
- February 14, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
इतिहास से कम नहीं रामचंद्र गुहा के संस्मरण
हाल-फ़िलहाल में सेतु प्रकाशन से आयी पुस्तक ‘सामने आते ही नहीं’ प्रसिद्ध इतिहास लेखक रामचंद्र गुहा के संस्मरणों का संकलन है। रामचंद्र गुहा ने इतिहास के अलावा पर्यावरण और क्रिकेट पर अब तक दो दर्जन पुस्तकें लिखी और संपादित की हैं। ‘इंडिया आफ़्टर गांधी’, ‘मेकर्स ऑफ़ मॉडर्न इंडिया’ और दो भागों में प्रकाशित महात्मा गांधी की प्रामाणिक जीवनी मेरी स्वयं की बुकशेल्फ़ में भी मौजूद हैं। आज भी वे पर्यावरण, इतिहास और सामाजिक प्रश्नों पर अध्ययनरत हैं। क्रिकेट के शौक़ीन गुहा ने भारतीय क्रिकेट के इतिहासन पर ‘ए कॉनर्र ऑफ़ ए फ़ॉरेनफ़ील्ड’ पुस्तक लिखी है। ‘सामने आते ही नहीं’ उनकी संस्मरण पुस्तक ‘द कुकिंग ऑफ़ बुक्स’ का हिंदी अनुवाद है। इस साहित्यिक संस्मरण पुस्तक का हिंदी अनुवाद हृदयेश जोशी ने किया है, जो प्रतिष्ठित पत्रकार हैं। लेखक के रूप में भी उनकी पहचान है।
‘द कुकिंग ऑफ़ बुक्स’ में डॉ. रामचंद्र गुहा ने अपने छात्र जीवन से लेकर कोरोना काल की महामारी के समय तक अपने संस्मरणों को समेटा है। वे साल में चार बार बंगलौर से दिल्ली नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम और लाइब्रेरी के समृद्ध अभिलेखागार में अध्ययन के लिए यात्रा करते रहे हैं। यह पुस्तक महामारी के समय की प्रस्तुति है। दरअसल यह मुख्यत: उनके मित्र के साथ लंबी अवधि की मित्रता और खट्टे-मीठे अनुभवों की पुस्तक है, जिसमें उन्होंने अपने मित्र रुकुन आडवाणी के साथ अपने संबंधों को समेटा है। रुकुन आडवाणी ने उनके जीवन, व्यक्तित्व और कैरियर पर लेखन यात्रा पर निर्णायक प्रभाव डाला।
रुकुन आडवाणी के अद्भुत व्यक्तित्व और उनके साथ अपने संबंधों को आधार बनाकर रामचंद्र गुहा ने साठ-सत्तर के दशक से लेकर इस सदी के दूसरे-तीसरे दशक तक देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों, शिक्षाविद और उनके लेखन संसार, प्रकाशन जगत, विशेष रूप से आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस और उनकी हिंदुस्तान स्थित शाखा के इतिहास और कार्यकलाप… सभी को समेटते हुए बीते समय को जीवंत किया है। इसमें आज के दौर के प्रभावशाली और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व वाले नाम भी आते हैं और उनके प्रारंभिक समय के चित्रात्मक परिचय भी, जैसे अमिताव घोष, शशि थरूर के अलावा अन्य अनेक जो बाद में अपने-अपने क्षेत्रों में प्रसिद्ध हुए और अपनी विशिष्ट पहचान बनायी। रुकुन आडवाणी और गुहा दोनों ही सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज के छात्र थे। रुकुन उनसे सीनियर थे और लखनऊ ला-मार्टिनियर कॉलेज से पढ़कर आये थे। लखनऊ का ज़िक्र करते हुए गुहा उनके पिता राम आडवाणी और मशहूर बुक शॉप का भी विस्तार से वर्णन करते हैं, जो लखनऊ के विशिष्ट इतिहास का हिस्सा है। राम आडवाणी और उनका पुस्तक संसार अपने आप में एक समृद्ध इतिहास है, जिसका उसी रूप में ज़िक्र होता है, जैसे लखनऊ के इमामबाड़े का। सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में भी रुकुन आडवाणी विशिष्ट थे। अंग्रेज़ी साहित्य और संगीत की विशद जानकारी के कारण। सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज का विस्तृत इतिहास और वहां के संपूर्ण परिदृश्य को भी वे पाठकों के लिए प्रस्तुत करते हैं, जिसने पूरे हिंदुस्तान को बड़ी संख्या में लेखक, समाजशास्त्री, ब्यूरोक्रेट्स और विशिष्ट क्षेत्रों में प्रसिद्धि पाये विद्वान दिये।
रुकुन आडवाणी ने बाद में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में पीएच.डी. किया और लौटकर किताबों की दुनिया में ही लौट आये यानी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में नियुक्त हो गये। गुहा ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस का दिलचस्प इतिहास भी प्रस्तुत किया है और तत्कालीन जनरल मैनेजर रामदयाल का भी विस्तार से वर्णन किया है, जो स्वयं में एक विशिष्ट व्यक्तित्व थे। कैंब्रिज से लौटे रुकुन की विद्वता से वह प्रभावित थे। यहीं रहकर एडिटर के रूप में उन्होंने रामचंद्र गुहा की पुस्तकों को संवारा, ज़रूरी मशविरे दिये और साहित्यिक इतिहास वृत्त लिखने के लिए प्रेरित किया। उसके बाद गुहा की अनेक पुस्तकें वहीं से छपीं और उनके बीच बेहद आत्मीय संबंध बने। रामचंद्र गुहा यह भी कहते हैं कि कॉलेज के दिनों में रुकुन उन्हें पसंद नहीं करते थे और गंभीरता से नहीं लेते थे। कारण कि गुहा क्रिकेटप्रेमी थे, साहित्य और संगीत में ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। बाद में रामचंद्र गुहा ने अध्ययन को गंभीरतापूर्वक लिया, पीएच.डी. की और अकादमिक क्षेत्र में जाने गये। तब रुकुन आडवाणी ने उन्हें गंभीरता से लिया और उनके लेखकीय सलाहकार और संपादक बने।

एक समय बाद रुकुन ने नौकरी छोड़ दी और उत्तराखंड के रानीखेत में, जंगल के बीच एक कॉटेज बनवा ली। अपनी पत्नी अनुराधा राय, जो उपन्यासकार हैं, के साथ वहीं रहने लगे। पहले की तरह ही, लोगों से मिलते-जुलते नहीं हैं और एकांतवास में अपना प्रेस, ‘पर्मानेण्ट ब्लैक’ चला रहे हैं।
विलक्षण व्यक्तित्व के रुकुन आडवाणी के साथ अपने संस्मरणों में रामचंद्र गुहा ने पिछले लगभग पचास-पचपन साल का इतिहास प्रस्तुत है, जिसमें बड़ी तादाद में उल्लेखनीय व्यक्तित्व मौजूद हैं और लोगों के लेखन, प्रकाशन तथा शैक्षिक ब्योरा पाठकों के सम्मुख आता है। एक संपादक/सलाहकार के रूप में रुकुन आडवाणी को प्रस्तुत करते हुए रामचंद्र गुहा नॉर्मन पोडहॉरिट्ज़ का लंबा कथन प्रस्तुत करते हैं, जिसका आशय है, “अच्छे संपादक अच्छे लेखकों से भी दुर्लभ होते हैं। इसके लिए इंसान के भीतर दो गुण होने चाहिए… एक ओर बड़ा अहंकार और दूसरी ओर महान नि:स्वार्थता। अहंकार इस बात का कि संपादक के तौर पर जो इस बात के विशेषज्ञ हैं कि कहने वाली बात को कैसे बताया जाये कि आप लेखक से बेहतर हैं। दूसरे विनम्रता या नि:स्वार्थ भाव, कि आप अपनी प्रतिभा किसी और को देने को तत्पर हैं। यानी किसी और के यश के लिए ख़ुद बिना कोई श्रेय लिये कार्य करना।” ‘वर्तमान साहित्य’ के संपादन के दौरान इन स्थितियों से गुज़रना लाज़मी था, इसलिए इस उद्धरण ने ध्यान खींचा।
अंत में, यह पुस्तक पढ़ना एक ताज़गी भरी इतिहास यात्रा से गुज़रना है। लेखक की राजनीतिक प्रतिक्रिया और अवधारणाओं से भी पाठक परिचित होता है, जिसमें लेखक ने किसी प्रकार की अस्पष्टता का सहारा नहीं लिया है। इतिहास लिखते समय आंखों देखा सच और पृष्ठभूमि को उजागर करना भी लेखकीय धर्म है। अपनी यात्राओं, मित्रों के साथ वार्तालाप, पत्र, ईमेल सभी को उद्धृत करते हुए यह केवल इतिहास नहीं, साहित्यिक रंगत लिये हुए हैं। छोटे-से कलेवर में इस पुस्तक के विराट फ़लक को समीक्षा के रूप में लाना सचमुच कठिन है। पूरे कथारस के साथ इस संस्मरण यात्रा को, साहित्यिक इतिहास को पढ़ा जा सकता है।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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