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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो एक टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से ​चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-4) मानस की कलम से....

मुन्नाभाई MBBS और हिरानी की दुनिया

            2003 में जब ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ रिलीज़ हुई, पोस्टर और नाम से यही आभास मिलता था कि यह एक हल्की-फुल्की मज़ाक़िया फ़िल्म होगी। उस समय संजय दत्त इतने बड़े स्टार नहीं थे कि केवल उनके नाम पर दर्शक सिनेमाघरों तक खिंचे चले आएँ। निर्देशक का नाम भी नया था, और फ़िल्म की मार्केटिंग भी कुछ ख़ास नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि फ़िल्म की शुरूआत धीमी रही। लेकिन मुन्नाभाई MBBS ने माउथ पब्लिसिटी की ताक़त से धीरे-धीरे वो रफ़्तार पकड़ी और ऐसी दौड़ लगायी कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में इसकी गूंज स्थाई हो गयी।

फ़िल्म को क्रिटिक्स और बॉक्स ऑफ़िस, दोनों जगह ज़बरदस्त सफलता मिली। इसे 2004 में बेस्ट पॉपुलर फ़िल्म का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला, साथ ही कई फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी। बॉक्स ऑफ़िस पर इसने सिल्वर जुबली का दर्जा हासिल किया। हैरानी की बात है रिलीज़ के 26वें हफ़्ते में भी यह फ़िल्म पूरे भारत में क़रीब 300 स्क्रीन्स पर चल रही थी। फ़िल्म की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके साथ ही इंडियागेम्स ने इस पर आधारित एक मोबाइल वीडियो गेम भी लॉन्च किया।

इन सब कामयाबियों के इतर सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस फ़िल्म ने हिंदी फ़िल्म उद्योग को एक नायाब निर्देशक दिया, राजकुमार हिरानी। हिरानी ने अब तक केवल छह फ़िल्में बनायी हैं, लेकिन हर एक फ़िल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई है।

हिरानी की कला के रहस्य

अगर हम मुन्नाभाई MBBS का पोस्टमॉर्टम करें, तो कुछ बेहद दिलचस्प बातें सामने आती हैं। राजकुमार हिरानी की फ़िल्में देखते हुए हम ख़ुद को एक ऐसी दुनिया में पाते हैं, जो पूरी तरह वास्तविक नहीं होती और न ही उसके मुख्य किरदार पूरी तरह यथार्थ से जुड़े होते हैं। इसके बावजूद हम उस दुनिया पर भरोसा करने लगते हैं।

अधिकांश फ़िल्में “सस्पेंशन ऑफ़ डिसबिलीफ़” के सिद्धांत पर टिकी होती हैं, लेकिन हिरानी इसे बेहद मज़बूती से स्थापित करते हैं। चाहे मुन्ना हो (मुन्नाभाई MBBS, लगे रहो मुन्नाभाई), पीके (PK) हो, या रैंचो (3 Idiots) हो, ये सभी किरदार हमारी रोज़मर्रा की दुनिया से सीधे-सीधे नहीं आते। (दिलचस्प यह है कि जिन दो फ़िल्मों में किरदार अपेक्षाकृत वास्तविक थे- संजू और डंकी का हार्डी- उन्हें हिरानी की कमज़ोर फ़िल्मों में गिना जाता है) ऐसे अवास्तविक लेकिन दिल से जुड़े किरदार हमें पहले ऋषिकेश मुखर्जी की आनंद और बावर्ची में देखने को मिले थे। (हिरानी की मुन्नाभाई एक तरह से फ़िल्म आनंद को श्रद्धांजलि भी देती है। फ़िल्म में लकवाग्रस्त मरीज़ का नाम आनंद बनर्जी है, जो राजेश खन्ना के किरदार आनंद सहगल और अमिताभ के किरदार भास्कर बनर्जी के नामों का कॉम्बिनेशन है। इसके अलावा जिस सीन में मुन्ना एक्स-रे देख रहा होता है, वह अंदाज़ा लगाता है कि मरीज़ को आंत का लिम्फ़ोसरकोमा है। आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना को भी यही बीमारी थी)

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लेकिन सवाल ये है आख़िर हम इन अवास्तविक किरदारों से जुड़ते कैसे है? हिरानी अपनी फ़िल्में LCD फ़ॉर्मूले पर बनाते हैं- Laugh (हँसी), Cry (आँसू) और Drama (भावुक टकराव)। उनका मानना है जिस सीन में इन तीनों में से कुछ भी न हो, उस सीन का फ़िल्म में होना ही बेकार है। यही वजह है उनकी बनायी अवास्तविक दुनिया से हम लगातार जुड़े रहते हैं।

फ़ॉर्मूला या क्राफ़्ट?

इसके अलावा है किरदारों को गढ़ने की कला। मुन्ना एक भावना से भरा हुआ गुंडा है। वह एक इज़्ज़तदार गैंगस्टर है, जो ग़लत काम करने से मना कर देता है। वह दिलेर है, जो प्यार की ताक़त को समझता है। वह देसी है, पारिवारिक मूल्यों से जुड़ा हुआ। उसे अपने पिता की इज़्ज़त चाहिए, माँ का प्यार चाहिए और अपनी प्रेमिका का साथ चाहिए। वह परवा करता है, दोस्ती की क़ीमत समझता है। यही वजह है कि मुन्ना हमें “कोई और” नहीं लगता- वह हममें से ही एक लगता है। और वो हमारे अंदर घर कर जाता है।

और यह किरदार हमारी दुनिया के सेट-अप में, सवाल उठाते हुए रख दिये जाते हैं। मुन्नाभाई MBBS मेडिकल सिस्टम की ख़ामियों पर सवाल उठाती है, लगे रहो मुन्नाभाई बदलती इंसानियत और गांधीगीरी की बात करती है, थ्री इडियट्स शिक्षा व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है, पीके गॉडमैन और अंधविश्वास के जाल पर चोट करती है और डंकी पलायन और डंकी रूट जैसी गंभीर समस्या छूती है। ये सभी वो समस्याएं हैं, जिससे आम इंसान रोज़मर्रा में रूबरू हो रहा है। जब कोई मुन्ना, PK या रैंचो हमारी बात कहता है तो ज़ाहिर है वो अपना लगने ही लगेगा।

और इसके बाद आता है हिरानी का किसी सीन को रचने में बारीकियों का ध्यान रखना। जैसे ‘सुबह हो गयी मामू’ गाने के दृश्यों में बारिकियाँ स्लो मोशन में देखें तो आपको दिख जाएँगी। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में रेडिओ पर जवाब देते समय प्रिंसिपल का न झुकना और अपने प्रिंसिपल पर अडिग रहना एक अच्छा मेटाफ़र है। बाक़ी टीचर्स को लालच के प्रभाव में दिखाना, जिससे मुन्ना का किरदार कमतर न लगे। सीन की बारीकियों की यह सूची उतनी ही लम्बी है, जितने उनकी फ़िल्मों में दृश्य हैं।

मुन्नाभाई और हिरानी की सभी फ़िल्में कल्ट बन चुकी हैं। यहाँ तक कि इन फ़िल्मों के कुछ संवाद भी कल्ट बन चुके है जैसे- जादू की झप्पी, गांधीगिरी, ऑल इज़ वेल, सफलता के पीछे मत भागो, एक्सीलेंस का पीछा करो इत्यादि! मुन्नाभाई उन सभी भाषाओं में ब्लॉकबस्टर रही, जिनमें इसे रीमेक किया गया। संजय दत्त का किरदार मुन्ना भाई “बॉलीवुड के बीस सबसे अच्छे काल्पनिक किरदारों” में से एक माना जाता है और लंबे समय तक रहेगा, ऐसी उम्मीद भी की जा सकती है।

और यह ट्रिविया भी…

मुन्नाभाई एमबीबीएस, 1998 की रॉबिन विलियम्स की रोम-कॉम “पैच एडम्स” से साफ़ तौर पर प्रेरित थी। प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा और डायरेक्टर राजू हिरानी, ​​जिनका जन्मदिन फ़िल्म की रिलीज़ के दिन ही होता है, दोनों ने इस बात से इनकार किया। टॉम शैडियैक की पैच एडम्स से समानताओं के बारे में हिरानी कहते हैं, “एक भी सीन एक जैसा नहीं है। एकमात्र समानता यह है कि एक ज़्यादा उम्र का हीरो मेडिकल स्कूल जाता है। हमारा हीरो संजय दत्त पैच एडम्स में रॉबिन विलियम्स से बहुत अलग है”।

कुछ लोग इसे ‘थ्रीज़ कंपनी’ के एपिसोड “डॉक्टर इन द हाउस” से इंस्पायर्ड भी मानते हैं। इसमें जैक ट्रिपर (जॉन रिटर) अपने दादाजी के आने पर डॉक्टर होने का नाटक करता है।

फ़िल्म में कई कबूतर हैं। यह क्लासिक गैंगस्टर फ़िल्म परिंदा (1989) का एक रेफ़रेंस है, जिसे विधु विनोद चोपड़ा ने डायरेक्ट किया था।

डॉ. अस्थाना एनाटमी के प्रोफ़ेसर हैं लेकिन फ़िल्म में वह सर्जरी भी करते हैं। असल में, सर्जरी सिर्फ़ सर्जन ही करते हैं। एनाटमी प्रोफ़ेसर डेड बॉडी का डिसेक्शन करते हैं।

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मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

2 comments on “मुन्नाभाई MBBS और हिरानी की दुनिया

  1. विवेक त्रिपाठी जी ने बहुत बढ़िया समीक्षा की।
    मुन्ना भाई,,, लगे रहो,, मूवीज में मज़ाहिया तौर पर फीलिंग्स और इंसानियत को रिप्रेजेंट करने का मोटिव बहुत प्रभावित करता है,,
    दूसरी मूवीज से inspired होने के बावजूद इनकी अपनी अलग ही छाप है।

    मुझेमूवीज देखना पसंद नहीं है,, मगर मैंने मुन्ना भाई,, लगे रहो,,, और मेरी मोस्ट फेवरेट बाग़बान को 3-4बार देखा है।

    लगे रहो मुन्ना,,,, का एक सीन मुझे अंदर तक हिला देता है,, जब सर्किट और मुन्ना नशे में एक नाला जैसा है,, वहाँ सर्किट स्टार्स दिखाकर अपनी माँ को याद करता है,,, वो तकलीफ़ ,,वो नेचुरलटी,,,क्या ही कहने!

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