manoj kumar मनोज कुमार

धरती से रिश्ता पनपना मेरी नियति में था: मनोज कुमार

              किस फ़िल्मकार की जड़ों में देश की धरती महकती रही? इस सवाल का पहला जवाब सभी के ज़ेह्न में होगा, मनोज कुमार। पिछले दिनों हमसे जुदा हुए अभिनेता, फ़िल्मकार मनोज कुमार (24.07.1937-04.04.2025) के शब्द और सिनेमा बरसो-बरस गूंजता रहेगा। सिने पत्रकार दिनेश रहेजा ने उनसे समय-समय पर एकाधिक साक्षात्कार किये। हिन्दी पाठकों के लिए उन्हीं से चुनिंदा अंश (अनुवाद: भवेश दिलशाद)…

manoj kumar मनोज कुमार

दिनेश रहेजा : आपके बाल-मन ने देश का बंटवारा देखा था, बाद में आपकी पहचान जो फ़िल्में बनीं, उनमें देशभक्ति का जो जुनून दिखता है, वह उस नन्हे मन से कैसे उपजा?
मनोज कुमार : बंटवारे से पहले के हिन्दोस्तान में उत्तर पश्चिम फ़्रंटियर प्रॉविन्स में सर एबट ने जो सैन्य छावनी बसायी थी, उस एबटाबाद में 24 जुलाई 1937 को मेरी पैदाइश हुई थी। हम लाहौर में रहा करते थे और 15 अगस्त 1947 को आज़ादी से ऐन पहले ही एक ट्रेन से हम दिल्ली पहुंचे थे।

हम एक कमरे के बैरैक में रिफ़्यूजी कैंप में रहे। मेरी मां बहुत बीमार रहीं और मेरा भाई शैशव में ही गुज़र गया। आज़ादी का दिन था, मेरे पिता ने मुझे सुबह जल्दी जगाया और मैंने लाल क़िले पर पंडित नेहरू को तिरंगा फहराते हुए देखा।

अपनी तमाम ज़ाती त्रासदियों से गुज़रते हुए, अपने निराश-हताश पिता को तब मैंने देखा कि उन्होंने ताली बजायी और ज़ोर से जयकारा लगाया ‘जय हिन्द’। उदास, परेशान होने के बावजूद अपने देश की आज़ादी के प्रति पिता को इतना उत्साही देखकर मुझे यह तो महसूस हो गया था कि इसकी अहमियत क्या थी।

उस वक़्त 10 साल के बच्चे के मन में लाल क़िले की अहमियत की एक और वजह भी थी। चूंकि बंटवारे ने मुझे छोटी-सी उम्र में ही मेरी जड़ों से उखाड़ दिया था, लिहाज़ा मैं लाहौर की गलियों के लिए तरसा करता था। जिन गलियों में हम बच्चे अक्सर अपने देश का तराना गाते घूमा करते थे, तब भी यह शब्द गूंजा करता था: ‘लाल क़िले से आयी आवाज़, सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज़।’

रहेजा : फिर दिल्ली से मुंबई तक का सफ़र और फ़िल्मों की दुनिया में आने का क़िस्सा?
कुमार : महज़ 19 बरस का था मैं, जब फ़िल्मों में हीरो बनने की ख़ातिर बम्बई पहुंचा। 11 अक्टूबर 1956 का दिन था, जब देहरादून एक्सप्रेस पकड़ी। दो दिन का सफ़र करना पड़ा क्योंकि इसी ट्रेन का भाड़ा सबसे कम था।

फ़िल्मकार और रिश्ते में भाई लेखराज भाकरी ने एक महीने के भीतर ही, प्रकाश स्टूडियोज़ में मेरा पहला स्क्रीन टेस्ट लिया था। उस स्क्रीन टेस्ट की रील मैंने अब तक सहेज रखी है।

जूनियर कलाकार के तौर पर करियर शुरू हुआ। प्रदीप कुमार व माला सिन्हा अभिनीत फ़ैशन (1957) में मैंने एक बूढ़े का किरदार किया… मुझ पर पहली बार जो गीत फ़िल्माया गया था, हेमंत कुमार की आवाज़ में उन्हीं का स्वरबद्ध किया हुआ था, बोल थे: ‘माटी को लजाना न ये देश है महान’। मुझे महसूस होता है धरती मां के साथ मेरे रिश्ते पनपना मेरी नियति में ही था।

रहेजा : अपना एक नाम बनाने के लिए आपको तक़रीबन आधे दशक तक कड़े संघर्ष से गुज़रना पड़ा, कैसे रहे होंगे वो दिन?
कुमार : सेंट्रल मुंबई के शिवाजी पार्क इलाक़े में अपने चाचा के साथ एक ज़रा-सी खोली में रहा करता था। एक दिन, मेरी घबराहट लेखराज के सामने उतावलेपन की तरह आ गयी कि मुझे ब्रेक देने के बारे में सोच भी रहे हैं! तब उन्होंने कहा, ‘तुम्हारे तो जूते का एक सोल नहीं घिसा अब तक, यहां तो लोगों के पांव घिस जाते हैं’।

उस कड़े दौर में धर्मेंद्र, शशि कपूर और मैं जैसे हमसाये थे, अनन्य हो गये थे। हालात से पैदा हुई हताशा यह थी कि धर्मेंद्र बोरिया-बिस्तर बांधकर लौटने को थे, तब मैंने उन्हें रोककर कहा, ख़ुद को दो महीने का वक़्त और देकर देखो। बस उसके पांच दिन बाद उन्होंने ‘शोला और शबनम’ साइन की और मैंने ‘पिकनिक’।

इन फ़िल्मों के लिए, हमें 350 रुपये प्रतिमाह और ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास पास का वादा मिला। धर्मेंद्र और मैंने लगातार अगले चार दिनों तक चर्चगेट से बोरिवली तक ट्रेन यात्रा का लुत्फ़ लेकर जश्न मनाया। वैसे, मैं फ़िल्मों में तीन लाख रुपये कमाने के इरादे से आया था, ताकि अपने माता-पिता, भाई-बहनों और और ख़ुद के लिए एक-एक लाख का बंदोबस्त कर लूं…

इतने पैसे कमाने पर फ़ोकस करने के पीछे मेरा इरादा यह था कि फिर मैं एक ग़ैर-ब्राह्मण लड़की, शशि से शादी करने के लिए अपने माता-पिता को राज़ी कर सकता था। और मेरी पहली बड़ी हिट फ़िल्म हरियाली और रास्ता (1962) के रिलीज़ होने के एक महीने पहले ही मैंने शशि से शादी की।

रहेजा : आपकी रचनात्मकता में क्या आपकी पत्नी का योगदान रहा?
कुमार : पूरब और पश्चिम (1970) का विचार उन्हीं ने दिया था। वह मेरी तीखी आलोचक रहीं, बड़ी मुश्किल से मेरे काम की तारीफ़ करती थीं। और अब इसके लिए मैं उनका बहुत शुक्रगुज़ार हूं। जिन फ़िल्ममेकरों की बीवियां उनके काम की तारीफ़ करती हैं, उनकी पिक्चरों की तारीफ़ लोग नहीं करते।

फ़िल्मों के बारे में उसकी समझ भी ख़ूब है। शादी से ठीक पहले के साथ के दौरान हमने साथ मिलकर साढ़े तीन महीने में 109 फ़िल्में देखी थीं।

रहेजा : ‘वो कौन थी’ जैसी शुरूआती रोमांटिक फ़िल्मों से आपकी एक छवि रही, उसके बावजूद, आपने जो सिनेमा बनाया, उसमें आपके दूसरे पहलू (‘भारत’) और उसकी महिलाओं के बीच अंतरंगता को पर्दे पर शायद ही कभी दर्शाया गया।
कुमार : शादी के बाद हनीमून एकांत में ही होता है, है न? मेरी फ़िल्में आदर्श और सिद्धांत की ज़मीन पर खड़ी हैं। ऐसा कैसे मुमकिन है कि आप एक लमहे में देशभक्ति का राग अलापें और अगले ही लमहे में किसी औरत के साथ हमबिस्तर हो जाएं।

रहेजा : आपकी नज़र में, परदे पर स्त्रियों की सबसे ख़ूबसूरत छवियां कौन-सी हैं?
कुमार : जो मैंने निर्देशित कीं, उन फ़िल्मों में से मुझे उपकार में आशा पारेख का वह शॉट बहुत पसंद है, जिसमें मद्धम रोशनी में उन्हें कैमरे ने क़ैद किया। शोर के गीत ‘एक प्यार का नग़्मा है’ में नंदा अलौकिक दिखी हैं। और फिर दिल अपना और प्रीत परायी में मीना कुमारी का क्लोज़-अप, काली घटा और अनारकली के ‘ओ आसमां वाले’ में बीना राय और नागिन में वैजयंती माला… हां, ‘मेरे महबूब’ और ‘वो कौन थी’ की दुल्हन के तौर पर साधना।

रहेजा : क्या अब आप बेटे कुणाल के साथ बैठकर आजकल की फ़िल्में देखते हैं?
कुमार : बेशक। एक वक़्त था जब मैं बहुत शर्मीला था… मेरे पिता हर शनिवार शाम मुझे दिल्ली के कनॉट प्लेस के एक रेस्तरां में ले जाते थे, जहां कैबरे हुआ करते थे। उन्हें महसूस हुआ हो कि मैं बहुत शर्मीला हूं। शायद मेरी हिचक दूर करने के लिए उन्होंने यह तरीक़ा चुना होगा।

रहेजा : अपनी बेहतरीन सिनेमाई यात्रा को आप किस तरह निहारते हैं?
कुमार : निर्देशक के तौर पर अपनी पहली फ़िल्म उपकार (1967) से ही, मुझे लगता है मैंने अपने विश्वास और इरादे के साथ फ़िल्में बनायीं, उन्हें एक बड़े स्केल पर विचारा और उतारा। लोग मेरी तीन फ़िल्मों को सदाबहार कहते हैं: रोटी कपड़ा और मकान (1974), पूरब और पश्चिम (1970) और क्रांति (1981)। इनकी थीम अब भी बासी नहीं हुई है।

क्रांति की शोहरत के पीछे इसकी भव्यता, संगीत, कहानी और अदाकारी रहे। इस फ़िल्म के निर्माण में 10,000 से भी ज़्यादा लोग शामिल रहे। क़िले के सेट को तैयार करने में चार महीने लगे। हमने जहाज़ पर शूटिंग के लिए भी एक मुश्किलतरीन शेड्यूल रखा था। ज़्यादातर कलाकार और तकनीशियन तो सी-सिकनेस की चपेट में रहे। जाने कैसे मैं जहाज़ पर एक अनुभवी नाविक की तरह फ़िट बना रहा। अब जब लोग इसका रहस्य पूछते हैं, तो मैं मुस्कुरा देता हूं, कहता हूं ‘होम्योपैथी’।

क्रांति के लिए मुझे अपना घर गिरवी रखना पड़ा था। पर ख़ुशक़िस्मती से, मुंबई के अप्सरा सिनेमा में यह 50 हफ़्ते चली। फ़िल्म देखकर राज (कपूर) साहब ने कहा था, ‘यह है हॉलीवुड को हमारा जवाब’। फ़िल्म के बारे में जानने के बाद अकीरा कुरोसावा ने मुझे एक फ़ाउंटेन पेन और तारीफ़ भरी चिट्ठी भेजी थी।

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