
- October 15, 2025
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नियमित ब्लॉग ज़ाहिद ख़ान की कलम से....
मजाज़: शमशीर, जाम और साज़ का इम्तिज़ाज
शेर-ओ-अदब की महफ़िल में जब भी ग़ज़लों-नज़्मों का ज़िक्र छिड़ता है, मजाज़ लखनवी का नाम ज़रूर आता है। एक लंबा अरसा गुज़र गया, मगर उनकी शायरी की धमक कम नहीं हुई। आज भी मजाज़ अवाम के महबूब-तरीन शायर हैं। मजाज़ के अलावा और भी ऐसे कई शायर हैं, जिन्हें अपने ज़माने में ख़ूब शोहरत मिली लेकिन मजाज़ की मक़बूलियत कुछ और ही है। मजाज़ के समूचे कलाम में दिलों के अंदर उतर जाने की जो कैफ़ियत है, वह बहुत कम लोगों को नसीब हुई है। मजाज़ की ख़ूबसूरत, पुर-सोज़ शायरी के पहले भी सभी दीवाने थे और आज भी उनकी मौत के इतने सालों बाद, यह दीवानगी ज़रा-सी कम नहीं हुई है। मजाज़ सरापा मुहब्बत थे। तिस पर उनकी शख़्सियत भी दिल-नवाज़ थी। वह जब अपनी सुरीली आवाज़ और ख़ूबसूरत तरन्नुम में नज़्म पढ़ते, तो चारों और ख़ामोशी पसर जाती थी। सामईन उनकी नज़्मों में डूब जाते। बाज़ आलोचक उन्हें उर्दू का कीट्स कहते थे, तो फ़िराक़ गोरखपुरी की नज़र में, ‘अल्फ़ाज़ों के इंतिख़ाब और संप्रेषण के लिहाज़ से मजाज़, फै़ज़ के बजाय ज़्यादा ताक़तवर शायर थे।’ एक दौर था, जब मजाज़ उर्दू अदब में आँधी की तरह छा गये थे। आलम यह था जब वे अपनी कोई नज़्म लिखते, तो वह प्रगतिशील रचनाशीलता की एक बड़ी परिघटना होती। लोग उस नज़्म पर महीनों चर्चा करते।
‘आवारा’ वह नज़्म है, जिसने मजाज़ को एक नयी पहचान दी। मजाज़ का दौर मुल्क की आज़ादी की जद्दोजहद का दौर था। बरतानवी हुकूमत की साम्राज्यवादी नीतियों और सामंतवादी निज़ाम से मुल्क में रहने वाला हर बाशिंदा परेशान था। ‘आवारा’ पूरी एक नस्ल की बेचैनी की नज़्म बन गयी। नौजवानों को लगा कि कोई तो है, जिसने अपनी नज़्म में उनके ख़यालात की अक्कासी की है। ‘आवारा’ नज़्म पर यदि ग़ौर करें, तो इस नज़्म की इमेजरी और काव्यात्मकता दोनों रूमानी है, लेकिन उसमें एहतिजाज और बग़ावत के सुर भी हैं। यही वजह है कि यह नौजवानों की पंसदीदा नज़्म बन गयी। आज भी यह नज़्म नौजवानों को अपनी ओर, उसी तरह आकर्षित करती है।
शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
इस नज़्म के अलावा मजाज़ की ‘शहर-ए-निगार’, ‘एतिराफ़’ वग़ैरह नज़्मों का भी कोई जवाब नहीं। ख़ास तौर पर जब वे अपनी नज़्म ‘नौ-जवान से’ में नौजवानों को ख़िताब करते हुए कहते थे:
जलाल-ए-आतिश-ओ-बर्क़-ओ-सहाब पैदा कर
अजल भी काँप उठे वो शबाब पैदा कर
तू इंक़लाब की आमद का इंतिज़ार न कर
जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर।
तो यह नज़्म, नौजवानों में एक जोश, नया जज़्बा पैदा करती थी। उनमें अपने मुल्क के लिए कुछ कर गुज़रने का जज़्बा जाग उठता था। वे अपने वतन पर मर-मिटने को तैयार हो जाते थे। मजाज़ अपनी शायरी से कम अरसे में ही तालीमयाफ़्ता नौजवानों, उनमें भी ख़ास तौर पर लड़कियों के महबूब शायर बन गये।

मजाज़ जिस दौर में लिख रहे थे, उस दौर में फै़ज़ अहमद फ़ै़ज़, अली सरदार जाफ़री, मख़दूम, मुईन अहसन जज़्बी आदि भी अपनी शायरी से पूरे मुल्क में धूम मचाये हुए थे। लेकिन वे इन शायरों में सबसे ज़्यादा मक़बूल और दिल-पसंद थे। मजाज़ की ज़िंदगानी में उनकी नज़्मों का सिर्फ़ एक संग्रह साल 1938 में ‘आहंग’ छपा, जो बाद में ‘शब ताब’ और ‘साज़-ए-नौ’ के नाम से भी प्रकाशित हुआ। ‘आहंग’ में मजाज़ की तक़रीबन साठ नज़्में शामिल हैं और सभी नज़्में एक से बढ़कर एक। भारतीय हिंद उपमहाद्वीप के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने मजाज़ की क़िताब ‘आहंग’ की भूमिका लिखी थी। अपनी भूमिका में फ़ैज़ लिखते है, ‘मजाज़ की समूची शायरी शमशीर, साज़ और जाम का शानदार संगम है। ग़ालिबन इसी वजह से उनका कलाम ज़्यादा मक़बूल भी है।’ मिसाल के तौर पर वे उनका एक शे’र पेश करते हैं, जो क़िताब की शुरूआत में ही है:
देख शमशीर है यह, साज़ है यह, जाम है यह
तू जो शमशीर उठा ले तो बड़ा काम है यह।
फै़ज़ अहमद फै़ज़, मजाज़ की ‘ख़्वाब-ए-सहर’ और ‘नौजवान ख़ातून से ख़िताब’ नज़्मों को सबसे मुकम्मल और सबसे कामयाब तरक़्क़ीपसंद नज़्मों में से एक मानते थे। फै़ज़ की इस बात से फिर भला कौन ना-इत्तिफ़ाक़ी जतला सकता है। ‘नौजवान ख़ातून से ख़िताब’ नज़्म है भी वाक़ई ऐसी:
तेरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा है
अगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था
तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
इस नज़्म में साफ़ दिखलायी देता है कि मजाज़ औरतों के हुक़ूक़ के हामी थे और मर्द-औरत की समानता के पैरोकार। मर्द के मुक़ाबले वे औरत को कमतर नहीं समझते थे। उनकी निगाह में मर्दों के ही बराबर औरत का मर्तबा था। मजाज़ ने दीगर तरक़्क़ीपसंद शायरों की तरह ग़ज़लों की बजाय नज़्में ज़्यादा लिखीं। उन्होंने शायरी में मोहब्बत के गीत गाये, तो मज़दूर-किसानों के जज़्बात को भी अपनी आवाज़ दी। मज़दूरों का आह्वान करते हुए वे अपनी लंबी नज़्म ‘मज़दूरों का गीत’ में लिखते हैं:
जिस रोज़ बग़ावत कर देंगे
दुनिया में क़यामत कर देंगे
ख़्वाबों को हक़ीक़त कर देंगे
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम
मजाज़ ने अपनी नज़्मों में दक़ियानूसी सोच, सियासी ग़ुलामी, हर तरह के शोषण, साम्राज्यवादी, सरमायादारी और सामंतवादी निज़ाम, सियासी ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी। उनकी नज़्मों में हमें आज़ाद-ख़याली, समानता और इंसानी हक़ की गूँज सुनायी देती है। ‘हमारा झंडा’, ‘इंक़लाब’, ‘सरमायेदारी’, ‘बोल अरी ओ धरती बोल’, ‘मज़दूरों का गीत’, ‘अँधेरी रात का मुसाफ़िर’, ‘नौजवान से’, ‘आहंग-ए-नौ’ वग़ैरह उनकी नज़्में इस बात की तस्दीक़ करती हैं। ये नज़्में कहीं-कहीं तो आंदोलनधर्मी गीत बन जाती हैं। मिसाल के तौर पर उनकी एक और मशहूर नज़्म ‘इंक़लाब’ देखिए:
फेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रुबाब
उठने ही वाला है कोई दम में शोर-ए-इंक़लाब
ख़त्म हो जाएगा ये सरमाया-दारी का निज़ाम
रंग लाने को है मज़दूरों का जोश-ए-इंतिक़ाम।
मजाज़ अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद और देशी सामंतवाद दोनों को ही अपना दुश्मन समझते थे। उनकी नज़र में दोनों ने ही इंसानियत को एक समान नुक़सान पहुँचाया है। मजाज़ ने अपनी नज़्मों में अंग्रेज़ी हुकूमत के हर तरह के जु़ल्म और नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की-
बोल! अरी ओ धरती बोल!
राज सिंहासन डाँवाडोल
साल 1936 में मजाज़ ने अपनी नायाब नज़्म ‘नज़्र-ए-अलीगढ़’ लिखी। किसी भी शायर के लिए इससे ज़्यादा फ़ख़्र की क्या बात होगी कि जिस यूनिवर्सिटी से वह पढ़कर निकला, उसी यूनिवर्सिटी का यह तराना, कुलगीत बन जाये। आज भी यह नज़्म यूनिवर्सिटी में गायी जाती है।
सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूँ पा-बस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूँ
ये मेरा चमन है मेरा चमन मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ
प्रोफ़ेसर मोहम्मद हसन ने मजाज़ की ज़िंदगी और उनके पूरे दौर पर एक शानदार नॉवेल ‘ग़म-ए-दिल वहशत-ए-दिल’ लिखा है। नॉवेल, जीवनीपरक है। मजाज़ को बहुत कम उम्र मिली। अगर उन्हें और उम्र मिलती, तो वे क्या हो सकते थे? इसके बारे में शायर-ए-इंक़लाब जोश मलीहाबादी ने अपनी आत्मकथा ‘यादों की बरात’ में लिखा है, ‘बेहद अफ़सोस है कि मैं यह लिखने को ज़िंदा हूँ कि मजाज़ मर गया। यह कोई मुझसे पूछे कि मजाज़ क्या था और क्या हो सकता था। मरते वक़्त तक उसका महज़ एक चौथाई दिमाग़ ही खुलने पाया था और उसका सारा कलाम उस एक चौथाई खुले दिमाग़ की खुलावट का करिश्मा है। अगर वह बुढ़ापे की उम्र तक आता, तो अपने दौर का सबसे बड़ा शायर होता।’ मजाज़ लखनऊ में दफ़्न हैं और क़ब्र पर उनका अपना ही एक शे’र लिखा है:
अब इसके बाद सुब्ह है और सुब्ह-ए-नौ मजाज़
हम पर है ख़त्म शाम-ए-ग़रीबान-ए-लखनऊ

जाहिद ख़ान
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।
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