
- February 25, 2026
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पंजाबी और हिंदी दोनों में समानाधिकार से लिखने वाले कथाकार गुलबीर सिंह भाटिया की कहानियाँ मानवीय रिश्तों की, आम ज़िंदगी की छोटी-बड़ी किन्तु गहरा प्रभाव डालने वाली उलझनों और मन में उथल-पुथल मचाते बारीक से बारीक भावों को सफलतापूर्वक प्रकट करती हैं। सत्ता विकास-विकास-विकास रूपी काँच के जिन छर्रों को हीरों के भाव बेचती है; वे किसी शहर-गाँव और वहाँ के प्रत्येक व्यक्ति को कभी न भरने वाले ज़ख़्म देते हैं। एक्वेरियम में मछली गोते खाती है या तड़पती है, यह विस्थापन के भुक्तभोगी जानते होंगे। - शशि खरे (संपादक: कथा प्रस्तुति)
गुलबीर सिंह भाटिया की कलम से....
मछली का मायका
कच्ची सड़क पर बस धीमी गति से आगे बढ़ रही थी। यही गति संगीता के विचारों की भी थी। कहीं कहीं तो वह सोच के चौराहे पर एकदम रुक ही जाती। चाह कर भी आगे बढ़ना जैसे उसके वश में न होता। वह सोच रही थी कि कुछ ऐसा हो गया है जो कभी हो ही नहीं सकता था। जिसकी कभी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। संसार की रचना से लेकर आज तक ऐसा कभी किसी के साथ भी नहीं हुआ होगा। उसने अपनी सोच बदलने का प्रयास किया – कहीं मैं अधिक भावुक तो नहीं हो रही। हुआ तो यह पूरे शहर के साथ है। बहुत से गाँवों के साथ भी, बहुत लोग तो खुश भी थे। ….. लेकिन शीघ्र ही उसने तय कर लिया कि उसकी सोच अति भावुकता का शिकार नहीं। यह सब भला सहजता से स्वीकार कैसे किया जा सकता है।
सड़क की बायीं ओर विशाल जलाशय था। दाहिनी तरफ क्या है, यह देखने जानने की न तो उसकी इच्छा थी और न ही वह देख पा रही थी। बस में बैठते समय उसने सीट ही बायीं ओर की चुनी थी। सुनी सुनाई बातों से उसे पता चल गया था कि जब बस जलाशय के किनारे बनी नई सड़क पर से गुजरेगी तब जलाशय सड़क की बायीं ओर रहेगा। जलाशय के एक एक दृश्य को वह अपनी आँखों में भर लेना चाहती थी।
जलाशय की भूमिका तो लगभग दस वर्ष पूर्व बनी थी लेकिन प्रक्रिया पिछले वर्ष ही तेज हुई थी। छोटा भाई दिनेश निरंतर सूचना भेजता रहा था। सरकारी नोटिस, मुआवज़ा, घर खाली करने की अंतिम तारीख, घर का गिरा दिया जाना, सामान ढुलाई और घर से लगभग बीस किलोमीटर दूर नयी बस्ती में नया बसेरा। सब कुछ साल भर में निपट गया। दिनेश की ओर से इन समस्त स्थितियों की सूचना उसे निरंतर प्राप्त होती रही थी। सूचित करते समय दिनेश उत्साहित सा सगता था लेकिन उसे हर सूचना आहत करती थी। यहाँ तक कि भरपूर मुआवजा मिलने और बदले में भू-खण्ड प्राप्त होने की सूचना ने भी उसे पीड़ा पहुँचाई थी। हद तो तब हुई जब पिछले सप्ताह दिनेश ने पिता की मृत्यु की सूचना भी इस ढंग से दी जैसे यह भी इसी प्रक्रिया का ही एक हिस्सा हो, जिसका होना अपरिहार्य था। पिता की अंत्येष्टि में वह चाह कर भी न पहुंच सकी थी। अब दशगात्र में जा रही थी। नये घर का पता उसे याद नहीं था। कागज पर लिख कर पर्स में डाल लिया था।
गोद में बैठे गोलू की दृष्टि पानी में मछलियां तलाश रही थी। बहुत देर के बाद उसे एक मछली दिखाई दी तो उसने उसका ध्यान आकर्षित किया – देखो मम्मी मच्चली!
उसने ध्यान से देखा। पर उसे मछली दिखाई न दी। चाहती तो पूछ सकती थी – कहाँ है मछली ? पर पूछा नहीं। उसे लगा कि यदि वह बोल पड़ी तो उदासी कम हो जायेगी। वह चाहती थी कि उदास ही बनी रहे। उदास रहना उसे सुख भोगने की तरह लग रहा था।
आठ घंटों की यात्रा ने शरीर थका दिया था। धूप तेज हो गयी थी। आगे पीछे की सवारियों ने खिड़कियां बंद कर ली थीं पर उसे एक-एक पल के दृश्य को आँखों में भरना था। खिड़की खुली ही रखी। गोलू सो गया तो उसके चेहरे पर आँचल की छाँव कर दी। वह नहीं जानती थी कि इस विशाल सागर को निहार कर वह दुख महसूस कर रही है या सुख। विषाद और कौतूहल का मिला जुला भाव उसके चेहरे से झलक रहा था। दूर दूर तक दृष्टि दौड़ाकर वह अपने डूब चुके घर की स्थिति का अनुमान लगाने का प्रयास कर रही थी। एक स्थान पर दृष्टि गड़ा कर उसने सोचा कि यही वह स्थान होगा जहां उसका घर था, आँगन था, गली मोहल्ला था। गुड्डे-गुड़िया का खेल, खो-खो, बिल्लस, लुका छिपी। वह अपने बचपन के दिनों की पिता की छवि को याद करने का प्रयास करने लगी। वह जानती थी कि घर के आंगन में गड़े लकड़ी के खम्भे से पीठ सटा कर बैठे बीड़ी पीते पिता जब उसे गोद में खिलाया करते थे तब वे युवा थे। लाख कोशिश करने पर भी उसकी स्मृति में पिता का युवा चेहरा न उभर पाया। स्मृति में उसे गोद में खिलाते पिता का चेहरा, गत वर्ष अंतिम बार देखे पिता का ही था। वह ससुराल जाने के लिए विदा हो रही थी। उसने कहा था-लगता है, यह घर, गली-मुहल्ला आखिरी बार देख रही हूँ, अगले वर्ष डूब जायेगा यह सब कुछ। प्रतिक्रिया के लिए उसने पिता की ओर देखा था पर वे कुछ नहीं बोल सके थे। पथराई आंखों से क्षितिज की ओर देखते रहे थे।
जलाशय में पानी अभी काफी कम था, एक चौथाई से भी कम। कहीं-कहीं डूबे हुए ऊँचे पक्के मकानों के अवशेष झलक रहे थे। उसका अपना घर तो छोटा सा था, खपरैल की छत वाला। एकाएक उसे विनोद की याद आई। पानी के ऊपर झलकते इन मकानों में कोई मकान विनोद का भी हो सकता है। न जाने वे लोग कहाँ गये होंगे।-माँ से पूछूँगी, उसने सोचा। – पूछ पाऊँगी या नहीं! उससे न पूछूँ तो फिर कौन बतायेगा ! कहाँ गईं वे सखी सहेलियाँ जिनसे यह सब कुछ पूछा बताया जा सकता था।
जलाशय को पार कर बस पक्की सड़क पर आ गयी थी। अब सड़क के दोनों ओर खेत थे। थोड़ी देर बाद बस बस्ती में प्रवेश कर एक स्थान पर रुक गई। बस्ती अपने नयेपन का पूरा अहसास दिला रही थी। पूरी रंगत के साथ बिछी मुरम, काली चिकनी सड़क और ताजे रंगों में निखरे छोटे-छोटे मकान। उत्सुक आँखों से आस पास को निहारती हुई वह गोलू को गोद में लिए छोटे से अटैची के साथ बस से उतरी।
– रिक्शा ? आवाज आई।
– हाँ, वह रिक्शे में बैठ गई।
– कहाँ चलना है ?
उसने पर्स टटोला। मनुष्यता के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है जब कोई लड़की मायके का पता दिल से नहीं पर्स से निकाल रही हो, उसने सोचा और फिर पता पढ़कर रिक्शे वाले को सुनाया। थोड़ी देर में ही रिक्शा एक छोटे लेकिन लगभग एक जैसे मकानों की बस्ती में प्रवेश कर गया।
छोटी बहन हर्षा दरवाजे पर ही खड़ी थी। सुबकती हुई वह रिकशे से उतरी और हर्षा के गले जा लगी। रूआँसी हर्षा ने गोलू को गोद में ले लिया। भीतर से माँ भी बाहर आ गई। आसू बहाती संगीता मां से लिपट गई – माँ ….. बाबू जी। माँ ने पहले उसके और फिर अपने आँसू पोछे- हो गया बेटी, जो होना था …. ।
तीनों बैठ गईं। थोड़ी देर में दिनेश भी आ गया, रुआँसा सा संगीता के पास आ बैठा। संगीता उसके गले में बाँह डालकर फिर से रो पड़ी। दो कमरों के छोटे से घर में संगीता ने नजर दौड़ाई। छत पक्की थी। खिड़कियां और दरवाजे जाने पहचाने लगे तो माँ ने बताया कि घर से निकाल लिए थे। सभी ने ऐसा ही किया। केवल दीवारें छूट गईं वहां।
तीन दिन बाद तेरहवीं थी और तेरहवीं के अगले दिन संगीता को लौट जाना था। अपनी गृहस्थी से इतना ही समय निकाल पायी थी वह पिता की तेरहवीं के लिए। तेरहवीं के दिन सब कुछ अति सामान्य रहा। अधिक लोग न आ पाये थे। सात-आठ रिश्तेदार, पास-पड़ोस की कुछ महिलायें और दिनेश के दो तीन दोस्त …. बस।
– यही सब घर में होता तो बहुत लोग आते, माँ ने कहा- पूरा मुहल्ला जुट जाता,
रिश्तेदार भी आते, सभी।
– घर में होते तो शायद बाबू जी अभी हमें छोड़कर जाते भी नहीं, संगीता ने कहा- वे तो घर डूबने से ही टूट गये। हर्षा ने हामी भरी, माँ ने मौन स्वीकृति दी, दिनेश चुप रहा।
अगले दिन संगीता को चले जाना था। बचे हुए समय को वह डूब चुके घर की स्मृतियों के साथ बिताना चाहती थी। हर्षा, गोलू को सीने से चिपकाये बार बार दुलार रही थी। दो साल का गोलू उसे बार-बार ‘हच्छा’ कह कर संबोधित करता तो वह खिल उठती। संगीता टोकती – हर्षा नहीं कहते बेटा, मौसी कहते हैं। लेकिन गोलू ‘हच्छा’ ही कहता। न जाने कितनी बार संगीता को दोहराना पड़ा था – हर्षा नहीं कहते बेटा, मौसी कहते हैं।
रात को जब मेहमान चले गये, पिता पर बहुत सी बातें हो चुकीं, गहन चुप्पी छा गयी तो संगीता को अथाह जल में डूबी हुई दीवारें याद आ गयीं। दीवारें, जिन पर उसने क, ख, ग लिखना सीखा था। दीवारें, जिनसे टिककर रोती थी वह बचपन में डाँट पड़ने पर, रोयी थी ससुराल जाते समय और गले मिला करती थी जिनसे ससुराल से लौटने पर।
– तुमने बताया था कि दीवारें वहीं खड़ी है, उसने माँ से पूछा। वह जानती तो थी कि दीवारें वहीं खड़ी हैं पर बात चालू करने के लिए उसने उन्हीं का सहारा लिया।
-हाँ, वहीं खड़ी हैं, माँ ने कहा – सभी घरों की दीवारें वहीं खड़ी हैं, हमारे घर की भी।
-कब तक खड़ी रहेंगी ?
– जब तक पानी की मार सह सकेंगी, आखिर गिरेंगी ही, कोई जल्दी कोई देर से, माँ ने उत्तर दिया।
– हम तो न सह सके पानी की मार, सँगीता अधिक उदास हो गयी – खपरे, बाँस बल्लियों का क्या हुआ ?
– बेच दिया सब कुछ, क्या करते उसका ?
– और वह लकड़ी का खम्भा, जिसके इर्द-गिर्द खेला करते थे हम, बाबूजी भी खेले थे अपने बचपन में, ऐसा बताया करती थीं दादी।
-बेच दिया, बाँस-बल्लियों के साथ, माँ ने थोड़ा खीझ कर कहा, मानों कहना चाहती हो कि अब सो जाओ।
थोड़ी देर चुप्पी छायी रही। फिर सँगीता ने अपनी सहेलियों के बारे में पूछा। अड़ोस पड़ोस के और लोगों के बारे में। खीझी सी माँ उत्तर देती रही। संगीता फिर मौन हो गयी। पर अधिक देर चुप न रह सकी। अंततः उसने पूछ ही लिया – उनका क्या हुआ पक्के मकान वालों का?
– विनोद की बात कर रही हो ? माँ का स्वर तीखा हो गया। दिनेश ने करवट बदल ली। हर्षा ने उनींदे गोलू को छेड़कर जगा दिया और फिर उसे सोने के लिए पुचकारने लगी। सँगीता चुप रही।
– नहीं मालूम, कहाँ गये वे लोग, थोड़ी चुप्पी के बाद माँ ने कहा और फिर करवट बदल ली।
अगले दिन दिनेश ने उसे बस में बिठा दिया। अब वह दाहिनी तरफ की सीट पर बैठी। बस जब जलाशय के किनारे की कच्ची सड़क पर पहुँची तो संगीता फिर जलाशय में डूब गयी। जलाशय के बीचो बीच खड़ी एक पक्की दीवार को उसने विनोद का मकान मान लिया। उससे सात आठ मकान दूर उसने अपने छोटे से घर की टूटी दीवारों की कल्पना की। उसे लगा कि किसी मछली ने उसके घर की दीवारों के बीच अपनी गृहस्थी जमा ली होगी। उसके बच्चे उस घर के कमरे में, रसोई में, आँगन में अठखेलियां करते होंगे। कोई जवान मछली उस घर से निकलती होगी और विनोद के घर के पास आकर अपने प्रेमी की प्रतीक्षा करती होगी।
तभी एक मछली पानी की सतह के ऊपर हवा में उछली और फिर पानी में समा गई। गोलू ने प्रसन्नता से कहा – वो देखो ‘मच्चली’
– मछली नहीं कहते बेटा, मम्मी कहते हैं, अपने ही ख्यालों में खोयी सँगीता ने गोलू से कहा और फिर पास बैठी सवारियों को अपनी ओर घूरते देखकर सर झुका लिया। गीली आँखें बंद हो गयीं।

गुलबीर सिंह भाटिया
1946 में रावलपिंडी में जन्म। हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं में बहुश्रुत लेखक। 20वी सदी के सातवे व आठवे दशक में प्रीतलड़ी, सारिका, नागमणि, पंजाबी डाइजेस्ट, नवां साहित्य, कंवल, सरदल आदि पत्र पत्रिकाओं में कहानियां, व्यंग्य, लेख आदि छपते रहे। कुछ कहानियों का मराठी, बांग्ला, उड़िया, अंग्रेज़ी व अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ। 1977 से 82 तक व्यंग्य के पत्र 'अट्टहास' का संपादन करने के साथ ही भाटिया ने साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक गुलज़ार सिंह संधू के पंजाबी उपन्यास 'ध्रुव तारे' का हिंदी अनुवाद भी किया। एक कहानी संग्रह व एक व्यंग्य संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। संपर्क: 9425555519।
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