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राजा अवस्थी की कलम से....

प्रगीत से नवगीत

             गीत कविता का शाश्वत रूप है। कविता चाहे जितने रूपों में स्वयं को प्रस्तुत करे, किन्तु हर बार लौटकर गीत ही हो जाती है। मैथिल-कोकिल विद्यापति को ही हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है और यदि यही सच है, तो हिन्दी कविता का उदय भी गीत से ही हुआ प्रमाणित होता है। “जिसका विकास आगे चलकर संतों और भक्तों की वाणी में हुआ।” (डॉ. नामवर सिंह कृत ‘वाद विवाद और संवाद’ के निबंध ‘प्रगीत और समाज ‘से)। नामवर जी की दृष्टि में मुक्तिबोध की कविताएं अपने रचना-विन्यास में प्रगीतधर्मी हैं। सूर, तुलसी के पद तो हैं ही, त्रिलोचन और नागार्जुन तक अपनी प्रगीतात्मकता में ही सामाजिक सार्थकता के बोध से भरे हैं। यद्यपि नामवर जी अपने इसी निबंध में अपनी इस जड़ धारणा से बद्धमूल हो जाते हैं कि “आज भी प्रगीत के रूप में उसी कविता को स्वीकार किया जाता है, जो नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक हो।”

समाज में निरन्तर घटित होते परिवर्तनों, बदलती मानसिकता और बढ़ते अन्तर्विरोधों के कारण मनुष्य के भीतर आत्मसंघर्ष, विद्रोह, विडम्बना भी तेज़ी से बढ़ी। कवि जो प्रगीत रच रहा था, उस पर भी आत्मेतर दबाव घनीभूत हो रहा था। यही वह समय है, जब नयी कविता की प्रगीतात्मकता में भी बदलाव होता है और प्रगीत नवगीत में रूपांतरित होता है। जो नयी कविता मुक्त छंद में प्रगीतात्मकता के साथ लिखी जा रही थी और जितने भी लोग मुक्त छंद में कविता लिखने का दावा कर रहे थे, वे मुक्त छंद की परम्परा को सम्हाल नहीं पाये। वहाँ एक अराजकता फैली और कविता के कथ्य को छंद मुक्त करने के बाद निरे गद्य में बदल दिया गया। फिर न मुक्त छंद बचा, न छंद मुक्त और न ही कविता, बचा तो मात्र गद्य… ऐसे में पारम्परिक छंदों के साथ या उनसे कुछ अलग भी, लोकलयों को रचना में शामिल करते हुए प्रगीत में समय की अभिव्यक्ति को साधने की साधना में निरन्तर नवगीत लगा रहा है। इसे ऐसा कहना अधिक ठीक होगा कि इसी साधना का परिणाम ही नवगीत कविता के रूप में सामने आया। यद्यपि प्रगीत के वैयक्तिकता से उबरकर सामाजिकता में ढलने में समय तो लगना ही था, इसीलिए तत्कालीन नवगीत कविताओं में यह बदलाव धीरे-धीरे क्रमशः दिखायी पड़ता है।

यदि इस बात पर विचार किया जाये कि नवगीत के अस्तित्व में आने की ज़रूरत क्या थी, तो हमें बीसवीं सदी के चौथे दशक से लेकर छठवें दशक तक की स्थितियों को देखना होगा। इस समय कविता लगातार स्वयं में जीवन स्थितियों को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य तलाश करती मिलती है। लेकिन, कवि ने या तो आज़ादी के तराने गाये थे या अपने ही सफल-असफल प्रेम और तद्धनित आशा-निराशा के वर्णन में रमा था। कविता अब इससे बाहर निकलने को छटपटा रही थी। ऐसे समय में महाप्राण निराला की डोर पकड़ कुछ लोग मुक्त छंद की ओर बढ़ते हैं, तो कुछ लोग गीत के भीतर ही नवीन अभिव्यक्ति की संभावनाएं गढ़ने में जुट जाते हैं।

आज़ादी के बाद जिस निराशा, हताशा और संत्रास की स्थितियाँ लगातार बढ़ रही थीं, ऐसे में स्वयं अपने रोदन से बाहर निकलकर उन स्थितियों और संघर्षों को अभिव्यक्ति और खाद-पानी देने का एक दबाव विचारशील रचनाकार के मन-मस्तिष्क पर पड़ रहा था। यानी अब कविता अपने समय को व्यक्त करना चाहती थी। अपने युग-संघर्ष को व्यक्त करना चाहती थी। गद्य कविता ने यह जल्दी स्वीकार कर लिया और अपनी कविता का रूपाकार गद्य के आसपास निर्मित कर लिया। जीवन स्थितियों और युग की आकांक्षाओं को कहने के लिए यह सरल और सुगम रास्ता था, किन्तु गीत ने भी अपने भीतर की आग को कुरेदा, हवा दी और अपने युग को जीने में लग गया। इस तरह गीत नवगीत के रूप में अस्तित्व में आया।

नवगीत के उद्भव के और भी कई कारण रहे होंगे। किसी एक ही कारण को मान लेना पूरी पड़ताल से बचने जैसा होगा, किन्तु इससे एक बात तो अवश्य सामने आती है कि नवगीत के उद्भव के प्रमुख कारणों में अपने समय को अभिव्यक्त करने की उद्दाम इच्छा भी रही है। यही कारण लगातार और प्रमुख होता गया और अब भी बना हुआ है। दरअसल नवगीत कविता की चुनौती भी यही है कि वह अपने समय की सभी तरह की स्थितियों, संघर्षों, अपेक्षाओं को पूरी गीतात्मकता, पूरे पैनेपन, प्रभावी तेवर और सम्प्रेषणीय भाषा के साथ अपनी संस्कृति, अपने लोक व चेतना को स्वर दे सके। नवगीत ने यह सामर्थ्य लगातार अर्जित भी की है। यही कारण है नवगीत लगातार लम्बे समय तक प्रासंगिक रहने की विशेषताओं से भरता जा रहा है। यद्यपि कुछ लोग इसे पारम्परिक छंद विधान में समेटने को आतुर हैं। उन्हें यह समझना आवश्यक है कि विधान की पारम्परिकता उतनी आवश्यक नहीं है, जितना कथ्य का पैनापन और प्रभावी तेवर और इसके लिए गीत के भीतर प्रयोगशीलता को बनाये रखने की ज़रूरत होती है। नवगीत के प्रारूप को मंच के अनुकूल बनाने से अधिक ज़रूरी उसमें समय की आग को जिन्दा रखना है। इस जिन्दा रखने के क्रम में रचनाकार का अपना जीवन, उसका पास-पड़ोस, उसका संघर्ष भी आता ही है। बस! वह मात्र उसका न हो, वह लोक का भी हो, तो वह भी नवगीत ही होगा। ज़रूरत इस बात की भी है कि बाहर छोटी से छोटी घटना, स्थिति, वस्तु पर नज़र रहे और उन्हें एक ऐसा अर्थ देने कि कोशिश हो, जो उनके मन्तव्य को कह पा रहा हो।

आज कवियों में विविध विधाओं में रचना करने की होड़-सी लगी है। हर कवि गीत, नवगीत, ग़ज़ल, दोहा और गद्य कविता सहित सभी ज्ञात काव्य-विधाओं में लिखकर हर विधा में एक किताब छपवा लेना चाहता। सवाल यह उठता है कि क्या उसकी संवेदना का विस्तार इतना हो गया कि कोई एक विधा उसकी संवेदना को स्वर नहीं दे पा रही? अभिव्यक्ति की छटपटाहट में वह विविध विधाओं में लिख रहा है? देखने में यह आ रहा है कि किसी कवि की एक ही संवेदना, कुछ गिने-चुने कथ्य-तथ्य-रूप बदलकर उसकी सभी रचनाओं में आ रही हैं। फिर कवि-मूल्य और कवि-धर्म का क्या? कवि-दृष्टि के विस्तार के लिए क्या किया गया? ऐसे में ज़रूरी है कि नवगीत में, ग़ज़ल में या किसी अन्य काव्य-विधा में कथ्य-तथ्य की सघनता, सार्थक काव्य-दृष्टि और निहित सार्थक व सामाजिक काव्य उद्देश्य की उपस्थिति वाला सृजन हो।

राजा अवस्थी

राजा अवस्थी

सीएम राइज़ माॅडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटनी (म.प्र.) में अध्यापन के साथ कविता की विभिन्न विधाओं जैसे नवगीत, दोहा आदि के साथ कहानी, निबंध, आलोचना लेखन में सक्रिय। अब तक नवगीत कविता के दो संग्रह प्रकाशित। साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित 'समकालीन नवगीत संचयन' के साथ सभी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समवेत नवगीत संकलनों में नवगीत संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, दोहे, कहानी, समीक्षा प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्र जबलपुर और दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से कविताओं का प्रसारण।

3 comments on “प्रगीत से नवगीत

  1. मुक्त छंद के नाम पर कुछ भी लिख देने की अराजकता ने साहित्य का बहुत नुकसान किया है और वह समाज से दूर किसी निर्जन की वस्तु मात्र बनकर रह गया है।

  2. बहुत बढ़िया लेख! गीत, नवगीत के बहाने कयी सवालों को उठाता। सबसे अच्छी बात अभिव्यक्ति की अर्थवत्ता पर लेखक का मन्तव्य मानै रखता है

  3. प्रगीत से नवगीत….
    वरिष्ठ गीतकार राजा अवस्थी का आलेख ज्ञानवर्धक तो है ही।साथ ही नवोदित गीतकारों के मन में गीत को लेकर उठ रहे कई प्रश्नों का समाधान कर दिशाबोध कराने में सक्षम है कविता का प्रारंभिक स्वरूप गीत ही था। इतिहास के विकास के साथ रूप बदलते रहे,पर प्रासंगिकता कभी कम नहीं हुई। पहले गीत सिर्फ अपनी कहता था ।अब गीत सबकी कहता है, सुनता है, समझता है। यह इस आलेख से जाना।

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