
- December 14, 2025
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शख़्सियत को जानिए ज़ाहिद ख़ान की कलम से....
शैलेंद्र: कला और सहजता का दुर्लभ संयोग
भारतीय सिनेमा के सौ साल से ज़्यादा के इतिहास में एक से बढ़कर एक गीतकार हुए हैं, लेकिन उनमें शैलेन्द्र की बात ही कुछ और है। आम आदमी के जज़्बात को अपने गीतों में अक्कासी करने का हुनर, उनमें औरों से कहीं ज़्यादा था। उनके गीत आज भी होठों पर सहजता से चले आते हैं। शैलेन्द्र, कवि हृदय थे और नौजवानी से ही कविता के जानिब उनकी बेहद दिलचस्पी थी। यह दिलचस्पी बढ़ी, तो कविताएँ लिखने लगे। कविताएँ, पत्र—पत्रिकाओं में छपने लगीं। कवि सम्मेलनों में उनकी उपस्थिति बढ़ गई। लेकिन फ़िल्मी दुनिया में जाएंगे या गीतकार के तौर पर अपना करियर बनाएंगे, यह बात कभी उनके दिल में न थी। तक़दीर ने उन्हें फ़िल्मी गीतकार बना दिया। फ़िल्मकार राजकपूर से शैलेन्द्र की पहली मुलाक़ात कैसे हुई और वे फ़िल्मों में किस तरह से आए ?, इसका क़िस्सा मुख़्तसर में यूॅं है। मुंबई में इप्टा ने एक कवि सम्मेलन आयोजित किया था, उसमें शैलेन्द्र अपना गीत ‘जलता है पंजाब साथियो…’ पढ़ रहे थे। श्रोताओं में मशहूर निर्माता-निर्देशक राजकपूर भी शामिल थे। उन्होंने जब ये गीत सुना, तो उन्हें ये बेहद पसंद आया। सम्मेलन के बाद राजकपूर, शैलेन्द्र से मिले और उन्हें अपनी फ़िल्म में गाने लिखने की पेशकश की। लेकिन शैलेंद्र ने इस पेशकश को यह कहकर ठुकरा दिया कि ‘‘मैं पैसे के लिए नहीं लिखता। और कोई ऐसी बात भी नहीं है, जो मुझे आपकी फ़िल्म में गाना लिखने के लिए प्रेरणा दे।’’
बहरहाल, यह वाक़िआ गुज़र गया। बात वहीं पर ख़त्म हो गई। पर एक वक़्त ऐसा भी आया, जब शैलेन्द्र को आर्थिक मजबूरियों और पारिवारिक ज़रूरतों के चलते पैसे की बेहद ज़रूरत आन पड़ी और वे ख़ुद, राजकपूर के पास पहुंच गए। फ़िल्म में गाने लिखने की उनकी पेशकश को उन्होंने मॅंज़ूर कर लिया। राजकपूर उस समय ‘बरसात’ बना रहे थे। फ़िल्म के छह गीत हसरत जयपुरी लिख चुके थे, दो गानों की और ज़रूरत थी। जिन्हें शैलेन्द्र ने लिखा। एक तो फ़िल्म का टाइटल गीत ‘बरसात में हम से मिले तुम’ और दूसरा ‘पतली कमर है, तिरछी नज़र है’। साल 1949 में आई फ़िल्म ‘बरसात’ के इन दो गीतों ने उन्हें रातों-रात देश भर में मक़बूल बना दिया। कलाकार, निर्देशक राजकपूर और शैलेन्द्र की जोड़ी ने आगे चलकर फ़िल्मी दुनिया में एक नया इतिहास रचा। उनकी जोड़ी ने एक साथ कई सुपर हिट फ़िल्में दीं। मसलन ‘आवारा’, ‘अनाड़ी’, ‘आह’, ‘बूट पॉलिश’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘अब दिल्ली दूर नहीं’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘कल, आज और कल’, ‘संगम’ और ‘मेरा नाम जोकर’। आरके फ़िल्मस के अलावा राजकपूर की ज़्यादातर फ़िल्मों ‘चोरी-चोरी’, ‘कन्हैया’, ‘आशिक़’, ‘तीसरी कसम’, ‘अराउण्ड द वर्ल्ड’, ‘सपनों का सौदागर’ आदि में भी शैलेन्द्र ने ही उनके लिए गीत लिखे।
फ़िल्मों में मसरूफ़ियत की वजह से शैलेन्द्र अदबी काम ज़्यादा नहीं कर पाए, लेकिन उनके जो फ़िल्मी गीत हैं, उन्हें भी कमतर नहीं माना जा सकता। शैलेन्द्र के इन गीतों में भी काव्यात्मक भाषा और आम आदमी से जुड़े उनके सरोकार साफ़ दिखलाई देते हैं। अपने इन फ़िल्मी गीतों में उन्होंने किसी भी स्तर का समझौता नहीं किया। शैलेन्द्र का दिल ग़रीबों के दुःख-दर्द और उनकी परेशानियों में बसता था। उनकी रोज़ी-रोटी के सवाल वह अक्सर अपने फ़िल्मी गीतों में उठाते थे। फ़िल्म उजाला में उनका एक गीत है, ”सूरज ज़रा आ पास आ, आज सपनों की रोटी पकाएंगें हम।” वहीं फ़िल्म मुसाफ़िर में वे फिर अपने एक गीत में रोटियों की बात करते हुए कहते हैं, ‘क्यों न रोटियों का पेड़ हम लगा लें।’ दरअसल, शैलेन्द्र ने अपनी ज़िंदगी में भूख और ग़रीबी को क़रीब से देखा था। वे जानते थे कि आदमी के लिए उसके पेट का सवाल कितना बड़ा है। रोज़ी-रोटी का सवाल पूरा होने तक, ज़िंदगी के सारे रंग उसके लिए बदरंग हैं। दीगर बातें बेमानी हैं। फ़िल्मों में शैलेन्द्र ने आठ सौ से ज़्यादा गीत लिखे, लेकिन इन गीतों में भी भाषा और विचारों की एक उत्कृष्टता है। अपने गीतों से उन्होंने हमेशा अवाम की सोच को परिष्कृत किया। वे जनता की नब्ज़ को पहचानने वाले गीतकार थे। अपने गीतों की लोकप्रियता के बारे में उनका कहना था कि ‘‘इन सोलह बरसों के हर दिन ने मेरे गीतकार को कुछ न कुछ सिखाया है, एक बात तो दृढ़ता से मेरे मन में विश्वास बनकर बैठ गई है कि जनता को मूर्ख या सस्ती रुचि का समझने वाले कलाकार या तो जनता को नहीं समझते या अच्छा और ख़ूबसूरत पैदा करने की क्षमता उनमें नहीं है। हॉं, वह अच्छा मेरी नज़रों में बेकार है, जिसे केवल गिने-चुने लोग ही समझ सकते हैं। इसी विश्वास से रचे हुए मेरे कई गीत बेहद लोकप्रिय हुए।’’

फ़िल्मी दुनिया के अपने छोटे से करियर यानी सिर्फ़ सत्रह साल में शैलेन्द्र ने कई फ़िल्मों में सुपरहिट गीत दिये। इनमें किन फ़िल्मों का नाम लें और किनको छोड़ दें। उनकी ज़ुबान का जादू यदि देखना है, तो इन गीतों पर नज़र डालिये, ‘आवारा हूं या ग़र्दिश में’ (आवारा), ‘मेरा जूता है जापानी’ (श्री 420), ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ (अनाड़ी), ‘तू प्यार का सागर है’ (सीमा), ‘दिल का हाल सुने दिलवाला’ (श्री 420), ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम’ (जिस देश में गंगा बहती है), ‘सजन रे झूठ मत बोलो..’ (तीसरी कसम,1966)। अपने मधुर गीतों के लिए शैलेन्द्र को अनेक अवार्डों से नवाज़ा गया। ‘ये मेरा दीवानापन है’ (यहूदी, 1958), ‘सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी’ (अनाड़ी, 1959), ‘मैं गाऊॅं तुम सो जाओ’ (ब्रह्मचारी, 1968) गीतों के लिए उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला।
फ़िल्मों में गीत लिखने की शैलेन्द्र की रचना प्रक्रिया भी अजब थी। लिखने के लिए वे सुबह-सवेरे कोई चार-पांच बजे के बीच उठकर समंदर के किनारे बैठ जाते थे। चूंकि वे काग़ज़ लेकर नहीं निकलते थे, लिहाज़ा सिगरेट की डिब्बी या उसकी पन्नी ही उनका काग़ज़ होता। उनके कई शानदार गीत इसी तरह से लिखे गए हैं। शैलेन्द्र ज़्यादातर धुन पर गीत लिखते थे। संगीतकार पहले उन्हें धुन सुनाते और उसके बाद वे उस पर गीत लिख देते। हालॉंकि, यह काम काफ़ी मुश्किल है, लेकिन उन्हें कभी परेशानी पेश नहीं आई। शैलेन्द्र ने अपने फ़िल्मी जीवन में कुल मिलाकर अट्ठाईस अलग-अलग संगीतकारों के साथ काम किया। उसमें सबसे ज़्यादा नब्बे फ़िल्में शंकर-जयकिशन के साथ कीं। ‘बरसात’ से लेकर ‘मेरा नाम जोकर’ (साल 1970) तक राजकपूर द्वारा बनाई गई सभी फ़िल्मों के टाइटल गीत उन्हीं ने लिखे, जो ख़ूब लोकप्रिय हुए।
राजकपूर, शैलेन्द्र की काफ़ी इज़्ज़त और एहतिराम करते थे और यह इज़्ज़त थी, शैलेन्द्र की बेजोड़ शख़्सियत और उनके आमफ़हम गीतों की। शैलेन्द्र की मौत के बाद दिए गए एक इंटरव्यू में राजकपूर ने उनके बारे में कहा था,‘‘शैलेन्द्र की रचना में उत्कृष्टता और सहजता का यह दुर्लभ संयोग उनके व्यक्तित्व में निहित दृढ़ता और आत्मविश्वास से सम्बद्ध है। साथ ही उनके गीतों में ऊॅंचा दर्शन था, सीधी भाषा।’’ शैलेन्द्र, फ़िल्मों में देश की ग़रीब अवाम के जज़्बात को अल्फ़ाज़ों में पिरोते थे। यही वजह है कि उनके गाने आम अवाम में काफ़ी लोकप्रिय हुए। आम आदमी को लगता था कि कोई तो है, जो उनके दुःख-दर्द को अपनी आवाज़ देता है। शैलेन्द्र के गीतों के बारे में मशहूर संगीत समीक्षक एम. देसाई की राय थी कि ‘‘शैलेन्द्र चाहते थे कि उनके गीत सब की समझ में आ आएं और उन्हें एक अनपढ़ कुली भी उसी मस्ती में गुनगुना सके, जिस अंदाज़ में कोई पढ़ा लिखा शहरी।’’
साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की चर्चित कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ पर शैलेन्द्र ने एक फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ भी बनाई। कहानी की पटकथा ख़ुद रेणु ने ही लिखी, जिसकी वजह से फ़िल्म बेहद यथार्थवादी बन गई। यह वाक़ई एक शानदार फ़िल्म थी, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। यही नहीं बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन की तरफ से इस फ़िल्म को ग्यारह पुरस्कारों से नवाज़ा गया। मास्को फ़िल्म फ़ेस्टिवल में फ़िल्म पुरस्कृत हुई। ख़्वाजा अहमद अब्बास ने इसे सेल्यूलाइड पर लिखी कविता कहा। यह बात अलग है कि व्यावसायिक तौर पर यह फ़िल्म नाकाम रही। जिसका सदमा शैलेन्द्र नहीं झेल पाए। 14 दिसम्बर, 1966 को महज़ तेतालिस साल की उम्र में उन्होंने इस दुनिया से अपनी विदाई ले ली। अपने जिगरी—दोस्त शैलेन्द्र की असमय मौत से राजकपूर को बड़ा झटका लगा। शैलेन्द्र के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा,‘‘मैं ही नहीं भारत की पूरी जनता इस महान कलाकार को कभी नहीं भुला पाएगी। क्योंकि यह उनका प्रतिनिधि था। उनका कवि था।’’

जाहिद ख़ान
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।
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