kedar nath singh, vasudha, केदारनाथ सिंह
गूंज बाक़ी... इस लेख में साहित्य अकादमी व ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिंदी कवि ने भारत व पाकिस्तान के उर्दू साहित्य, प्रगतिवादी दौर के बाद उर्दू साहित्य और हिंदी व उर्दू के साहित्य की तुलना को लेकर बड़े दावे किये थे। तब इस पर बहस हुई या नहीं लेकिन होने की गुंजाइश बनी हुई है। 'वसुधा' के 2002 में समकालीन उर्दू साहित्य पर केंद्रित अंक से यह लेख याद के तौर पर साभार।
केदारनाथ सिंह की कलम से, आब-ओ-हवा की प्रस्तुति...

अदब में अलग भाषा नहीं, परंपरा है

               हिंदी और उर्दू के समकालीन साहित्य की तुलना एक शोध का कार्य है जिसके लिए ठोस तथ्य तत्काल मेरे पास नहीं है। पर एक अच्छी बात यह है कि हिंदी और उर्दू भाषाएँ तात्विक दृष्टि से दो भाषाएँ नहीं हैं। हाँ, वे दो अलग-अलग साहित्य परंपराएँ जरूर हैं। इसलिए यहाँ एक सुविधा यह है कि अक्सर दो भाषाओं के साथ तुलना के क्रम में जो भाषागत कठिनाई आती है, वह लगभग यहाँ नहीं है। पर एक बात याद रखने की है कि जब हम समकालीन उर्दू साहित्य कहते हैं, तो वह केवल भारत के भूगोल तक महदूद नहीं होता। पड़ोसी देश पाकिस्तान में उर्दू ही राजभाषा है और वहाँ प्रचुर मात्रा में रचनात्मक लेखन हो रहा है। पाकिस्तान में हो रहे उर्दू लेखन के बारे में यहाँ थोड़ी-बहुत जो जानकारी मिल पाती है उसके आधार पर कह सकता हूँ कि भारतीय उर्दू से पाकिस्तानी उर्दू में बेहतर लेखन हो रहा है। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत-पाकिस्तान के बीच चाहे जितना तनावपूर्ण संबंध क्यों न हो हिंदी साहित्य की तरह ही पाकिस्तान का उर्दू लेखन इन तनावों से मुक्त है और सेक्युलर भी। दरअसल साहित्य का अच्छा होना और सेक्युलर होना ये दोनों बातें अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं। साम्प्रदायिक साहित्य अच्छा साहित्य हो ही नहीं सकता। यदि उर्दू कथा साहित्य की बात करें तो मेरा मानना है कि सआदत हसन मंटो के बाद के पाकिस्तानी कथा लेखन के शीर्ष पर इंतज़ार हुसैन हैं जो पिछले तीस वर्षों से लगातार महत्त्वपूर्ण लेखन कर रहे हैं। जहाँ तक मैं जानता हूँ, उनसे बेहतर कथाकार आज भारतीय उर्दू में मौजूद नहीं है। बल्कि मैं यहाँ तक कहना चाहूँगा कि पूरे भारतीय कथा लेखन में बहुत थोड़े-से ऐसे लेखक हैं जो इंतज़ार हुसैन से टक्कर ले सकें। एक दिलचस्प बात यह है इंतज़ार हुसैन रहते लाहौर (पाकिस्तान) में हैं पर अक़्सर कहानियाँ भारत के परिवेश पर लिखते हैं। मैं नहीं जानता कि किस भारतीय लेखक ने बौद्ध चरित्रों, प्रतीकों और अभिप्रायों को लेकर महान रचना की है। इंतज़ार साहब यह करते हैं। इसलिए उनके पाकिस्तानी होने के बावजूद उन्हें पढ़ते हुए मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि वे हमारे लेखक हैं। मैंने पिछले दिनों ही उनकी एक कहानी पढ़ी जिसमें कराची में बसे मोहाजिरों की यातना का बड़ा मार्मिक चित्रण किया गया था- ये मोहाजिर वही लोग हैं जो विभाजन के समय भारत से पाकिस्तान गये थे। नये लोगों में पाकिस्तान के आसिफ़ फारुख़ी और बिहार के अब्दुल समद काफ़ी अच्छा लिख रहे हैं। इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि उर्दू में एक नयी शुरूआत हो रही है। सुरेन्द्र प्रकाश और जोगिंदर पाल महत्वपूर्ण भारतीय उर्दू कथाकार हैं। पर फिर कहूंगा कि पाकिस्तानी कथा लेखन भारतीय उर्दू कथा लेखन पर भारी पड़ता है। जहाँ तक हिंदी से तुलना का प्रश्न है तो निःसंदेह हिंदी कथा लेखन में इस बीच अधिक विस्तार और गहराई आयी है। इसका एक प्रमाण यह है कि हिंदी कहानी की ओर पाकिस्तानी पाठकों का ध्यान इस बीच बड़े पैमाने पर गया है। वहाँ के मशहूर अख़बार ‘आज’ ने लगातार हिंदी कहानियों का उर्दू रूपांतर प्रकाशित किया है जो बहुत लोकप्रिय हुए हैं। एक बातचीत में मुझसे इंतज़ार हुसैन ने उदय प्रकाश की कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर टिप्पणी करते हुए कहा था- “इस कहानी के कारण उदय प्रकाश अचानक पाकिस्तानी पाठकों का हीरो बन गया। हिंदी की संवेदनात्मक गहराई, भाषिक वैशिष्ट्य और उन्मुक्त मानवतावादी तेवर आदि को पाकिस्तानी पाठक ख़ासतौर से पसंद कर रहे हैं। हिंदी के कई उपन्यास भी पाकिस्तानी पाठकों में ख़ूब लोकप्रिय हो रहे हैं। यह एक नया प्रवाह है जो इधर शुरू हुआ है।

कविता के क्षेत्र में प्रगतिशील तथा आधुनिकतावादी दौर के बाद उर्दू की दुनिया में बहुत हलचल नहीं दिखायी पड़ती। मेरा ख़याल है कि अख़्तर उल इमान भारत, पाकिस्तान को मिलाकर आधुनिक उर्दू के आख़िरी बड़े कवि हैं। उनके बाद भारतीय उर्दू कविता में बहुत महत्त्वपूर्ण कुछ घटित नहीं हुआ। थोड़ी बहुत नवीनता निदा फ़ाज़ली, शहरयार, ज़ुबैर रिज़वी के यहाँ ज़रूर दिखायी देती है पर हिंदी के साथ तुलना करें तो यह दृश्य उत्साहवर्धक नहीं दिखता। उर्दू की प्रगतिशील कविता, जिसके शीर्ष पर अब कैफ़ी आज़मी हैं और कुछ साल पहले तक अली सरदार जाफ़री थे- भी ऐसी नहीं है कि संवेदना की गहराई, प्रयोगशीलता और यथार्थ चेतना की अभिव्यक्ति की नयी भंगिमाओं के आधार पर नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल से तुलनीय हो सके। ऐसा कोई उर्दू कवि भारत, पाकिस्तान में दिखायी नहीं पड़ता जिसकी तुलना मुक्तिबोध से की जा सके। पाकिस्तानी उर्दू कविता में अभी हाल-हाल तक नासिर काज़मी की ग़ज़लों का असर गहरा रहा है जो कभी फ़िराक़ गोरखपुरी से प्रभावित थे। पर उनका मिज़ाज कैसा था इसका पता उनके एक कथन से लगाया जा सकता है। एक बार इंतज़ार हुसैन ने उनसे पूछा- “आपका समकालीन कौन है?” नासिर काज़मी तपाक से बोले- “मेरा समकालीन सरसों का फूल है।” ‘सरसों का फूल’ क्या कह रहा है मैं इसकी व्याख्या नहीं करूँगा।

इधर जो नज़्म की शायरी पाकिस्तान में लिखी जा रही है, उससे मीराजी और नूनमीम राशिद की परंपरा को एक नया मोड़ देते हुए जो सबसे महत्त्वपूर्ण नाम उभरकर आया है वह अफ़ज़ाल अहमद का नाम है। कुछ साल पहले ‘पहल’ ने उनकी चुनी हुई कुछ नज़्मों की पुस्तिका प्रकाशित की थी, जो समकालीन हिंदी कवियों के बीच व्यापक चर्चा में रही। अभिव्यक्ति की जैसी ताज़गी मुझे वहाँ दिखायी पड़ी, वैसी तो आज हिंदी में भी कम है। अफ़ज़ाल अहमद के बाद पाकिस्तानी शायरी में क्या कुछ नया हुआ उसकी जानकारी मुझे नहीं है।

kedar nath singh, vasudha, केदारनाथ सिंह

पाकिस्तान में उर्दू आलोचना के बारे में मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है क्योंकि अक्सर हिंदी और उर्दू में आलोचना साहित्य का अनुवाद बहुत कम होता रहा है। पिछले दिनों अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिंद) से प्रकाशित ‘उर्दू अदब’ ने हिंदी के नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डे आदि कुछ आलोचकों के लेख छापे थे, जो पाकिस्तानी पाठकों का ख़ासा ध्यान आकृष्ट करने में सफल रहे। उसी तरह से पाकिस्तान के वज़ीर आग़ा के कुछ लेख हिंदी में छपे थे जिनसे लगा कि साहित्यिक सोच का एक अलग शऊर वहाँ भी विकसित होता रहा है। पर यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि उर्दू आलोचना पर अमेरिकी नयी समीक्षा का असर आज भी बहुत गहरा है। मेरा मानना है कि इस समय भारत, पाकिस्तान दोनों को मिलाकर उर्दू आलोचना में शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी ही शीर्ष पर हैं जो भारतीय लेखक हैं।

उर्दू साहित्य के मूल्यांकन की एक परंपरा उर्दू में है जिसके बारे में दूर-दूर से थोड़ी बहुत जानकारी मिल पाती है पर ज़ाहिर है कि हर भाषा जब किसी अन्य भाषा की रचना का साहित्यिक आंकलन करती है तो उसके मानदंड लगभग वही होते हैं जो अपनी भाषा पर लागू होते हैं। कथा लेखन को लेकर तो ये मानदंड दोनों पर लागू हो सकते हैं पर कविता के स्तर पर हिंदी उर्दू में थोड़ी भिन्नताएँ आती हैं। उदाहरण के लिए यदि उर्दू ग़ज़ल का आकलन करना हो तो उस फ़ॉर्म के परंपरागत वैशिष्ट्य की गहरी पहचान और पड़ताल के बिना यह संभव नहीं होगा। इसलिए इस बिंदु पर एक हिंदी आलोचक को उर्दू परंपरा और उसकी मूल्य प्रणाली की वांछित जानकारी होनी चाहिए। थोड़ी-बहुत भाषिक भिन्नता को छोड़ दें तो नज़्म और कविता के मूल्यांकन में कोई ख़ास अंतर नहीं होता।

जहाँ तक समकालीन उर्दू साहित्य से मेरी अपेक्षाओं की बात है तो मैं उसी बात को अपनी भाषा में कहना चाहूँगा जो कभी फ़िराक़ गोरखपुरी ने उर्दू कविता और ख़ासतौर से भारतीय उर्दू कवि के बारे में कही थी- “उसमें भारतीय चिंतन प्रणाली और प्रतीक प्रणाली के साथ भी एक गहरा जुड़ाव होना चाहिए- फ़ारस से आये हुए प्रतीकों को छोड़कर नहीं बल्कि उसको लिये-दिये।”

हिंदी-उर्दू के रचनाकारों और पाठकों के बीच रचनात्मक संवाद आज की ज़रूरत भी है और एक सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी भी। मिलन के अवसर शुरू से ही आते रहे हैं और कवि सम्मेलनों के मंच पर भी हिंदी के लोकप्रिय कवि और उर्दू शायर साथ-साथ कविता सुनाते रहे हैं। पर मेरा ख़याल है कि इतना ही काफ़ी नहीं है। दोनों भाषाओं के साहित्यकारों के बीच वैचारिक विमर्श के अवसर होने चाहिए। बड़ी साहित्यिक संस्थाएँ इससे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पर मेरा मानना है कि इसके लिए केवल संस्थाओं और सरकारी तंत्र का मुखापेक्षी होना आवश्यक नहीं है। बिना किसी योजना और लगभग स्वतःस्फूर्त ढंग से पिछले कुछ समय से दोनों भाषाओं के लेखकों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर मिलना-जुलना शुरू हुआ है जो एक अच्छी बात है। मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि केवल भारतीय उर्दू लेखकों के साथ ही नहीं पाकिस्तानी उर्दू लेखकों के साथ भी हिंदी लेखकों के मिलन के अवसर तलाशे जाने चाहिए जो बुनियादी भाषिक एकता के कारण दोनों भाषाओं के लेखकों के लिए उपयोगी हो सकता है। मैंने कई पाकिस्तानी लेखकों से बातचीत में पाया कि परस्पर मिलने की चाह और सृजनात्मक बेचैनी उनके भीतर भी है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि राजनीति इसमें आड़े न आए। साहित्य की यही ताक़त है, जो इधर भी है और उधर भी।

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