनी रंजिशों में सरकार दख़ल नहीं देती क्योंकि ये समाज के धार्मिक मामले हैं। जोगी-जोगणी पढ़ते हुए यह दिलचस्प लगता है कि हमारे वर्ण-विभाजित हिंदुस्तानी समाज में देवताओं के नाम पर जोखिम भरे कृत्य हमेशा निम्न वर्ण के लोग ही करते रहे हैं। यह अलग बात है कि उनको मंदिर प्रवेश की और पूजा की अनुमति न हो! उत्तरांचल में ‘जागर’ लगता है और दलित जाति के ‘जगणियों’ पर देवता अवतरित होते हैं। इसी तरह, केरल का ‘थियम’ हो, कर्नाटक का ‘कांतारा’ या हिमाचल प्रदेश में ‘काहिका’… केवल इन्हीं अवसरों पर दलित वर्ग के लोग सम्मान पाते हैं। यह विचार करने योग्य है। यहां भी फकीरा का परिवार सम्मान का पात्र है क्योंकि उसके पिता ने अपने प्राण देकर गांव का सम्मान बढ़ाया।
कहानी में महाराष्ट्र में दो-तीन साल तक वर्षा न होने के कारण सूखे और भुखमरी का वर्णन है। यहां भी लोग भूखे मर रहे हैं। फ़कीरा गांव के मालगुज़ार शंकरराव पाटिल और विष्णु पंत से चर्चा करता है। विष्णु पंत कई पत्र सहायता हेतु सरकार को लिख चुके हैं लेकिन अपराधी जाति घोषित मांग समुदाय को सहायता नहीं मिलती। तब फ़कीरा अपने हथियारबंद गिरोह के साथ मालवाड़ी के मठाधीश की हवेली से अनाज लूटने जाता है। अनाज के बोरों के ढेर लगे हैं और अनाज सड़ रहा है। तलवार के बल पर लूटा अनाज गांव में वितरित होता है। बाद में सरकार अफ़सर के सामने लूट के मामले की सुनवाई होती है और विष्णु पंत फ़कीरा का बचाव करते हैं। उसकी समाज में भूमिका रॉबिनहुड जैसी है। देश में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अनेक क्रांतिकारी भी उसके संपर्क में है और वह अपने साथियों के साथ वक़्त पड़ने पर उनकी मदद भी करता है। इसी क्रम में उनके लिए वे पूरी रणनीति बनाकर सरकारी ख़ज़ाने की लूट करते हैं और उसे ज़रूरतमंदों में बांट देते हैं।
सरकारी ख़ज़ाने की लूट को सरकार गंभीरता से लेती है और सिपाहियों द्वारा उनका गांव चारों ओर से घेर लिया जाता है। फकीरा के परिवार के सभी लोगों के हाथ-पैर बांधकर उन्हें बंधक बना लिया जाता है जिसमें बच्चे, बूढ़े तथा औरतों समेत सभी लोग हैं। फ़कीरा छुपते-छुपाते गांव जाकर विष्णु पंत से सलाह-मशवरा करता है तथा सबको छोड़ देने के एवज़ में आत्मसमर्पण करने को तैयार हो जाता है। अंत में, वह अपनी तलवार अंग्रेज़ अफ़सर को सौंपते हुए कहता है, “यह तलवार मेरे पूर्वजों को शिवाजी महाराज ने दी थी, इसी तलवार के साथ मेरा बाप खोत (शिगांव के) से लड़ा था और इसे लेकर मैं आपसे लड़ रहा था…”।
बेहद पठनीय और रोचक यह उपन्यास महाराष्ट्र के उस अंचल की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ बीसवी सदी के उस कालखंड का इतिहास भी प्रस्तुत करता है। मांग और महार जातियों का जुझारूपन तथा क्रांतिकारी जीवन भी उपन्यास का हिस्सा बनते हैं।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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