
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग आलोक त्रिपाठी की कलम से....
मोटापा: क्या इसका पूरा सच जानते हैं हम?
कुछ महीने पूर्व, प्रधानमंत्री ने एक सभा को संबोधित करते हुए जनमानस से अपील की खाने के तेल में 10% की कटौती कीजिए। क्योंकि मोटापा एक महामारी का रूप ले रहा है। उनकी चिंता भी जायज़ थी। मोटापा एक ऐसी समस्या है जो कई समस्याओं की जननी है, जैसे हाई बीपी, शुगर, हृदय संबंधी रोग आदि। अतः मोटापा और उसके कारण और संभावित निराकरण का गहन विश्लेषण आवश्यक हो जाता है। वैसे कहते हैं न कि बड़े लोगों पर दैवीय शक्तियों की कृपा बनी रहती है, अतः प्रधानमंत्री जी की चिंता के कुछ महीने पश्चात ही मोटापे की दवा भी आ गयी। अब उसे खाकर कितने लोग दुबले हुए इसका कोई आंकड़ा मेरे पास तो नहीं है, अगर आपके पास हो तो कृपा करके साझा करें।
भारत में 1990 के बाद मोटापा (obesity, BMI ≥30) की दर में भारी वृद्धि हुई है। 1990 में वयस्कों में मोटापा सिर्फ़ 1-2% था, जो 2022 तक महिलाओं में 9.8% और पुरुषों में 5.4% पहुँच गया। बच्चों (5-19 वर्ष) में यह 1990 के लगभग 1% से बढ़कर 2022 में 8.4% हो गया। शहरी क्षेत्रों में मोटापा ग्रामीण क्षेत्रों से दोगुना से अधिक है– वयस्कों में शहरी 35-40% बनाम ग्रामीण 20-24%, और बच्चों में शहरी 9-31% बनाम ग्रामीण 4-15%। पिछले 30 सालों में मोटापे की औसत वार्षिक वृद्धि दर वयस्कों में 0.3-0.4 प्रतिशत अंक और बच्चों में 0.2-0.3 प्रतिशत अंक रही है, जो 2010 के बाद तेज़ होकर 1% प्रति वर्ष के करीब पहुँच गयी है। 2025 तक भारत में लगभग 70-80 मिलियन वयस्क और 14-15 मिलियन बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं।
तो अब आते हैं मूल मुद्दे पर। मोटापा का कारण क्या है? क्यों किसी भी भीड़ में मोटे लोगों का अनुपात ज़्यादा दिखायी देता है? वैसे इस सवाल पर कुछ लोग हंसेंगे भी। क्या मूर्खता भरा सवाल है! “यू डोंट नो, इट्स लाइफ़स्टाइल प्रॉब्लम”। सच बताऊं तो सहसा इस उत्तर पर विश्वास भी हो जाता है, किंतु भारत में यह जीवनशैली की समस्या बनाम मोटापा में वृद्धि की दर कुछ और बयान करती है। सन 2000 से ऐसा क्या बदला है, आपकी दिनचर्या में? मेरा सरोकार वैश्वीकरण के बाद से है! ज़रा एक नज़र इन आंकड़ों पर डालनी चाहिए:
- भारत का फ़ास्ट-फ़ूड बाज़ार विस्फोटक गति से बढ़ रहा है, जो अपने पश्चिमी समकक्षों को बहुत पीछे छोड़ रहा है। 2012 से 2023 के बीच आलू चिप्स के बाज़ार में 136% की भारी वृद्धि हुई, जबकि उत्तरी अमेरिका में महज़ 13% की वृद्धि दर्ज की गयी। चॉकलेट बाज़ार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है– भारत में 27% की बढ़ोत्तरी हुई, जबकि उत्तरी अमेरिका में सिर्फ 7%।
- साथ ही आपको यूनीलीवर पूर्व हेड हन्नेक फेवर का बयान सुनाना चाहिए, “India’s on fire”, ……”fantastic growth engine!” जंक फ़ूड, कोल्ड ड्रिंक्स, उसके केन, कॉस्मेटिकस आदि वो पदार्थ हैं, जिन्हें विज्ञान में एंडोक्राइन डिस्रप्टर कहा जाता है, क्योंकि ये लैंगिक हार्मोंस की नक़ल करके बच्चों, ख़ासकर बच्चियों में वयस्क होने की उम्र को घटा रहे है। अतः जो समय बच्चों के शारीरिक विकास के लिए सुलभ होता है, ख़ासकर मांसपेशियों के, उसमें लगातार कमी हो रही है।
- इसका एक दूसरा दुष्परिणाम देखिए। मांसपेशियों में ही आवश्यकता से अधिक पचा हुआ भोजन संग्रहित होता है। जिसे ज़रूरत के समय शरीर, एटीएम की तरह, भोजन न मिल पाने की अवस्था में करता है। और इसे ही स्टैमिना कहते है। आंकड़ों के अनुसार एक एथलीट का शरीर 90 मिनट तक उसे व्यायाम करने के लिए ऊर्जा दे सकता है। और अगर आप ध्यान दें तो समझ पाएंगे कि सामान्य रूप से बच्चों में लगातार स्टैमिना का क्षय होता जा रहा है।
- इन मांसपेशियों के आवश्यकता से कम मात्रा में निर्माण के कारण, ज़रूरत से अधिक पचा हुआ भोजन इन मांसपेशियों में संग्रहित न होकर यकृत और फ़ैटी ऊतकों में संग्रहित होता है, जिससे प्रत्यक्षतः मोटापा में वृद्धि होती है।

ये तो रही एक मोटी-मोटी तस्वीर इसके मूल कारण की। साथ ही आहारनाल में भोजन का किण्वन (फर्मेंटेशन) एक महत्वपूर्ण समस्या है। यह एक ऊर्जा की एक समानांतर राह तो सुनिश्चित करता ही है, साथ ही किण्वन के फलस्वरूप कुछ नुक़सानदेह केमिकल पैदा होते हैं, जो यकृत और आहार नाल से जोड़ने वाली शिरा की निगरानी तंत्र पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं।
अतः जिम जाकर मोटापा कम करने का विचार करने से पहले इन बिंदुओं पर विचार कर लें। जिम जाना या व्यायाम करना शरीर के डिमांड व् सप्लाई को संतुलित रखने के लिए तो उचित राह है पर इससे आप एकाएक दुबले हो जाएंगे यह कहना ज़रा मुश्किल है। या फिर कोई दवा आपके मोटापे को जादू से हवा कर देगी, मेरी समझ से यह मुश्किल है। और तार्किकता के लिए अगर यह मान भी लें कि ऐसा हो सकता है, तो भी इसके भविष्य में होने वाले दुष्परिणाम भयावह हो सकते हैं।
सहज समाधान आपको पता ही है
- क्या खाना है क्या नहीं? इसमें ज़्यादा माथापच्ची नहीं करना हो तो पूर्वज जो भी खाते थे, वो सब खाएं।
- संतुलित आहार, जिसमें सब कुछ हो, लें। सब कुछ मतलब सब कुछ।
- कार्बोहाइड्रेट या वसा आपके दुश्मन नहीं है, और कोई उन्हें ऐसा रंगने का प्रयास कर रहा है, तो उसके पीछे कोई कारण होगा। शरीर को इनकी भी आवश्यकता होती है।
- व्यायाम या घरेलू कार्य अवश्य करें।

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
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उपयोगी रोचक तर्क़ युक्त तथ्य बहुत अनिवार्य और सराहनीय।
धन्यवाद