कुमार गंधर्व, kumar gandharva
पाक्षिक ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से....

स्वर, रंग-रूप, भंगिमा, आकाश और अन्य तत्व

             उन दिनों भोपाल में रहना वाक़ई सौभाग्य था। कभी तो ऐसा भी हुआ कि कुमार जी को सुनने का मौक़ा हर हफ़्ते मिला। एक या दो बार तो अशोक काका-रश्मि मासी के घर में बैठकर सुनने का मौक़ा भी आया। कैसे-कैसे कार्यक्रम हुए उन दिनों कुमार जी के भोपाल में- कभी मीरा, सूर, कबीर की त्रिवेणी। कभी सिर्फ़ होली। कभी उनके सिरजे हुए नये राग-रसिया, संजारी, मालवती, सहेली तोड़ी, गांधी मल्हार, मधसुरजा। कभी ‘गीत वर्षा’, ‘ऋतुराज’, कभी राग कल्याण-एक दर्शन। कभी भैरव के प्रकार।

समझ तो आज भी क्या आता है और तब तो बिल्कुल ही नहीं आता था। लेकिन, बुद्धि से समझने के पहले बचपन में कई अनुभव सीधे सोख लिये जाते हैं। वे अनुभव, वे लोग, वे जगहें आपके भीतर रहने लगती हैं। आप उनकी छाया में बड़े होते हैं। वे आपकी दैहिक मांस-मज्जा को नहीं, आपके होने मात्र को गढ़ते हैं।

“गुरुजी, जहाँ बैठूँ वहाँ छाया है
सोहि तो मालक म्हारी नज़रां में आया है”

यह तो बहुत बाद में पता चला कि “भारतीय सांगीतिक आकाश के भाल पर कुमार गंधर्व का प्राकट्य एक धूमकेतु की तरह था, जिससे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत दो हिस्सों में बँट गया- एक कुमार गंधर्व के पहले और दूसरा उनके बाद- भारतीय संगीत में ईसा पूर्व और ईसा पश्चात्।” (राघव मेनन-म्यूज़िकल जर्नी ऑफ़ कुमार गंधर्व)

डॉ. अशोक दामोदर रानडे के अद्भुत लेख से जाना कि- “जिस समय कुमार गंधर्व ने भारतीय संगीत-जगत में पाँव रखा, ख़याल गायकी अपना सारा लचीलापन खो चुकी थी और उतनी ही रूढ़िग्रस्त थी जितना बैसाखियों पर टिका हुआ ध्रुपद। कुमार गंधर्व ने लगभग अपने अकेले बूते पर इस दमघोंट परिस्थिति को बदलने की कोशिश की। उनकी कलात्मक प्रौढ़ता के चलते, वे महज़ रूढ़ि और असल परंपरा में विवेक कर पाये।”

इसी तरह सत्यशील देशपांडे के आलेख से एक ठोस तथ्य के रूप में यह जाना कि “कुमार गंधर्व ने हमारी शास्त्रीय बंदिशों को सास-सौतन-पिया से मुक्त किया। उन्होंने हिंदुस्तानी संगीत रूपी प्रतिमा पर दशकों से जामा होते गये सिंदूर को खुरचकर साफ़ कर दिया, जिससे देवता का (राग संगीत) का असल स्वरूप उभरकर सामने आ गया। वे शास्त्रीय संगीत के प्राण तत्व को घरानों की जकड़बंदी से मुक्त कर उसके असल मूल स्वरूप को पुनः लैटा पाये।” (पूर्वग्रह, अंक 16, 1976)

किन्तु मेरे और मेरे जैसे कई अन्य सहृदयी सुननेवालों के भीतर तो शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग की बुनियाद ही कुमार गंधर्व के गायन से पड़ी। कान ही उनकी गायकी से तैयार हुए और इसलिए उनके द्वारा हिदुस्तानी संगीत में किये गये क्रांतिकारी बदलाव हमारे लिए तो उसका सहज स्वरूप थे। हालोंकि, यह पूरा सच नहीं है। उसी समय में अन्य कई संगीतकारों को सुनने के दौरान, संगीत के शास्त्रीय ज्ञान से अनभिज्ञ होते हुए भी, इतना स्पष्ट महसूस होता था कि कुमार जी का संगीत से संबंध दूसरों से अलग है। कि संगीत की उनकी धारणा और उससे प्राप्य की अपेक्षा भी कुछ और है।

जब वे किसी राग की शुरूआत करते हैं, तो पहले उसके स्वरूप को चिन्हित करने वाले स्वरों का आह्वान-सा करते जान पड़ते हैं- कुछ वैसे ही जैसे कथकली या कई प्रांतों की रामलीला मे सारे सरूपों का वंदन कर उन्हें एक-एक कर मंच पर आमंत्रित किया जाता है। और तब उस राग और लय में निबद्ध बंदिश का निरूपण उन स्फुट स्वर समुच्चय/स्वरांशों (म्यूज़िकल फ्रेसेज़) से करते है जो उस राग का मर्म है।

उनके गयन में रियाज़, तैयारी, सुरीलापन तो जैसे अंतिम कतार में अदृश्य हो बैठे रहते हैं। उनका यहाँ कोई काम नहीं है। यहाँ तो हर क्षण उस राग से नया रिश्ता बनाने, उसके मूल भाव के निकट, और निकट पहुँचने की कोशिश दिखती है।

रूसी लोककथा के तिलिस्मी घोड़े पर सवार ईवान की तरह स्वर कई मंज़िला भवन की अटारी की ओर छलाँग लगाता है और देखने वालों की साँस थमी की थमी रह जाती है। वह कब राजकुमारी के होठों को छू, उसकी हीरे की अँगूठी ले, पलक झपकते वहाँ से ऐन सबकी नज़रों के सामने से ओझल हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता!

उनके यहाँ एक राग का विशिष्ट भाव कभी, स्वर लताओं के घुमावदार तन्तु से घेरकर बांध लिया जाता है तो कभी एक तीक्ष्ण स्वर शूल से औचक बींध लिया जाता है। यह कैसे होगा, इसकी गायक को भी एक क्षण पहले तक ख़बर नहीं होती। वह स्वयं ही चकित रह जाता है, अपने भीतर से अचानक फूटे उस सहस्र-स्वर-दल सूरजमुखी पर!

यूं तो राग संगीत में ‘उपज’ की अपूर्वानुमेयता को हर संगीतकार महत्वपूर्ण मानता है और उसकी यह अपूर्वानुमेय संभावना ही उसे दुनिया भर के संगीत से अलग करती है किन्तु, अधिकांश संगीतकारों में इसका स्वरूप व्याकरण के एक निश्चित फ्रेम में, दीर्घ रियाज़ के फलस्वरूप आसानी से स्वरों की बाज़ीगरी का रूप ले लेता है। कुमार गंधर्व का गान शुरू से आख़िर तक ‘कला का जोखिम” उठाता गायन है।

कुमार गंधर्व, kumar gandharva

गायन के दौरान प्रतिपल उसके अप्रत्याशित स्वरूप की प्रत्याशा है। स्वर कब, किस वेग से उठेगा, घूमेगा या छलाँग लगा डुबकी लगा जाएगा, कितनी देर बाद, किनारे से कितनी दूर फिर उसका सिर सतह के ऊपर प्रकट होगा, होगा भी या नहीं? स्वरों की यह आशु रचनात्मकता श्रोता को भी चौकन्ना किये रहती है- रस के बहाव में महज़ बहने नहीं देती बल्कि अपने श्रोता से सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा करती है।

चेख़व अपने एक पत्र में अलेक्सी सुवोरिन को 1890 में लिखते हैं- “लिखने के दौरान मैं पूरी तरह से अपने पाठक पर भरोसा करता हूँ और आश्वस्त रहता हूँ कि जो ब्योरे मुझसे छूट गये होंगे, उन्हें वह ख़ुद भर लेगा।” (How to write like Chekhov- edited and introduced by Piero Brunella and Lena Lencek, Lifelong Books, 2008)

यह कैसी अपूर्व आश्वस्ति है एक लेखक की अपने पाठक पर! वह उसका निरा मनोरंजन करने के बजाय उससे लगभग बराबरी की भागीदारी की माँग कर रहा है।

प्रिय फ़िल्मकार अब्बास किरस्तमी की फ़िल्मों के दृश्य की याद भी इस सिलसिले में आती हैं, जिनमें जो स्क्रीन पर दिखायी या सुनायी दे रहा होता है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण स्क्रीन के बाहर छूट गये दृश्य का बोध दर्शक में जगाना होता है। उन्होंने दार्शनिक ज़्याँ लूक नैन्सी को दिये गये एक साक्षात्कार में कहा है- “मैं एक ऐसी फ़िल्म बनाना चाहता हूँ जिसमें कुछ न कहा जाता हो, ताकि दर्शक सिर्फ़ एक कहानी देखने कि बजाय अपनी अपनी कहानी ख़ुद गढ़ते हों।” (‘The evidence of film’ by Jean Luk Nancy, Garage Screen series)

यह जो कैमरे से बाहर छूट गया है, उसे फ़िल्म देखनेवाले दर्शक के अनुभव में शामिल करने की फ़िल्मकार की अभिलाषा है, इसका नाता दर्शक की सहभागिता की कामना से भी है, और उसे फ्रेम के भीतर और बाहर यथार्थ के नैरंतर्य का अहसास कराने से भी है। कुछ ऐसी ही बात अपने गायन के संदर्भ से कुमार गंधर्व भी कहते हैं। हिंदुस्तानी संगीत में स्वर समुच्चयों के मध्य अंतराल का जैसा इस्तेमाल कुमार जी ने किया है, वैसा किसी अन्य संगीतकार ने नहीं किया है। अंतराल को बढ़ाने की आकांक्षा का नाता ही अन्य (श्रोता) को भागीदारी के लिए आमंत्रित करने से है।

अपने गायन में स्वर के अचानक विलीन होने और फिर प्रकट होने के अंतराल की घटना को कुमार गंधर्व ने चित्रकला में स्पेस की निर्मिति के रूपक से समझाया है। वे कहते हैं- “तानपूरा और तबले को मैं ख़ाली ड्रोन नहीं समझता। ये जो तानपूरे हैं, मैं इस पर स्वर के साथ पेंटिंग करना चाहता हूँ। ये मेरा कैनवास हैं। मुझे जिस रंग का कैनवास चाहिए, वो तैयार हो जाता है पीछे तानपूरे पर। तो क्या होता है कि गाते समय बहुत बार मेरे साथ तानपूरे गाते रहते हैं। मैं ऐसे कोण पर स्वर को छोड़ देता हूँ कि मुझे कुछ करना नहीं पड़ता। वे स्वतःस्फूर्त तरीक़े से उसमें विलीन हो जाते हैं। यानी, ऐसे मौक़े पर स्वर को छोड़ना चाहिए कि उस ढंग से छोड़ते ही उसमें से जो चीज़ थी, वह तानपूरे में से निकलने लगती है। जिसे आप स्पेस कहते हैं, वह ऐसे ही निर्मित होती है।”

कुमार जी की इस बात पर जितना मनन करो, उतनी ही स्पेस की व्याख्या खुलती चली जाती है- चार्ल्स कोरिया के भारत भवन के आँगन-दर-आँगन वाले स्थापत्य की तरह। यह अकारण नहीं है कि कुमार गंधर्व का वास्तुकला से भी गहरा जुड़ाव था। वास्तुकला से संगीत के संबंध को जोड़ते हुए ही उन्होंने स्वरों के गुरुत्व, उसके वज़न, उसकी भारहीनता, उसकी लम्बान, सीधी, आड़ी, तिरछी, घुमावदार चाल, उसके मूर्त-अमूर्त और हाँ, अंतराल से संपृक्त होने की बात कही है।

अपने माटी शिल्पों में शुरू से मेरी जद्दोजहद एक ओर गुरुत्वाकर्षण के घनत्व, तो दूसरी ओर उससे मुक्त हो ऊपर हवा में पंजे के बल उठने की रही है। साथ ही एक रूपाकार अपने इर्दगिर्द के अंतराल से कैसे सम्वाद कर रहा है यह भी शिल्प के होने में अत्यंत महत्व रखता है।

क्या यही कारण है कि मिट्टी में काम करने के दौरान, काम शुरू करने के पहले अक्सर कुमार जी को ही सुनती हूँ? अवचेतन में कहीं आस रहती हो कि उनके गायन के केंद्र में बसने वाला अंतराल या निविड स्तब्धता शिल्पों में भी आ जाये? स्टूडियो, मिट्टी और कुमार जी का गायन! “यह संपूर्ण की ख़ामोशी है” (नवीन सागर की पंक्ति) इससे अधिक क्या चाहिए?

माँ (ज्योत्स्ना मिलन) के मुँह से अक्सर नरसिंह मेहता की यह पंक्ति सुनी थी- “हरि ना जन, मुक्ति नहिं माँगे, माँगे जन्मो जनम अवतार”

अन्य जन्मों का तो पता नहीं, पर यह जन्म कुमार गंधर्व को सुनते हुए संपूर्ण लगता है- उसका कोई और अर्थ न भी निकले, तब भी। कुमार जी का गाया ‘निंदियारी’ कानों में भर जाता है-

“नाम तेरो निस दिन ललन उचारे
आजा रे आ जा!”

(चित्र परिचय: डॉमिनीक ज़ेवियर रचित कुमार गंधर्व का इलस्ट्रेशन रेडिफ.कॉम से साभार)

shampa shah, शम्पा शाह

शम्पा शाह

कला की दुनिया में रमी हुई यह कलाकार सिरैमिक की लोक कला और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाती रही है और मृदा कला के संरक्षण/संवर्धन में योगदान देती रही है। भारत के अनेक शहरों सहित अनेक देशों में कला प्रदर्शनियां आपके नाम हैं। आपकी शिल्प कला में मानवीय, प्राकृतिक एवं मिथकीय रूपों का एक अंतर्गुम्फन एक थीम की तरह प्रतिध्वनित होता है। भोपाल स्थित मानव संग्रहालय में 20 और कला के क्षेत्र में 30 से अधिक सालों तक सेवाओं के साथ ही साहित्य, संगीत व सिनेमा जैसे कलाक्षेत्रों में भी ख़ासा दख़ल।

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