
- September 30, 2025
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नियमित ब्लॉग विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....
राजेश रोशन का राग पहाड़ी में संगीतबद्ध अनूठा भजन
वर्ष 1975 में राजेश रोशन के संगीत से सजी फ़िल्म ‘जूली’ के गाने हर युवा की ज़ुबान पर थे। विक्रम और लक्ष्मी की जोड़ी को इस फ़िल्म में बेहद पसंद किया गया था। इसी में प्रीति सागर की मीठी आवाज़ में पहली बार एक अंग्रेज़ी गाना भारतीय फ़िल्मों में आया, जिसके बोल थे- ‘माय हार्ट इज़ बीटिंग’। इसके अलावा किशोर कुमार और लता मंगेशकर का गाया वो सदाबहार दोगाना- ‘दिल क्या करे जब किसी को, किसी से प्यार हो जाये’ भी बहुत मक़बूल हुआ। लता की आवाज़ में ‘जूली, जूली लव्स यू’ का ख़ुमार दिल में उतना ही गहरा उतरता, जितना मुग़ल-ए-आज़म में उनका “प्यार किया तो डरना क्या” का क्रांतिकारी ऐलान। मगर इस कैथोलिक ईसाई परिवार की कहानी से जुड़ी फ़िल्म में हम आज उस भजन की बात कर रहे हैं, जिसने राजेश रोशन की सांगीतिक समझ को बहुत आला मुक़ाम पर पहुंचाया। वो भजन है- ‘तू श्याम मेरा, सांचा नाम तेरा’, जिसे उषा मंगेशकर के साथ आशा भोसले ने गाया है।
इस गाने की तर्ज़, आलाप और मुखड़े से ही आपको अद्भुत सम्मोहन में डाल देती है। राग पहाड़ी के स्वरों में सुंदर आलाप के साथ ‘सांचा नाम तेरा’ में आशा और उषा इन दोनों मंगेशकर बहनों ने कमाल कर दिया है। एक तो राग पहाड़ी में भजन संगीतबद्ध करना काफ़ी हटकर प्रयोग कहना चाहिए। इस राग पर आधारित फ़िल्मी गीतों पर नज़र डालें तो उनमें रोमांटिक गाने ही बहुतायत में मिलेंगे। मसलन ‘चौदहवीं का चांद’ फ़िल्म का शीर्षक गीत या ‘कश्मीर की कली’ फ़िल्म का “इशारों इशारों में दिल लेने वाले” या “लग जा गले” जैसे गीत। हालांकि डी.वी. पलुस्कर का गाया कालजयी भजन “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” इसी राग पर आधारित है। लेकिन फ़िल्मों में पहाड़ी में शृंगार रस के गाने ज़्यादा याद आते हैं। राजेश रोशन ने इस राग में जैसा दोगाना रचा है, वो उनके अभ्यासी स्वभाव का प्रमाण है। याद रहे राजेश रोशन को 1974 में आयी फ़िल्म ‘कुंवारा बाप’ में अभिनेता महमूद ने ब्रेक दिया था और अगले ही साल मात्र 20 वर्ष की आयु में आपने ‘जूली’ का संगीत दिया।

‘तू श्याम मेरा’ में परदे पर अचला सचदेव और रीता भादुड़ी को घर के पूजास्थल में भजन गाते देखते हुए अचानक वर्ष 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘काला बाज़ार’ का दोगाना “ना मैं धन चाहूं, ना रतन चाहूं” याद आता है। बर्मन दादा का संगीतबद्ध यह भजन राग पहाड़ी में ही निबद्ध है। ज़ाहिर है राजेश रोशन को वैसा ही कुछ जादू रचने की ख़्वाहिश रही होगी। तभी जैसे सचिन देव बर्मन ने गीता दत्त और सुधा मल्होत्रा से वो गाना गवाया, वैसे ही राजेश रोशन ने भी आशा और उषा को लिया। उषा मंगेशकर जब गाती हैं- “हर रंग में तू ही संग में है”, तो एकदम अलग रंग में दिखती हैं। आनंद बख़्शी ने गीत में दोनों गायिकाओं को बेहतरीन पंक्तियां दी हैं- “मैं तुझमें खोई, दूजा न कोई… जागी या सोई, तू एक अपना जीवन सपना…”
पर्दे पर इस गीत के बोल पहले सुनायी देते हैं और कलाकार बाद में दिखते हैं। एक शाम जूली यानी लक्ष्मी अपनी पक्की सहेली के घर आती है, तो उसे दीया-बाती के समय का यह चित्र दिखायी देता है। ईसाई परिवार में पली-बढ़ी जूली के लिए यह नितांत अलग अनुभव है। मंत्रमुग्ध-सी वह पूजाघर के दरवाज़े से सटकर इस भक्तिमय वातावरण का आनंद लेती है। फ़िल्म ‘काला बाज़ार’ और जूली के भजन में मुख्य अंतर रस का है। “ना मैं धन चाहूं” करुणा जगाता है जबकि “सांचा नाम तेरा” नियमित संध्या वंदन के समय का भजन है।
फ़िल्म निर्देशक ने बिना लाउड हुए दोनों धर्मों से जुड़े परिवारों की दिनचर्या को बहुत बारीक़ी से रेखांकित किया है। तभी ‘भूल गया सब कुछ’, ‘ये रातें नई पुरानी’ और ‘दिल क्या करे’ जैसे, पाश्चात्य वाद्ययंत्रों से सजे गानों के बीच – ‘तू श्याम मेरा सांचा नाम तेरा’ का पहाड़ी शास्त्रीय वैभव सर्वथा अलग और एकमेवाद्वितीय दिखायी देता है।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
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