भारतीय गृहिणी, किचन में महिला, मध्यमवर्गीय परिवार, indian housewife, indian woman, middle class familiy, woman in kitchen
संदर्भ-अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, प्रमोद दीक्षित मलय की कलम से....

"मैं कुछ नहीं करती.."

            गत वर्ष फरवरी के उत्तरार्ध में शिक्षकों के एक तीन-दिवसीय शैक्षिक संवाद कार्यक्रम में जाना हुआ था। मुझे 90 मिनट के अपने सत्र में कक्षागत अनुभवों के दस्तावेज़ीकरण पर बातचीत करनी थी। पूर्वाह्न 11 बजे के टी ब्रेक के बाद मेरा सत्र था। दो घंटे के दो सत्रों के बाद हुए ब्रेक में सभी सहभागी शिक्षक-शिक्षिकाएं आम के पेड़ की नीचे बने बड़े से चबूतरे पर छोटे समूहों में गर्मागर्म सूप का आनंद लेते हुए परस्पर बातचीत में मशगूल थे, तभी मेरा पहुंचना हुआ। पूर्व परिचित साथी सूप का एक गिलास मुझे थमाते हुए अनौपचारिक बातचीत करने लगे। तभी दो-तीन नये साथी शामिल हुए, जो सपत्नीक आये थे। उनसे परिचय का क्रम शुरू हुआ। जब मैंने उनमें से एक सज्जन की पत्नी, जो लगभग पीछे की ओर कुछ सहमी-सी खड़ी थीं, से पूछा आप क्या करती हैं। वह कुछ बोल पातीं उससे पहले ही उनके पति तपाक से बोल पड़े, “कुछ नहीं करतीं, हाउस वाइफ़ हैं।” दूसरी महिला से यही सवाल किया तो उनका उत्तर था, “सर, मैं कुछ नहीं करतीं, घर और बच्चे संभालती हूं।”

मेरा मंतव्य उनको बातचीत में शामिल करना था, न कि उनकी नौकरी या अर्थोपार्जन के स्रोतों की जानकारी करना। किंतु उन दो उत्तरों ने मेरे मन-मस्तिष्क पर हलचल मचा दी थी। मैं सोच रहा था कि सामान्य गृहिणी क्या वास्तव में कुछ नहीं करतीं? क्या कुछ करने से आशय केवल अर्थोपार्जन से है? या फिर समाज में अभी भी घरेलू कामों को महत्व और स्वीकृति क्यों नहीं है। आख़िर एक महिला ‘मैं कुछ नहीं करतीं, गृहिणी हूं’ यह कहते हुए झेंपती क्यों है? घर-परिवार के निर्माण एवं साज-संभाल में, एक गृहिणी की कितनी बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका होती है इसका समुचित मूल्यांकन समाज ने अभी तक नहीं किया है। मुझे लगता है, इस मुद्दे को पक्षपात रहित स्वतंत्र मन-बुद्धि से समझना होगा। मैं इस मुद्दे की डोर से एक सच्चे संदर्भ का प्रसंग और जोड़ता हूं। इससे हम घर, समाज एवं राष्ट्र के विकास में महिलाओं की भूमिका का सम्यक् विवेचन कर सकेंगे।

बात निकली तो दूर तक गयी

मैं जब ब्लॉक संसाधन केंद्र में सह-समन्वयक के रूप में काम कर रहा था तब, कोविड काल के पहले की बात है.. मैं अपने क़स्बे से बिसंडा-बबेरू होते हुए फ़तेहपुर जा रहा था। बिसंडा से आगे निकलने पर बायीं ओर एक सुंदर सुव्यवस्थित हरा-भरा विद्यालय दिखा- पूर्व माध्यमिक विद्यालय सया। शिक्षा पर मेरी रुचि के चलते ऐसे विद्यालय मुझे आकर्षित करते रहे हैं। मेरे पैर अनायास ब्रेक पर जम गये, ब्रेक की चरमराहट के साथ गाड़ी रुकी और मैं बरामदे से होते ऑफ़िस पहुंच गया। औपचारिक परिचय के बाद मैंने बच्चों से बातचीत की इच्छा व्यक्त की। प्रधानाध्यापक तीनों कक्षाओं से लगभग आधे-आधे बच्चों को मिलाकर एक कमरे में बैठा, मुझे वहां ले गये। बच्चों से परिचय कर बातचीत शुरू की।

बच्चों के सवालों के संयोग से बातें लैंगिक असमानता पर चल पड़ीं। और विषय बन गया- घर के कामों में महिला-पुरुष की भागीदारी। सुबह सर्वप्रथम जागने से लेकर रात में सबसे अंत में सोने वाले व्यक्ति तक घर के सभी सदस्यों का कामों का विवरण ब्लैकबोर्ड पर लिखा गया। विश्लेषण से निष्कर्ष निकला कि महिला ही है, जो सबसे पहले जगती और सबसे अंत में सोती है। घर-बार तथा खेत-खलिहान के 80 प्रतिशत से अधिक कार्यों में महिलाओं एवं बालिकाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी है। समाधान निकला पुरुषों-बालकों को घर के इन कामों में हाथ बंटाना चाहिए, क्योंकि कार्यों का लिंग के रूप में कोई विभाजन नहीं होता।

ये बातें उदाहरण देकर समझायी गयीं। तभी सहसा एक बालिका ने तीखा सवाल कर दिया कि क्या मैं अपने घर में इन घरेलू कार्यों में हाथ बंटाता हूं, या यहां पर केवल उपदेश दे रहा हूं। मैंने स्वयं उत्तर देने की बजाय बारहवीं में अध्ययनरत बेटी संस्कृति को घर में फ़ोन लगा, स्पीकर पर बात करवायी। पूरी कक्षा ने लगभग 10-15 मिनट बात, तमाम सवाल किये। जवाबों से मिलने वाली संतुष्टि की ख़ुशी बच्चों के चेहरे पर खिल उठी थी। और एक प्रसंग को और जोड़ना लेख को समृद्ध करेगा।

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ऐसे ही एक बार मेरा पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरेहंड़ा जाना हुआ। मैं जब स्कूल पहुंचा तब प्रार्थना आरम्भ हो चुकी थी। प्रार्थना एवं राष्ट्रगान बाद मुझे सम्बोधन के लिए कहा गया। मैंने सामान्य सी बात कही कि जब तक कक्षाओं और सभाओं में बालक-बालिकाएं या महिला-पुरुष अलग-अलग कतारों में बैठेंगे, तब तक लैंगिक भेदभाव बना रहेगा। दूसरे दिन विद्यालय के शिक्षक रामकिशोर पांडेय जी का फ़ोन आया कि आज प्रार्थना सभा और कक्षाओं की बैठक व्यवस्था में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ। बच्चे मिक्स होकर बैठे। रोमांचित करता यह दृश्य मुझे आह्लादित करने वाला था। ये तीन घटनाएं, सामान्य घटना प्रसंग न होकर महिलाओं की घर-परिवार एवं समाज में स्थिति, भूमिका और उसके महत्व को रेखांकित करती हैं। पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला के श्रम की कितनी स्वीकृति हो सकी है, यह प्रश्न आज भी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समाधान की प्रतीक्षा में है।‌

कुछ पहलू और कई प्रश्न

‘मैं कुछ नहीं करती’ दरअसल एक महिला का अपना स्वर नहीं है, यह पुरुष प्रधान समाज की वह ध्वनि है, जो निरंतर एक महिला के कानों और मन-मस्तिष्क के माध्यम से उसके दिल में उतर टीस-कसक बन उसे कमतर और हीन सिद्ध कर रही है। समाज, घर के कामों को काम की श्रेणी में नहीं मानता। उसकी नज़र में काम का अर्थ केवल पैसा कमाने से है। जबकि भोर से देर रात तक घर के कामों में खटती महिला के काम के आधार पर ही घर-परिवार सबल, समर्थ और सुदृढ़ हैं। कह सकते हैं कि पुरुष की बजाय महिला कहीं अधिक श्रमशील है, पर उसका पारिश्रमिक और मूल्यांकन नगण्य है।

भारत सरकार द्वारा 2024 में जारी नेशनल सर्वे सैंपल के अनुसार औसतन एक महिला, एक पुरुष की तुलना में एक घंटा अधिक काम करती है तथा उसके मनोरंजन, काम के दौरान सुस्ताने का औसत पुरुष के 127 मिनट के बरअक्स 113 मिनट है। एक आश्चर्यजनक आंकड़ा तो यह भी है कि एक महिला तैयार होने में पुरुष की बजाय 6 मिनट कम लेती है किंतु सजने-संवरने के संदर्भ में वह हास्य का पात्र आज भी बनती है। मेरे एक दिवंगत बुज़ुर्ग साथी ने कभी बताया था पहले आम चुनाव में महिलाओं की पहचान उनके नाम से नहीं अपितु परिवार के किसी पुरुष के रिश्ते के आधार पर थी, जैसे महेश की अम्मा, रामचरन की दादी और गनेश की भाभी आदि।

स्वतंत्र भारत की इस लोकतांत्रिक यात्रा में अभी तक महिलाओं को वह सम्मान और महत्व नहीं मिला, जिसकी वे सर्वथा हक़दार हैं। उसके श्रम, समर्पण, संवेदना, स्वप्न, सहकार से उपजे कला, कौशल एवं उपलब्धियों को स्वीकृति नहीं मिल सकी, जबकि खुशियों के फ़लक पर महिलाओं की स्वेद स्याही से अंकित अमिट हस्ताक्षर हेम सम जगमगा रहे हैं। उन्हें महत्व और सम्मान दें, यह मानवीय गरिमा के लिए आवश्यक है।

महिला हितों, राजनीतिक एवं सामाजिक उत्थान, लैंगिक भेदभाव से मुक्ति तथा काम के घंटे, समान अवसर एवं वेतन की पैरवी करता अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक ऐसी समाज रचना की नींव रखता है, जहां महिला मानवोचित गरिमामय वातावरण में न केवल काम कर सके अपितु अपने सपनों की पतंग को अनंत आकाश में उड़ान भी दे सके। महिला सशक्तिकरण की राह इतनी आसान नहीं है जितनी ऊपर से दिखायी देती है।

पूरी दुनिया का संदर्भ लें तो पाएंगे कि सर्वाधिक शारीरिक हिंसा का शिकार महिलाएं हैं। बलात्कार और यौन हिंसा की आग में झुलसती महिलाओं की सूखी आंखों में डर समाया हुआ है। उनके लिए शिक्षा के रास्ते कांटों भरे हैं, यौन दासी बनाकर युद्ध के लिए बच्चे पैदा करने की ज़मीन बन चुकी औरतें मौत से भी बदतर जीवन जीने को अभिशप्त हैं। उद्योग-धंधों, कारख़ानों, ईंट-भट्ठों, सड़क-भवन निर्माण में पुरुषों के बराबर घंटों में काम करने के बावजूद मज़दूरी में भारी असमानता है। राजनीति की चमकीली फिसलन भरी राह में 30 प्रतिशत महिला आरक्षण का झुनझुना थामे वह मंज़िल से दूर खड़ी अभी ज़ोर-ज़ोर नारे उछाल रही है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला के बुनियादी सवालों पर विमर्श करते हुए राह की चुनौतियों के कंकड़-पत्थर बीनते हुए उपलब्धियों के शिखर पर महिलाओं का गौरव गान हो, यही पावन उद्देश्य है।

प्रमोद दीक्षित मलय

प्रमोद दीक्षित मलय

प्रमोद दीक्षित मलय की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जबकि वह क़रीब एक दर्जन पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से अनुभूति के स्वर, पहला दिन, महकते गीत, हाशिए पर धूप, कोरोना काल में कविता, विद्यालय में एक दिन, यात्री हुए हम आदि शामिल हैं। कविता, गीत, कहानी, लेख, संस्मरण, समीक्षा और यात्रावृत्त लिखते रहे मलय ने रचनाधर्मी शिक्षकों के स्वैच्छिक मैत्री समूह 'शैक्षिक संवाद मंच' स्थापना भी 2012 में की।

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