poetry, कविता
पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....

मनोचिकित्सा से अलग है कविता की थेरेपी

           अभी तक मैं पोइट्री थेरेपी से सम्बन्धित कुछ केस प्रस्तुत कर रही थी, लेकिन कुछ बैठकों में शामिल होने पर मुझे पता चला कि इस संबन्ध में मनोवैज्ञानिकों की भी जानकारी अधूरी है। कोई अपने आप कविता लिख रहा है, जाने या अनजाने। इसमें मनोचिकित्सक की कोई भूमिका नहीं होती है। दरअसल पोइट्री थेरेपी एक अलग विधा है, उसके उपयोग का भी तरीक़ा साधारण मनोचिकित्सक से भिन्न होता है।

थेरेपी में चिकित्सक नहीं सहायक होता है, जो प्रोफ़ेशनलिज्म से भिन्न होता है। उदाहरण के लिए मैंने कृत्या फ़ेस्टिवल में कैंसर वार्ड की बात की थी। जब हम किम्स के कैंसर वार्ड में पहुंचे तो देखा कि वार्ड में रोगियों के साथ उनके सहायक भी थे, जैसी कि भारतीय परंपरा है, अधिकतर परिजन थे। हमने जब बातचीत शुरू की तो परिजन बोलने को अधिक आतुर दिखे। हमने रोगियों का नाम पता आदि पूछा, जिससे वे सहज हो जाएं। फिर किम ने धीरे से पूछा कि यह तो बहुत सुन्दर वार्ड है। यहां तो खिड़की भी है। बाहर भी दिखता है। तब महसूस हुआ कि उन लोगों ने शायद खिड़की के बाहर देखा ही नहीं। वे अपनी नसों में टिप-टिप करते तरल पदार्थ, जो भीतर जाकर उत्पात मचा देता है, में ध्यान केन्द्रित रख रहे थे।

पोइट्री थेरेपिस्ट

कीमियों की ज़हरीली बून्दें
न खिड़की की ओर देखने का मौका देती हैं
न उसके पीछे झांकती दुनिया की
देह एक शहर में तब्दील हो गया है
जिनकी नालियों से बह रही है वेदना

जवान बेटी के साथ बैठे पिता
देख रहे थे बेटी का भविष्य
युवा बेटे के साथ खड़ी मां
देख रही थी थकती कोख
बेटे का बिखरना छन-छन

युवा स्त्री के पल्लू से
प्रेमी पति पौंछ रहा था, अपने आंसू

और हम?
उनसे कविता की बात करने जा रहे थे।

किम, जो थेरेपिस्ट रही हैं, उनसे परिवार के बारे में पूछने लगती है, घर में कौन-कौन है? रोगियों का ध्यान भटकता है। किसी का परिवार के नाम से चेहरा बुझ जाता है तो किसी का चमक जाता है। युवा रोगी का पिता समझता है कि किम कैंसर स्पेशलिस्ट हैं, वे पूछते हैं कि मेरी बेटी का क्या होगा। अभी बीस साल की है, कैसे इसकी जिन्दगी गुजरेगी? क्या यह ठीक होगी? किम उन्हें बोलने देती है, कोई सुझाव नहीं बस सुनते रहना। जी हां, थेरेपिस्ट का सबसे पहला काम है सुनना।

आज के समय में कोई सुनने वाला है भी नहीं। हर किसी को जल्दी है, सब बोलना चाहते हैं, बस। थेरेपिस्ट का काम है कि रोगी हो अथवा उसका सहायक, उसे बोलने दें, उसे सुनें?

डॉक्टर के पास एक रोगी के लिए सिर्फ़ पांच मिनिट होते हैं, उनके पास बने-बनाये खांचे होते हैं, रेडीमेड रिज़ल्ट होते हैं। उसके पास रोगी को सुनने का वक़्त ही कहाँ?

बोलने से रोगी के मन के मवाद फूट-फूट कर निकलने लगते हैं, यदि रोगी बोल नहीं पाता है तो उसके कुछ मानसिक छिद्रों के अवरुद्धन को साफ़ करना होगा। यह बोलना है, न कविता है न लेखन। कभी-कभी रोगी बोल नहीं पाता तो अन्य कला का सहारा लिया जा सकता है, जैसे रंगीन पैंसिल और कागज़ दे दिया जाये या माटी का गुंधा ढेला दे दिया जाये, जिससे वह मनभावन आकृति बना सके। ज़रूरी नहीं कि उसे यह काम पसन्द आये, लेकिन वह जो भी करेगा। अपने मन की उलझनों को दूर करेगा।

जब कीमियों (कैंसर मरीज़ों को दी जाने वाली थेरेपी कीमो) से किसी तरह से उबरी, तो मैंने आनलाइन मिट्टी का आर्डर कर दिया था और अक्सर कुछ न कुछ बनाती रहती थी। कुछ अनगढ़ आकृतियां, ये सब माटी की कविताएं ही तो हैं।

क्रमशः

रति सक्सेना, rati saxena

रति सक्सेना

लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्र​काशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।

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