sajan peshawari, roshan lal roshan
सलीम सरमद की कलम से....

पहली किताब, बस स्टैंड और दीवान रोशन लाल रोशन

            जब मुझे शेर के दो मिसरों की समझ आयी और ग़ज़ल से मेरी निस्बत बढ़ी तो सबसे पहले मैंने समाज के आईने में देखा, जहां मेरा अक्स मुझे चिढ़ा रहा था। मुझे कुछ गिल्ट-सा महसूस हुआ, मैं शायरी क्यों पढ़ रहा हूं? मुझे लगने लगा कि कभी न कभी मुझसे मेरा ये अक्स कहने वाला है ‘तुम बिगड़ रहे हो’, ये उस दौर की बात है, जब सिनेमा देखने और यार-दोस्तों के साथ घूमने से भी बिगड़ जाने का ख़दशा रहता था। मैं किसी ग़लत संगत में नहीं था फिर भी मेरे बालक मन में ये धारणा तो थी, शायरी ठीक नहीं है, इसके बावजूद मुझे शायरी से नफ़रत नहीं हुई। हां इतनी एहतियात ज़रूर थी, इस बात को मेरे उस अक्स के सिवा कोई और न जान पाये। कभी तो ये विचार भी आया कि काश कोई घटना घटे या कोई आंदोलन हो, जिससे शायरी को लोग किसी दूसरे नाम से पुकारने लग जाएं।

‘शायरी की किताब चाहिए’, तब दुकानदार से सीधे बोलने की हिम्मत मुझमें नहीं थी, मगर बस स्टैंड पर ये सहूलत थी, वहां वो किताबें भी खुले में दिख जाती थीं, जिनका नाम लेकर नहीं ख़रीदा जाता। शायरी की किताब ढूंढ़ने पर वहां अक्सर रंगारंग शायरी की रद्दी किताबें दिख जाती थीं, जिस पर अक्सर किसी हसीन लड़की की तस्वीर छपी होती। शायद ऐसे ही कवर के कारण शायरी के लिए मुझमें गिल्ट आया होगा।

उस दिन वो किताब दिखी, जिसका टाइटल था ग़ज़लियात, काले कवर पर ख़ूबसरत गर्ल मॉडल का साइड फ़ेस और एक गुलाब, झिझकते हुए कवर पलटा, लिखा था- साजन पेशावरी की प्रस्तुति दीवान रोशन लाल रोशन की मख़मली ग़ज़लें, पहली ग़ज़ल का पहला शेर पढ़ा-
हर गाम हवादिस का ये लश्कर तो नहीं है
हर शख़्स मेरी तरह सिकंदर तो नहीं है

ऐसा लगा जैसे सिकंदर ने पन्ने से निकलकर मेरी कलाई पकड़कर पूछा हो- बताओ इसमें क्या बुरा है, इसे पढ़कर तुम कैसे बिगड़ जाओगे, बस स्टैंड पर बिकने वाली हर किताब अश्लील तो नहीं होती। दूसरा शेर पढ़ा और अधीर हो गया, मैंने किताब की क़ीमत दुकानदार के हाथ में रख दी और किताब को बाएं हाथ से पकड़कर अपने बदन में छुपा लिया ताकि समाज के आईने में बैठा हुआ मेरा वो अक्स कहीं किताब के काले कवर पे छपी लड़की का साइड फ़ेस और गुलाब को न देख ले। दूसरा शेर था-
दुनिया जो बिगड़ती है बिगड़ जाये मुझे क्या
वो मेरी तरह मेरा मुक़द्दर तो नहीं है

किताब मेरी फेवरेट तो नहीं बनी मगर पुरानी होते-होते बाइंडिंग करवाकर उसे रख लिया। ये पहली ग़ज़ल की किताब थी, जिसके कारण मेरा बालक मन आसान क़ाफ़ियों और रदीफ़ से आशना हुआ था।
डूबी ही चली जाती है दुनिया-ए-तमन्ना
आंखों में मेरी कोई समंदर तो नहीं है
उठती हैं जो रह-रह के अनलहक़ की सदाएं
दीवाना कोई शहर के अंदर तो नहीं है

बचपन में सुनी किसी किरदार की कहानी या कोई किताब हमारे व्यक्तित्व का आधार बन जाती है। दीवान रोशन लाल जी के बारे में उसमें कोई जानकारी नहीं थी मगर उस किताब ने मुझे जो दिशा दिखायी, मैं उस तरफ़ चल पड़ा था।

जब मुसाफ़िर राह पर देखा गया
सर पटकता राहबर देखा गया
अल्फ़ाज़ को ख़ुलूस के क़ालिब में ढालकर
काग़ज़ पे रख दिया है कलेजा निकालकर

कोई भी लुग़त लफ़्ज़ों को बरतने का सलीक़ा नहीं सिखा सकती जब तक उन्हें व्यवहार में न लाया जाये। मैं इस किताब को पढ़कर उन लफ़्ज़ों को लिखने लगा था जिन्हें मैं बोलता नहीं था, ग्रामीण परिवेश में जन्मे बालक को उर्दू के अल्फ़ाज़, उनके नुक़्ते और सही मात्राओं का ज्ञान हो रहा था।
एहसास हुआ है मुझे तन्हाई में अक्सर
मैं दूर समझता हूं जिसे, पास खड़ा है
इंसान की सूरत को ज़रा ग़ौर से देखो
इंसान की सूरत में ख़ुदा है कि नहीं है

यह कोई महान किताब नहीं थी। इसकी ग़ज़लें इस किताब के अलावा मैंने कहीं नहीं देखीं, न सुनीं। इस किताब में मौजूद किसी भी शेर को मैंने किसी भी आख्यान में कोट होते हुए भी नहीं देखा। फिर भी इस पहली किताब पर मेरा अक़ीदा था क्योंकि इससे मेरे बचपन की याद जुड़ी थी।
आबला-पा हूं, बनाऊंगा नक़ूशे-पा नये
आने वालों को मैं मंज़िल का पता दे जाऊंगा
आसमां से भी वो बुलन्द हुआ
जिसके हाथों में आ गयी मिट्टी

पतझड़ के मौसम में हवा के साथ उड़ते हुए सूखे पत्ते की तरह किताबें मेरी आंखों से गुज़रती रहीं लेकिन बस स्टैंड से ये किताब मुझे मिली, जैसे कोई मासूम-सा पत्ता अचानक किसी झौंके से निकलकर मेरे गाल पर चिपक गया हो।
मैं क्या हूं कौन हूं कोई तो ये बताओ मुझे
नहीं तो गहरे समंदर में फेंक आओ मुझे

इस किताब में लिखे शब्द वफ़ा, इश्क़, प्यार, हिज्र मेरी कच्ची उम्र को समझ भी नहीं आये। इस किताब की ग़ज़लें मुझे मख़मली भी नहीं लगीं जैसा पहली ग़ज़ल से पहले दावा किया गया था, फिर भी दीवान रोशन लाल रोशन के शब्दों में कहता हूं-
बस एक बार तेरी इक झलक-सी देखी थी
मेरी निगाह में अब तक वही नज़ारा है

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

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