मंगलयान, mangalyaan, spacecraft
विज्ञान दिवस पर वैज्ञानिक प्रदीप मिश्र की कलम से....

एक मंगल-यात्रा के बाद अब मंगलयान-2 से उम्मीदें

            भारत मंगलयान को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करके पूरी दुनिया को अपनी वैज्ञानिक क्षमता के सामने हतप्रभ कर चुका है। मंगल ग्रह के बारे में संस्कृत शास्त्रों में कहा गया है-
धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्|
कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम्||
अर्थात्
धरती के गर्भ से जन्म लेने वाले,
जो विद्युत के समान कांतिवान हैं,
जो युवा हैं और हाथ में भाला लिए हुए हैं
ऐसे मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ।

मंगल ग्रह के बारे में इस तरह के बहुत सारे श्लोक और उक्तियाँ भारतीय जीवन दैनंदिनी में प्रचलित हैं। भारतीय जनमानस में मंगल ग्रह वैदिक काल से ही चिह्नित है। सिर्फ़ भारत ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में मंगल चिर-परिचित है। भारतीय मंगलयान यात्रा पर चर्चा करने से पहले आइए मंगल के बारे में पूर्व में हुए खोजों, अभियानों और तथ्यों पर एक नज़र डाल लेते हैं।

सौरमंडल में मंगल संबंधी मूलभूत जानकारियों से तो सभी परिचित हैं, फिर भी कुछ महत्वपूर्ण बातें ये हैं कि इस ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण बल 3.71 मीटर प्रति सेकण्ड स्क्वायर है। इसकी सतह का क्षेत्रफल 14.48 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इसकी त्रिच्या 3390 किलोमीटर है। सूर्य से इसकी दूरी लगभग 22.79 करोड़ किलोमीटर है तथा पृथ्वी से यह लगभग 65 करोड़ किलोमीटर है।

आज तक के प्रमुख मंगल अभियानों को संक्षिप्त रूप से देखें तो:

मंगल ग्रह की पहली सफल उड़ान 14-15 जुलाई 1965 को नासा द्वारा भेजी गयी मेरिनर 4 थी। 14 नवम्बर 1971 को मेरिनर 9, पहला अंतरिक्ष यान बना जिसने परिक्रमा के लिए मंगल की कक्षा में प्रवेश किया। दो सोवियत यान, 27 नवम्बर 1971 को मार्स 2 और 3 दिसम्बर 1971 को मार्स 3 ने मंगल की सतह पर सर्वप्रथम सफलतापूर्वक क़दम रखा। परन्तु उतरने के चंद सेकंडों के भीतर ही दोनों के संचार बंद हो गये। 1975 में नासा ने वाइकिंग कार्यक्रम की शुरूआत की, जिसमें दो कक्षीय यान शामिल थे, प्रत्येक में एक एक लैंडर थे और दोनों लैंडर 1976 में सफलतापूर्वक मंगल की धरती पर उतरे थे। वाइकिंग-1 छः वर्ष के लिए और वाइकिंग-2 तीन वर्ष के लिए परिचालक बने रहे। वाइकिंग लैंडरों ने मंगल के जीवंत परिदृश्य प्रसारित किये जिनके चित्र आज भी वैज्ञानिकों को मंगल ग्रह के बारे में शोध हेतु सहायता प्रदान कर रहे हैं।

मंगल पर प्रक्षेपित अंतरिक्ष यानों में ज्यादातर या तो दो-तिहाई अभियान पूरा होने या फिर शुरूआत में ही किसी ना किसी तरीक़े से विफल हो गये। अभियान की विफलता के लिए आमतौर पर तकनीकी समस्याओं को ज़िम्मेदार माना जाता है।

भारत का मंगल अभियान

इतनी सारी असफलाताओं के बाद धरती पर बैठे वैज्ञानिकों को यह तो समझ में आ गया कि मंगल और धरती में बहुत समानता है और वहाँ भी जीवन होने की पूरी संभावना है। साथ ही यह भी प्रमाणित हुआ कि यह कार्य अत्यंत कठिन है। जिसमें हाथ डालना असफलता को आमंत्रित करना है। लेकिन भारत सरकार को अपने वैज्ञानिकों पर पूरा भरोसा था। अतः 3 अगस्त 2012 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र, जिसे संक्षिप्त में इसरो कहते हैं, की मंगलयान परियोजना को स्वीकृति दे दी गयी। भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपने लक्ष्य को साधने में लग गये। उनके सामने एक चुनौती तो मंगल पर पहुँचने की तकनीकी जटिलता की थी ही, साथ ही उनको यह भी अहसास था कि वे एक विकासशील देश के नागरिक हैं। जहाँ आर्थिक सीमाएं भी हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने देशी तकनीक विकसित करके और गुरुत्वाकर्ष बल का उपयोग करके अपेक्षाकृत कम ईंधन के ख़र्च पर चलने वाली योजना का निर्माण किया। इसे कहना जितना आसान है, सफलतापूर्वक घटित करना उतना ही कठिन। आख़िर वह दिन भी आया जब भारतीय वैज्ञानिकों ने मंगलयान के 300 दिन की यात्रा की घोषणा कर दी।

5 नवंबर 2013 को मंगलवार के दिन में दोपहर भारतीय समय अनुसार 2:38 पर श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) के सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र से ध्रुवीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-25 द्वारा मंगलयान को प्रक्षेपित किया गया। 3:20 अपराह्न के निर्धारित समय पर पीएसएलवी-सी 25 के चौथे चरण से अलग होने के उपरांत यान पृथ्वी की कक्षा में पहुँच गया और इसके सोलर पैनलों और डिश आकार के एंटीना ने कामयाबी से काम करना शुरू कर दिया।

मंगलयान, mangalyaan, spacecraft

5 नवम्बर से 1 दिसम्बर 2013 तक यह पृथ्वी की कक्षा में घूमता रहा तथा कक्षा (ऑर्बिट) सामंजस्य से जुड़े 6 महत्वपूर्ण प्रचालन या ऑपरेशनों को पूरा किया। इसरो की योजना पृथ्वी की गुरुत्वीय क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करके मंगलयान को पलायन वेग देने की थी। यह काफ़ी धैर्य का काम था और इसे छह किस्तों में 1 दिसम्बर 2013 तक सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया। आइए इस क्रम को थोड़ा विस्तार से जानें…

  • 7 नवंबर 2013 को भारतीय समयानुसार एक बजकर 17 मिनट पर मंगलयान को ऊपर की कक्षा में पहुँचाया गया। इसके लिए बैंगलुरू के पी‍न्‍या स्थित इसरो के अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र से अंतरिक्ष यान के 440 न्‍यूटन लिक्विड इंजन को 416 सेकेंडों तक चलाया गया जिसके परिणामस्वरूप पृथ्‍वी से मंगलयान का शिरोबिन्‍दु (पृथ्‍वी से अधिकतम दूरी पर‍ स्थित बिन्‍दु) 28,825 किलोमीटर तक ऊपर पहुँच गया, जबकि पृथ्‍वी से उसका निकटतम बिन्‍दु 252 किलोमीटर हो गया।
  • 11 नवंबर 2013 को नियोजित चौथे चरण में शिरोबिन्‍दु को 130 मीटर प्रति सेकंड की गति देकर लगभग 1 लाख किलोमीटर तक ऊपर उठाने की योजना थी, किंतु लिक्विड इंजिन में ख़राबी आ गयी। परिणामतः इसे मात्र 35 मीटर प्रति सेकंड की गति देकर 71,623 से 78,276 किलोमीटर तक ही किया जा सका।
  • इस चरण को पूरा करने के लिए एक पूरक प्रक्रिया 12 नवम्बर को सुबह 05 बजे पुनः दोहरायी गयी। 12 नवंबर 2013 को एक बार फिर मंगलवार, मंगलयान के लिए मंगलमय सिद्ध हुआ। सुबह 05 बजकर 03 मिनट पर 303.8 सेकंड तक इंजन को दागकर यान को 78,276 से 118,642 किलोमीटर शिरोबिन्‍दु की कक्षा पर सफलतापूर्वक पहुँचा दिया गया।
  • 16 नवम्बर 2013 को पांचवीं और अंतिम प्रक्रिया में सुबह 01:27 पर 243.5 सेकंड तक इंजन चालू करके यान को 1,92,874 किलोमीटर के शिरोबिंदु तक उठा दिया। इस प्रकार यह चरण भी पूरा हुआ।
  • 30 नवंबर की रात एवं 1 दिसंबर की मध्यरात्रि को 00:49 पर मंगलयान को मार्स ट्रांसफ़र ट्रेजेक्‍टरी में प्रविष्‍ट करा दिया गया, इस प्रक्रिया को ट्रांस मार्स इंजेक्शन (टीएमआई) ऑपरेशन का नाम दिया गया।

सपना साकार होने की घड़ी

यह इसकी 20 करोड़ किलोमीटर से ज़्यादा लम्बी यात्रा की शुरूआत थी, जिसमें नौ महीने से भी ज़्यादा का समय लगना था और वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसके अन्तिम चरण में यान को बिल्कुल सटीक तौर पर धीमा करने की थी ताकि मंगल ग्रह अपने छोटे गुरुत्व बल के ज़रिये इसे अपने उपग्रह के रूप में स्वीकार करने को तैयार हो जाये। इस वक़्त इसरो प्रमुख डॉ० के राधाकृष्णन ने कहा कि मंगल अभियान की परीक्षा में हम पास हुए या फ़ेल, यह तो 24 सितम्बर को ही पता चलेगा।

22 सितम्बर 2014 को एमओएम (मार्स आर्बिटल मिशन) के तहत मंगलयान ने मंगल के गुरुत्वीय क्षेत्र में प्रवेश किया। लगभग 300 दिन की संपूर्ण यात्रा के दौरान सुषुप्ति में पड़े रहने के बाद मंगलयान के मुख्य इंजन 440 न्यूटन लिक्विड एपोजी मोटर को 4 सेकंड्स तक चलाकर अंतिम परीक्षण एवं अंतिम पथ संशोधन का कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया। भारतीय वैज्ञानिक आस्वस्त हो गये कि अब सफलता उनके क़दम चूमनेवाली है।

24 सितम्बर 2014 की सुबह 7 बजकर 17 मिनट पर 440 न्यूटन लिक्विड एपोजी मोटर (एलएएम) यान को मंगल की कक्षा में प्रवेश कराने वाले थ्रस्टर्स के साथ सक्रिय किया गया, जिससे यान की गति को 22.1 किमी प्रति सेकंड से घटकर 4.4 किमी प्रति सेकंड करके मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रविष्ट कर दिया गया। जिस समय यान मंगल की कक्षा में प्रविष्ट हुआ, उस समय पृथ्वी तक इसके संकेतों को पहुँचने में लगभग 12 मिनट 28 सेकंड का समय लगा।

ये संकेत नासा के कैनबरा और गोल्डस्टोन स्थित डीप स्पेस नेटवर्क स्टेशनों ने ग्रहण किये और आंकड़े रीयल टाइम पर इसरो स्टेशन पर भेजे गये। मार्स ऑर्बिटर मिशन के मंगलयान-1 में पांच वैज्ञानिक उपकरण हैं, जैसे मार्स कलर कैमरा (एमसीसी), थर्मल इन्फ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर (टीआईएस), मंगल के लिए मीथेन सेंसर (एमएसएम), लाइमैन अल्फा फोटोमीटर (एलएपी) और मार्स एक्सोस्फेरिक न्यूट्रल कंपोजिशन एनालाइजर (एमईएनसीए)।

यह कार्य संपन्न होते ही सभी वैज्ञानिक ख़ुशी से झूम उठे। भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया, जिसने पहले ही प्रयास में अपना मंगल अभियान पूरा कर लिया। इस ऐतिहासिक घटना का गवाह बनने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री बैंगलोर के इसरो केंद्र में मौजूद रहे। एक संयोग ही कहिए कि इस मंगल यात्रा में मंगलवार महत्वपूर्ण दिन रहा। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी ट्विटर पर इसरो को बधाई दी।

मंगलयान-2 की पूरी संकल्पना

भारत ने इस मिशन पर क़रीब 450 करोड़ रुपये ख़र्च किये, जो बाक़ी देशों के अभियानों की तुलना में सबसे कम है। अब सवाल उठता है कि इस अभियान से क्या प्राप्त हुआ। इस अभियान का लक्ष्य स्वदेशी वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग करके मंगल की सतह की विशेषताओं, आकृति विज्ञान, खनिज विज्ञान और मंगल ग्रह के वातावरण को समझने का प्रयासभर था। कक्षा में स्थापित होने के कुछ ही घंटों में यान ने मंगल ग्रह की ली गयी तस्वीरें भेजनी शुरू कर दी थीं। 500 से ज़्यादा हाई रिज्योलूशन चित्र प्राप्त हुए। मंगलयान ने मंगल ग्रह के वातावरण अध्ययन के लिए बहुत बड़ी संख्या में डेटा उपलब्ध करवाया। मीथेन गैस का पता लगाया, साथ ही रहस्य बने हुए ब्रह्मांड के उस सवाल का भी पता लगाया कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं?

इस मिशन से मंगल ग्रह के बारे में ढेरों अन्य जानकारियाँ हासिल हुईं। जिनके अध्ययन से यह भी पता चल पाएगा कि क्या इस ग्रह के गर्भ में खनिज छिपे हैं, वहाँ बैक्टीरियाओं का भी वास है कि नहीं। पूरे विश्व के वैज्ञानिक न जानकारियों पर शोध कर रहै हैं। मंगलयान-1 की उम्र छः महीने की थी, लेकिन यह कई वर्षों तक कार्य करता रहा। वर्ष 2022 में ईंधन समाप्त होने के कारण इसका संचालन समाप्त हो गया।

मंगलयान के पहले लॉन्च से ठीक बारह वर्ष बाद इसरो ने मंगलयान-2 को 2030 में लॉन्च करने की घोषणा की है। इस अवसर पर इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने कहा, “5 नवंबर 2013 को लॉन्च हुआ पहला मंगलयान सफल रहा था और उस मिशन ने भारत को पहला एशियाई देश बनाया जो मंगल की कक्षा तक पहुँचा। साथ ही भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना, जिसे पहले प्रयास में ही सफलता मिली।”

मंगलयान-2 के अभियान में भारत का अंतरिक्ष विज्ञान बहुत बड़ी छलांग लगाएगा। पहला मंगलयान प्रक्षेपण मंगल ग्रह के चारों ओर चक्कर लगाने का अभियान था, लेकिन नया मिशन अपने साथ एक ऑर्बिटर, एक लैंडर और संभव हुआ तो एक छोटा रोवर भी लेकर जाएगा। इस अभियान में उन्नत रॉकेट प्रौद्यौगिकी, सटीक और बाधारहित रास्तों की खोज के साथ उतरने के लिए नयी प्रणाली विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ने की संकल्पना है।

इस प्रणाली के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे मंगल ग्रह के हल्के वायुमंडल में भी काम कर सकें और ग्रह की सतह पर सही जगह उतर भी सकें। संक्षिप्त में कहें तो चंद्र के अलावा किसी दूसरे ग्रह पर भारत की पहली सॉफ़्ट लैंडिंग का प्रयास भी होगा। इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में इस मिशन का शुरूआती अध्ययन और डिज़ाइन का कार्य लगभग पूरा हो चुका है। अब इस मिशन के लिए पेलोड और डाटा को साझा करने के लिए दूसरे देशों से सहयोग लेने की प्रक्रिया चल रही है।

मंगलयान-2 की सफलता भारत को उन देशों की सूची में शामिल कर देगी, जो मंगल पर उतर चुके हैं जिनमें सिर्फ़ अमेरिका, चीन और पहले का सोवियत संघ शामिल है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह मिशन भारत की गहरे अंतरिक्ष में ख़ुद-ब-ख़ुद रास्ता खोजने, सतहों की तस्वीरें लेने और मिट्टी-पत्थर की जाँच की क्षमता को अत्याधुनिक स्तर पर सक्षम कर देगा। साल 2030 में होने वाला यह लॉन्च मंगल की खोज में भारत के वैज्ञानिक विकास के लिए नये-नये क्षितिज तैयार करेगा।

अब भारतीय समाज को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि मंगल, शादी-ब्याह का कोई दोष नहीं, बल्कि पृश्वी की तरह एक ग्रह है। इसकी कृपा के लिए हनुमान जी की जगह विज्ञान और प्रौद्योगिकी में आस्था की ज़रूरत है।

(चित्र मंगलयान-1 का और सूचनार्थ, लेख में सभी समय भारतीय प्रणाली के अनुसार हैं)

प्रदीप मिश्र, pradeep mishra

प्रदीप मिश्र

परमाणु ऊर्जा विभाग के राजा रामान्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र, इंदौर में वैज्ञानिक अधिकारी के साथ ही साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान। कुछ अख़बारों के साहित्य पृष्ठ और पत्रिकाओं के अंकों का संपादन। एकाधिक कविता संग्रह, विज्ञान उपन्यास, बाल उपन्यास प्रकाशित। समवेत संकलनों तथा साहित्यिक वार्षिकियों में रचनाएँ। पत्रिकाओं, पत्रों, आकाशवाणी, ज्ञान वाणी और दूरदर्शन आदि से प्रकाशन एवं प्रसारण। म.प्र साहित्य अकादमी सहित अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत। कुछ रचनाओं का दूसरी भाषाओं में अनुवाद। संपर्क: 9425314126।

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