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​आदित्य की कलम से....

एनसीईआरटी बनाम न्यायपालिका

             सर्वोच्च न्यायालय ने जमकर लताड़ लगायी। एनसीईआरटी जैसी नख-दंत-विहीन संस्थान की ऐसी हिमाकत! कि न्यायालय का अपमान करे। आख़िर यह हिम्मत आ कहाँ से रही है..?

ख़ैर! अपनी अवमानना पर स्वतः संज्ञान लेकर न्यायालय ने अपनी साख बचाने का गंभीर प्रयास किया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के अधिकार को खोते समय जो अपमान का घूंट पीना पड़ा था, उसका प्रतिकार ज़रूरी था, तो देर आयद दुरुस्त आयद….

वैसे हाल के कुछ घटनाक्रमों को देखा जाये तो साफ़-साफ़ दिखेगा कि यह लिटमस टेस्ट था… न्यायपालिका की सहनशीलता मापने का। अगर न्यायपालिका इस मुद्दे पर भी ख़ामोश रह जाती तो उसे बदनाम और कमज़ोर करने के लिए बहुतेरे हथकंडे अपनाये जाते। जल्द ही जजों का हाल भी देश चलाने वाले मूक-बधिर नौकरशाहों की तरह हो जाता।

यह एक कुत्सित रणनीति है जिसका धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। मसलन पहले कुछ विशिष्ट शैक्षणिक संस्थानों के लिए मीम्स के क़िस्म की कहानियां सोसायटियों तक फैला दी गयीं कि वो छात्रों के दिमाग़ में ज़हर घोल रहे हैं। अब देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय इन आरोपों को न केवल झेल रहे हैं बल्कि दमन का सामना कर रहे हैं। इन संस्थानों में सरे आम “विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” द्रौपदी के चीर की तरह हरी जा रही है।

और याद कीजिए झूठे सबूतों और सरकारी मशीनरी के बेइंतहा दुरुपयोग से निरपराध सलाख़ों के पीछे डाल दिये गये, जिनमें से ज़्यादातर बेगुनाह साबित हुए। असल गुनहगार सत्ता में कहां, कितनी मलाई खा रहे हैं, इसकी कोई रिपोर्टिंग हो जाये तो क़यामत! आम नागरिकों के अधिकारों के हनन पर लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ मौन था। संविधान के रक्षक को क्या बार-बार याद दिलाये जाने पर भी संज्ञान नहीं लेना चाहिए था? उस समय तो प्रक्रिया का पालन ज़रूरी था।

चुनाव आयोग/ई.डी./सी.बी.आई. आदि के दुरुपयोग के अलावा इलेक्टोरल बॉण्ड, महाराष्ट्र की सरकार, पी.एम. केयर फ़ंड आदि अवैधानिक तरीक़ों से चलते रहे जो नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का मख़ौल उड़ाते रहे, लेकिन यहां संज्ञान लेने योग्य क्या था?

रसूख़दार की अवमानना ही सही मायने में अवमानना होती है। आम जनता की वर्षों से अवमानना हो रही है और जगह-जगह हो रही है लेकिन उसे संविधान ने मान ही क्या दिया है, जो अवमानना मानी जाये! सुरक्षा के आवरण में ज़िन्दगी गुज़ारने वालों को शायद ही इस बात का आभास होता हो कि आम आदमी के लिए इस माहौल में सांस लेना क्या संघर्ष है।

देश भर के शिक्षण संस्थानों में एक ख़ास क़िस्म की रुग्ण मानसिक विचारधारा रखने वालों का प्रभाव बढ़ गया है और एनसीईआरटी इससे अछूती नहीं है। इस वर्ग विशेष का ज्ञान कूपमण्डूकों के स्तर का है और भाषा और सामाजिक विज्ञान तक सीमित है। इससे पहले भी इतिहास की विशेष समझ का परिचय उनके द्वारा दिया गया था। देश के प्रतिष्ठित इतिहासकार इसके इतिहास बोध पर अपना सिर पीटने से ज़्यादा कुछ कर नहीं पाये।

इन विशेषज्ञों ने बड़े ही भोलेपन से न्यायपालिका में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की तरफ़ कक्षा आठ में पढ़ रहे तरुणों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया था। पुस्तक बताती है “लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं। ग़रीब और कमज़ोर वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो जाती है।”

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पाठ में आगे बताया गया न्याय प्रणाली कई समस्याओं से जूझ रही है, जैसे:

1. न्यायालयों में मामलों का बहुत बड़ी संख्या में लंबित रहना
2. जजों की अपर्याप्त संख्या
3. जटिल कानूनी प्रक्रिया, और
4. कमज़ोर बुनियादी ढांचा

इन बातों को न्याय प्रणाली की “चुनौतियाँ” बताया गया है। एनसीईआरटी के विशेषज्ञों के भोलेपन पर न्योछावर हो जाने का मन करता है। इस अध्याय को लिखने वाले अगर ख़ुद से ही सवाल करते तो उन्हें जवाब मिल जाता, आइए एक नज़र डालते हैं-

लंबित मुकदमे क्यों है? …क्योंकि जजों की पर्याप्त संख्या नहीं है।

जजों की पर्याप्त संख्या क्यों नहीं है? क्योंकि देश की जनसंख्या और बढ़ते हुए मुक़दमों की संख्या देखते हुए भी सरकारों ने इसे बढ़ाने के गंभीर प्रयास नहीं किये।

क़ानूनी प्रक्रिया इतनी जटिल क्यूं है? क्या देश में क़ानूनों के जानकारों की कमी है? ऐसा तो नहीं है। जटिल प्रक्रिया लोगों को उलझाये रखने का एक ऐसा उपकरण है जिसे बनाये रखने में कुछ ख़ास लोगों को लाभ है।

कमज़ोर बुनियादी ढांचा क्यों है? जनता प्रतिवर्ष करोड़ों-अरबों रुपया टैक्स दे रही है, सरकारों के पास शहरों को बेवजह तोड़-फोड़ करके बनाने, पुतले स्थापित करने, अनावश्यक रूप से सरकारी कार्यक्रमों का आयोजन करने, मुफ़्त की रेवड़ी बांटने, जनप्रतिनिधियों के ऐशो-आराम पर ख़र्च करने के लिए पर्याप्त बजट है, लेकिन न्यायालयों के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं है।

एनसीईआरटी को इन बातों का ज़िक्र करके इस ओर भी ध्यान दिलाना था ताकि छात्र इस बारे में बेहतर समझ बना पाते।

सवाल उठता है पंचायतों से लेकर राज्य की सरकारों और केन्द्र सरकार तक पारंपरिक भ्रष्टाचार के सिद्धहस्त खिलाड़ियों का इसमें ज़िक्र क्यों नहीं है? अकेली न्यायपालिका ही जनजागरण का शिकार क्यों बनायी जा रही है? देखा जाये तो यह मामला एक-दूसरे के कपड़े फाड़ने जैसा है। सच ये है कि “हमाम में सब चंगे हैं।”

(चित्र परिचय: 25 फरवरी की रिपोर्ट के साथ इंडियन एक्सप्रेस ने यह तस्वीर जारी की)

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आदित्य

प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।

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