
महाप्राण: व्यक्ति से कवि होना
बंगाल को हमेशा अपनी जन्मभूमि कहकर उस पर जान छिड़कने वाला बमुश्किल 20 बरस का नौजवान उन दिनों एक एस्टेट में मामूली नौकर हुआ। साल भर पहले पिता के गुज़र जाने के बाद नौकरी मजबूरी थी। राजा साहब के शौक़िया थिएटर से उसकी लोकप्रियता जब बढ़ना शुरू हुई थी, तभी इन्फ़्लुएंज़ा का प्रकोप अख़बारों के काले अक्षरों से गाढ़ा धुआं छोड़ने लगा।
‘तार आया – तुम्हारी स्त्री सख़्त बीमार है, अंतिम मुलाक़ात के लिए चले आओ।’ अख़बार बता चुके थे महामारी कितनी जानलेवा थी। युवक ससुराल पहुंचा तो पता चला कि पत्नी गुज़र चुकी। यही नहीं, जाते हुए रास्ते में उसने अपने दादाज़ाद भाईसाहब की लाश जाती हुई भी देखी। जब परिवार के लोग मर रहे थे, तब उसके पहुंचने पर चाचाजी ने कहा ‘तू यहां क्यों आया?’ उसने लिखा:
देखते-देखते घर साफ़ हो गया। जितने उपार्जन और काम करने वाले आदमी थे, साफ़ हो गये। चार बड़के दादा के, दो मेरे, दादा के सबसे बड़े लड़के की उम्र 15 साल, मेरी सबसे छोटी लड़की साल भर की। चारों ओर अंधेरा नज़र आता था… इतने दुख और वेदना के भीतर भी मन की विजय रही। रोज़ गंगा देखने जाया करता था। एक ऊंचे टीले पर बैठकर लाशों का दृश्य देखता…
यह क़िस्सा है हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का। यह डलमऊ का अवधूत टीला था, जिसे निराला के दुख ने हिन्दी जगत में स्मारक बनाया। डॉ. रामविलास शर्मा कहते हैं ‘जुही की कली’ को अगर निराला की पहली रचना मान भी लिया जाये, तो भी साफ़ दिखता है कि यह कविता इसी वेदना के अनुभवों से उपजी। इस कविता ने कवि को स्थापित करने वाली रचना का गौरव हासिल किया, जो मृत्यु के तांडव देखने के बाद भी सृजन का राग सुनाती है।
शतायु कवि यतींद्रनाथ राही ने एक खण्ड-काव्य ‘महाप्राण’ शीर्षक से रचा, जो निराला का जीवनवृत्त ही है। इस खण्ड काव्य में आठ सर्ग हैं। निराला की जन्मतिथि (21 फरवरी 1899-15 अक्टूबर 1961) के अवसर पर ‘संवेदन’ सर्ग यहां प्रस्तुत किया जा रहा है, जो असीम दुख से एक कवि के अंकुरण की यात्रा का एक प्रकार से चित्र भी है और दर्शन भी, आब-ओ-हवा की प्रस्तुति…

महाप्राण (खण्ड-काव्य का अंश)
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अवधूत शैल वह अर्द्धनिशा
भयभीत प्रकंपित दिशा-दिशा
दूरस्थ टूटते-ढहते तट
हर लहर मृत्यु की श्यामल लट।
हतकान्ति दीन-सा सूर्यकान्त
अवसाद-छिन्न दिग्भ्रान्त क्लान्त
या देख रहा विस्फारित दृग
गंगा में डूबा-सा अग-जग।
जल रहा चिताओं में यौवन
सुकुमार देह सौन्दर्य सुमन
मधुमय जीवन के मधुमय क्षण
वात्सल्य राग-अनुराग हवन।
विक्षुब्ध मृत्यु का अट्टहास
कर गया निमिष में वंश नाश
निरुपाय जड़ित दुर्भाग्यग्रस्त
क्या यही शेष या प्रकृति न्यस्त?
हो रहा लाश गंगा का तन
यह स्वर्ग नरक का उभय मिलन
नश्वर जीवन अस्तित्व बोध
सांसों पर चलने लगा शोध।
यह मात्र रूप का परिवर्तन
तत्वों का तत्वों में विघटन
जो महाशून्य में हुआ विलय
वह शाश्वत है वह है अक्षय।
होती है जैसे गन्ध अमर
ज्यों गीतकार के छन्द अमर
शाश्वत जीवन की परिभाषा
अधरों की, नयनों की भाषा।
तम पट में लिपटी ज्योति-किरण
घन मण्डित ज्यों सावनी गगन
अद्वैत-द्वैत यह उदय-अस्त
यति में गतिमयता सृजन व्यस्त।
सौन्दर्य अरे यह चिरनवीन
कब काल-ध्वस्त कब मृत्यु लीन
चह दिव्य ज्योति अन्त:सलिला
स्फूर्त चेतना काव्य-कला।
अवसाद-अश्रु यह पागलपन
नैराश्य पलायन कुंठित मन
आसक्ति नहीं है छलना है
यह महानाश का पलना है।
आसक्ति प्रेरणा ज्वाला है
पौरुष की फेनिल हाला है
यह नहीं तृप्ति है मात्र भोग
उसमें इंगित है कर्म योग।
विस्मृति में स्मृतियां हुईं लीन
स्थूल आवरण सब हुए क्षीण
खुलते अनन्त के वातायन
जीवन्त हुए वे बीते क्षण।
लाशों पर उभर गयी छाया
जीवन्त रश्मि चंचल काया
अधरों पर मौन निमन्त्रण थे
पलकों में बीते अनुक्षण थे।
अनुराग राग की सुमन सृष्टि
परिणय का मधुर ग्रन्थि-बन्धन
तन गये दिव्य धनु सप्त वर्ण
मेहदी-जावक-अक्षत-चन्दन।
फिर हुई समायित पुंजीकृत
तेरह बसन्त की सुमन सृष्टि
मधु पिंगल स्वर्ण शिखा चेतन
देवी मनोहरा देह यष्टि।
लज्जानत धवल अपांग मुखर
शशि मुख पर खिंचता अवगुंठन
अनुराग कपोलों पर छल-छल
प्राणों में शत-शत अभिनन्दन।
मिलनातुर हर्ष-प्रकम्प-स्वेद
गति मंजु मराल सुरभि-स्यन्दन
चुप-चुप कहते भी बज जाते
छुन-छुन नूपुर खन-खन कंगन।
वे धीर-अधीर विचंचल तम
सोलह शरदों के उठे ज्वार
बांहों में मचलन लहरों की
करते अनन्त छवि समाहार।
सांसों में फूट चला सौरभ
प्राणों में व्याकुल अलि-गुंजन
मृदु स्पर्श प्रहर्षित रोमांचित
मनुहार-समर्पण-परिरंभण।
वे नव सुहाग के स्नेह स्वप्न
कमनीय गात शैथिल्य तरल
जब स्वर्ण ढोलते थे प्रात:
पीयूष सान्ध्य के रंजित पल।
पर झरे तभी वे नयन कमल
मंथित कर प्राणों में हलचल
अधरों पर विक्षत कम्पन था
झंकृत सरोज का क्रन्दन था।
वह दृष्टि कि जैसे रत्नावलि
अन्तर के पृष्ठ खोलती थी
या कालिदास में तिलोत्तमा
जीवन के तत्व घोलती थी।
वह दृष्टि ज्योति निर्झरिणी-सी
कर गयी गलित जड़ अन्धकार
वह दृष्टि कि जिसमें फूट पड़ा
फिर किसी क्रौंच का चीत्कार।
वह दृष्टि कि जिससे श्रद्धा ने
मनु का नैराश्य मिटाया था
फिर महानाश के रोदन पर
जीवन-संगीत जगाया था।
वह दृष्टि गरल में घुलकर जो
बन गयी सोम का मधुर चषक
वह दृष्टि जिसे पा गीत बनी
हर विकल वेदना पीर कसक।
उस दृष्टि कोर से फिर जैसे
आसक्ति-ज्वार था मचल उठा
जो बूंद-बूंद कर रीता था
मधु-पात्र हृदय का छलक उठा।
मातृत्व-पितृ-दायित्व सघन
कर अनुबन्धित संकल्पित मन
चल पड़ा निराला सूर्यकान्त
वह क्षुब्ध ज्वार था सुप्त-शान्त।
पग-पग पर छंटता तिमिर-जाल
आलोक प्रिया का रूप ज्वाल
कंटक-कर्दम पाषाण ध्वस्त
था कलमकार अब सृजन व्यस्त।
प्रिय के वे धवल कटाक्ष क्षिप्र
थे शब्द शक्तियां समाहार
अधरों पर टंकित मौन अधर
प्रतिपल भाषा का परिष्कार।
सौन्दर्य सरोवर अनुमज्जित
फूटे निर्झर से सजल गान
वह एक अलौकिक दिव्य ज्योति
थी अखिल सृष्टि में दीप्तमान।
हो गये विलय अद्वैत-द्वैत
निष्काम-काम की सीमाएं
निस्सीम धरातल पर उभरी
कवि-कर्म-सृजन की रेखाएं।
-यतींद्रनाथ राही
