पंडित रतननाथ सरशार, ratan nath sarshar
गूंज बाक़ी... पिछली पीढ़ियों के यादगार पन्ने हर गुरुवार। पं. रतननाथ सरशार का नाम उर्दू गद्य के पुरोधाओं में लिया जाता है। उनके जीवन व सृजन पर 'क़लंदर क़लमकार' शीर्षक से एक लंबा लेख चर्चित स्तंभकार, पत्रकार, लेखक, अनुवादक और संपादक राजकुमार केसवानी (26 नवंबर 1950 – 21 मई 2021) ने लिखा, वे शब्द अब भी गूंजते हैं।

पंडित रतननाथ सरशार एक क़लंदर क़लमकार

          राजकुमार केसवानी का नाम हमारे दौर के चहेते लेखकों व सम्मानित पत्रकारों में शुमार रहा है। इस महीने उनकी जयंती का मौक़ा है। ‘कशकोल’ में उन्होंने पं. रतननाथ सरशार (1846-1902) पर जो मज़मून लिखा, उसमें दर्ज है कि हिंदी में भारतेंदु और बांग्ला में बंकिमचंद्र के समकक्ष उर्दू में सरशार का मक़ाम रहा, लेकिन उर्दू वालों ने उन्हें वह स्थान देने में इंसाफ़ नहीं किया। सरशार के कारनामों और ज़िंदगी पर लंबे लेख के अंश यहां पुस्तक से साभार प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जीवनियों के पाठकों के लिए महज़ क़िस्सा नहीं बल्कि यह लेख इतिहास से हासिल सबक़ के तौर पर भी पढ़े जाने की मांग करते हैं। बक़लम राजकुमार केसवानी…

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          यह सचमुच एक हैरान कर देने वाली बात भी है और इंसानी ज़ेह्न की क़ुव्वत का नमूना भी कि सरशार को हज़ारों कि लाखों मुहावरे और शेर ज़बानी याद थे। ‘फ़साना-ए-आज़ाद’ ही नहीं बल्कि उनके बाक़ी उपन्यासों में भी हर दूसरे सफ़े पर उर्दू-फ़ारसी के ढेर सारे शेर और मुहावरे कहानी के किरदारों के मुँह से मौक़े की मुनासिबत और ज़रूरत के हिसाब से आते-जाते हैं। कहीं-कहीं शायद जहाँ सरशार को कोई मुनासिब शेर नहीं मिला तो अपनी शायरी क़ुव्वत का इस्तेमाल कर नया शेर ही लिख डाला है।

‘फ़साना-ए-आज़ाद’ अगस्त 1878 से जनवरी 1880 तक बाक़ायदा छपता रहा। इस एक फ़साने की वजह से ‘अवध अख़बार’ की बिक्री में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ। बाद में जब यह फ़साना किताब की शक्ल में शाया करने का फ़ैसला हुआ तो तक़रीबन तीन हज़ार से ज़्यादा सफ़े मौजूद थे। इन तीन हज़ार सफ़ों को चार हिस्सों में बाँटकर छापा गया। किताब की शक्ल में तबसे यह सिलसिला सवा सौ साल के बाद भी अब तक क़ायम है।

इसी दौर में सर सैयद अहमद, रौनक़ अली ‘रौनक़,’ मिर्ज़ा हादी रुस्वा, जैसी बड़ी हस्तियों के साथ ही एक बेहद अहम नाम था अब्दुल हलीम ‘शरर’। शरर साहब के वालिद नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में आलिमों की तरह जुड़े थे और वे ख़ुद अपनी हैसियत से नामवर अदीब थे। किसी वजह से सरशार से उनके इख़्तिलाफ़ात थे और वे उन्हें नापसन्द करते थे, लेकिन उस दौर में शख़्सी पसन्द-नापसन्द के ऊपर ईमान अक्सर पूरी ताक़त से इंसानी किरदार में मौजूद था। इसी वजह से ‘शरर’ ने बाक़ी तमाम बातों को दरकिनार कर ‘सरशार’ को एक बेहद जज़्बाती और ख़ूबसूरत ख़त लिखा।

पंडित रतननाथ सरशार, ratan nath sarshar

काफ़ी कोशिश के बावजूद मेरे पास मौजूद उस ख़त का असल उर्दू मज़मून इस वक़्त हाथ नहीं आ रहा, जिसे पण्डित बृजनारायण चकबस्त ने अपने एक उर्दू मज़मून में इस्तेमाल किया है। लिहाज़ा उस ख़त का अंग्रेज़ी से अपना तर्जुमा पेश कर रहा हूँ।

“फ़साना-ए-आजाद’ लिखकर उर्दू ज़बान के लिए आपने एक मसीहाई कारनामा कर दिखाया और इसमें (उर्दू) में एक नयी रूह फूँक दी है… यह बात हौसला बढ़ाने और दिलासा देने वाली है कि आप एक क़दीम और ख़ूबसूरत लेकिन बे-यार-ओ-मददगार ज़बान के मद्दाह हैं। मैं इस बात के लिए ख़ुदा का शुक्र बजा लाता हूँ। मैं नहीं जानता कि आपके इस कारनामे की किस तरह तारीफ़ करूँ, सिवाय इसके कि मैं शेरी ज़बान में कुछ लिख भेजूँ…”

इसी के बाद लिखे मुताबिक़ ‘शरर’ साहब ने आख़िर में यह लिख दिया था-

तुमने नयी निकाली फ़साने की राह वाह!
किन-किन मुहावरों का किया है निबाह वाह!
देखीं जो शोख़ियाँ तिरे ख़ामा की ग़ौर से
(ख़ामा-लेखनी)
बोले शफ़ीक़ वाह, अदू बोले आह-आह!
(शफ़ीक़-दोस्त/अदू-दुश्मन)
करता है ‘शरर’ मिसरा-ए-तारीफ़ पेशकश
क्या बोलचाल लिखी रतन नाथ वाह-वाह!

पण्डित बृजनारायण चकबस्त ने एक जगह दिलचस्प ख़ुलासा किया है कि ‘फ़साना-ए-आज़ाद’ का बुनियादी ख़याल सरशार के दिमाग़ में एक दोस्त त्रिभुवननाथ ‘हिज्र’ की एक बात से पैदा हुआ। ‘हिज्र’ का कहना था.. “कि इस दुनिया में अगर कोई एक ऐसा नावेल है, जिसका हर पेज बिना बीस बार हँसे पढ़ना नामुमकिन है तो वह एक अकेला उपन्यास है ‘डान क्विगज़ोट।’ अगर कोई उर्दू में इस तरह का उपन्यास लिख सके तो कमाल हो जाएगा।”

और कमाल हो गया। ‘डान’ के सांचो पाजा की तरह सरशार के यहाँ आज़ाद के साथ खोजी मौजूद है, जिसका अन्दाज़ एकदम निराला और देसी है। खोजी के किरदार को लेकर हिन्दी में भी ख़ासा इस्तेमाल हुआ है, जिसके चलते इस किरदार को किसी और ज़्यादा तआरुफ़ की ज़रूरत नहीं है। अलबत्ता ‘फ़साना’ के ढेर सारे किरदार और उनके साथ सरशार का एक हमदर्दी भरा सुलूक ज़रूर एक अलहदा मज़मून की दरकार रखता है।

सरशार के ढेर सारे तर्जुमों में मैकेंज़ी वालेस का रूस का इतिहास के अलावा ‘अलिफ़-लैला’ का भी एक अनोखा मक़ाम है।

इन सबसे अलग ‘सरशार’ एक शायर भी हैं, जिन्हें अपने दौर में ख़ूब दाद भी मिली। उसी के साथ यह भी हक़ीक़त है कि उनकी पहचान उनके फ़साने से ही है शायरी से नहीं। शायरी में मुंशी मज़हर अली ‘असीर’ उनके उस्ताद होते थे।

‘सरशार’ ने ग़ज़ल, नज़्म, मसनवी और क़तआत में यकसां क़ाबिलियत के साथ लिखा है। कहीं-कहीं वो भले ही हँसी-मज़ाक़, छेड़-छाड़ और तंज़ से काम लेते हों, लेकिन बाज़ जगह वो बड़ी संजीदा और पते की बात कह जाते हैं। उनका एक शेर है-

जिनको नशा हो बादशाही का
उनको हाले-गदा नहीं मालूम

उन्होंने अपनी जात-बिरादरी वालों के अन्धविश्वास की खिल्ली उड़ाने के लिए भी शायरी का ही सहारा लिया। असल में उस दौर के कश्मीरी पण्डितों की धर्मसभा ने एक कश्मीरी विद्वान और सरशार के दोस्त बिसननाथ धर के सात समन्दर पार इंग्लैंड जाने को लेकर ‘जात बाहर’ करने का फ़तवा दे दिया था। सरशार ने एक मसनवी ‘तोहफ़ा-ए-सरशार’ लिखकर इस अन्धविश्वास में पड़ने के लिए ख़ूब लताड़ लगायी थी।

सरशार की ज़िन्दगी का आख़िरी दौर बेहद तकलीफ़देह था। ज़िन्दगी भर राज-दरबारों से फ़ासला बनाये रखने वाले और मज़लूमों के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने वाले सरशार ने 1895 में लखनऊ छोड़ हैदराबाद जाने का फ़ैसला कर लिया। हैदराबाद में निज़ाम के वज़ीर-ए-जंग महाराजा किशन प्रसाद ने उन्हें अपनी शायरी और मज़मून की इस्लाह के लिए 200 रुपये महीना पर मादर-उल-माहम मुक़र्रर कर दिया था।

नौकरी देते वक़्त उनसे कई सारे वादे किये गये, जो वफ़ा नहीं हुए। हैदराबाद पहुँचने पर उनका ऐसा अज़ीमो-शान इस्तक़बाल किया गया कि उसकी सारी तफ़सील खुशी से फूले सरशार ने लिखकर अख़बार ‘कश्मीर प्रकाश’ में छपवा दिया।

किशन प्रसाद ने ख़ुद भी सरशार को शुरूआत में ख़ूब तवज्जो दी और उनसे ख़ूब काम भी लिया। एक अदबी रिसाला ‘दबदबा-ए-आसिफ़ी’ निकालना शुरू किया, लेकिन बाद के दिन सरशार निहायत तकलीफ़ में रहे। किशन प्रसाद ने अचानक ही किसी बात पर ख़फ़ा होकर उन्हें नौकरी से अलहिदा कर दिया। वादों के मुताबिक़ रक़म भी नहीं मिली।

एक दौर का ख़ूबसूरत, क़दावर, दिलकश इंसान जिसके सर पर महज़ हड्डियों का ढाँचा बनकर रह गया। मुनासिब इलाज की गैर-मौजूदगी में जिस्म खोखला होता चला गया। और 27 जनवरी 1902 को ये सारे मर्ज़ और सारे दर्द ख़त्म हो गये। बस रह गया एक फ़साना, ‘फ़साना-ए-आज़ाद’ बक़लम पण्डित रतननाथ ‘सरशार।’

रतननाथ सरशार की एक ग़ज़ल –

हाले-ज़ुल्फ़ रसा नहीं मालूम
इब्तिदा इंतिहा नहीं मालूम
जिनको नशा हो बादशाही का
उनको हाले-गदा नहीं मालूम
टाले टलती नहीं है हिज़ की रात
है कहाँ की बला नहीं मालूम
पेच-दर-पेच दे रहे हैं वह
गेसुओं की ख़ता नहीं मालूम
बह्रे-आलम में हम हैं मिस्ले-हुबाब
अपना बिगड़ा, बना नहीं मालूम
मुंह चिढ़ाते हो होश में आओ
अपना बिगड़ा, बना नहीं मालूम
हजूमे कर रहे हैं क्यों वाइज़
उनको इसका मज़ा नहीं मालूम
ख़िज्र-ए-राह को हाल ख़ुद अपना
सूरत-ए-नक़्श-ए-पा नहीं मालूम
हाय दिल अपना उसपे आया है
जिसके घर का पता नहीं मालूम
हाथ में उसके तेग़ है सरशार
आयी किसकी क़ज़ा नहीं मालूम

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