
- September 19, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
लोकरंग की लघुकथा पंकज निनाद की कलम से....
सज़ा
जबसे उसने होश संभाला था, वो तीन सरकारें बदलते देख चुका था। सब कुछ बदला, पर नहीं बदला तो उसका नसीब। न नौकरी थी, न कोई ढंग का रोज़गार। वैसे था वो ख़ुद्दार। लेकिन कहते हैं न मजबूरी और ख़ुद्दारी बहुत दिनों तक एक साथ नहीं रहते। पेट की आग सब कुछ जला देती है- नैतिकता, सदाचार, ईमानदारी- सब बेबस हैं भूख के सामने।
जब बहुत दिनों तक कोई रोज़गार नहीं मिला तो चोरियाँ करने लगा। कल रात वो चोरी करता पकड़ा गया। घर-गृहस्थी बसाने का उसका भी ख़्वाब था। घोड़ी पर बारात सजे, उसके भी अरमान थे। दूल्हा बन गाँव के आकर्षण का केंद्र बने- यह कल्पना करता था। पूरे गाँव के आकर्षण का केंद्र तो वो आज भी है, पर वो घोड़ी पर सवार नहीं है। उसका सिर मूँड़कर उसे गधे पर बैठाया गया है। उसकी बारात नहीं, जुलूस निकाला गया है।
इस मुफ़्त के मनोरंजन में सारा गाँव इकट्ठा था। मुफ़्त की चीज़ हमारे यहाँ कोई नहीं छोड़ता। ऐसे दौर में जब मुल्क में मनहूसियत माफ़ हो और मनोरंजन पर कर लगता हो, तो मुफ़्त मनोरंजन के इस सुनहरे अवसर को कोई क्यों छोड़े? तो अच्छा-ख़ासा मजमा इकट्ठा हो गया वहाँ। गधे पर बैठाने के पहले मुँह भी काला किया गया।
वो बेचारा चुपचाप गधे पर बैठा सोचता रहा कि अजब दस्तूर है दुनिया का! मुझ जैसे मामूली चोर के साथ इतना ज़ुल्म, जबकि गाँव में उससे बड़े-बड़े ज़ाहिर चोर हैं, जो ज़मीन, कुआँ, तालाब, नहर और न जाने क्या-क्या चुराकर बैठे हैं। परंतु उनके पास कितना रुतबा है! अजब दुनिया की ग़ज़ब रीत है। यहाँ चिड़िया की बीट से परहेज़ है, लेकिन हाथी का गोबर शौक से उठाते हैं।
ख़ैर, यह जुलूस गाँव के चौपाल पर आकर रुका, जहाँ उसके जुर्म का फैसला होना था। चौपाल पर लगी इस पंचायत का सरपंच एक रोबदार बूढ़ा था, जिसकी बड़ी-बड़ी मूँछें थीं। अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि उसने मूँछें रखी हैं या फिर मूँछों ने उसको रखा है।
हुक्का गुड़गुड़ाते हुए उसने कहा- “देख भाया, जे थारी पहली चोरी हेगी। इसलिये मैं थारे पर दया कर रियो हूँ। मैंने थारे लेण तीन सजा मुकर्रर की हेंगी। या तो तू सौ रुपिया जुर्माना देगो, या सौ प्याज खायगो, या फिर सौ जूते खायगो। तू अपनी पसंद की सजा चुन ले।”
सज़ा सुनकर गाँव वालों का मज़ा दोगुना हो गया। इधर बेचारा चोर भी सोच में पड़ गया कि क्या चुनूँ। सौ जूते खाऊँगा तो हड्डियों का चूरमा निकल जाएगा। और अगर सौ रुपये दूँगा तो फिर लाले पड़ जाएँगे। क्यों न सौ प्याज़ वाला विकल्प चुन लूँ- कम से कम शरीर को तो लगेगी।
वो निश्चय करके बोला- “मालको, मैं सौ प्याज़ खाऊँगा।”
उसके सामने सौ प्याज़ रखे गये। उसने पहला प्याज़ खाया। गाँव के बच्चों ने गिनती शुरू की- एक, दो, तीन, चार… दस।
अब आँखों से आँसू आने लगे। मन में शंका होने लगी कि सज़ा चुनने में कहीं ग़लती तो नहीं हो गयी। गिनती अभी भी जारी थी- चालीस, इकतालीस… अब तो मुँह से झार निकलने लगी। जैसे-तैसे वो पचास प्याज़ खा गया। लेकिन अब उसको यक़ीन हो गया कि भारी ग़लती हो गयी।
अभी भी दूसरा विकल्प सुरक्षित है। वो हाथ जोड़कर बोला- “मालको, मैं अब और न खा पाऊँगा। भले ही सौ जूते खा लूँगा।”
गाँव वालों को भरपूर हँसने का मौक़ा मिला। सरपंच भी आज मनोरंजन के ही मूड में था। बोला- “चल, तू भी के याद रखेगो किस दिलदार से पालो पड़ो है। थारी जे इच्छा भी पूरी हो जावेगी।”
उसने जल्लाद को इशारा किया। जल्लाद शायद अपनी बारी का ही इंतज़ार कर रहा था। वो भी मनोरंजन के मूड में था। उसने एक जूता उसकी पीठ में जमाया। एक, दो, तीन… बच्चों ने फिर गिनती शुरू कर दी।
दस जूतों में ही उसकी आँखों के सामने तारे झूम गये। गिनती अभी भी जारी थी। पचासवें जूते तक वो दोहरा हो गया। अब तो उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से गवाही देने लगा कि उसने यह विकल्प चुनने में भी भारी ग़लती कर दी।
वो बुक्का फाड़ कर चिल्लाया- “रहम मालको, रहम! मैं मर जाऊँगा। मैं थारे को सौ रुपयो दे दुंगो।”
भीड़ का हँस-हँसकर बुरा हाल था। उससे सौ रुपये लेकर पंचायत ने सारे तमाशे का पटाक्षेप किया।
लोग हँसते हुए घरों की ओर लौट गये। और बेचारा चोर अपने घुटनों में सिर दबाये सोच रहा था- “साला, मैंने सज़ा चुनी थी या सरकार।”

पंकज निनाद
पेशे से लेखक और अभिनेता पंकज निनाद मूलतः नाटककार हैं। आपके लिखे अनेक नाटक सफलतापूर्वक देश भर में मंचित हो चुके हैं। दो नाटक 'ज़हर' और 'तितली' एम.ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में भी शुमार हैं। स्टूडेंट बुलेटिन पाक्षिक अख़बार का संपादन कर पंकज निनाद ने लेखन/पत्रकारिता की शुरूआत छात्र जीवन से ही की थी।
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वर्तमान हालात का सजीव चित्रण…मार्मिक व सशक्त
आपकी “सज़ा”, जो लोककथात्मक व्यंग्य है, गाँव की चौपाल के बहाने पूरे शासन-तंत्र की विडंबना उजागर करती है। भूख से मजबूर गरीब चोरी करता है और समाज उसे तमाशा बनाकर दंडित करता है, जबकि बड़े चोर सम्मान पाते हैं। कथा दिखाती है कि गरीब को कभी न्याय नहीं, केवल अपमान और शोषण ही मिलता है। अंतिम वाक्य—“साला, मैंने सज़ा चुनी थी या सरकार”—पूरे तंत्र की सच्चाई है। यही सत्ता जनता को देती है: दर्द और दंड, विकल्प मात्र छल हैं। कथा हँसी के बीच गहरी पीड़ा जगाती है— यही इसकी सफलता है।
आपकी सृजन-साधना जारी रहे- शुभकामनाएं ।
–––मनोज
लोककथा को नए सन्दर्भ में भी फिट हो रही है । व्यंग्य से गहरी पीड़ा उपजती है ।यही व्यंग्य की खासियत भी है ।बेहतरीन निनाद जी की रचना ।